विदेश यात्राओं पर सवाल उठाने से पहले उपलब्धियाँ देखें

संजय तिवारी । May 26, 2017 11:58AM
यद्यपि मजबूत विदेश नीति की बुनियाद मजबूत घरेलू नीति ही होती है। वह भारत, जहाँ सम्पूर्ण विश्व का छठवां भाग निवास करता है, हमेशा अपनी शक्ति से बहुत कम प्रहार करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह नियम मानने वाला देश रहा है।

विपक्ष के लोग यद्यपि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर तरह तरह की टिप्पणियां करते हैं लेकिन इन यात्राओं की अनगिनत उपलब्धियों के कारण ही आज दुनिया जिस तरह से भारत की तरफ देख रही है वह ऐतिहासिक है। कुछ पंडित भारत की विदेश नीति के आक्रामक होने की बात कहते हैं लेकिन यह समय के साथ होने वाली स्पर्धा है जिसमें हमारे प्रधानमंत्री को यह सब करना पड़ा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। अब जबकि मोदी के सत्ता में आये तीन वर्ष पूरे हो रहे हैं, भारत की विदेश नीति को लेकर चर्चायें होना स्वाभाविक है क्योंकि इसी दौर में दुनिया एक नए तरह के वातावरण में प्रवेश कर रही है। अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों में दक्षिणपंथ का उदय हो रहा है। वैश्वीकरण पर संकट के बादल हैं और दुनिया नयी परिभाषाओं के साथ आकार ले रही है। ऐसे में विवेचना दोनों की ही होनी चाहिए- इतिहास की भी और वर्त्तमान से जुड़े भविष्य की भी। एक तरह से देखने पर नरेंद्र मोदी की विदेश नीति भारत को अधिक प्रतिस्पर्धी, विश्वस्त और सुरक्षित देश के रूप में नए सिरे से तैयार करने में सक्षम प्रतीत होती है। यद्यपि मजबूत विदेश नीति की बुनियाद मजबूत घरेलू नीति ही होती है। वह भारत, जहाँ सम्पूर्ण विश्व का छठवां भाग निवास करता है, हमेशा अपनी शक्ति से बहुत कम प्रहार करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह नियम-निर्माता नहीं नियम मानने वाला देश रहा है। 

सुखी और शांत पड़ोसी 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की विदेश नीति में सुखी और शांत पड़ोसी बनाने की पहल सबसे बड़ी ताकत है। मोदी ने अपने शपथ ग्रहण के दिन से ही इसकी शुरुआत कर दी थी जिसे 5 मई को कर के भी दिखा दिया। यह अलग बात है कि इस दिशा में पकिस्तान एक नासूर ही बन कर सामने आता रहा है। पकिस्तान को छोड़ दीजिये तो आज हम यह कह सकने की स्थिति में हैं कि समूचा दक्षिण एशिया आज एक कुटुंब के रूप में उभर कर सामने आया है जो मोदी की नीतियों की सबसे बड़ी विजय है। इस बात को दक्षिण एशिया के सभी देशों ने भी स्वीकार किया है।

इसरो की तरफ से दक्षिण एशिया संचार उपग्रह जीसेट-9 को लांच करने के बाद दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भारत को शुक्रगुजार मानते हुए कहा कि भारत के इस कदम से क्षेत्रीय देशों का आपसी संपर्क बढ़ेगा। सैटेलाइट में उपग्रह छोड़े जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि यह लांच इस बात को प्रमाणित करता है कि जब क्षेत्रीय सहयोग की बात हो तो आसमान में कोई सीमा नहीं होती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि क्षेत्रीय जरूरतों के हिसाब से इसरो की टीम ने दक्षिण एशिया सैटेलाइट का निर्माण किया। मोदी ने आगे कहा कि इस लांचिंग के मौके पर मुझसे जुड़ने के लिए अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भुटान, नेपाल, मालदीव और श्रीलंका के अपने सहयोगी नेताओं का शुक्रिया करता हूं।

