ये रहीं 2018 में विज्ञान के क्षेत्र में भारत की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां

  •  दिनेश सी. शर्मा
  •  दिसंबर 24, 2018   18:22
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ये रहीं 2018 में विज्ञान के क्षेत्र में भारत की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां

भारतीय वैज्ञानिकों ने कई उल्लेखनीय शोध किए हैं। नैनोटेक्नोलॉजी से लेकर अंतरिक्ष मौसम विज्ञान तक विविध क्षेत्रों में हो रहे वैज्ञानिक विकास, नई तकनीकों और उन्नत प्रौद्योगिकियों से जुड़ी खबरें लगभग पूरे साल सुर्खियां बनती रही हैं।

नई दिल्ली। (इंडिया साइंस वायर): वर्ष 2018 में भारतीय वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों ने अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र से जुड़े विभिन्न अभियानों में कई अभूतपूर्व सफलताएं हासिल की हैं। लेकिन, वर्ष 2018 की वैज्ञानिक उपलब्धियां महज यहीं तक सीमित नहीं रही हैं। अंतरिक्ष एवं रक्षा क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी भारतीय वैज्ञानिकों ने कई उल्लेखनीय शोध किए हैं। नैनोटेक्नोलॉजी से लेकर अंतरिक्ष मौसम विज्ञान तक विविध क्षेत्रों में हो रहे वैज्ञानिक विकास, नई तकनीकों और उन्नत प्रौद्योगिकियों से जुड़ी खबरें लगभग पूरे साल सुर्खियां बनती रही हैं। यहां वर्ष 2018 की ऐसी 15 कहानियों का संग्रह दिया जा रहा है, जो भारतीय वैज्ञानिकों के कार्यों की झलक प्रस्तुत करती हैं।

किसानों को जहरीले कीटनाशकों से बचाने वाला जैल

किसानों द्वारा खेतों में रसायनों का छिड़काव करते समय कोई सुरक्षात्मक उपाय नहीं अपनाने से उनको विषैले कीटनाशकों का शिकार बनना पड़ता है। इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल बायोलॉजी ऐंड रीजनरेटिव मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने त्वचा पर लगाने वाला "पॉली-ऑक्सीम" नामक एक सुरक्षात्मक जैल बनाया है, जो जहरीले रसायनों को ऐसे सुरक्षित पदार्थों में बदल देता है, जिससे वे मस्तिष्क और फेफड़ों जैसे अंगों में गहराई तक नहीं पहुंच पाते हैं। शोधकर्ताओं ने एक ऐसा मुखौटा विकसित करने की योजना बनाई है जो कीटनाशकों को निष्क्रिय कर सकता है।

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उत्कृष्ट तकनीक से बना दुनिया का सबसे पतला पदार्थ

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने नैनो तकनीक की मदद से एक ऐसा पतला पदार्थ बनाया है, जो कागज के एक पन्ने से भी एक लाख गुना पतला है। उन्होंने मैग्नीशियम डाइबोराइड नामक बोरॉन यौगिक द्वारा सिर्फ एक नैनोमीटर (मनुष्य के बाल की चौड़ाई लगभग 80,000 नैनोमीटर होती है) मोटाई वाला एक द्विआयामी पदार्थ तैयार किया है। इसे दुनिया का सबसे पतला पदार्थ कहा जा सकता है। इसका उपयोग अगली पीढ़ी की बैटरियों से लेकर पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करने वाली फिल्मों के निर्माण में किया जा सकता है।

केले के जीनोम का जीन संशोधन

राष्ट्रीय कृषि-खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, मोहाली के शोधकर्ताओं ने जीन संशोधन की क्रिस्पर/सीएएस9 तकनीक की मदद से केले के जीनोम का संशोधन किया है। भारत में किसी भी फल वाली फसल पर किया गया अपनी तरह का यह पहला शोध है। सकल उत्पादन मूल्य के आधार पर गेहूं, चावल और मक्का के बाद केला चौथी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल मानी जाती है। केले की पोषक गुणवत्ता में सुधार, खेती की दृष्टि से उपयोगी गुणों के समावेश और रोग प्रतिरोधी किस्मों के विकास में जीन संशोधन तकनीक अपनायी जा सकती है।


