हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना चाहते थे डॉ. आंबेडकर

By आशीष वशिष्ठ | Publish Date: Dec 6 2018 3:48PM
हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना चाहते थे डॉ. आंबेडकर

हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को वे समाप्त करना चाहते थे इसीलिए उनके विचारों में हिन्दू धर्म एवं व्याप्त ब्राह्मणवाद के विरुद्ध कटुता और आक्रामकता दिखती है, लेकिन इसका यह अभिप्राय कतई नहीं है कि उन्हें भारतीय संस्कृति और इसकी विरासत का अभिमान नहीं होता।



भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर सिर्फ दलितों के ही नहीं बल्कि सर्व समाज के हितैषी थे। लिंग भेद पर प्रहार करने वाले और समान नागरिक संहिता की वकालत करने वाले डॉ. अंबेडकर भारत वर्ष के पहले चिंतक थे। डॉ. आंबेडकर’ ने सामाजिक उत्पीड़न और वंचना के शिकार लोगों के लिए आजीवन संघर्ष किया। वे अपने समय के सर्वाधिक विद्वान और सुविज्ञ नेताओं में से थे। जीवन में तरह-तरह के अपमान, उपेक्षा और उलाहने सहते हुए वे आगे बढ़े। उन लोगों को आवाज दी जिन्हें दमन सहते-सहते चुप्पी साधने की आदत पड़ चुकी थी। वे सही मायने में ‘मूकनायक’ बने। वंचितों के हित में सतत संघर्ष कर जननायक कहलाए। वे अपने जीवन में ही किवंदति बन चुके थे। उन्होंने भारतीय समाज को समानता, सद्भाव, न्याय एवं बंधुता के रास्ते पर लाने के लिए सतत संघर्ष किया। डॉ. अंबेडकर केवल दलितों के ही चिंतक नहीं, बल्कि सर्व समाज के हितों की रक्षा करने की सोच वाले व्यक्ति थे। उन्होंने सदैव उपेक्षित, शोषित व पीड़ित लोगों की व्यथाओं को समझ कानून का निर्माण किया। बाबा साहब का जीवन सर्वसमाज के लिये था।

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डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक नेता, वकील, गरीबों के मसीहा और देश के बहुत बड़े नेता थे, जिन्होंने समाज की बेड़ियां तोड़ कर विकास के लिए कार्य किए। उन्होंने अपना सारा जीवन भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। डॉ. आंबेडकर उन लोगों के नेता थे जो एक साथ दो गुलामियां झेल रहे थे। राजनीतिक गुलामी के अलावा सामाजिक दासता, जिनके शिकार वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते आए थे। ऐसे लोगों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन थी, जब तक सामाजिक दासता से मुक्ति न हो। ऐसे ही सामाजिक-सांस्कृतिक दलन का शिकार रहे लोगों के मान-सम्मान और आजादी के निमित्त उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया। इसके लिए उन्हें दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा। पहला मोर्चा देश की आजादी का था। दूसरा अपने लोगों के सामाजिक मान-सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता का। उनके लिए सामाजिक आजादी राजनीतिक स्वतंत्रता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी। उनका पूरा आंदोलन सामाजिक स्वतंत्रता एवं समानता पर केंद्रित था। कोरी राजनीतिक स्वतंत्रता को वे वास्तविक स्वतंत्रता मानने को तैयार ही नहीं थे।

डॉ. आंबेडकर मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने का हक देने के पक्षधर थे। उन्होंने छुआछूत जैसे घिनौनी निकृष्टतम सामाजिक व्यवस्था को पशुता की संज्ञा दिया था। उन्होंने अपनी उपेक्षा, अवहेलना एवं अपमान को सतत् झेलने के बाद भी समष्टि के लिये निजी हितों एवं स्वार्थों को त्यागने की भावना थी। वे एक महान वैज्ञानिक थे। अपनी विश्लेषण क्षमता से उन्होंने समाज के विभिन्न पक्षों के व्यावहारिक एवं शास्त्रीय दोनों दृष्टियों से देखा। भारतीय समाज के विषमतामूलक तत्वों को जड़ से उखाड़ने के लिए उनके क्रान्तिकारी विचार आज भी प्राणवान हैं। 
 


