आखिर क्यों ओम प्रकाश राजभर का गुस्सा शांत ही नहीं हो रहा? उनका लक्ष्य क्या है?

By अजय कुमार | Publish Date: Nov 15 2018 11:58AM
आखिर क्यों ओम प्रकाश राजभर का गुस्सा शांत ही नहीं हो रहा? उनका लक्ष्य क्या है?
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 312 सीटें जीत कर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने गठबंधन सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के मुखिया और योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर की बदजुबानी से काफी आहत नजर आ रहा है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 312 सीटें जीत कर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने गठबंधन सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के मुखिया और योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर की बदजुबानी से काफी आहत नजर आ रहा है। चार विधायकों वाली सुभासपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश उसी भाजपा की जड़ों में मट्ठा डालने में लगे हैं जिसको बैसाखी बनाकर उन्होंने जीत का स्वाद चखा था। वर्ना 2004 से चुनाव लड़ रही सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की किसी भी चुनाव में स्थिति वोटनोचवा से अधिक नहीं रही।
 
राजभर के सियासी कॅरियर पर नजर दौड़ाने पर पता चलता है कि राजभर ने 1981 में कांशीराम के समय में राजनीति में शुरूआत की थी। कांशीराम की पहचान दलित चिंतक, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक के रूप में थी। कांशीराम ने भारतीय वर्ण व्यवस्था में अछूतों और दलितों के राजनीतिक एकीकरण तथा उत्थान के लिए कार्य किया। इसके लिये उन्होंने पहले दलित शोषित संघर्ष समिति (डीएसएसएसएस) का गठन किया। इसके बाद 1971 में अखिल भारतीय पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी महासंघ (बामसेफ) बनाया। 1984 में कांशीराम ने राजनैतिक दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की। बहुजन समाज पार्टी में मायावती का रूतबा लगातार बढ़ता जा रहा था, जबकि राजभर की अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं। इसी के चलते मायावती और ओम प्रकाश के बीच दूरियां बढ़ने लगीं तो कांशीराम भी राजभर की जगह मायावती के साथ खड़े दिखाई दिये। विवाद जब सिर से ऊपर चढ़कर बोलने लगा तो 2001 में ओम प्रकाश ने बसपा से इस्तीफा दे दिया। कारण बना जिला भदोही का नाम बदला जाना। राजभर भदोही का नाम बदल कर संतकबीर नगर रखने से नाराज थे। इसके बाद राजभर ने किसी और दल का हाथ पकड़ने की जगह अपनी अलग सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी बनाई। ओम प्रकाश राजभर की नजर पूर्वांचल की 122 सीटों पर थी, जहां राजभर समाज निर्णायक भूमिका में था। पूर्वांचल की लगभग 65 सीटें ऐसी हैं, जहां राजभर मतदाताओं की आबादी 50 हजार से एक लाख तक है, जबकि 58 विधानसभा सीटों पर 50 से 25 हजार के बीच राजभर मतदाता रहते हैं।
 


ओम प्रकाश राजभर ने अलग पार्टी तो बना ली, लेकिन जमीनी हालात पक्ष में नहीं होने के कारण राजभर मतदाता उनकी पार्टी के पक्ष में खुलकर मतदान नहीं करता था। यही कारण था कि 2004 से चुनाव लड़ रही सुभासपा ने यूपी और बिहार के चुनाव में अपने प्रत्याशी तो जरूर खड़े किए मगर अधिकांश मौकों पर सुभासपा के प्रत्याशी चुनाव जीतने से ज्यादा खेल बिगाड़ने वाले बने रहे। राजभर ने एक बार माफिया  मुख्तार अंसारी के खिलाफ भी चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। मगर बाद में वह पीछे हट गए थे।
 