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जीका, डेंगू, जापानी एन्सेफ्लाइटिस और चिकनगुनिया से निपटने के लिए की गईं खोजें

हरियाणा के मानेसर में स्थित राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र (एनबीआरसी) के वैज्ञानिकों ने शिशुओं में माइक्रोसिफेली या छोटे सिर होने के लिए जिम्मेदार जीका वायरस की कोशिकीय और आणविक प्रक्रियाओं का पता लगाया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जीका वायरस के आवरण में मौजूद प्रोटीन मनुष्य की तंत्रिका स्टेम कोशिकाओं की वृद्धि दर को प्रभावित करता है और दोषपूर्ण तंत्रिकाओं के विकास को बढ़ावा देता है। एक अन्य शोध में फरीदाबाद स्थित रीजनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने एक प्रमुख प्रोटीन की पहचान की है, जो एंटी-वायरल साइटोकिन्स को अवरुद्ध करके डेंगू और जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस को बढ़ने में मदद करता है। यह खोज डेंगू और जापानी एन्सेफलाइटिस के लिए प्रभावी दवा बनाने में मददगार हो सकती है। इसी तरह, एमिटी विश्वविद्यालय, नोएडा, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के शोधकर्ताओं ने चिकनगुनिया का पता लगाने के लिए मोलिब्डेनम डाइसल्फाइड नैनोशीट की मदद से एक बायोसेंसर विकसित किया है।

तपेदिक की शीघ्र पहचान करने वाली परीक्षण विधि

ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, फरीदाबाद और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने फेफड़ों और उनके आसपास की झिल्ली में क्षयरोग संक्रमण के परीक्षण के लिए अत्यधिक संवेदनशील, अधिक प्रभावी और तेज विधियां विकसित की हैं। बलगम के नमूनों में जीवाणु प्रोटीन का पता लगाने के लिए एंटीबॉडी आधारित वर्तमान विधियों के विपरीत इन नयी विधियों में बलगम में जीवाणु प्रोटीन का पता लगाने के लिए एपटामर लिंक्ड इमोबिलाइज्ड सॉर्बेंट एसे (एलिसा) और इलेक्ट्रोकेमिकल सेंसर (ईसीएस) का उपयोग होता है।


पंजाब के भूजल में मिला आर्सेनिक

भूजल में आर्सेनिक के अधिक स्तर के कारण मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, असम, मणिपुर और छत्तीसगढ़ को ही प्रभावित माना जाता रहा है। लेकिन, अब पंजाब के भूमिगत जल में भी आर्सेनिक की भारी मात्रा होने का पता चला है। नई दिल्ली स्थित टेरी स्कूल ऑफ एडवांस स्टडीज के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नये अध्ययन में पंजाब के बाढ़ प्रभावित मैदानी क्षेत्रों के भूमिगत जल में आर्सेनिक का अत्यधिक स्तर पाया गया है। यहां भूजल में आर्सेनिक स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के निर्धारित मापदंड से 20-50 गुना अधिक पाया गया है। 

अंतरिक्ष मौसम चेतावनी मॉडल ने लघु हिम युग को किया खारिज

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आइजर) कोलकाता के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित एक मॉडल की गणनाओं के आधार पर आगामी सनस्पॉट (सौर कलंक) चक्र के शक्तिशाली होने की अवधारणा को नकार दिया गया है। आगामी सनस्पॉट चक्र-25 में पृथ्वी के निकट और अंतर-ग्रहीय अंतरिक्ष में पर्यावरणीय परिस्थितयां तथा जलवायु को प्रभावित करने वाले सौर विकिरण के मान वर्तमान सौर चक्र के दौरान पिछले एक दशक में प्रेक्षित मानों के समान या थोड़ा अधिक होंगे। इस विधि द्वारा अगले सनस्पॉट चक्र की शक्तिशाली चरम सक्रियता में पहुंचने की भविष्यवाणियां एक दशक पहले की जा सकती हैं।

