संसद में सरकार कामकाज कर पायेगी या नहीं, सबकुछ चुनाव परिणामों पर निर्भर

By आशीष वशिष्ठ | Publish Date: Dec 10 2018 10:58AM
संसद में सरकार कामकाज कर पायेगी या नहीं, सबकुछ चुनाव परिणामों पर निर्भर
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एग्जिट पोल से नतीजों की जो तस्वीर उभर कर सामने आई है उससे तो यह तय हो गया है कि सड़क से लेकर संसद तक हंगामा, शोर-शराबा और धूम-धड़ाका होना तय है। देखना होगा कि अंतिम परिणाम क्या रहते हैं।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों के दिन शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र के हंगामेदार होने के आसार हैं। एग्जिट पोल से नतीजों की जो तस्वीर उभर कर सामने आई है उससे तो यह तय हो गया है कि सड़क से लेकर संसद तक हंगामा, शोर-शराबा और धूम-धड़ाका होना तय है। यदि भाजपा जीती तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए चुनाव के दौरान उठाए गए मुद्दों पर भाजपा को घेरना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन, यदि कांग्रेस कामयाब रही तो विपक्षी पार्टी ऐसे मुद्दे उठा सकती है जो राजनीतिक तापमान बढ़ा सकते हैं। सत्र के पहले ही दिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाएंगे और इसका असर संसद की कार्यवाही और सरकार-विपक्ष की रणनीति पर पड़ेगा। मोदी सरकार के आखिरी संसद सत्र में विपक्ष राफेल सौदा, सीबीआई बनाम सीबीआई, आरबीआई और सरकार में टकराव, किसान और महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरना चाहता है।
 
 
इन सबके बीच भाजपा के धुर विरोधी दल महागठबंधन बनाने के प्रयास में जुटे हैं। संसद के शीतकालीन सत्र से पूर्व विपक्ष की एकजुटता को लेकर प्रयास तेज हो गए हैं। आगामी 10 दिसंबर को प्रस्तावित बैठक में विपक्ष के सभी बड़े नेताओं की मौजूदगी सुनिश्चित करने के प्रयास हो रहे हैं। बैठक के लिए कांग्रेस, सपा, बसपा, टीडीपी, एनसीपी, टीएमसी, पीडीपी, एनसी, राजद, जदएस, डीएमके, भाकपा, माकपा, आम आदमी पार्टी समेत अन्य कई विपक्षी दलों ने अपनी स्वीकृति दे दी है। दरअसल, इस सत्र में सरकार और भाजपा की रणनीति राम मंदिर निर्माण मुद्दे पर विपक्ष को घेरने की है। इसके तहत पार्टी सांसद राकेश सिन्हा समेत कुछ अन्य भाजपा सांसद राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने संबंधी निजी बिल राज्यसभा में पेश करेंगे। दूसरी ओर कांग्रेस सरकार पर पलटवार के लिए पहले दिन से ही किसानों की बदहाली को मुद्दा बनाना चाहती है। वाम दल भी इससे सहमत हैं। जबकि टीडीपी, राजद और टीएमसी कथित तौर पर केंद्र द्वारा सीबीआई के दुरुपयोग के मुद्दे पर हमलावर होना चाहते हैं। 


 
पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने से पहले होने जा रही यह बैठक लोकसभा चुनाव के लिए महागठबंधन की नींव रखने की कवायद भी है। हालांकि बसपा प्रमुख मायावती और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इस बैठक में शामिल होने को लेकर अभी असमंजस बना हुआ है। पिछले दिनों दिल्ली में किसान आंदोलन के दौरान विपक्ष के कई नेताओं ने एक मंच पर आकर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया था। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की पहल पर हो रही इस बैठक में विपक्ष के महागठबंधन बनाने की पहल तेज की जाएगी। हालांकि इस महागठबंधन का स्वरूप बहुत कुछ पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से भी तय होगा।
 
 
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। अभी एनडीए अथवा यूपीए के खेमे में खड़े दल पाला भी बदल सकते हैं। यदि कांग्रेस के पक्ष में परिणाम आते हैं तो तय है कि राहुल गांधी इस महागठबंधन के निर्विरोध नेता हो जाएंगे। लेकिन उलट आने पर कांग्रेस को विपक्षी दलों के सामने झुकना पड़ सकता है। इसी तरह भाजपा के पक्ष में आने पर मोदी की रायसीना हिल्स लौटने की संभावना बढ़ जाएगी, लेकिन विपरीत आने पर भाजपा में उनकी कार्यशैली से नाराज नेता अपनी आवाज बुलंद करने लगेंगे। इसलिए सभी को 11 दिसंबर को नतीजे आने का इंतजार है। कभी एनडीए के संयोजक रह चुके चंद्रबाबू नायडू इस मुहिम में लगे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भी नायडू का साथ दे रही हैं। नायडू चाहते हैं कि विपक्षी दलों के प्रमुख नेता इस बैठक में मौजूद रहें।


