कैसी आजादी, जब बहुतों को खाना नहीं मिलता!

भारत दशकों से इस बात पर गर्व करता आया है कि उसके पास इतना अनाज है कि वह हर नागरिक का पेट भर सकता है। मगर भूख की वजह से होने वाली मौतें बदलते और प्रगति की ओर बढ़ते भारत की पोल खोलती हैं।

देश को स्वाधीन हुए 66 साल हो गए। पंद्रह अगस्त को हर कोई आजादी का जश्न मनाता है, पर आज भी भारत को भूख और कुपोषण से आजादी नहीं मिल पाई है। गरीब लोग महंगाई के कारण दो वक्त की रोटी व अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं। नतीजा उनके बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं। भारत दशकों से इस बात पर गर्व करता आया है कि उसके पास इतना अनाज है कि वह हर नागरिक का पेट भर सकता है। मगर भूख की वजह से होने वाली मौतें बदलते और प्रगति की ओर बढ़ते भारत की पोल खोलती हैं।

देश में इस समय लगभग 360 मिलियन लोग गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रहे हैं। यह आंकड़ा दूसरे देशों के मुकाबले बहुत ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय फूड पॉलिसी रिसर्च के अनुसार भारत के तीन राज्य ऐसे हैं, जहां भूख और कुपोषण की समस्या बहुत ज्यादा है। ये हैं- बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश। इन राज्यों में भूख से होने वाली मौतों का आंकड़ा काफी है। पांच साल से कम उम्र के बच्चे इस भूख और कुपोषण के सबसे अधिक शिकार होते हैं। इतिहास के पन्ने पलटें, तो भूख से मरने वाले ज्यादातर पिछड़े वर्ग के लोग हुआ करते थे। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं। भूख से होने वाली ज्यादातर मौतें आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग में होती हैं। अकेले बिहार में इस कमजोर वर्ग में हर 1000 शिशुओं में से 113 की मौतें जन्म के समय ही हो जाती हैं। इसकी तुलना में पूरे भारत का औसत 74 है।

स्वतंत्रता के 66 साल बाद भी पूरे देश में कई लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो रही। वहीं बड़ी-बड़ी पार्टियों, ब्याह-शादियों और बड़े समारोहों में खाने की बर्बादी साफ दिखती है। सरकार खाद्य सुरक्षा बिल पास कर चुकी है। जिसमें यह दावा किया गया कि देश का कोई नागरिक भूखे पेट नहीं सोएगा। मगर हकीकत यह है कि सरकारी गोदामों में पड़ा अनाज सड़ जाता है, लेकिन वह गरीबों को नहीं मिलता। बिना राशन कार्ड के उन्हें अनाज नहीं दिया जाता। फिर गरीबों को दिया जाने वाला यही अनाज दुकानों पर ऊंचे दाम पर बेच दिया जाता है। ऐसा क्यों होता है, क्यों नहीं सरकार इसकी जांच कराती।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 36 प्रतिशत महिलाएं और 34 प्रतिशत पुरुषों को पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता। देश में महिलाओं की स्थिति भी अच्छी नहीं। उन्हें खाने के नाम पर बचा-खुचा खाना मिलता है। गर्भावस्था में भी वे भरपूर पौष्टिक आहार नहीं खा पातीं जिससे उनका शिशु भी कुपोषित होता है।

इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार भारत में अनाज की कोई कमी नहीं। फिर भी 20 करोड़ से ज्यादा लोग भूखे पेट सोते हैं, जो पूरे विश्व के आंकड़ों से सबसे ज्यादा है। प्रधानमंत्री ने कुछ महीने पहले देश में कुपोषण की बढ़ती समस्या को शर्मनाक बताया था। एक सर्वे के मुताबिक देश में 42 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं। गरीबों को खाने के साथ-साथ उन्हें रोजगार व शिक्षा भी मुहैया कराना भी जरूरी है। पब्लिक हेल्थ सिस्टम इस बात का ख्याल रखे कि हर जरूरतमंद नागरिक को सही चिकित्सा सुविधा मिले। कुपोषण से ग्रस्त बच्चे और गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को मुफ्त चिकित्सीय सुविधा मिले।

लगभग 22 हजार लोग हर साल आयरन की कमी से मौत के मुंह में चले जाते हैं। 87 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं और 75 प्रतिशत पांच साल से कम उम्र के बच्चे एनिमिया से ग्रस्त होते हैं। विटामिन ‘ए‘ और आयरन की कमी कुपोषण का कारण बनती है। बच्चों को मुफ्त भोजन मिले। खासकर किशोरियों को जिससे वे बड़ी होकर कुपोषण की शिकार न रहें और देश को ऐसा नागरिक दें जो सबल और स्वस्थ हो। मिड डे मिल की व्यवस्था को और कारगर बनाने की जरूरत है। हालांकि यह कड़वा सच है कि उससे बच्चों का कुपोषण तो नहीं मिटेगा। उल्टे घटिया खाने से उनकी तबीयत जरूर खराब होगी। कुपोषण एक चुनौती की तरह है जिससे इस देश को मुक्ति चाहिए और इसके लिए ठोस पहल जरूरी है। आजादी के इस मौके पर शासन तंत्र ही नहीं नागरिक भी संकल्प करें कि कुपोषण से वे लड़ेंगे पर जरूरी यह भी है कि पहले देश के गरीबों की भूख मिटाई जाए। कुपोषण तो उनके लिए दूर की कौड़ी है।

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