देश बदलाव तो चाहता है लेकिन कोई विकल्प भी तो नजर नहीं आ रहा है

By डॉ. दीपकुमार शुक्ल | Publish Date: Feb 4 2019 2:04PM
देश बदलाव तो चाहता है लेकिन कोई विकल्प भी तो नजर नहीं आ रहा है
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समस्याओं में उलझा देश बदलाव चाहता है। परन्तु बदलाव हो तो हो कैसे ? क्योंकि बदलाव की पृष्ठभूमि पर विकल्पहीनता की स्थिति दिखायी दे रही है। कांग्रेस या देश की अन्य किसी भी पार्टी के पास देश के लिए न तो कोई कार्य योजना है और न कुशल नेतृत्व की क्षमता ही।

2019 के आम चुनाव का बिगुल बस बजने ही वाला है। सभी महारथी अपनी-अपनी रणनीति बनाने में लगे हुए हैं। राजग को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए विपक्षी दल सारे बैर भाव भुलाकर गले मिल रहे हैं। सारी कवायद ठीक वैसी ही हो रही है जैसी सन् 1989 में हुई थी। तब भाजपा समेत सभी विपक्षी दल कांग्रेस के विरुद्ध लामबंद हुए थे। बीते पच्चीस साल से नदी के दो पाट की तरह अडिग दिखने वाले एक दूसरे के धुर विरोधी मायावती और मुलायम सिंह अब एक साथ आ चुके हैं। प्रियंका गांधी के सक्रिय हो जाने के बाद कांग्रेस अब एकला चलो की नीति पर विचार कर रही है।

 


अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से जन्मी आम आदमी पार्टी भी सत्ता के लिए कुछ भी करने को तैयार है। उधर सत्ता में पुनः वापसी के लिए राजग ने तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें नोट दूँगा की तर्ज पर जनता के लिए देश का खजाना खोल दिया है| अब निर्णय देश की जनता को करना है कि वह दिल्ली की गद्दी किसे सौंपती है। हालांकि चुनाव तक देश की राजनीतिक तसवीर में अभी कितने और रंग भरे जाएंगे इसका अंदाजा किसी को भी नहीं है।
  
किसी भी नीति पर अडिग न रहने के लिए चर्चित हो चुकी भारत की राजनीति 2019 के चुनाव में पुनः एक नया अवतार लेने के लिए तैयार खड़ी है। किसी का कोई सिद्धान्त नहीं, किसी का कोई आदर्श नहीं, किसी का कोई धरातल नहीं। सभी की बस एक ही महत्वाकांक्षा कि सत्ता आखिर मिलेगी कैसे। देश हित की सोच तो अब गुजरे जमाने की बात हो गयी है। एक दूसरे पर भ्रष्टाचार और बेईमानी का आरोप लगाकर स्वयं को ईमानदार सिद्ध करने का सूत्र सभी के पास है। राहुल गांधी राफेल डील का राग अलाप रहे हैं तो प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी कांग्रेस के जमाने के घोटाले गिना रहे हैं। अमित शाह समेत भाजपा के अन्य नेता शौचालय, रसोई गैस कनेक्शन, मुद्रा योजना से लेकर सवर्ण आरक्षण तक की बांसुरी बजा रहे हैं। तो अन्य पार्टियां विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने वाला वायदा भाजपा को याद दिला रहीं हैं। राहुल गांधी बीच-बीच में नोटबंदी की विफलता और खातों में पन्द्रह-पन्द्रह लाख का सुर्रा भी छोड़ते रहते हैं।
 
 