 
मोदी सरकार के पिछले साढ़े चार साल में कांग्रेस भाजपा को घेरने में असफल ही दिख रही थी। ले-देकर कांग्रेस राफेल विमान डील पर मोदी सरकार को सड़क से लेकर संसद तक घेरती दिख रही थी। राहुल गांधी से लेकर तमाम कांग्रेस के नेता राफेल विमान डील में घोटाले की बात कहकर मोदी सरकार पर कीचड़ उछाल रहे हैं। राहुल गांधी तो सीधे प्रधानमंत्री मोदी को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। पांच राज्यों के चुनाव प्रचार के दौरान भी कांग्रेस के लगभग हर मंच व सभा में राफेल की गूंज सुनाई दी। यह माना जा रहा था कि कांग्रेस संसद के शीतकालीन सत्र में राफेल का मुद्दा पूरे जोश-खरोश के साथ उठाएगी। लेकिन इन सबके बीच राफेल विमान खरीद में भ्रष्टाचार के कांग्रेसी आरोपों की काट के लिये मोदी सरकार ने यूपीए सरकार के शासन काल में अगस्ता-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर सौदे में बिचौलिए का धंधा करने वाले ब्रिटिश नागरिक क्रिश्चियन मिशेल को दबोचकर कांग्रेस का मुंह बंद कराने की तैयारी कर ली है। 3000 करोड़ के इस सौदे में लगभग 300 करोड़ रु. की रिश्वत बांटने वाले इस दलाल को दुबई से पकड़ कर अब दिल्ली ले आया गया है। जांच ब्यूरो के अधिकारी इससे अब सारी सच्चाई उगलवाएंगे। फौज के लिए खरीदे गए हेलिकॉप्टरों के सौदे में किस नेता और किस अफसर को कितने रुपये खिलाए गए हैं, ये तथ्य अब इस मिशेल से उगलवाए जाएंगे।
 
मिशेल के पकड़े जाने से पूर्व अगस्ता-वेस्टलैड कंपनी के जो अधिकारी पकड़े गए थे, उनकी डायरियों से कुछ नाम उजागर हुए हैं। उन नामों को सोनिया गांधी के परिवार से जोड़ा गया था। हमारी सेना के एक आला अधिकारी पर भी रिश्वतखोरी के आरोप हैं। मिशेल के जांच एजेंसियों के हत्थे चढ़ने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में यह जबर्दस्त हथियार आ गया है जिससे वह गांधी परिवार व कांग्रेस पर दबाव बना सकते हैं। सोनिया गांधी परिवार के विरुद्ध पहले ही ‘नेशनल हेरल्ड’ के मामले में आयकर विभाग जांच कर रहा है। अब मोदी ने सोनिया परिवार की तरफ अपनी चुनाव-सभा में नाम लेकर भी इशारा किया है। हो सकता है कि मिशेल जो भी सच उगले, वह कांग्रेस के गले की फांस बन जाए। यदि वह बोफोर्स की तरह सोनिया परिवार को अदालत में अपराधी सिद्ध न कर पाए तो भी चुनाव के अगले छह सात माह में भाजपा के लिए वह रामबाण सिद्ध हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी इतने तीर चलाएंगे कि कांग्रेस का महागठबंधन चूर-चूर हो सकता है। कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाने में हर पार्टी सकुचाएगी। मिशेल की गिरफ्तारी के बाद इस बात की ज्यादा संभावना है कि राफेल मुद्दे पर कांग्रेस की आवाज धीमी पड़ जाएगी और संसद में राफेल का ज्यादा शोर-शराबा सुनाई नहीं देगा। 
 


 
जानकारों की मानें तो अगर पांच राज्यों के चुनाव नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं आये तो मोदी सरकार पर राम मंदिर के लिये कानून बनाने का दबाव पार्टी के भीतर और बाहर दोनों ओर से पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट के रवैये के बाद से राम मंदिर पर कानून लाने की मांग ने तेजी पकड़ी है। बीते 25 नवंबर को अयोध्या में धर्मसभा के बाद से अयोध्या मुद्दा लगातार सुर्खियों में है। सूत्रों की मानें तो अंदर ही अंदर भाजपा राम मंदिर के लिये बिल लाने की तैयारियों पर भी काम कर रही है। भाजपा के कई सांसद व नेता दबी जुबान से यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने तय कर लिया है कि शीतकालीन सत्र में राम मंदिर निर्माण के लिए कानून पारित करा लिया जाये। मोदी सरकार ने 16 नवंबर को ही अपने सभी सांसदों को ‘व्हिप‘ जारी करते हुए संसद सत्र के दौरान दिल्ली से बाहर नहीं जाने के निर्देश दिये हैं। असल में राम मंदिर पर कानून लाकर मोदी सरकार जहां अपने वोट बैंक को एकजुट करने की चाल चलेगी वहीं संसद में जब राम मंदिर के कानून को लेकर चर्चा होगी, तब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की असलियत का भी पता चल जायेगा कि वह कितने बड़े जनेऊधारी और शिवभक्त हैं। 
 

 
लोकसभा चुनावों से पहले संभवतः यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली इस सरकार का आखिरी पूर्णकालिक सत्र होगा। लिहाजा, इस सत्र में सत्तारुढ़ भाजपा और विपक्षी दल कांग्रेस का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। खासकर जब सत्र के पहले दिन ही विधानसभा चुनावों की मतगणना का असर संसद की कार्यवाही पर पड़ेगा। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम विधानसभा चुनाव के नतीजे 11 दिसंबर को ही आएंगे। इस वक्त मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भाजपा का शासन है जबकि तेलंगाना में टीआरएस और मिजोरम में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है। एग्जिट पोल के नतीजे बदलाव व कांटे की टक्कर की तस्वीर पेश कर रहे हैं। मोदी सरकार के लिए शीतकालीन सत्र का शांतिपूर्ण ढंग से चलना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उसके बाद यह सरकार सिर्फ संक्षिप्त बजट सत्र ही बुला पाएगी, जिसमें मई 2019 तक का बजट पारित करना होगा। सरकार इस दौरान लंबित कुछ जरूरी विधेयक भी पारित कराना चाहेगी, जबकि विपक्ष सरकार को घेरना चाहेगा। राम मंदिर, राफेल, अगस्ता-वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर जैसे तमाम मुद्दे दिसंबर में दिल्ली की सर्दी के बीच संसद का गर्माने का काम करेंगे।
 
-आशीष वशिष्ठ
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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