ऑटिज्म की पहचान के लिए नया टूल

कई मामलों में, ऑटिज्म या स्वलीनता को मंदबुद्धि और अटेंशन डेफिसिट हाइपर-एक्टिविटी डिस्ऑर्डर नामक मानसिक विकार समझ लिया जाता है। रोग की शीघ्र पहचान और हस्तक्षेप से बच्चों में स्वलीनता विकारों को समझने में सहायता मिल सकती है। इस प्रक्रिया में मदद करने के लिए, चंडीगढ़ के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के वैज्ञानिकों ने ऑटिज्म वाले बच्चों की जांच के लिए एक भारतीय टूल विकसित किया है। चंडीगढ़ ऑटिज्म स्क्रीनिंग इंस्ट्रूमेंट (सीएएस) को सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को ऑटिज्म की शुरुआती जांच में मदद करने के लिए तैयार किया गया है।       

अल्जाइमर और हंटिंगटन के इलाज की नई आशा

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने अल्जाइमर रोग के लिए जिम्मेदार उन शुरुआती लक्षणों का पता लगाया है, जिससे यादाश्त कम होने लगती है। उन्होंने पाया है कि मस्तिष्क में फाइब्रिलर एक्टिन या एफ-एक्टिन नामक प्रोटीन के जल्दी टूटने से तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संचार में व्यवधान होता है और इसके परिणामस्वरूप स्मृति की कमी हो जाती है। इस शोध का उपयोग भविष्य में रोग की प्रारंभिक जांच परीक्षण विधियां विकसित करने के लिए किया जा सकता है। फल मक्खियों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में, दिल्ली विश्वविद्यालय के आनुवांशिकी विभाग के शोधकर्ताओं ने पाया है कि मस्तिष्क की न्यूरोनल कोशिकाओं में इंसुलिन सिग्नलिंग को बढ़ाकर हंटिंग्टन रोग का बढ़ना रोका जा सकता है।

प्लास्टर ऑफ पेरिस से होने वाले प्रदूषण से मुक्ति दिलाने वाली हरित तकनीक

पुणे स्थित राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (सीएसआईआर-एनसीएल) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी पर्यावरण हितैषी तकनीक विकसित की है, जो किफायती तरीके से अस्पतालों से प्लास्टर ऑफ पेरिस अपशिष्टों को पुनर्चक्रित करने में मदद करती है। इस तकनीक की सहायता से अपशिष्ट को असंक्रमित करके उससे अमोनियम सल्फेट और कैल्शियम बाइकार्बोनेट जैसे उपयोगी उत्पाद बनाए जा सकते हैं। नदियों एवं अन्य जलाशयों में विसर्जित की जाने वाली प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों को विघटित करने के लिए भी इस तकनीक का उपयोग किया जा सकता है।

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भारतीय सभ्यता पर रोशनी डालते पाषाण युगीन उपकरण और आनुवांशिक अध्ययन

चेन्नई के पास एक गांव में खोजे गए पाषाण युग के उपकरणों से पता चला है कि लगभग 385,000 साल पहले भारत में मध्य पुरापाषाण सभ्यता मौजूद थी। लगभग उसी काल के दौरान यह सभ्यता अफ्रीका और यूरोप में भी विकसित थी। भारत के मध्य पुरापाषाण सभ्यता के उस दौर में ले जाने वाली यह खोज उस लोकप्रिय सिद्धांत को चुनौती देती है, जिसमें कहा गया है कि आधुनिक मानवों द्वारा लगभग 125,000 साल पहले या बाद में मध्य पुरापाषाण सभ्यता अफ्रीका से भारत आई थी। वहीं, उत्तर भारत के आधुनिक हरियाणा में रहने वाले रोड़ समुदाय के लोगों के बारे में किए गए एक अन्य जनसंख्या आनुवंशिक अध्ययन से पता चला है कि ये लोग कांस्य युग के दौरान पश्चिम यूरेशियन आनुवंशिक वंशों से सिंधु घाटी में आए थे। 

सिक्किम में स्थापित हुआ भूस्खलन चेतावनी तंत्र

उत्तर-पूर्वी हिमालय के सिक्किम-दार्जिलिंग बेल्ट में एक अतिसंवेदी भूस्खलन चेतावनी तंत्र स्थापित किया गया है। इस चेतावनी तंत्र में 200 से अधिक सेंसर लगाए गए हैं, जो वर्षा, भूमि की सतह के भीतर छिद्र दबाव और भूकंपीय गतिविधियों समेत विभिन्न भूगर्भीय एवं हाइड्रोलॉजिकल मापदंडों की निगरानी करते हैं। यह तंत्र भूस्खलन के बारे में लगभग 24 घण्टे पहले ही चेतावनी दे देता है। इसे केरल स्थित अमृता विश्वविद्यालय और सिक्किम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के शोधकर्ताओं ने बनाया है।

