LIC के IPO ने विनिवेश के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है

LIC के IPO ने विनिवेश के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है
Prabhasakshi

2003 में बहुचर्चित मारुति उद्योग लिमिटेड के सरकारी हिस्सेदारी को सुजुकी मोटर को बेचा गया और इसके बाद मारुति ने अपनी वास्तविक क्षमता का प्रदर्शन किया। 2022 के प्रारम्भ में भारतीय कार बाजार में मारुति सुजुकी की हिस्सेदारी 44.2% हो गई।

सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC आखिरकार देश का सबसे बड़ा आईपीओ 4 मई को लेकर बाज़ार में आ रही है। इसी के साथ एक बार फिर विनिवेश का मुद्दा देश के विमर्श में है। 11 अक्टूबर, 2021 को नई दिल्ली में इंडियन स्पेस एसोसिएशन के उद्घाटन भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था की सरकारों को enabler होना चाहिए न की handler इसके मायने यह हैं कि सरकारों का उद्देश्य नागरिकों/ संस्थाओं को प्रगति करने हेतु योग्यतम परिस्थितियां उपलब्ध करवाने का होना चाहिए न कि प्रगति का नियंत्रक बन नागरिकों/ संस्थाओं की उद्यमिता में प्रतिस्पर्धा पैदा करने वाला। इसके दो दिन बाद 13 अक्टूबर को गतिशक्ति योजना के उद्घाटन में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा, "21वीं सदी का भारत सरकारी व्यवस्थाओं की उन पुरानी सोच को पीछे छोड़ आगे बढ़ रहा है। अब परियोजनाएं समय से पहले पूर्ण हो रही हैं।"

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कुल मिलाकर सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है की वह विश्व के विकास की स्पर्धा में होड़ लेने हेतु पुराने ढर्रे को छोड़ 'स्टेट ऑफ़ द आर्ट' परिस्थितियां देश में निर्मित करने को तैयार है और इसके लिए सरकार को चाहिए एक भारी भरकम बजट। वर्ल्ड इकनोमिक फोरम 2021 के रिपोर्ट के अनुसार विश्व प्रतिस्पर्धा रैंकिंग में भारत 45वें स्थान पर रहा जिसका एक बड़ा कारण भारत का बेहद ख़राब इंफ़्रा है। मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी के लिए गतिशक्ति योजना हो या मेक इन इंडिया जैसे प्रोजेक्ट्स, सभी के लिए विशालकाय बजट भी चाहिए।

देश की आज़ादी के बाद देश की GDP मात्र 3 % थी। साथ ही दुनिया के सभी समाजशास्त्री यह मान चुके थे की बेरोजगारी, जनसँख्या, विभाजन की विभीषिका, कुपोषण, मृत्युदर जैसे संकटों के कारण आज़ाद भारत की परिणति आगे एक दशक में एक विफल राष्ट्र की होगी। यही कारण है कि देश के आज़ाद होते ही हमारे निति निर्धारकों ने औद्योगिकीकरण पर सबसे पहले ध्यान देने की बात की एवं नेहरू जी के नेतृत्व में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की स्थापना के साथ तीव्र औद्योगिक विकास प्रारम्भ किया गया। समय के साथ इन उद्यमों ने दशकों तक देश के विकास में लोगों को रोज़गार मुहैय्या करवाकर अपनी उपादेयता को सिद्ध किया। उन तात्कालिक परिस्थितियों में यह बहुत अच्छा निर्णय था जो आज की परिस्थितियों में अप्रासंगिक हो चुका है। साथ ही ध्यान देने की बात है कि भारत में उद्योगीकरण किसी सरकार द्वारा लाभ कमाने की मंशा से न कर के समाज को रोजगार देने और विकास की मंशा से किया गया था। ऐसे में अब जबकि रोजगार और सामाजिक विकास के आयाम वैश्वीकरण ने बदल दिए हैं तो घाटे के सार्वजनिक उद्यम सरकारों के पैर में बेड़ियों के समान हैं।

