चुनावी वर्ष में 'चुनावी बजट' आना ही था, आलोचना की बजाय इसमें राहत देखें

By आशीष वशिष्ठ | Publish Date: Feb 2 2019 4:22PM
चुनावी वर्ष में 'चुनावी बजट' आना ही था, आलोचना की बजाय इसमें राहत देखें
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यह बजट मोदी के नए भारत के विजन को दर्शाता है। चुनावी वर्ष में पेश बजट का चुनावी बजट कहा जाना कोई नयी बात नहीं है। लेकिन मोदी सरकार ने 2030 में 10 सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयामों को सूचीबद्ध करते हुए अगले दशक के लिए अपनी परिकल्पना पेश की है।

2019 के आम चुनाव से पहले केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल का आखिरी बजट पेश किया है। बजट में किसान, नौकरीपेशा, महिलाओं पर मेहरबानी दिखाई गई। आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर प्रभारी मंत्री पीयूष गोयल ने चुनावी चाशनी में डूबा हुआ बजट पेश किया है। बजट का मुख्य आकर्षण है आयकर सीमा मे छूट। अब पांच लाख तक की आय करमुक्त होगी। रक्षा बजट पहली बार तीन हजार करोड़ के पार हो गया है। कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने बजट में लोक लुभावन घोषणाओं के साथ मोदी सरकार की उपलब्धियों का भी जिक्र किया है। वर्तमान परिस्थिति के मद्देनजर वित्त मंत्री ने काफी व्यवहारिक बजट बनाया है। बजट में सभी क्षेत्रों को तरजीह दी गई और आने वाले समय में क्या होगा इसके संकेत दिए गए हैं। सरकार के एजेंडे में आम आदमी का हित सबसे ऊपर है। कृषि क्षेत्र के विकास के लिए सरकार ने उत्साहवर्धक माहौल तैयार करने के लिए कई प्रावधान किए हैं।
 
 
केंद्र सरकार की ओर से हर साल पेश किए जाने वाले बजट के बाद कुछ प्रतिक्रिया आम होती है। सत्ता पक्ष के नेता इसकी सराहना करते हैं तो विपक्ष इसकी आलोचना। प्रतिक्रिया देने वाले कुछ तो ऐसे होते हैं जिनकी प्रतिक्रिया बजट पेश होने के पहले ही तैयार होती है। उद्योग जगत ने बजट को सकारात्मक बताया है। जबकि विपक्ष इसे ‘थोथा चना बाजे घना’ और ‘चुनावी जुमला बजट’ बता रहा है। बीजेपी ने इसे ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाला बजट करार दिया है। चुनावी साल को देखते हुए जिसकी उम्मीद थी, वही हुआ। मोदी सरकार ने अपने छठे बजट में सैलरीड क्लास, पेंशनर्स, वरिष्ठ नागरिकों और छोटे व्यापारियों को बड़ा तोहफा दिया है। वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने टैक्स फ्री इनकम की सीमा बढ़ाकर दोगुनी कर दी। अब 2.5 लाख रुपये की जगह 5 लाख रुपये तक की आय पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। पांच लाख रुपये तक की व्यक्तिगत आय पूरी तरह से कर मुक्त होगी और विभिन्न निवेश उपायों के साथ 6.50 लाख रुपये तक की व्यक्तिगत आय पर कोई कर नहीं देना होगा। व्यक्तिगत कर छूट का दायरा बढ़ने से तीन करोड़ करदाताओं को 18,500 करोड़ रुपये तक का कर लाभ मिलेगा। वेतनभोगी तबके के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन को 40,000 से बढ़ाकर 50,000 रुपये किया गया। इस टैक्स छूट का लाभ 3 करोड़ मध्यवर्गीय करदाताओं को मिलेगा। 