मौसम की भविष्यवाणी के लिए कम्प्यूटिंग क्षमता में संवर्धन

इस साल भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) ने मौसम पूर्वानुमान और जलवायु निगरानी के लिए अपनी कंप्यूटिंग क्षमता को संवर्धित किया है। इसकी कुल उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग (एचपीसी) शक्ति को 6.8 पेटाफ्लॉप के उच्चतम स्तर पर ले जाया गया है। इसके साथ ही भारत अब मौसम और जलवायु संबंधी उद्देश्यों के लिए समर्पित एचपीसी संसाधन क्षमता में यूनाइटेड किंगडम, जापान और यूएसए के बाद दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंच गया है।

वैज्ञानिकों ने सिल्क पॉलीमर से विकसित की कृत्रिम कशेरुकीय डिस्क

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने सिल्क-आधारित एक ऐसी कृत्रिम जैव डिस्क बनाई है, जिसका भविष्य में डिस्क रिप्लेसमेंट थेरेपी में उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए एक "डायरेक्शल फ्रीजिंग तकनीक" द्वारा सिल्क-आधारित कृत्रिम जैव डिस्क के निर्माण की प्रक्रिया विकसित की गई है। यह डिस्क आंतरिक रूप से हूबहू मानव डिस्क की तरह लगती है और उसकी तरह ही काम भी करती है। एक जैव अनुरुप डिस्क को बनाने के लिए सिल्क बायो पॉलीमर का उपयोग भविष्य में कृत्रिम डिस्क की लागत को कम कर सकता है।

कम आर्सेनिक जमाव वाले ट्रांसजेनिक चावल और जल्दी पुष्पण वाली ट्रांसजेनिक सरसों

चावल में आर्सेनिक जमाव की समस्या को दूर करने के लिए, लखनऊ स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के शोधकर्ताओं ने कवकीय जीन का इस्तेमाल करते हुए आर्सेनिक का कम जमाव करने वाली चावल की ट्रांसजेनिक प्रजाति विकसित की है। उन्होंने मिट्टी में पाए जाने वाले एक कवक से आर्सेनिक मिथाइलट्रांसफेरेज (वार्सएम) जीन का क्लोन बनाकर उसे चावल के जीनोम में डाला। एक अन्य अध्ययन में, टेरी स्कूल ऑफ एडवांस्ड स्टडीज को वैज्ञानिकों ने सरसों की शीघ्र पुष्पण वाली ट्रांसजेनिक किस्म विकसित की है।

विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रयासों की बात करें तो उनमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा साइबर-भौतिकीय प्रणालियों के लिए 3660 करोड़ रुपये की लागत से शुरू किया गया पांच वर्षीय राष्ट्रीय मिशन भी शामिल है। इसके अलावा बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स ने गतिशील ब्रह्मांड पर नजर रखने के लिए भारत के पहले रोबोटिक टेलीस्कोप को चालू किया है। वहीं, महत्वाकांक्षी भारतीय न्यूट्रिनो वेधशाला (आईएनओ) परियोजना को भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल से स्वीकृति मिल गई है। 

(इंडिया साइंस वायर)

भाषांतरण- शुभ्रता मिश्रा







दिल्ली में भूकंप स्रोतों की पहचान के लिए सर्वेक्षण

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  जनवरी 15, 2021   13:32
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दिल्ली में भूकंप स्रोतों की पहचान के लिए सर्वेक्षण

हाल के वर्षों में दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में भूकंप की कई घटनाएं दर्ज की गई हैं। भूकंप की बार-बार होने वाली घटनाओं को देखते हुए भूकंप के स्रोतों को चिह्नित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।

भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि दिल्ली और इसके आसपास के क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील हैं, और यहाँ 7.9 की तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है। इतनी अधिक तीव्रता के भूकंप से बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान की आशंका रहती है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (एनसीएस) द्वारा दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में भूकंप के खतरे का सटीक आकलन करने के लिए भू-भौतिकीय सर्वेक्षण किया जा रहा है। एनसीएस के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पहल भूकंप के कारण होने वाले नुकसान को कम करने से संबंधित रणनीतियों के विकास में मददगार हो सकती है। एनसीएस यह अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), कानपुर के सहयोग से कर रहा है।

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हाल के वर्षों में दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में भूकंप की कई घटनाएं दर्ज की गई हैं। भूकंप की बार-बार होने वाली घटनाओं को देखते हुए भूकंप के स्रोतों को चिह्नित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। एनसीएस की इस पहल के अंतर्गत भूकंपीय खतरों के सटीक आकलन के लिए उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और भू-गर्भ क्षेत्र शोध का विश्लेषण और व्याख्या की जा रही है। इस अध्ययन से प्राप्त जानकारी का उपयोग भूकंप-रोधी इमारतों, औद्योगिक इकाइयों, अस्पतालों, स्कूलों आदि को डिजाइन करने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा, हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) अन्वेषण, भू-तापीय अन्वेषण, कार्बन अनुक्रम, खनन अन्वेषण तथा हाइड्रोकार्बन और भूजल की निगरानी में भी इस तरह प्राप्त जानकारियों का उपयोग होता है।

भू-वैज्ञानिकों ने भूकंप के खतरे की दृष्टि से पूरे देश को पाँच जोन में विभाजित किया है। भूकंप के आसन्न खतरे के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्रों को जोन-5 में रखा गया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और उसके आपपास के इलाकों को जोन-4 की श्रेणी में रखे गए हैं। भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि स्थानीय भूकंपीय नेटवर्क को सुदृढ़ करना और भ्रंश (फाल्ट) जैसी उप-सतह की विशेषताओं की रूपरेखा तैयार करना जरूरी है, जो भूकंप का कारण बन सकते हैं। भ्रंश (फाल्ट), धरती के अन्दर की चट्टान में टूट-फूट या दरार को कहा जाता है।

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दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में ज्ञात भ्रंश (फाल्ट) को कवर करने के लिए 11 अस्थायी अतिरिक्त स्टेशनों की तैनाती के साथ भूकंप नेटवर्क को मजबूत बनाया जा रहा है। इससे भूकंप के कारणों की बेहतर समझ के लिए भूकंप पैदा होने व बाद के झटकों का सटीक स्थान-निर्धारण किया जा सकेगा। इन स्टेशनों से डेटा लगभग वास्तविक समय पर प्राप्त किया जा सकता है। इस डेटा का उपयोग संबंधित क्षेत्र के सूक्ष्म और छोटे भूकंपों का पता लगाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। इस विस्तारित नेटवर्क से अब भूकंप-केंद्र के निर्धारण में दो किलोमीटर तक की सटीकता आयी है। 

दिल्ली क्षेत्र में भू-भौतिकीय सर्वेक्षण- मैग्नेटोटेल्यूरिक (विद्युत चुम्बकीय-भू-सतह) भी किया जा रहा है। मैग्नेटोटेल्यूरिक (MT) एक भू-भौतिकीय पद्धति है, जिसमें भूगर्भीय संरचनाओं एवं गतिविधियों के अध्ययन के लिये पृथ्वी के चुंबकीय एवं विद्युत क्षेत्रों की भिन्नता का उपयोग किया जाता है। इस विधि के द्वारा भूकंप उत्प्रेरण की संभावना को बढ़ाने वाले तत्वों, जैसे मैग्मा आदि की आवृत्ति को मापा जाता है। इस विधि द्वारा 300 से 10,000 मीटर तक की गहराई में उच्च आवृत्तियों को रिकॉर्ड किया जा सकता है। इसके लिये प्रायः तीन प्रमुख भूकंपीय स्रोतों, महेंद्रगढ़-देहरादून फॉल्ट (MDF), सोहना फॉल्ट (SF) और मथुरा फॉल्ट (MF) से मापों को लिया जाता है। इस सर्वेक्षण में वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान, देहरादून भी एक भागीदार है।