 
डॉ. आंबेडकर एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज का स्वप्न देखते थे, जिसमें महत्ता और सामाजिक स्तर के मामले में सभी व्यक्तियों के साथ समान रूप से व्यवहार किया जाए। वह सामाजिक असमानता और शोषण के कारकों को पूरी तरह से खारिज करते थे। वह मानते थे कि एक व्यवस्था के भीतर समतावादी न्याय सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को कायम करने की जरूरत होती है। चूंकि जाति व्यवस्था इन तीन बुनियादी तत्वों का उल्लंघन करती है, जिसके चलते यह भारतीय समाज में न्याय के विचार को जड़ जमाने में मुख्य अवरोध है।


 
आंबेडकर के लिए कानून एक ऐसी चीज है, जो सबसे वंचित लोगों के अधिकारों की गारंटी देता है। आंबेडकर ने जिस हिंदू कोड बिल को संसद में पेश किया था, वह ब्राह्मणवादी कानूनों, हिंदू पारिवारिक संहिता को खारिज करता है। यह बिल पुत्र और पुत्री दोनों को उनके पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार प्रदान करता है। इस बिल ने एकल विवाह प्रथा और तलाक के मामले में महिलाओं के पक्ष में क्रन्तिकारी प्रावधान किए।
 
आंबेडकर ने धर्म को ‘सर्वधर्म समभाव’ के रूप में देखा और माना। उनका स्पष्ट मत था कि नियमबद्ध धर्म के स्थान पर ‘सिद्धान्तों’ का धर्म होना चाहिए। आगे आंबेडकर ने धर्म को चार सिद्धान्तों में प्रतिपादित किया। धर्म नैतिकता की दृष्टि से प्रत्येक धर्म का मान्य सिद्धांत है, .....धर्म बौद्धिकता पर टिका होना चाहिए, जिसे दूसरे शब्दों में विज्ञान कहा जा सकता है।’ .....इसके नैतिक नियमों में स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व भाव का समावेश हो, जब तक सामाजिक स्तर पर धर्म में ये तीन गुण विद्यमान नहीं होगें, धर्म का विनाश हो जाएगा, ......धर्म को, दरिद्रता को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। .....इसलिए डॉ॰ आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को पसन्द किया कि वह समानता पर आधारित धर्म है। अन्ततः सीमित शब्दों में आंबेडकर के धर्म के दृष्टिकोण के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि नियमबद्ध धर्म के स्थान पर सिद्धांतों का धर्म होना चाहिए।
 


दलित शोषित समाज का सशक्तीकरण एवं अछूतोद्वार के उद्देश्य को प्रमुखता प्रदान करने के कारण सामान्यतः उन्हें एक वर्ग विशेष के नेता या उन्नायक के रूप में देखा जाता है। यह उनके कृतित्व एवं बहुआयामी चिन्तन के साथ अन्याय है। यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए तो दिखता है कि उनका भी मूल उद्देश्य समाज और राष्ट्र निर्माण है। उनकी मूल प्रेरणा जाति न होकर सामाजिक समन्वय और राष्ट्रीय एकता ही है। राष्ट्र की एकता, सम्प्रभुता, अखंडता, दृढ़ता ही उनका अभीष्ट है, केवल माध्यम अलग है। यह उल्लेखनीय है कि डॉ. आंबेडकर ने अपने राजनीतिक जीवन में ऐसा कोई प्रसंग नहीं आने दिया जिससे कोई यह कह सके कि उन्होंने देशहित से समझौता किया और अपने तथा जाति समूह के हित को प्राथमिकता प्रदान की।
 
 
राष्ट्र के लिए आवश्यक तत्वों की चर्चा करते हुए डॉ. आंबेडकर का कथन है, ”राष्ट्र निर्माण के लिए प्रथम आवश्यकता है सम्पन्न विरासत की स्मृति का सामान्य स्वत्व और दूसरी है वास्तविक सहमति। एक साथ विकास करने की उत्कट अभिलाषा, अविभाजित उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त निधि को सुरक्षित रखने की इच्छा। राष्ट्र, व्यक्ति की भांति विगत दीर्घकाल के प्रयास त्याग और लगन का परिणाम है। एक साहसिक अतीत, महान पुरुष तथा राष्ट्र का वैभव ये सब मिलकर सामाजिक पूंजी संचित करते हैं, जिसके ऊपर राष्ट्रीय विचारधारा की नींव पड़ती है। राष्ट्रीय जनता के लिए आवश्यक शर्ते हैं- अतीत का सम्मिलित गौरव, वर्तमान की सम्मलित इच्छाशक्ति, मिलजुलकर किया हुआ महान कार्य और भविष्य में पुनरू करने’ का संकल्प। जिस भवन (राष्ट्र) को हमने निर्मित किया है, हमें प्रिय है। इसे हम अपने उत्तराधिकारियों के सुपुर्द करेंगे।” उनकी यह सुन्दर भावना ही वास्तव में राष्ट्रवाद है। 
 
हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को वे समाप्त करना चाहते थे इसीलिए उनके विचारों में हिन्दू धर्म एवं व्याप्त ब्राह्मणवाद के विरुद्ध कटुता और आक्रामकता दिखती है, लेकिन इसका यह अभिप्राय कतई नहीं है कि उन्हें भारतीय संस्कृति और इसकी विरासत का अभिमान नहीं होता। उन्होंने अपने कष्ट का उल्लेख करते हुए ‘बहिष्कृत भारत’ पत्रिका में ‘हिन्दुओं का धर्मशास्त्र’ शीर्षक से संपादकीय लिखा, ”अति प्राचीन काल के वैभव संपन्न राष्ट्रों में हिंदू राष्ट्र भी एक है। मिस्र, रोम, ग्रीस आदि का अस्तित्व समाप्त हो गया परंतु हिन्दू राष्ट्र आज तक जीवित है, इसलिए बलवान है यह कहना भी अपने को धोखे में रखने की बात है। हिंदू राष्ट्र की पराजय तथा उसके पतन के कारणों में उसका भेदभाव मूलक धर्मशास्त्र भी है। यह हमें मानना पड़ेगा।
 
डॉ. आंबेडकर के जीवन लक्ष्य को अनेकानेक रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है। विषमताओं और सदियों से संघर्षरत आंबेडकर को अनेकानेक स्वार्थी राजनीतिकों ने अपनी क्षुद्र राजनीति में कैद कर दिया है। परंतु वे सदैव राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रोन्नति के लिए तत्पर और सन्नद्ध रहे। इसलिए उनके भाषण के एक अंश का उल्लेख प्रासंगिक है, ”मैं यह स्वीकार करता हूं कि कुछ बातों को लेकर सवर्ण हिन्दुओं से मेरा विवाद है परंतु मैं आपके समक्ष यह प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।”
 
राष्ट्र निर्माण ही बाबा साहेब का एकमात्र अभीष्ट था। इसीलिए उन्होंने जहां दलित, शोषित, वंचित समाज के उत्थान में अपना सर्वस्व लगाया वहीं उन्होंने संविधान के माध्यम से सर्वोपयोगी, सर्वसमावेशी, ऐसे प्रावधान किए जिससे आज भारत समग्र दुनिया के सफलतम लोकतंत्र के रूप में स्थापित है। बाबा साहेब के योगदान का स्मरण करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्रीगुरुजी ने 1973 में भीमराव साहित्य संघ, मुंबई के अध्यक्ष शिरीष कडलाक के नाम पत्र में लिखा था, ”वंदनीय डॉ. आंबेडकर की पवित्र स्मृति को नमन करना मेरा स्वाभाविक कर्तव्य है। भारत के संदेश की गर्जना द्वारा उन्होंने सारी दुनिया में खलबली मचाई, उन्होंने कहा कि दीन, दुर्बल, दरिद्र, अज्ञान में डूबे भारतवासी ही मेरे लिए ईश्वर स्वरूप हैं, उनकी असाधारण करामात है, उन्होंने राष्ट्र के ऊपर असीम उपकार किया है। वे ऐसे श्रेष्ठ व्यक्ति हैं कि उनसे उऋण होना कठिन है।”
 
युगदृष्टा व दलितों और पिछड़ों के इस मसीहा ने देश में नासूर बन चुकी छूत-अछूत, जाति-पाति, ऊंच-नीच आदि कुरीतियों के उन्मूलन के लिए अंतिम सांस तक अनूठा और अनुकरणीय संघर्ष किया। उन्होंने 6 दिसम्बर, 1956 को अपने अनंत संघर्ष की बागडोर नए युग के कर्णधारों के हाथों सौंप, महापरिनिर्वाण को प्राप्त हो गए। दलितों के महान मुक्तिदाता और भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का निधन हुए हालांकि 62 वर्ष हो चुके हैं, फिर भी भारतीय समाज पर उनके विचारों का गहरा प्रभाव कायम है। समाज में व्याप्त कुरीतियों को त्यागना व उनकी शिक्षाओं की अलख देशभर में जगाना ही बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 
 
-आशीष वशिष्ठ

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