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विश्लेषण

ताजमहल की उपेक्षा कर रही योगी सरकार, ऐसे ही आगे बढ़ेगा पर्यटन?

By योगेन्द्र योगी | Publish Date: May 14 2018 3:42PM

ताजमहल की उपेक्षा कर रही योगी सरकार, ऐसे ही आगे बढ़ेगा पर्यटन?
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प्रदूषण से पीले पड़ते ताजमहल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। विश्व के सात मानवनिर्मित आश्चर्यों में शामिल करीब तीन सौ साल पुराने शाहजहां और मुमताज की मोहब्बत के इस प्रतीक को बचाने के लिए जो काम सुप्रीम कोर्ट कर रहा है, दरअसल उसकी सीधी जिम्मेदारी केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार की है। संयोग से दोनों में भाजपा की सरकारें हैं। भाजपा देश की धर्म−संस्कृति को बचाने की दुहाई देते हुए नहीं थकती। हालांकि यह मामला मुस्लिम शासक का होने से ताज को बचाने के मामले में नाक−मुंह सिकोड़े हुए हैं। ताज को लेकर इनके पूर्वाग्रह का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने अपने ब्रोशर में ताज को शामिल नहीं किया। इस मुद्दे पर खूब किरकिरी होने के बाद इसे शामिल किया गया।

ऐसा भी नहीं है कि धर्म−संस्कृति की झंडाबरदार पार्टी को हिन्दू धार्मिक−ऐतिहासिक स्थलों की खास चिंता हो। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक पुरामहत्व की 24 धरोहरें विलुप्त प्राय हो चुकी हैं। इनमें उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। यहां 11 धरोहरें संरक्षण और सुरक्षा के अभाव में विलुप्त हो गईं। इसमें मिर्जापुर जिले का एक हजार वर्ष प्राचीन तीन लिंगा मंदिर भी शामिल हैं। ऐतिहासिक और संस्कृति से जुड़ी इन धरोहरों को बचाने के लिए आंदोलन तो क्या कभी किसी ने आवाज तक बुलंद नहीं की। दरअसल इनके नष्ट या जर्जर होने से किसी राजनीतिक दल का वोट बैंक प्रभावित नहीं होता। पुरामहत्व की विरासतों को बचाने के मामले में सरकारें सिर्फ मुखौटा ही साबित हुई हैं।
 
आजादी के बाद देश में चाहे किसी भी दल की सरकारें रही हों, सरकारें विश्वस्तरीय दिखाने लायक कुछ दे तो नहीं सकीं बल्कि जो दर्शनीय है, उसकी हिफाजत करने में भी नाकामयाब रहीं हैं। इतना जरूर है कि सरकारें गाल बजाने में माहिर हैं। बेतुके और निरर्थक मुद्दों पर हंगामा करवाने में पीछे नहीं रहतीं। देश की पुरा सम्पदा और ऐतिहासिक इमारतों की सार−संभाल करने में सरकारों का दम फूलने लगता है। ये तो तब है जब ये धरोहरें सरकारी खजाना भर रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारें इन्हें देसी−विदेशी पर्यटकों को दिखाकर खजाना भरने में लगी हुई हैं। लेकिन जब बारी इनकी हिफाजत की आती है तो जिम्मेदारी से भागने लगती हैं। सरकारी कमाई के मामले में ताजमहल का कोई सानी ही नहीं है। यूनस्को से संरक्षित प्रेम की इस धरोहर से सर्वाधिक कमाई हो रही है। इससे होने वाली आय से न केंद्र और ना ही उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को कोई गुरहेज है। इस मामले में भाजपा सरकारों की हालत गुड़ खाए और गुलगुले से परहेज जैसी है। ताज से सीधी कमाई के अलावा उत्तर प्रदेश की अप्रत्यक्ष आय और रोजगार का एक बड़ा स्त्रोत ताजमहल ही है। विगत तीन वर्षों में ताज से सीधे 75 करोड़ से अधिक की आय हुई है।
 