पिछले साल अप्रैल से अगस्त महीनों के दौरान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीटी)- दिल्ली में चार छोटे-छोटे भूकंप की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से 3.5 तीव्रता का पहला भूकंप लॉकडाउन के दौरान एनसीटी दिल्ली की पूर्वोत्तर सीमा में 12 अप्रैल, 2020 को आया था। इन भूकंपों के बाद रिक्टर पैमाने पर 3.0 से कम तीव्रता की लगभग एक दर्जन सूक्ष्म घटनाओं का अनुभव किया गया, जिनमें बाद में आने वाले कुछ झटके (आफ्टरशॉक्स) भी शामिल हैं।

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भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भूकंप की इन घटनाओं के केंद्र तीन अलग-अलग क्षेत्रों में आते हैं। इन क्षेत्रों में, उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सीमा, रोहतक (हरियाणा) के दक्षिण-पूर्व में 15 किलोमीटर तक का क्षेत्र और फरीदाबाद (हरियाणा) से17 किलोमीटर पूर्व तक का क्षेत्र शामिल है। भूकंप की इन घटनाओं का स्थान निर्धारण राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (एनसीएस) द्वारा संचालित राष्ट्रीय भूकंपीय नेटवर्क (एनएसएन) द्वारा किया गया है। 

भू-भौतिकीय और भूगर्भीय दोनों जमीनी सर्वेक्षणों के 31 मार्च 2021 तक पूरा होने की उम्मीद है। इससे पहले पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक महत्वकांक्षी परियोजना के अंतर्गत भूकंप के खतरे से ग्रस्त जोन-4 और जोन-5 में शामिल क्षेत्रों की माइक्रो-मैपिंग भी की जा रही है, जो भूकंप-रोधी शहरों के विकास और अत्यधिक आबादी वाले क्षेत्रों में इमारतों की सुरक्षा एवं जान-माल के नुकसान को कम करने में उपयोगी हो सकती है। 

(इंडिया साइंस वायर)







कोरोना से लड़ने के लिए आप तक ऐसे पहुँचेगी वैक्सीन!

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  जनवरी 11, 2021   20:13
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कोरोना से लड़ने के लिए आप तक ऐसे पहुँचेगी वैक्सीन!

टीकाकरण के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर विभिन्न टास्क फोर्स गठित किए हैं। हालांकि, टीकाकरण शुरू होगा तो कैसे कोरोना वैक्सीन, फैक्टरी से टीकाकरण केंद्र तक पहुँचेगी, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है।

कोविड-19 संक्रमण के लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस के विरुद्ध भारत ने निर्णायक युद्ध के लिए कमर कस ली है। कोरोना वैक्सीन के उपयोग को मंजूरी मिलने के बाद पूरे देश में युद्ध स्तर पर इसके टीकाकरण की तैयारियां चल रही हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 16 जनवरी से विश्व का यह सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हो रहा है। तीन जनवरी 2021 को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) द्वारा दो टीकों (कोविशील्ड और कोवैक्सीन) के आपात उपयोग की मंजूरी मिलने के बाद अब चुनौती इस टीकाकरण को समुचित रूप से अंजाम देने की है। यही कारण है कि देश के विभिन्न राज्यों में कई दौर के ट्रायल और हर जरूरतमंद व्यक्ति तक वैक्सीन पहुँचाने की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए सशक्त रणनीति तैयार की गई है।

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कोविशील्ड और कोवैक्सीन को मंजूरी 

भारत में सीमित आपात उपयोग (रिस्ट्रिक्टेड इमरजेंसी यूज़ ऑथराइजेशन) के लिए दो कोरोना वैक्सीन - कोविशील्ड और कोवैक्सीन को अनुमति मिली है। कोविशील्ड को ऑक्सफोर्ड और एस्ट्रजेनका के संयुक्त प्रयास में पुणे स्थित कंपनी सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा तैयार किया गया है। वहीं, कोवैक्सीन का निर्माण हैदराबाद की जैव प्रौद्योगिकी कंपनी भारत बायोटेक ने किया है। टीकाकरण के पहले चरण में 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन दिए जाने की योजना है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा इस महत्वकांक्षी टीकाकरण कार्यक्रम की रूपरेखा पहले ही तैयार कर ली गई है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के 736  जिलों में वैक्‍सीन  पर ड्राई रन किया गया। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के 736  जिलों में वैक्‍सीन  पर ड्राई रन किया गया। 