दुनिया में एक मिशन के तहत सबसे अधिक सैटेलाइट्स की सफल लॉन्चिंग के बाद भारत ने दक्षिण एशियाई देशों के लिए GSAT-9 को अंतरिक्ष में भेज दिया। इस क्षेत्र के देशों के लिए यह काफी अहम उपहार है। बदलते दौर में अपने पड़ोसियों से संबंधों को मजबूत करने के लिए भी यह सैटेलाइट काफी अहम भूमिका निभाएगा। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका के लिए भारत का यह उपहार कई मायनों में अहम इसलिए भी है क्‍योंकि इन देशों का अपना या तो कोई सैटेलाइट है ही नहीं या फिर उससे मिलने वाली सेवाएं इतनी खास नहीं हैं। इस सैटेलाइट लॉन्चिंग से जुड़ी एक अहम बात यह भी है कि इस सैटेलाइट की सेवाओं के लिए भारत ने किसी भी अन्‍य देश से कोई राशि नहीं ली है। इसका अर्थ है कि इस क्षेत्र के सभी देश इस सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारियों को अपने हित के लिए बिना किसी मूल्य के इस्‍तेमाल कर सकेंगे। हालांकि पाकिस्‍तान इसमें भागीदार नहीं है।

अरब देशों से रिश्ते बेहतर करने की पहल

पश्चिम एशियाई देशों से भारत की बढ़ती नजदीकी बहुत ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोर रही है। मगर मोदी सरकार का अरब देशों से ताल्लुक बेहतर करने का मिशन कई लोगों को पसंद आया है। कई जानकारों को लगता है कि अरब मुल्कों से नजदीकी बढ़ाने से घरेलू मोर्चे पर मोदी सरकार ये संदेश भी देने में कामयाब होगी कि वह धर्मनिरपेक्ष है। प्रधानमंत्री मोदी का इरादा विदेश नीति में पश्चिमी एशियाई देशों को अहमियत देने का है। उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईरान, इराक और कतर के अलावा फिलिस्तीन से ताल्लुक बेहतर करने पर जोर दिया है। हालांकि, इन नीतियों से भारत अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर संदेश देना चाह रहा है। मगर इसका घरेलू राजनीति पर भी असर होगा। भारत में 14 करोड़ मुसलमान रहते हैं, जो दुनिया के किसी देश में मुसलमानों की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी है।

प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक और विदेश नीति में काफी दिलचस्पी है। अरब देशों के साथ संबंध बेहतर करके वो मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान के असर को भी कम करना चाह रहे हैं ताकि भारत के साथ विवाद में इन देशों का पाकिस्तान को मिल रहा समर्थन कमजोर हो। बहुत से लोग प्रधानमंत्री मोदी की इस नीति के समर्थक हैं। सूत्रों के मुताबिक, मोरक्को की राजधानी रबात से कुछ जानकारियां ऐसी मिली हैं कि आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा मोरक्को की जमीन का इस्तेमाल अपनी गतिविधियों के लिए कर रहा है।

मोरक्को से गुजारिश

भारत पिछले 10 साल से मोरक्को से गुजारिश कर रहा था कि वो अपने देश में लश्कर की गतिविधियों की जानकारी साझा करे। मगर भारत की अपील अनसुनी कर दी जा रही थी। अब हालात बदल रहे हैं। मोदी की मुस्लिम देशों से संबंध बढ़ाने की इस नीति के पीछे हैं विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर। अकबर सीरिया, इराक और फिलिस्तीन का दौरा कर चुके हैं ताकि इन देशों से भारत के रिश्तों को नए सिरे से गढ़ा जा सके। सरकार मुस्लिम देशों से ताल्लुक बेहतर करने पर बहुत जोर दे रही है। इसी का नतीजा था कि इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में संयुक्त अरब अमीरात के शहजादे शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान को मुख्य अतिथि बनाया गया था। इस एक कदम से भारत ने ये साफ कर दिया है कि वो खाड़ी देशों से अपने रिश्तों को नई दशा-दिशा देना चाहता है। सूत्रों ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री कई बार अमेरिका गए मगर उन्होंने सिर्फ एक बार संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया जबकि, वहां बीस लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं। मोदी सरकार का ये कदम घरेलू राजनीति के लिहाज से भी कारगर है। संयुक्त अरब अमीरात के युवराज शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान सरकार के मुखिया नहीं हैं लेकिन वो संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं की नई पीढ़ी की नुमाइंदगी करते हैं।

नहयान खाड़ी देश में बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी वजह से संयुक्त अरब अमीरात और भारत की सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ा है। पूर्व राजनयिक हरदीप पुरी कहते हैं कि ये भारत के लिए फायदे की बात है। हरदीप पुरी के मुताबिक ऐसे कदम से भारतीय मुसलमानों के बीच भी अच्छा संदेश जाता है।


