राहुल की जुबान फिसली या अपरिपक्वता दिखाई

सवाल उठता है कि भीड़ को देखकर अति उत्साह में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जबान फिसल गई या फिर यह किसी परिपक्व नेता का सोच समझकर किया गया हमला था।

मोदी विरोध के नाम पर कब हमारे सियासतदां देश विरोध की हदें छूने लग जाते हैं, शायद उन्हें भी पता नहीं होता। अक्सर यह काम कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह करते रहे हैं। वोट बैंक की राजनीति को साधने के लिए वे अक्सर ऊलजुलूल बयान देने के लिए कुख्यात हैं। मुंबई हमले को आरएसएस प्रायोजित व बटला हाउस एनकाउंटर को वे फर्जी ठहरा चुके हैं। न केवल इसे उन्होंने फर्जी ठहराया बल्कि इस एनकाउंटर में मारे गये आतंकियों के घर आजमगढ़ जाकर उनके परिवारों से अपनी संवेदना भी प्रकट कर चुके हैं। लेकिन इस बार वे चुप हैं। पाकिस्तान के खिलाफ हुए अब तक के सबसे बड़े सर्जिकल स्ट्राइक पर उन्होंने कोई खास गलतबयानी नहीं की है। इस बार यह मोर्चा उनकी पार्टी के दूसरे नेताओं ने संभाला है। 

आजाद हिंदुस्तान के सबसे बड़े व कामयाब सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपने बयान पर एक सप्ताह भी कायम नहीं रह पाये। देवरिया से दिल्ली तक अपनी खाट लुटवा चुके राहुल गांधी की खाट सभा की पूर्णाहुति दिल्ली में हुई। इसी सभा में वे एक ऐसी बात कह गये जिससे एक बार फिर उनकी थुक्का फजीहत हो गई। अब भीड़ को देखकर अति उत्साह में उनकी जबान फिसल गई या फिर यह किसी परिपक्व नेता का सोच समझकर किया गया हमला था। हालांकि ऐसा लगता नहीं कि यह किसी परिपक्व राजनेता का अपने विरोधी पर हमला है, क्योंकि हर बात में उनका समर्थन करने वाले व बिहार में महागठबंधन के प्रमुख सहयोगी दल राजद के मुखिया लालू यादव ने उनके भाषण से किनारा करते हुए कहा कि राहुल अपनी बात ठीक से रख नहीं पाये। वह कहना कुछ और चाहते थे और कह कुछ और गये। यानी मामला जबान फिसलने का है। बहरहाल, अपने चिर विरोधी पीएम मोदी पर हमला करने के क्रम में वे सारी सीमाएं लांघ गये। उन्होंने पीएम पर सेना के जवानों के खून की दलाली करने का आरोप जड़ दिया। अब उनका पहले वाला बयान सही था या यह आरोप। इसे लेकर पूरी कांग्रेस ही भ्रम की स्थिति में नजर आई। चूंकि तीर कमान से निकल चुका था सो पार्टी के तमाम प्रवक्ता अपने उपाध्यक्ष के बचाव में कुतर्कों का सहारा लेते नजर आये। भाजपा ने इसे सेना के शौर्य व पराक्रम का अपमान बताते हुए राहुल के मूल में ही खोट बता दिया।

सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगकर पाकिस्तानी मीडिया के दुलारे बने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी राहुल के जवानों के खून की दलाली वाले बयान की कड़ी निंदा की। अक्सर राहुल गांधी में अपरिपक्वता की झलक दिखाई दे जाती है। यह बयान भी उसी की एक बानगी है। गांधी की हत्या में आरएसएस का हाथ होने का बयान देकर कानूनी दांवपेंच में उलझे राहुल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अभी भी वे परिपक्व नहीं हो पाये हैं। अभी भी उनमें बचपना है। दरअसल, कांग्रेस तय नहीं कर पा रही है कि वह स्ट्राइक सर्जरी पर क्या स्टैंड ले। यही कारण है कि पूरी कांग्रेस एक कदम आगे और दो कदम पीछे जैसी हालत में है। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद तमाम राजनीतिक दलों ने एक सुर में इसकी प्रशंसा करते हुए सरकार के साथ अपनी एकजुटता दिखाई थी। इसमें प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सबसे आगे थी। खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सेना के इस पराक्रम को सलाम किया था।

इसमें तो कोई दो राय नहीं कि आतंकवाद का पनाहगाह बने पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मात देने की कामयाब सर्जिकल स्ट्राइक पीएम मोदी की राजनीतिक इच्छाशक्ति का ही नतीजा है। अब कहा जा रहा है कि पहले भी इस तरह के सर्जिकल स्ट्राइक हुए हैं लेकिन उनका कभी प्रचार नहीं किया गया। लेकिन ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि इस बार का सर्जिकल स्ट्राइक सबसे बड़ा व व्यापक है। इस सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी देश दुनिया को एक स्ट्रैटजी के तहत दी गई। इससे जहां पाकिस्तान बेनकाब हुआ वहीं भारत की इस कार्रवाई को दुनिया के तमाम बड़े छोटे देशों ने अपना समर्थन दिया। यहां तक कि पाकिस्तान का दोस्त चीन भी इसका खुलकर विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। अमेरिका रूस से लेकर जर्मनी व ग्रेट ब्रिटेन ने आतंकवाद के खिलाफ की गई भारत की इस कार्रवाई का जोरदार समर्थन किया। लेकिन दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि देश में ही राजनीतिक नफा नुकसान की गुणा गणित के लिहाज से विभिन्न तरह के सुर सुनाई दे रहे हैं। राजनीति देश से बड़ी हो गयी है। 

ऐसा लगता है कि सफल सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश भर में हो रही मोदी की वाहवाही को कांग्रेस पचा नहीं पा रही है। यही कारण है कि पहले प्रशंसा करने के बाद अब राजनीतिक नफा नुकसान को देखते हुए उसके सुर बदले बदले से नजर आ रहे हैं। इसकी शुरुआत वाया शिवसेना कांग्रेस नेता बनने वाले संजय निरूपम ने की। बड़बोले निरूपम ने सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगते हुए इसे अफवाह करार दे दिया। निरूपम के इस बयान का विरोध बढ़ने पर कांग्रेस ने इससे पल्ला झाड़ लिया और कहा कि यह उनका व्यक्तिगत बयान है। हालांकि निरूपम के खिलाफ किसी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई के सवाल पर चुप ही रही। इसी तरह पी चिदंबरम भी सर्जिकल स्ट्राइक पर सवालिया निशान लगाने से नहीं चूके। सवाल है कि आखिर हमारे सियासतदां कब समझेंगे कि देश हमेशा राजनीति से ऊपर होता है। देश बचेगा तो ही राजनीति बचेगी। इससे पहले जब भी देश की बात आई तमाम पार्टियां तत्कालीन सरकारों के साथ चट्टान की तरह खड़ी रही हैं। सरकार के साथ एकजुटता दिखाते हुए उन्हें अपना पूरा समर्थन दिया है। हर मुद्दे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने को उतावले इन नेताओं को क्या यह बताने की जरूरत है कि 1971 के युद्ध के समय अपने सियासी नफे नुकसान को किनारे कर संसद में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी धुर विरोधी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को शक्ति स्वरूपा दुर्गा कहा था। आज भी उसी जज्बे की जरूरत है।

- बद्रीनाथ वर्मा

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