निर्धारित प्रोटोकॉल के मुताबिक टीकाकरण 

निर्धारित प्रोटोकॉल के मुताबिक प्राथमिक रूप से हेल्थकेयर वर्कर यानी डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अन्य लोगो को वैक्सीन दी जाएगी, जिनकी संख्या करीब एक करोड़ बतायी जा रही है। इसके बाद करीब दो करोड़ फ्रंटलाइन वर्कर, जिसमें राज्य पुलिस, अर्ध सैनिक बल, सैन्य बल और सैनिटाइजेशन वर्कर शामल हैं, को यह वैक्सीन दी जाएगी। हेल्थकेयर वर्कर और फ्रंटलाइन वर्कर्स को पंजीकरण नहीं कराना होगा, क्योंकि इनका डेटा सरकार के पास उपलब्ध है। पहले चरण में सबसे अधिक 27 करोड़ ऐसे लोग शामिल होंगे, जिनकी उम्र 50 साल से ज्यादा है, या फिर ऐसे लोग, जिन्हें पहले से ही कोई गंभीर बीमारी है। इस पूरे अभियान की तत्परता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि टीकाकरण कार्यक्रम का बिगुल बजने से पहले दो बार पूरी प्रक्रिया का ड्राई रन यानी मॉक ड्रिल किया जा चुका है।

उत्पादन इकाई से टीकाकरण केंद्र तक 

टीकाकरण के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर विभिन्न टास्क फोर्स गठित किए हैं। हालांकि, टीकाकरण शुरू होगा तो कैसे कोरोना वैक्सीन, फैक्टरी से टीकाकरण केंद्र तक पहुँचेगी, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है। वैक्सीन का निर्माण कंपनी की उत्पादन इकाई में होता है, जहाँ से इसे भारत सरकार के गवर्न्मेंट मेडिकल स्टोर डिपार्टमेंट द्वारा संचालित प्राइमरी वैक्सीन स्टोर (जीएमसीडी) में भेजा जाएगा। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मेडिकल स्टोर संगठन में मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, गुवाहाटी, करनाल और नई दिल्ली स्थित सात मेडिकल स्टोर डिपो शामिल हैं। उत्पादनकर्ता कंपनी हवाई यातायात के माध्यम से वैक्सीन इन जीएमसीडी डिपो पर भेजती है, जहाँ से इसे राज्यों के वैक्सीन डिपो तक पहुँचाया जाता है।

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भारत में इस समय कुल 37 राज्य वैक्सीन स्टोर हैं। रेफ्रिजरेटेड या इंसुलेटेड बैंक के जरिये वैक्सीन यहाँ तक पहुँचती है। इन भंडारण-केंद्रों से वैक्सीन को आगे पहुँचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की होती है। राज्यों के वैक्सीन डिपो से प्रदेश सरकार द्वारा जिला वैक्सीन स्टोर में कोरोना वैक्सीन को रेफ्रिजरेटेड या इंसुलेटेड वैन के जरिये भेजा जाएगा, जो तापमान नियंत्रित केंद्र होता है। चिह्नित किए गए वैक्सीन केंद्रों तक वैक्सीन को ताप नियंत्रित ट्रांसपोर्ट डिवाइस में भेजा जाएगा। इस तरह के वैक्सीन केंद्रों में जिला अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, या फिर उप-स्वास्थ्य केंद्र शामिल हो सकते हैं। हालांकि, टीकाकरण की तारीख और स्थान का निर्धारण जिला प्रशासन करेगा।

CoWin ऐप रखेगा अपडेट 

भारत में आम जनता को वैक्‍सीन लगवाने के लिए CoWin ऐप डाउनलोड  करना होगा। हालांकि, ध्यान देने की बात यह भी है कि गूगल प्ले स्टोर पर CoWin से मिलते-जुलते नाम वाले कई अन्य ऐप पहले से बन गए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि टीकाकरण अभियान शुरू होने से पहले CoWin ऐप लॉन्च किया जाएगा, जिसके बाद लोग इसे डाउनलोड कर सकेंगे। वैक्सीन लगवाने के लिए 12 भाषाओं में उपलब्ध इस ऐप पर पंजीकरण करना होगा। वैक्सीन की दो डोज लेने के बाद इस ऐप से सर्टिफिकेट भी मिलेगा। टीकाकरण के बाद किसी को परेशानी होती है तो साइड इफेक्ट मॉनिटरिंग की व्यवस्था भी इस ऐप में ही है। इस ऐप को डिजीलॉकर से भी जोड़ा जा रहा है, ताकि वैक्सीन लगने के बाद सर्टिफिकेट इसी ऐप में सुरक्षित रखा जा सके। 24 घंटे की हेल्पलाइन और Chatbot भी ऐप में उपलब्ध होगा। 