 
देश की जीडीपी में लगभग 17 प्रतिशत मेहनतकशों को रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र को इस आम बजट से कई बड़ी उम्मीदें थीं। कम एमएसपी, मानसून की मार, कर्ज के बोझ और बाजार ने किसानों की इनकम दोगुनी करने के रास्ते को बहुत संकरा कर दिया है। ऐसे में गांव और किसान की चिन्ता भी बजट में साफ तौर पर दिखती है। मोदी सरकार ने किसानों के खाते में सीधे 6 हजार रुपये हर साल डालने की घोषणा की है। इसका फायदा उन किसानों को मिलेगा जिनकी जमीन 2 हेक्टेयर से कम है। विपक्ष किसानों को दी जाने वाली सहायता राशि की घोषणा को ऊंट के मुंह में जीरा बताा रहा है। सहायता राशि भले ही कम हो लेकिन इस तरह की ठोस पहल पूर्व में नहीं हुई है। किसानों के लिए और बेहतर किया जा सकता था। ग्रामीण रोजगार पर ध्यान देते हुए मनरेगा के लिए 60 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। गौमाता के लिए कामधेनु योजना और राष्ट्रीय गोकुलु आयोग बनाने की घोषणा भी बजट में की गयी है। बजट में किसानों के साथ-साथ मजदूरों और श्रमिकों के लिए तोहफों का पिटारा खोल दिया है। 
 
 
बजट में मोदी सरकार ने तोहफों की बौछार के बावजूद कई सेल्फ गोल भी किये हैं। मोदी सरकार ने ग्रामीण भारत में व्याप्त असंतोष और समस्याओं को स्वीकार तो किया है लेकिन बजट में की गयी घोषणाएं अपर्याप्त हैं। वहीं युवाओं के आगे मुंहबाये खड़ी बेरोजगारी की समस्या के समाधान के लिये कोई ठोस कदम बजट नहीं किया गया है। गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण तो दिया लेकिन अपने चुनावी वादे के अनुसार युवाओं को नौकरिया देने में मोदी सरकार असफल रही है। अंतरिम बजट में रोजगार की बात को लेकर कोई साफ तस्वीर पेश नहीं की गयी है। मोदी सरकार का यह बजट-किसान, गांव, गरीब पर फोकस है। जिसे देर आयद, दुरुस्त आयद कहा जा सकता है। मोदी सरकार ने इस बजट के माध्यम से अपनी कॉरपोरेट-मित्र छवि से उबरने की कोशिश तो है ही, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी संजीवनी देने की बड़ी कोशिश है। सरकार ने आखिर महसूस कर लिया कि किसान, गरीब और गांव की हालत सुधारे बगैर अर्थव्यवस्था को सुधारा नहीं जा सकता है।


 
नोटबंदी और जीएसटी के बाद से ही उद्योग जगत और विशेषकर व्यापारी वर्ग मोदी सरकार से नाराज चल रहा है। जीएसटी को लेकर व्यापारी वर्ग में नाराजगी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। व्यापारी वर्ग को मोदी सरकार के आखिरी बजट से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन बजट में अर्थव्यवस्था के सभी वर्गों को सुविधाएं दी गई है लेकिन व्यापारी वर्ग को पूरी तरह नकार दिया गया है। व्यापारी देश की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी का काम करते हैं। बजट को देख कर लगता है कि व्यापारी वर्ग की मांगों और परेशानियों की ओर से मोदी सरकार ने मुंह फेर लिया है। व्यापारी वर्ग की अनदेखी चुनावी वर्ष में मोदी सरकार को भारी पड़ सकती है।  
 
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले साढ़े चार सालों में मोदी सरकार ने लगभग हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किए हैं। इस दौरान केंद्र सरकार ने आर्थिक क्षेत्र में कई सुधारों की शुरुआत की। इनमें गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी), इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी), कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश से जुड़े सुधार, जन-धन योजना और आधार-बैंक को जोड़ने वाला सब्सिडी सुधार कार्यक्रम प्रमुख हैं। हालांकि, ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जिनमें मोदी सरकार कोई अहम सुधार करने में नाकाम रही है। इसकी एक मिसाल है- जमीन और श्रम सुधार। ये उन लोगों के लिए सबसे बड़ी बाधा हैं, जो भारत में उद्योग लगाना चाहते हैं। जीएसटी और नोटबंदी को लेकर मोदी सरकार की जमकर आलोचना की, लेकिन ये कठोर कदम आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती देंगे ये बात धीरे-धीरे व्यापक तौर पर देश की जनता समझने लगी है। 
 