विदेशी पर्यटकों के पसंदीदा स्थलों में ताज के बाद पहले पांच स्थानों पर भी मुस्लिम शासकों की बनाई इमारतें रहीं हैं। इनमें आगरा का किला, कुतुब मीनार, फतेहपुर सीकरी, हुमायूं का मकबरा और दिल्ली का लालकिला शामिल है। इनसे होने वाली सरकारी कमाई भी सैंकड़ों करोड़ों में है। मुस्लिम शासकों की बनाई इन ऐतिहासिक इमारतों की कमाई खाने से किसी को परहेज नहीं है। वैसे इनके प्रतीकों को लेकर खूब राजनीति होती रही है। इन इमारतों की देखभाल के मामलों में सरकारों की हालत ऐसे बेटों की तरह है जो जीवन भर पिता की कमाई खाता है और बुढ़ापे में उसे बेसहारा छोड़ देता है। लगता यही है कि सरकारों के लिए सिर्फ वोट बैंक ही सब कुछ है, बेशक ताजमहल क्यों न नेस्तानबूद हो जाए।
 
यह निश्चित भी है कि यदि अदालतें हस्तक्षेप नहीं करतीं तो विश्व प्रसिद्ध मोहब्बत की यह इमारत अब तक दफन भी नहीं तो खंडहर में तब्दील जरूर हो जाती। बढ़ते प्रदूषण और पर्यटकों का दबाव झेल रहे ताजमहल को बचाने की जब भी पहल की है, अदालत ने ही की है। सरकारें तो इसका इस्तेमाल दुधारू गाय की तरह ही करती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1996 में ताज कोरिडोर परिसर के 10 हजार 400 वर्ग किलोमीटर में प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाईयों पर प्रतिबंध लगाया था। सरकारों ने इसे बचाने के कोई प्रयास नहीं किए। इसके बाद यमुना नदी में ताज के किनारे शवदाह पर प्रतिबंध लगाया गया। सवाल यह है कि जब अदालतों को ही ऐसे मामलों दखल देना पड़े तो सरकारों की जरूरत ही क्या है? अदालत की ताज परिक्षेत्र में लगाई औद्योगिक पाबंदी का ही परिणाम है कि भरतपुर स्थित विश्वविख्यात केवलादेव पक्षी उद्यान बचा हुआ है। यदि ताज परिक्षेत्र में उद्योग लगाने की छूट मिल जाती तो यह उद्यान प्रदूषण की मार से अभी तक पक्षी विहिन हो गया होता। इसमें देश-विदेश के सैंकड़ों प्रजातियों के परिन्दे शीतकाल में सर्दी से बचने के प्रवास पर आते हैं। विदेशी पर्यटकों के प्रमुख पसंदीदा स्थलों में केवलादेव पक्षी उद्यान भी शामिल है। इससे भी खूब सरकारी कमाई होती है।
 
ऐसा नहीं है कि सरकारी उपेक्षा की दुर्दशा प्रमुख स्मारक ही झेल रहे हों, प्रदूषण के मामले में देश की पावन नदी गंगा का भी यही हाल है। कितनी ही सरकारें आईं और चली गईं पर गंगा की गंदगी दूर नहीं हुई। सरकारों ने गंगा को बचाने के लिए वायदे खूब किए पर हालत ढाई दिन चले अढ़ाई कोस जैसी ही रही। हरिद्वार से आगे गंगा की हालत यह है कि इसका जल आचमन के लायक भी नहीं रहा। राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी और भ्रष्टाचार ने गंगा को गंदा किया है। आश्चर्य की बात तो यह है कि देश के धर्म−संस्कृति की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल और सरकारों ने भी पुरा धरोहरों को बचाने के लिए गंभीरता से प्रयास नहीं किया। सवाल यही है कि कोरे वादों और उपेक्षा से जिस दिन ये ऐतिहासिक धरोहरें विलुप्त हो जाएंगी तो क्या धर्म−संस्कृति की विविधता बची रह जाएगी। धर्म−संस्कृति क्या कागजों पर दिखाई जाने वाली चीज है। इनके विलुप्त होने की दशा में विश्व में हमारी स्थिति कितनी हास्यादपद हो जाएगी। बेहतर है कि ऐसी नौबत आए इससे पहले राजनीतिक द्वेषभाव और वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर इनके संरक्षण की दिशा में गंभीर प्रयास हों।
 
-योगेन्द्र योगी

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