देशभर के डॉक्टरों ने मरीजों को मौत के मुंह में ढकेला

By अजय कुमार | Publish Date: Jun 18 2019 12:40PM
देशभर के डॉक्टरों ने मरीजों को मौत के मुंह में ढकेला
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दरअसल, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के आह्वान पर पश्चिम बंगाल और पूरे भारत मे बढ़ रहे हमलों के विरोध में चिकित्सक हड़ताल पर थे। उत्तर प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों के जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल से अस्पताल की स्वास्थ्य सेवायें पूरी तरह से चरमरा गई थीं।

उत्तर प्रदेश में भी सरकारी और निजी चिकित्सकों की हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह से चरमरा गईं। हड़ताल के चलते कितने मरीजों को जान से हाथ धोना पड़ा इसका आंकड़ा शायद ही किसी को पता चल पाएगा। उत्तर प्रदेश के डॉक्टरों के कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में डॉक्टर्स के साथ अभद्रता के मामले में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के आहवान पर कार्य बहिष्कार का बड़ा असर पूरे उत्तर प्रदेश में पड़ा। लखनऊ में संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) सहित सभी बड़े अस्पताल के डॉक्टर्स ने हाथ पर काली पट्टी बांधकर कार्य बहिष्कार किया, जिसके कारण राजधानी लखनऊ सहित प्रदेश में चिकित्सा सेवा पूरी तरह से ठप हो गई थी। मरीज के साथ तीमारदार बेहद परेशान दिखे। सबको एक ही चिंता थी कि क्या किसी की जान की कीमत पर हड़ताल की जा सकती है। एक थप्पड़ की कीमत बेगुनाह मरीजों को मौत के मुंह में डालकर नहीं चुकाई जा सकती है। यह सच है कि डॉक्टरों के साथ अक्सर अभद्रता और मारपीट की खबरें आती रहती हैं, तो दूसरी तरफ इस बात से भी इंकर नहीं किया जा सकता है कि अपवाद को छोड़कर ज्यादात्तर चिकित्सक अपने पेशे के साथ इंसाफ नहीं करते हैं। जहां सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जान से खिलवाड़ आम बात है। वहीं प्राइवेट अस्पताल लूट का अड्डा बने हुए हैं।


आश्चर्य होता है कि सरकारी अस्पतालों के बाहर न केवल निजी अस्पतालों की बड़े−बडे बैनर पोस्टर लगे रहते हैं बल्कि निजी अस्पतालों के दलाल भी दूरदराज से भोले भाले मरीजों और उनके तीमारदारों के इर्दिगर्द मंडराते मिल जाते हैं। कई मरीजों को तो यह बहला−फुसला का यहां से निजी अस्पतालों में ले जाने में कामयाब भी हो जाते हैं। प्राइवेट अस्पतालों की एम्बुलेंस करीब−करीब सभी सरकारी अस्पतालों के गेट के बाहर खड़ी मिल जाती हैं। ऐसा नहीं है कि इस बात की जानकारी सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों या अन्य स्टाफ को नहीं है, लेकिन जब मुंह और आंख बंद रखने की कीमत जेब में पहुंच जाती है तो इन सबकी आत्मा मर जाती है।  
 
दरअसल, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के आह्वान पर पश्चिम बंगाल और पूरे भारत मे बढ़ रहे हमलों के विरोध में चिकित्सक हड़ताल पर थे। उत्तर प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों के जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल से अस्पताल की स्वास्थ्य सेवायें पूरी तरह से चरमरा गई थीं। इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा था। लखनऊ में मेडिकल यूनिवर्सिटी के साथ ही आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज, मेरठ व प्रयागराज के मेडिकल कॉलेज में भी काम ठप थे। सीनियर के साथ जूनियर डॉक्टर्स काली पट्टी पहनकर अपना विरोध जता रहे थे। एसजीपीजीआई, केजीएमयू और लोहिया संस्थान में जूनियर डॉक्टर के कार्य बहिष्कार करने पर मरीज परेशान रहे। हड़ताल की घोषणा के बाद भी राजधानी में केजीएमयू और लोहिया संस्थान में मरीज आ रहे थे और उनके बैरंग लौटने का सिलसिला भी जारी रहा था। वहीं जांच के लिए भी मरीज भटकते रहे। डाक्टरों के कार्य बहिष्कार के चलते आज लखनऊ में केजीएमयू, पीजीआई और लोहिया संस्थान में मरीजों को नहीं देखा गया। इन संस्थानों के पर्चा काउंटर पर सन्नाटा पसरा रहा। राजधानी के निजी अस्पतालों में भी मरीजों का बुरा हाल रहा। फातिमा, विवेकानंद पॉलीक्लीनिक, चरक हॉस्पिटल समेत कई बड़े अस्पतालों की ओपीडी बंद रही। सुबह आठ बजे से शुरू होने वाली ओपीडी में हजारों की संख्या में लोग वापस हुए।
 
लब्बोलुआब यह है कि कोलकत्ता के डॉक्टर को एक थप्पड़ मारने की कीमत पूरे देश के मरीजों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, जो किसी भी दशा में सही नहीं ठहराया जा सकता है। यूनियन या एसोसिएशन को इस ओर गौर करना चाहिए। उनकी जितनी जिम्मेदारी डॉक्टरों को सम्मान दिलाने की है उससे कम मरीजों को सही और समय पर इलाज मिले की भी है। वह किसी एक पक्ष को अनदेखा नहीं कर सके हैं। कुछ भी हो डाक्टरों को अपने पेशे का सम्मान करना चाहिए। उन्हें सियासी पचड़ों से बच कर रहना चाहिए। अगर डॉक्टर चाहते हैं कि मरीज उनका सम्मान करें तो उन्हें भी अपने पेशे और मरीज के प्रति ईमानदार रहना होगा। ऐसे ही डॉक्टरों को धरती का भगवान नहीं कहा जाता है। 


सरकारी अस्पतालों में जिस तरह से अमीर−गरीब, पहुंचदार और बिना पहुंच वाले मरीजों के बीच में मतभेद किया जाता है। वह कतई बर्दाश्त योग्य नहीं है। सरकारी अस्पतालों में आने वाली सस्ती−मंहगी दवाओं पर इन अस्पतालों के चिकित्सक और स्टाफ गिद्ध दृष्टि जमाए रहते हैं। यह दवाएं सिर्फ वीआईपी मरीजों और उनके परिवार के लोगों तथा पहुंचवाले मरीजों को ही मिल पाती हैं। बाकी दवाएं बाजार से लेकर स्टाफ के घरों तक में पहुंच जाती है। 


 
ज्ञातव्य हो, कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टरों के साथ मारपीट की घटना के बाद देशभर के डॉक्टर लामबंद हो गए थे। कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक मरीज की मृत्यु के बाद उसके परिजनों ने दो डॉक्टरों के साथ मारपीट की थी। जिसके बाद बीते मंगलवार से ही पश्चिम बंगाल में डाक्टर हड़ताल पर थे। आईएमए ने केंद्र सरकार से डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय अस्पताल सुरक्षा कानून बनाने और उसे पूरे देश में सख्ती से लागू कराने की मांग कर रही थी।
 
- अजय कुमार
 

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