 
भ्रष्टाचार और आर्थिक घोटालों पर मोदी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति काबिलेतारीफ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की खास बात ये है कि सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार से दूर रहे हैं। जिस तरह पिछली सरकार 2-जी स्कैम, कोयला स्कैम, कॉमनवेल्थ स्कैम, चॉपर स्कैम, आदर्श स्कैम के आरोपों में घिरी रही, उससे उलट मोदी सरकार में भ्रष्टाचार के मामले कम आए। हालांकि राज्य सरकारों पर घोटालों के आरोप लगे। पिछले काफी समय से कांग्रेस मोदी सरकार की छवि पर दाग लगाने के लिये राफेल विमान खरीद में गड़बड़ी के आरोप ‘बिना पक्के सुबूतों’ के लगा रही है। भ्रष्टाचार कम होने से अर्थव्यवस्था को गति व बल मिला है, इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता। 
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में जन-धन योजना की घोषणा स्वतंत्रता दिवस के मौके पर की थी। इस योजना का मकसद देश के हर नागरिक को बैंकिंग सुविधा से जोड़ना है और इन योजना के तहत 31.31 करोड़ लोगों को फायदा भी मिला है। बताया जाता है कि आर्थिक जगत के क्षेत्र में ये दुनिया की सबसे बड़ी योजना है। मोदी सरकार ने पिछले साढ़े चार सालों में डिजिटाइजेशन पर काफी जोर दिया है। अब बैंकिंग क्षेत्र से लेकर अन्य सरकारी कार्यों में डिजिटाइजेशन को बढ़ावा मिला है, जिससे लोगों को काफी राहत मिली है। पिछले साढ़े चार के कार्यकाल में मोदी सरकार द्वारा चलायी गयी आयुष्मान भारत-राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण मिशन, सोलर चरखा मिशन, राष्ट्रीय पोषण मिशन, एंटी नॉरकोटिक्स योजना, गोबर-धन योजना, हरित क्रांति-कृषोन्नति योजना, समग्र शिक्षा योजना, अटल भूजल योजना, पहला “खेलो इंडिया स्कूल गेम्स”, राष्ट्रीय बांस मिशन, एमएसएमई के लिए 59 मिनट में एक करोड़ रूपये का ऋण, दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना, प्रधानमंत्री ‘मेक इन इंडिया’, स्वच्छ भारत अभियान, उज्ज्वला योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना और मिशन इंद्रधनुष की सफलता ने देश की दशा और दिशा बदलने का काम किया है।
 

 
यह बजट मोदी के नए भारत के विजन को दर्शाता है। चुनावी वर्ष में पेश बजट का चुनावी बजट कहा जाना कोई नयी बात नहीं है। लेकिन मोदी सरकार ने 2030 में 10 सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयामों को सूचीबद्ध करते हुए अगले दशक के लिए अपनी परिकल्पना पेश की है। वित्तमंत्री ने कहा कि, हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहां गरीबी, कुपोषण, गंदगी और निरक्षरता बीते समय की बातें होंगी। उन्होंने कहा कि भारत एक आधुनिक, प्रौद्योगिक से संचालित, उच्च विकास के साथ एक समान और पारदर्शी समाज होगा। अगर ये परिकल्पना जमीन पर उतर पाएं तो आने वाले समय में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शुमार होगा। मोदी सरकार द्वारा पेश अंतरिम बजट ‘न्यू इंडिया’ के सपनों वाला चुनावी बजट है। गांवों, किसानों, मध्यम वर्ग और श्रमिकों की तरक्की पर जोर साफ दिख रहा है। लब्बोलुबाब यह है कि मोदी सरकार का आखिरी बजट भविष्य के लिए उम्मीदें जगाने वाला है। 
 
-आशीष वशिष्ठ

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