संयुक्त अरब अमीरात से उम्मीदें

भारत के मुसलमान मानसिक सहयोग के लिए संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब की तरफ उम्मीद भरी निगाह से देखते हैं। मोदी सरकार खाड़ी देशों से ताल्लुक पर जोर देकर भारतीय मुसलमानों के बीच अच्छा संदेश दे सकती है साथ ही इससे इन देशों में पाकिस्तान का असर कम करने में भी आसानी होगी। संयुक्त अरब अमीरात को भारत के निर्यात का दूसरा बड़ा हिस्सा जाता है, साथ ही संयुक्त अरब अमीरात भारत का तीसरा बड़ा कारोबारी साझीदार है। उसका नंबर चीन और अमेरिका के बाद आता है। दोनों देशों के बीच करीब पचास अरब डॉलर का कारोबार होता है। भारत के लिए फायदे की बात ये है कि दोनों देशों के बीच रक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ रहा है। छह देशों के सदस्यों वाली गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल, भारत की तेल और गैस की जरूरतों का आधा हिस्सा सप्लाई करती है। इन देशों के पास दुनिया के 45 फीसद तेल और 20 प्रतिशत गैस के भंडार हैं। खाड़ी देश भारत के बड़े बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं। हाल के दिनों में भारत ने फिलिस्तीन से भी संबंध बेहतर करने पर जोर दिया है। सीरिया और इराक के संघर्ष में भारत का रोल न के बराबर है, ऐसे में फिलिस्तीन से बेहतर ताल्लुक से भारत इस इलाके में अपना असर बनाए रखना चाहता है।

भारतीय मुसलमानों को संदेश

मोदी सरकार का अब तक पूरा जोर इजराइल से संबंध बेहतर करने पर रहा है। इससे कई अरब देश नाखुश भी हुए हैं। इसका भारतीय मुसलमानों के बीच भी अच्छा संदेश नहीं गया है। फिलिस्तीन से रिश्ते बेहतर करके मोदी सरकार इस नाखुशी को दूर करना चाहती है। भारत हमेशा से फिलिस्तीन का समर्थक रहा है। अब इस पर नए सिरे से जोर देकर वो इजराइल से बढ़ते रिश्तों से हो रही नाराजगी को दूर कर सकता है। साझा आयोग की बैठक में फिलिस्तीनी अधिकारियों ने इस बात पर खुशी जताई कि भारत ने उनसे संबंध बढ़ाने में फिर से दिलचस्पी दिखाई है। उन्हें लगता है कि इसका फायदा फिलिस्तीन को भी मिल सकता है क्योंकि भारत के इजराइल से काफी अच्छे रिश्ते हैं। आज की तारीख में आधे अरब देश खुद ही इजराइल से रिश्ते बेहतर करने पर जोर दे रहे हैं। भारत इजराइल से बड़े पैमाने पर हथियार खरीद रहा है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा साझीदारी बढ़ रही है। दोनों देश अब एटमी हथियारों की तकनीक के लेनदेन पर भी बात कर रहे हैं। साथ ही मौजूदा सरकार इजराइल की पानी के बेहतर इस्तेमाल की तकनीक का भी फायदा उठाना चाहती है।

मोदी सरकार की फिलिस्तीन में दिलचस्पी की एक और वजह भी है। भारत, फिलिस्तीन के गाजा शहर में इन्फोटेक पार्क बनाना चाहता है। ये फिलिस्तीन की तरक्की में भारत का अब तक का सबसे बड़ा योगदान होगा। विदेश मंत्रालय इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है। पिछले महीने एमजे अकबर ने जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी को एक चिट्ठी लिखी थी। इसमें उन्होंने तीन फिलिस्तीनी यूनिवर्सिटी से सहयोग के समझौते को लागू करने में नाकामी पर नाखुशी जताई थी। चिट्ठी में उन्होंने जामिया के वाइस चांसलर तलत अहमद से पूछा था कि फिलिस्तीन की अल- कुद्स, अल इस्तिकाल और हेब्रान यूनिवर्सिटी से समझौता अधर में क्यों लटका है?