समय के साथ 1991 का भारत में वह आर्थिक संकट भी आया जब देश का खजाना खाली था। भारत के बाजार संसार के व्यापार हेतु बंद थे। संसार उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के लाभ उठा रहा था। 1991 में उदारीकरण का प्रारम्भ होते ही देश में विदेशी कंपनियों के आगमन के साथ ही भारत ने महसूस किया कि वैश्विक निवेश हेतु मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर यानि अवसंरचना की आवश्यकता है। समय के साथ वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार के कड़े नियम, लाइसेंस व्यवस्था, सरकारी हस्तक्षेप, PSU के ख़राब प्रदर्शन एवं निम्नस्तर की कार्य प्रणाली ने भी विदेशी निवेश में बाधा पैदा की। ऐसे में सरकार ने घाटे में चल रहे एवं अप्रासंगिक बन चुके PSUs से विनिवेश कर पैसा जुटाने का प्रयास किया। साथ ही मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उदारीकरण और निजीकरण को सरकार ने अपने मुख्य एजेंडे में शामिल कर तेजी से कार्य करना शुरू किया।

1991 में कांग्रेस सरकार द्वारा प्रारम्भ किये गए इस विनिवेशीकरण के बाद विनिवेश हर यूनियन बजट का हिस्सा होता रहा है जो आज भी जारी है। 2022-23 के बजट में इस विनिवेश का लक्ष्य 65000 करोड़ है। इसके लिए BJP को जिम्मेदार ठहराने की बजाय नेहरू के बाद के उस कांग्रेस के भ्रस्टाचार तंत्र को दोषी मानना चाहिए जिसने इन PSUs के निर्माण के बाद इसके संवर्धन या प्रदर्शन पर ध्यान नहीं दिया और यह देश के लिए एक आर्थिक बोझ बन गए।

विनिवेश के मुख्यतः 3 उद्देश्य होते हैं, पहला राजकोषीय घाटा कम करने हेतु एक निम्न उद्देश्य है। दूसरा महत्वपूर्ण लक्ष्य, इंफ़्रा के विकास हेतु व तीसरा सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में निवेश हेतु। जब सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में अपने स्वामित्व की हिस्सेदारी को निजी क्षेत्र को बेच देती है तो इस प्रक्रिया को विनिवेश कहते हैं। आंशिक विनिवेश में सरकार अपने हिस्सेदारी का अधिकतम ४९% तक ही बेचती है, रणनीतिक विनिवेश में सरकार अधिकतम 51% या उससे अधिक हिस्सेदारी बेंचती है इससे प्रबंधन का अधिकार निजी क्षेत्र के पास चला जाता है। तीसरा विकल्प है पूर्ण विनिवेश जिसमें सरकार सम्पूर्ण हिस्सेदारी को बेच सकती है और कंपनी पूर्णतया निजी क्षेत्र की बन जाती है।

यदि विनिवेश का सिंहावलोकन करें तो 1991 से 2018 तक सरकारों ने अपनी हिस्सेदारी बेचकर लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये विनिवेश से जुटाए हैं। 2000 में HTL का 74% हिस्सेदारी HFCL को 55 करोड़ में सरकार द्वारा बेचा गया और आज भी 26% हिस्सेदारी सरकार की है जिससे आज भी सरकार को बहुत लाभ मिल रहा है। 2001 में CMC लिमिटेड कंपनी की टाटा संस को 151 करोड़ में 51% हिस्सेदारी बेच दी गयी और आज यही CMC लिमिटेड TCS के नाम से दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनियों में से एक बन गई है और भारत की सबसे लाभकारी कंपनियों में से एक है। 2002 में हिंदुस्तान जिंक की 70% हिस्सेदारी 769 करोड़ में स्टरलाइट इंडस्ट्री को बेच दी गयी और इस विनिवेश के कारण हिंदुस्तान जिंक ने लगभग सौ गुना अधिक मुनाफा कमाया। बाकी बची 30% सरकारी हिस्सेदारी की कीमत आज साढ़े सत्ताईस हज़ार करोड़ रुपये है। साथ ही हिंदुस्तान जिंक संसार का दूसरा सबसे बड़ा ज़िंक लेड माइनर भी बन गया। यह आज दुनिया के 10 सबसे बड़े चांदी उत्पादकों में भी शामिल है।