बहरहाल, 2017 के विधान सभा चुनाव से पूर्व ओम प्रकाश राजभर ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन की इच्छा जताई तो बीजेपी ने सियासी फायदे को देखकर तुरंत हामी भर दी। इसका फायदा बीजेपी को तो मिला ही ओम प्रकाश राजभर की पार्टी को चार विधान सभा सीटों पर विजय हासिल हुई। गठबंधन धर्म निभाते हुए बीजेपी ने ओम प्रकाश राजभर को मंत्री भी बना दिया, लेकिन कुछ समय बाद ही ओम प्रकाश राजभर ने अपनी ही सरकार के फैसलों पर उंगली उठानी शुरू कर दिया। कभी वह शिवपाल यादव को बीजेपी का एजेंट बता रहे थे तो कभी योगी को सलाह दे रहे थे कि वह जिलों के नाम बदलने के साथ−साथ अपने मुस्लिम मंत्रियों का भी नाम बदल दें। राजभर कहते हैं कि जब हम गरीबों की बात करते हैं तो बीजेपी वाले मंदिर की बात करते हैं। मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलकर जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय किया गया तो ओमप्रकाश पूछने लगे क्या इससे ट्रेनें समय पर आने लगेंगी। गुजरात में जब उत्तर भारतीयों पर हमला हुआ तो राजभर ने गुजरात की बीजेपी सरकार से ही इस्तीफा मांग लिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जब अपराध पर नियंत्रण के लिये बदमाशों को एनकांउटर में मारना शुरू किया तो राजभर कहने लगे कि पैसा लेकर हत्याएं कराई जा रही हैं। कानून व्यवस्था मजाक बन गया है। एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद जब केन्द्र ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने का मन बनाया तो राजभर इसकी मुखालफत करने लगे।
 
गठबंधन के सहयोगी ओम प्रकाश राजभर एक तरफ मंत्री पद का फायदा उठा रहे थे तो दूसरी ओर बीजेपी के लिये मुश्किलें खड़ी कर रहे थे। यह सिलसिला लगातार चल रहा था। कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर की बयानबाजी भाजपा के लिए असहनीय होती जा रही है। सियासी सुगबुगाहट जोर पकड़ रही थी कि कहीं राजभर का बड़बोलापन उनको गठबंधन से बाहर का रास्ता न दिखा दे। पानी सिर से ऊपर होता जा रहा था तो राजभर इसे बीजेपी की कमजोरी मान रहे थे। ऐसे में बीजेपी की तरफ से राजभर को आईना दिखाने का काम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने संभाला। उन्होंने गठबंधन के साथी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर को हद में रहने की नसीहत दी। योगी और मौर्य ने जिस तरह से राजभर को आईना दिखाया है उसे राजभर के संकट में घिरने से जोड़कर देखा जा रहा है। योगी−मौर्य का बयान आते ही राजनीतिक गलियारे में यह भी चर्चा होने लगी है कि ओमप्रकाश राजभर शायद ही भाजपा के मिशन 2019 में सहयोगी रहें। यदि इन्होंने भाजपा के खिलाफ बोलने से परहेज नहीं किया तो भाजपा इनसे दूरी भी बना सकती है। भाजपा र्शीष टीम ने हाल के दिनों में राजभर द्वारा मंदिर मुद्दे और भाजपा के बड़े नेताओं के हिन्दू−मुस्लिम रिश्तों पर की गई बयानबाजी को न केवल गंभीरता से लिया है बल्कि गहरी नाराजगी जताई है।


 
हालांकि पार्टी सूत्रों का दावा है कि भाजपा मिशन−2019 को ध्यान में रखते हुए किसी भी सहयोगी दल को खोना नहीं चाहती है। न ही राजभर को गठबंधन से हटाने का मुद्दा अभी तक पार्टी एजेंडे में शामिल हुआ है। यह और बात है कि योगी और मौर्या के सख्त तेवरों के बाद भी राजभर ने अपनी जुबान नहीं बंद की है। बल्कि मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के बयानों के बाद ओमप्रकाश राजभर के तेवर और भी तल्ख हो गये हैं। योगी−मौर्य के बयान के बाद राजभर ने कहा कि भाजपा नेताओं को अहंकार हो गया है कि 50 साल तक सत्ता में रहेंगे। अहंकार तो महाबली रावण का भी टूट गया था। उन्होंने कहा कि इस अहं के कारण ही उपेंद्र कुशवाहा, रामविलास पासवान और शिवसेना भाजपा से नाराज हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें गठबंधन से निकाले जाने का कोई खौफ नहीं है। वह उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब भाजपा उन्हें गठबंधन से निकाल दे। जो हालात बन रहे हैं उसमें आज की तारीख में राजभर भारतीय जनता पार्टी के लिये गुड़ भरी हसिया साबित हो रहे हैं।
 
-अजय कुमार


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