राजीव गांधी के हत्यारे को गले लगाकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने गलत परम्परा कायम की

Nalini Sriharan
ANI
योगेंद्र योगी । Nov 23, 2022 12:15PM
हिन्दी का विरोध तमिलनाडु के राजनीतिक दलों को प्रमुख शगल रहा है। सभी क्षेत्रीय दल इस मुद्दे को भुना कर राजनीति करते रहे हैं। गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी को लेकर सबसे पहला विरोध दक्षिण भारत के तमिलनाडु में 1937 में हुआ।

वोटों की फसल काटने के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसका नया प्रमाण है तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई को लेकर मनाया गया जश्न। इसे बहुत बड़ी जीत माना गया। तमिलनाडु देश में एक ऐसा राज्य है, जहां की चुनी हुई डीएमके की सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों की रिहाई के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। एमडीएमके, पीएमके, एआइएडीएमके और सत्तारुढ़ डीएमके ने आतंकियों की रिहाई को ऐतिहासिक जीत बताया है। इससे पहले जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय दलों ने आतंकियों का समर्थन करके ऐसी हरकत की है। एआइएडीएमके सहित दूसरे क्षेत्रीय दल भी सत्ता में रहने के दौरान राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा कराने की इस कवायद में पूरी तरह शामिल रहे हैं। इतना ही नहीं वोट बैंक की राजनीति के लिए नैतिकता, आदर्श और सिद्धान्तों की आहुति देते हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दोषियों में से एक एजी पेरारिवलन से गले मिले। स्टालिन ने यह कृत्य करके यही जताने की कोशिश की है कि हत्यारों ने कोई गलती नहीं की है।

ऐसा नहीं है कि इन क्षेत्रीय दलों की सोई हुई अतंराआत्मा अचानक मानवता की भलाई के लिए जाग गई हो। यह सारा खेल चुनावी समीकरण से जुड़ा हुआ है। इससे पता चलता है कि मौजूदा राजनीति में कितनी गिरावट आ चुकी है। तमिलनाडु में हजारों अपराधी जेल में बंद हैं, इन सबकी रिहाई के लिए सरकार की ओर से कभी कोई प्रयास नहीं किया गया, जबकि इनमें से ज्यादातर तमिल हैं। इसके विपरीत राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा कराने के लिए मौजूद डीएमके की सरकार और पूववर्ती सरकारों ने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। कारण साफ यह हाइप्रोफाइल मामला था। इससे लोगों की सहानुभूति अर्जित की जा सकती है, जिसे वोट बैंक में बदला जा सकता है। इससे पहले भी श्रीलंका में आतंकी संगठन एलटीटीई (लिट्टे) का क्षेत्रीय दल समर्थन करते रहे हैं। राजीव गांधी के हत्यारे भी इसी आतंकी संगठन के सदस्य रहे हैं। उनकी हत्या का कारण भी यह रहा कि प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गांधी ने लिट्टे के खिलाफ श्रीलंका सरकार की मदद के लिए शांति सेना भेजी थी। इससे नाराज लिट्टे ने वर्ष 1991 में आतंकियों को ट्रेनिंग देकर आत्मघाती दस्ते से हमला करवा कर उनकी हत्या कर करवा दी।

यह पहला मौका नहीं है, जब तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि वे अखंड भारत का हिस्सा नहीं हैं। मुद्दा चाहे लिट्टे आतंकियों के समर्थन का हो या फिर हिन्दी भाषा के विरोध का। क्षेत्रीय दलों ने अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिए भारत की गरिमा, एकता और अखंडता से खिलवाड़ करने में कसर नहीं छोड़ी। पिछले दिनों मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने राज्य विधानसभा में हिंदी थोपने के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था। स्टालिन ने यह कदम केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाने की संसदीय समिति की सिफारिश के बाद उठाया। सत्तारुढ़ डीएमके ने हिंदी के विरोध में प्रदेशव्यापी प्रदर्शन किया।

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हिन्दी का विरोध तमिलनाडु के राजनीतिक दलों को प्रमुख शगल रहा है। सभी क्षेत्रीय दल इस मुद्दे को भुना कर राजनीति करते रहे हैं। गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी को लेकर सबसे पहला विरोध दक्षिण भारत के तमिलनाडु में 1937 में हुआ। हिंदी विरोध के नाम पर हिंसक बवाल 25 जनवरी 1965 को तमिलनाडु के मदुरई में हुआ। इसमें करीब 70 लोगों की मौत हुई जिसमें 2 पुलिसवाले भी शामिल थे। 1965 के इस आंदोलन ने अगर किसी को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया है तो वो और कोई नहीं मौजूदा सत्तारुढ़ दल डीएमके है। 1967 के चुनाव में डीएमके ने हिंदी को एक बड़ा मुद्दा बनाया और इसके दम पर चुनाव जीता और इसके बाद बरसों तक तमिलनाडु में शासन किया।

तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों की पृथकतावादी सोच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मौजूदा स्टालिन सरकार ने केंद्र सरकार को केंद्र सरकार न मान कर संघीय (यूनियन) सरकार माना है। इतना ही नहीं केंद्र सरकार से किए जाने वाले पत्राचार में भी संघीय यूनियन ही लिखा जाता है। तमिलानाडु के दलों ने क्षेत्रीय राजनीति में अपना प्रभुत्व कायम रखने के लिए केंद्र सरकार के देशभर में लागू किए गए कई फैसलों का विरोध किया है। नीट और जेईई की परीक्षा को राष्ट्रीय स्तर पर करवाने के खिलाफ स्टालिन सरकार ने बाकायदा विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया। नैतिकता और कानून की तमाम मर्यादाओं को तोड़ते हुए नीट के विरोध में राज्यपाल आरएन रवि के काफिले पर हमला किया गया। इसमें डीएमके समर्थक शामिल थे। निहित स्वार्थों के वशीभूत किए गए इस विरोध के बावजूद दोनों परीक्षाएं राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की गईं। इन दोनों परीक्षाओं को राज्यस्तर पर कराए जाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सहित 6 राज्यों की याचिका खारिज कर दी थी।

स्टालिन सरकार और दूसरे क्षेत्रीय दल इन परीक्षाओं को राज्यस्तर पर करवाए जाने की मांग करते रहे हैं। सत्तारुढ़ डीएमके ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इन परीक्षाओं को राज्य स्तर पर कराने का वादा किया था। इसका कारण भी साफ है, राज्य स्तर पर परीक्षा में सरकार अपनी मर्जी से परीक्षा के कायदे-कानून तय कर सकती है। इससे राजनीतिक दलों का क्षेत्रीय वोट बैंक मजबूत होता है। इसी तरह स्टालिन सरकार ने केंद्र की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का विरोध करते हुए इसे तमिलनाडु में लागू करने से इंकार कर दिया। तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों की ओर से वोट बैंक की राजनीति के लिए देश को दरकिनार करना बताता है कि सत्ता के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं, चाहे देश को उसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

-योगेन्द्र योगी

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