BALCO के शेयर भी सरकार द्वारा स्टरलाइट इंडस्ट्री को बेचे गये और बाद में इसी कंपनी ने भारत की मिसाइल परियोजनाओं को उच्च स्तर के एल्युमीनियम मुहैय्या कराये। 2002 में इंडियन पेट्रोकेमिकल की आंशिक हिस्सेदारी को रिलायंस इंडस्ट्रीज ने खरीदा। बाद में मनमोहन सिंह की सरकार में सरकार द्वारा इंडियन पेट्रोकेमिकल के सम्पूर्ण शेयर बेचकर इसे पूर्णतया प्राइवेट कंपनी बना दिया गया। एक अध्ययन के अनुसार प्राइवेट होने के बाद इंडियन पेट्रोकेमिकल के टर्नओवर में 14% और लाभ में 20% की बढ़ोत्तरी हुई।

2003 में बहुचर्चित मारुति उद्योग लिमिटेड के सरकारी हिस्सेदारी को सुजुकी मोटर को बेचा गया और इसके बाद मारुति ने अपनी वास्तविक क्षमता का प्रदर्शन किया। 2022 के प्रारम्भ में भारतीय कार बाजार में मारुति सुजुकी की हिस्सेदारी 44.2% हो गई। इन कुछ उदाहरणों से स्पष्ट है कि विनिवेश का लाभ सरकार और उद्यम दोनों को होता है। साथ ही इन विनिवेशों से राजकोषीय घाटा 2008 के 6% की अपेक्षा 2019-20 में 3.4 % रह गया। यद्यपि कोविड ने मोदी सरकार के प्रयासों पर विगत वर्षों में करारा प्रहार किया परन्तु सरकार के सूझबूझ, ईमानदार प्रयासों और देश भर में मुफ्त अनाज और चिकित्सा सुविधाओं के कारण यह घाटा बढ़ने के बाद पुनः अपने गिरावट पर है।

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यद्यपि VSNL जैसे कुछ उदहारण हैं जहाँ विनिवेश का कोई फायदा नहीं हुआ साथ ही AIR इंडिया भी इसका एक बेहद ताज़ा उदाहरण है जहाँ सरकार को कोई खरीदार ही नहीं मिल रहा था क्योंकि 2019 में इसका घाटा 8000 करोड़ था। 18000 करोड़ में टाटा को बेचने के बाद भी सरकार के लिए सरदर्द बन चुकी इस कंपनी से केवल 2700 करोड़ ही मिला क्योंकि शेष पैसा कर्ज की अदायगी में देना पड़ा। BSNL जैसी कंपनी द्वारा 2019-20 में 15 हज़ार करोड़ का नुकसान और MTNL द्वारा लगभग 3600 करोड़ का घाटा सरकार को हुआ। LIC का प्रतिदिन का नुकसान 20 करोड़ रुपये है जो सरकार के लिए एक बड़ी समस्या है। हिंदुस्तान कॉपर, भेल, मंगलोर पेट्रोकेमिकल जैसी कम्पनियाँ अभी भी सरकार का सिरदर्द बनी हुई हैं और हर साल हज़ारों करोड़ का नुकसान झेल रही हैं। सरकार का लक्ष्य LIC के कुछ शेयर बेचकर 1 ट्रिलियन डॉलर जुटाने का है।