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति

प्रधानमंत्री मोदी अपनी कोशिशों के फौरी नतीजे चाहते हैं। वो मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की जगह बेहद अहम है। वो देख रहे हैं कि ईरान और इजराइल से बहुत से देशों से अच्छे रिश्ते नहीं हैं। आज भारत और ईरान के ताल्लुक काफी अच्छे हो गए हैं। शायद किसी भी अरब देश से भारत के रिश्ते उतने अच्छे नहीं, जितनी आज की तारीख में ईरान से हैं। अगर अमेरिका, ईरान से पाबंदियां हटाता है तो इसका सबसे ज्यादा फायदा भारत को होगा। हालांकि ट्रंप प्रशासन से इसकी उम्मीद कम ही है।

भारत, ईरान और इजराइल के करीब आने से दुनिया की राजनीति पर भी असर पड़ना तय है। मोदी सरकार मानती है कि अरब देशों और ईरान-इजराइल से अच्छे संबंध से भारत को एनर्जी सिक्योरिटी मिलेगी, जो देश की तरक्की के लिए जरूरी है। साथ ही इसके जरिए वो दुनिया के नक्शे पर विश्व नेता की छाप छोड़ने में भी कामयाब होंगे। मोदी को ऐसे नेता के तौर पर देखा जाएगा जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना असर छोड़ा। पर सवाल ये है कि क्या ऐसा होगा? 'मोदी डॉक्ट्रिन' किताब के लेखक डॉक्टर अनिर्बान गांगुली ने भी माना है कि बरसों से भारत की पश्चिमी एशिया नीति, पाकिस्तान के चश्मे से देखी जाती रही। जबकि, इसका भारतीय मुसलमानों पर गहरा असर होता है। अब मोदी सरकार अपनी नई विदेश नीति से इस तस्वीर को बदलना चाहती है। भारत के मुसलमान हमेशा से चाहते रहे हैं कि, भारत के मुस्लिम देशों से ताल्लुक अच्छे रहें। ऐसा कदम अब मोदी सरकार उठा रही है ताकि वो मुसलमानों की अपेक्षाओं पर खरी उतर सके।

वैसे भी विदेश नीति के मोर्चे पर वर्ष 2016 भारत के लिए बेहतरीन वर्ष साबित हुआ। बेहतरीन इस अर्थ में कि इस मोर्चे पर भारत की झोली में नाकामियां गिनी चुनी रहीं, मगर उपलब्धियों की भरमार रही। खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ताबड़तोड़ विदेश दौरे ने दुनिया के मंच पर भारत को नई पहचान दी। प्रधानमंत्री ने ताकवतर देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बेहतर संबंध स्थापित करने के अलावा पाकिस्तान के वर्चस्व वाले मुस्लिम देशों में भी भाजपा की पैठ मजबूत कर दी। हालांकि साल 2016 के जाते जाते वैश्विक राजनीति में एकाएक आए परिवर्तन ने आने वाले साल के लिए मोदी सरकार की विदेश नीति के लिए अग्नि परीक्षा की नींव रख दी। इसका कारण अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना और कई मोर्चे पर नीति स्पष्ट न होना, रूस-पाकिस्तान-चीन की बन रही मजबूत तिकड़ी के अलावा मोदी सरकार की ओर से लिया गया नोट बंदी का फैसला है। वर्तमान वैश्विक दौर में विदेश नीति की सफलता-असफलता के लिए किसी भी देश की आर्थिक परिस्थिति सबसे बड़ा कारण बनती है। उपलब्धियों की बात करें तो साल 2016 ने भारत को दुनिया में एक नई पहचान दी। भारत ताकतवर देशों ही नहीं बल्कि सामरिक, कूटनीतिक दृष्टिï से महत्वपूर्ण देशों को भी साधने में सफल रहा। खासतौर पर आतंकवाद के सवाल पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की रणनीति मजबूती से आगे बढ़ी और भारत ने कई मौकों पर चीन के समर्थन के बावजूद पाकिस्तान को आईना दिखाया। हम इस साल एमटीआर के सदस्य बने, रूस के साथ एयर डिफेंस सिस्टम समझौता हुआ। एनएसजी और यूएन की सदस्यता मामले में दावेदारी और मजबूत हुई। पड़ोसी देशों में पाकिस्तान-चीन को छोड़ कर अन्य देशों से रिश्तों में मजबूती आई। खासतौर पर इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी-तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच बने परस्पर विश्वसनीय संबंध बड़ी उपलब्धि साबित हुई।

संजय तिवारी

(लेखक भारत संस्कृति न्यास, नयी दिल्ली के अध्यक्ष हैं)

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