हुआ तो हुआ, राहुल गांधी या अन्य कोई कांग्रेस नेता इस्तीफा क्यों दें ?

By संतोष पाठक | Publish Date: May 28 2019 11:08AM
हुआ तो हुआ, राहुल गांधी या अन्य कोई कांग्रेस नेता इस्तीफा क्यों दें ?
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अगर अध्यक्ष जिम्मेदारी लेते हैं तो बाकियों को भी तो पद छोड़ना पड़ेगा और यह जोखिम कोई उठाना नहीं चाहता है इसलिए राहुल गांधी फिलहाल राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे, टिके रहेंगे। अब तो यह कांग्रेस नेता भी मान रहे हैं कि हुआ तो हुआ।

1977 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस को हार कर सत्ता से बाहर होना पड़ा था। आपातकाल से उपजे माहौल के बीच मां-बेटे इंदिरा और संजय गांधी की जोड़ी विरोधी जनता पार्टी ही नहीं बल्कि कई कांग्रेसी नेताओं के लिए भी विलेन बन चुकी थी। कांग्रेस के अंदर भी इन दोनों से छुटकारा पाने की भावना जन्म ले चुकी थी। इससे पहले कि ये भावना बगावत का रूप ले पाती, इंदिरा गांधी ने स्वयं एक बड़ा दांव खेलते हुए कांग्रेस कार्यसमिति– CWC की बैठक से ठीक एक दिन पहले हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। अगले दिन अप्रैल 1977 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इंदिरा गांधी नहीं पहुंचीं, इसे उनके इस्तीफे के रूप में लिया जाने लगा। उहापोह की स्थिति बन गई थी क्योंकि चुनावी हार और सत्ता से बाहर होने के झटके से अभी तक कांग्रेसी उबर भी नहीं पाए थे। ऐसे में गांधी परिवार की छत्रछाया भी उनसे छिन जाए, यह झटका वो झेलने की हालत में नहीं थे। तमाम नेताओं ने विचार-विमर्श करने के बाद बरुआ, चव्हाण और कमलापति को इंदिरा गांधी को मनाने के लिए भेजा। ये तीनों इंदिरा गांधी को अपने साथ लेकर आए। बैठक में पहुंचीं इंदिरा का सभी सदस्यों ने हाथ जोड़कर स्वागत किया। इंदिरा गांधी हार के बावजूद जीत चुकी थीं क्योंकि वो जानती थी कि ये एक अचूक हथियार है। इस हथियार का सफल प्रयोग करते हुए वो कई बार महात्मा गांधी और अपने पिता जवाहर लाल नेहरू को देख चुकी थीं।

 
इस्तीफा एक अचूक हथियार


 
वक्त बदला लेकिन हथियार की अहमियत नहीं। एनडीए के शासनकाल में कई बार अटल बिहारी वाजपेयी इसका इस्तेमाल करते नजर आए तो अब करारी हार के बाद राहुल गांधी ने भी इसी का सहारा लिया। दरअसल, लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेसी खेमे में यह सवाल उठने लगा कि आखिर इस हार की नौतिक जिम्मेदारी कौन लेगा ?  इससे पहले कि ये सवाल बगावत के रूप में सामने आते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोनिया गांधी के समक्ष इस्तीफे की पेशकश कर दी। राजनीति की चतुर खिलाड़ी सोनिया गांधी ने राहुल को कांग्रेस कार्यसमिति में अपनी बात रखने को कहा।
 

 


हार के दुख और सदमे के बीच दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक शुरू हुई और राहुल गांधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी। इसके बाद मोर्चा संभाला पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने, उन्होने कहा कि हार और जीत तो लगी रहती है, इस्तीफे की कोई जरूरत नहीं है। पी. चिदंबरम रोते नजर आए तो प्रियंका गांधी भाई को मोदी की चाल के बारे में समझाती नजर आईं। इशारा काफी था और उसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने राहुल के इस्तीफे की पेशकश को ठुकरा दिया यानि सिरे से खारिज कर दिया। राहुल गांधी को फिर से संगठन में बदलाव का अधिकार दे दिया। कहा तो यहां तक जा रहा है कि गुस्से से भरे बैठे राहुल ने बेटे पर ज्यादा ध्यान देने के लिए कमलनाथ, अशोक गहलोत और पी. चिदंबरम को जमकर लताड़ भी लड़ाई लेकिन हुआ तो हुआ।
    
राहुल गांधी नहीं तो कौन का सवाल ?
 


मोदी की सुनामी में अमेठी से राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस कार्यसमिति के कई दिग्गज नेताओं को अपने-अपने क्षेत्रों में लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। वर्तमान लोकसभा में नेता कांग्रेस मल्लिकार्जुन खड़गे, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे और अशोक चह्वाण, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली, ज्योतिरादित्य सिंधिया, ऱघुवीर सिंह मीना, जितिन प्रसाद, दीपेंदर सिंह हुड्डा, सुष्मिता देव, के.ए. मुनियप्पा, अरूण यादव समेत टीम राहुल के कई अन्य युवा नेताओं को भी हार का सामना करना पड़ा। टीम राहुल के सदस्य राजीव सातव ने तो माहौल को भांप कर चुनाव ही नहीं लड़ा।
 

 
हाल ही में राजस्थान के मुख्यमंत्री की बागडोर संभालने वाले अशोक गहलोत के राज्य में भी कांग्रेस साफ हो गई, यहां तक कि गहलोत के बेटे को भी हार का सामना करना पड़ा। कमलनाथ भी सिर्फ अपने बेटे को ही जिता पाए। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है कि राहुल गांधी नहीं तो कौन ? कांग्रेस की बैठक में जो नेता मौजूद थे, उसमें से ज्यादातर हारे हुए नेता थे या वो थे जिन्होंने लोकसभा का चुनाव ही नहीं लड़ा। कई राज्यसभा सदस्य थे। इन विपरीत परिस्थितियों में भी सोनिया गांधी ने रायबरेली से जीत हासिल कर अपना रुतबा बरकरार रखा है। लेकिन स्वास्थ्य कारणों की वजह से सोनिया गांधी बहुत ज्यादा सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकती हैं। कांग्रेस का ट्रंप कार्ड प्रियंका गांधी भी इस चुनाव में फेल हो गईं। कांग्रेस के लिए अजीब सी स्थिति बन गई है।
राजा एक जगह से हारा है तो एक जगह से जीता भी है लेकिन सेना के अन्य सेनानायकों को भी तो बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा है। ऐसे में अगर अध्यक्ष जिम्मेदारी लेते हैं तो बाकियों को भी तो पद छोड़ना पड़ेगा और यह जोखिम कोई उठाना नहीं चाहता है इसलिए राहुल गांधी फिलहाल राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे, टिके रहेंगे। अब तो यह कांग्रेस नेता भी मान रहे हैं कि हुआ तो हुआ, इसके लिए इस्तीफा देने की क्या जरूरत है....।
 
-संतोष पाठक
 

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