PSU की स्थितियां इतनी ख़राब हैं कि सरकार अपना विनिवेश का लक्ष्य भी पूरा नहीं कर पा रही है एवं साल दर साल पैसे की कमी से नए प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही है। 2019-20 में सरकार के 1.5 लाख करोड़ के विनिवेश के लक्ष्य का पीछा करते हुए सरकार ने केवल 17,300 करोड़ का विनिवेश लक्ष्य प्राप्त किया। कुछ आलोचकों द्वारा विनिवेश पर घेरते हुए यह भी कहना है कि घाटे का तर्क देने वाली सरकार लाभ कमाने वाली पीएसयू में अपनी हिस्सेदारी क्यों बेचना चाहती है जबकि 2019 में लाभ कमाने वाली पीएसयू ने पौने तीन लाख करोड़ रुपए शेयर मार्केट से इकट्ठा किया है और साथ ही 2018-19 वित्त वर्ष में केंद्रीय PSU द्वारा ढाई लाख करोड़ रुपए का व्यापार किया गया। ऐसे में सरकार अपनी नियमित आय की दूरदृष्टि को छोड़कर शार्ट टर्म लक्ष्य को पूरा करने के लिए लाभ वाले PSUs भी बेच रही है। परन्तु यह दलील तर्कसंगत नहीं मालूम पड़ती क्योंकि सरकार की आय का 75% कर से आता है और सार्वजनिक उद्यम में इतनी बड़ी पूंजी को बहुत कम आय प्राप्त करने हेतु बनाये रखने से अच्छा है कि उसे इंफ्रास्ट्रक्चर में लगा कर उद्योगों का विकास किया जाए और कर द्वारा लाभ कमाया जाए।

सरकार द्वारा किये जा रहे विनिवेश से प्राइवेट सेक्टर का एकाधिकार स्थापित होने से अधिक मुनाफे के चक्कर में महंगाई बढ़ने एवं कल्याणकारी योजनाओं के कम होने का डर है। सरकार द्वारा किये जा रहे विनिवेश से प्राइवेट सेक्टर का एकाधिकार स्थापित होने से अधिक मुनाफे के चक्कर में महंगाई बढ़ने एवं कल्याणकारी योजनाओं के काम होने का डर है। साथ ही पुराने अनुभव देखें तो अधिकतर NPA प्राइवेट सेक्टर में ही होते हैं। PSUs का कुल NPA में सहभाग मात्र 3 % है।

पहले की कांग्रेस सरकारों के दौरान हुए विनिवेश का प्रयोग एक और जहाँ राजकोषीय घाटे को कम करने हेतु किया वहीँ वर्तमान मोदी सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है कि उसने अपनी इस मंशा को संसद से देश के सामने रखा है कि विनिवेश के द्वारा जुटाया गया पैसा देश की बड़ी विकास परियोजनाओं में लगेगा जिससे विदेशी निवेश आकर्षित हो और देश में विश्वस्तर का उद्योग विकसित हो सके। इन उद्योगों और निवेश के माध्यम से सरकार का उद्देश्य नागरिकों/ संस्थाओं को प्रगति करने हेतु योग्यतम परिस्थितियां उपलब्ध करवाने का है जिससे GST आदि करों के माध्यम से सरकार को दूरगामी लाभ हो। कुल मिलाकर हम विनिवेश को पूर्णतया सही या गलत के आधार पर नहीं देख सकते। सरकार द्वारा स्पष्ट रूप से उन प्रोजेक्ट्स को चिन्हित करना चाहिए जहाँ विनिवेश से मिले पैसों का प्रयोग होना है। साथ ही सरकारों को समय के साथ उन खर्च किये पैसों के द्वारा जो सामाजिक ढांचे में बदलाव/ या उन्नति होता है, उनका भी अध्ययन करना चाहिए जिससे विनिवेश और अधिक तर्कसंगत रूप से समाज के सामने आ पाए। कुल मिलाकर एक नागरिक के रूप में हमें विनिवेश पर सरकारों की सकारात्मक मंशा पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

-शिवेश प्रताप

(लेखक IIM कलकत्ता से पढ़े हैं एवं तकनीकी-प्रबंध सलाहकार हैं।)