(इंडिया साइंस वायर)







आईआईटी खड़गपुर ने बनाया गन्ने की रोपाई के लिए स्वचालित उपकरण

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  जनवरी 9, 2021   13:29
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आईआईटी खड़गपुर ने बनाया गन्ने की रोपाई के लिए स्वचालित उपकरण

ट्रैक्टर-चालित यह कली रोपण मशीन तैयार गन्ने की कलियों के रोपण और कवकनाशी के छिड़काव के लिए विकसित की गई है। इसमें दो पंक्तियों में गन्ने की कली के रोपण का तंत्र और सेंसर-आधारित कवकनाशी अनुप्रयोग प्रणाली शामिल है।

गन्ना एक वैश्विक औद्योगिक फसल है, जो चीनी, जैव ऊर्जा, पेपर, इथेनॉल, बिजली आदि के उत्पादन से जुड़ा एक प्रमुख संसाधन है। वैश्विक स्तर पर गन्ने के उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 17 प्रतिशत है। लेकिन, खेती के पारंपरिक तरीकों के कारण किसानों को बीज सामग्री के रूप में उपयोग किए जाने वाली गन्ने की डंठल का नुकसान उठाना पड़ता है। उत्पादन की इस पद्धति में श्रम व समय अधिक लगने के साथ-साथ उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने गन्ने की खेती से संबंधित कार्यों के स्वचालित रूप से निपटारे के लिए एक विशिष्ट उपकरण विकसित किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह उपकरण गन्ने की रोपाई और कवकनाशी दवाओं के छिड़काव में उपयोगी हो सकता है।

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गन्ने की रोपाई से संबंधित यह उपकरण एक दृष्टि-आधारित गन्ने की कलियां काटने की मशीन है, जिसमें ट्रैक्टर से संचालित एक रोपाई मशीन भी शामिल है। इस मशीन में गन्ने का फीडिंग सिस्टम, गन्ने की कलियों की पहचान के लिए मशीन विज़न सिस्टम और गन्ने की कलियों की कटाई के लिए मेकाट्रॉनिक्स (Mechatronics) सिस्टम शामिल है। मेकाट्रॉनिक्स, इंजीनियरी की एक ऐसी शाखा है, जिसमें यांत्रिक इंजीनियरी, रोबोटिक्स, इलेक्ट्रॉनिकी, संगणक इंजीनियरी, संचार इंजीनियरी, सिस्टम इंजीनियरी, और नियंत्रण इंजिनीयरी आदि आधारित मिश्रित प्रणाली का अध्ययन और डिजाइन किया जाता है।

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ट्रैक्टर-चालित यह कली रोपण मशीन तैयार गन्ने की कलियों के रोपण और कवकनाशी के छिड़काव के लिए विकसित की गई है। इसमें दो पंक्तियों में गन्ने की कली के रोपण का तंत्र और सेंसर-आधारित कवकनाशी अनुप्रयोग प्रणाली शामिल है। आईआईटी खड़गपुर के निदेशक प्रोफेसर वीरेंद्र के. तिवारी ने कहा है कि “यह तकनीक भारत जैसे गन्ना उत्पादक देशों में औद्योगिक और स्थानीय स्तर पर उपयोग के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ स्वचालित तकनीकों का प्रचलन कम है। यह प्रणाली गन्ने के रोपण के लिए अपनाए गए पारंपरिक तरीकों के मुकाबले रोपण सामग्री के उपयोग को कम करने में मदद कर सकती है। इससे गन्ने की कलियों की अधिक मात्रा को बचा सकते हैं और कच्चे माल की क्षति कम कर सकते हैं।” 

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