पश्चिम बंगाल की मुख्यमन्त्री ममता बनर्जी ने मोदी सरकार के खिलाफ अलग ढंग से ही मोर्चा खोल दिया है। सरकार की नीतियों से नाराज देश के किसानों को राहुल गांधी कर्ज माफी के आश्वासन की घुट्टी पिला ही रहे थे कि अन्तरिम बजट को आम बजट की तरह पेश करने वाले कार्यवाहक वित्तमंत्री पीयूष गोयल ने देश के करीब 12.56 करोड़ किसानों को 6000 रुपये प्रतिवर्ष की सहायता राशि तथा कर्ज के ब्याज में पाँच प्रतिशत तक की राहत देने वाली घोषणा करके फिलहाल राहुल गांधी की बोलती बंद कर दी है। अब देखना यह है कि यह लाभ देश के कितने किसानों को कब और कैसे मिल पाता है। लगभग 42 करोड़ असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को पेंशन देने की घोषणा भी बजट में की गई है। इस योजना के तहत 15000 रुपये या इससे कम कमाने वाले असंगठित क्षेत्र के लोगों को एक निश्चित राशि हर महीने जमा करनी होगी। सरकार भी उतनी ही राशि उसमें जोड़ती जाएगी। जैसे ही उस व्यक्ति की आयु साठ वर्ष हो जाएगी उसे 3000 रुपये प्रतिमाह बतौर पेंशन मिलने लगेगी। हर महीने जमा होने वाली राशि का निर्धारण आयु के आधार पर किया जाएगा। 18 वर्ष की आयु वाले व्यक्ति को लगभग 55 रुपये प्रतिमाह जमा करने होंगे लेकिन इस योजना के लाभार्थी को सरकार ढूंढ़ेगी कैसे इसका जवाब किसी के भी पास नहीं है। कर योग्य राशि की सीमा 2.50 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपये करके सरकार ने देश के मध्यम वर्ग को भी साधने की पुरजोर कोशिश की है।
 
पिछली सभी सरकारें चुनाव पूर्व के अन्तरिम बजट को लोकलुभावन बनाने का सदैव प्रयास करती रही हैं इसलिए इस सरकार के अन्तरिम बजट को देखकर किसी को भी आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। परन्तु इतना तो सभी को पता है कि पिछले सभी अन्तरिम बजट मात्र चुनावी घोषणा-पत्र ही साबित हुए हैं। तब फिर इस सरकार के अन्तरिम बजट को अलग से कैसे देखा जा सकता है। योजना बनाना अलग बात है और उसे लागू करके देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना दूसरी बात है।
 


 
प्रधानमन्त्री जी ज़ोरशोर से यह दावा करते हैं कि उन्होंने 3 लाख कंपनियों को बन्द करवा कर काले धन को रोकने का काम किया है। निश्चित रूप से यह कदम सराहनीय एवं स्वागत योग्य है। परन्तु उन कम्पनियों में काम करने वाले करोड़ों कर्मचारी रोजी रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं। उनकी सुधि लेने वाला कहीं कोई नहीं है। देश की सबसे बड़ी रियल एस्टेट कम्पनी पीएसीएल को भी सन् 2014 में बन्द कराया गया था। उसके पौने छह करोड़ निवेशक अपनी गाढ़ी कमाई को वापस पाने के लिए जहां-तहां गुहार लगा रहे हैं। परंतु कहीं कोई सुनने वाला नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाल व्यवस्था, भ्रष्टाचार, असुरक्षा, बेरोजगारी और मंहगाई से जूझते देश को आखिर किस विकास का सपना दिखाया जा रहा है ? बिजली कनेक्शन मुफ्त, गैस कनेक्शन मुफ्त। लेकिन बिजली का बिल अदा करने और गैस खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आएंगे, जब लोगों के पास रोजगार ही नहीं है ? उपरोक्त परिस्थितियों में उलझा देश बदलाव चाहता है। परन्तु बदलाव हो तो हो कैसे ? क्योंकि बदलाव की पृष्ठभूमि पर विकल्पहीनता की स्थिति स्पष्ट तौर पर दिखायी दे रही है। कांग्रेस या देश की अन्य किसी भी पार्टी के पास देश के लिए न तो कोई कार्य योजना है और न कुशल नेतृत्व की क्षमता ही। उलटा कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी एक परिवार विशेष की विरासत बन कर रह गई है।
 
इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीते सभी चुनावों की तरह यह चुनाव भी आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से ओतप्रोत रहेगा। पंडित सोई जो गाल बजावा की उक्ति को जो जितना अधिक चरितार्थ कर पाएगा वह उतना ही सफल होगा क्योंकि आजादी के सत्तर वर्ष बाद भी यह देश लोकतन्त्र को सुचारू रूप से सफल बनाने के योग्य नहीं बन पाया है। लोभ, लालच और मुफ्तखोरी की कुवृत्ति से हम पहले भी ग्रसित रहे हैं, आज भी हैं और आगे भी बने रहेंगे।
 
डॉ. दीपकुमार शुक्ल
(स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

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