आधी आबादी को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और गणित से जोड़ने की पहल

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  फरवरी 19, 2021   13:39
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आधी आबादी को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और गणित से जोड़ने की पहल

विज्ञान ज्योति कार्यक्रम से जुड़ी गतिविधियों में छात्र-अभिभावक परामर्श, प्रयोगशालाओं और ज्ञान केंद्रों का दौरा, आदर्श व्यक्तित्व संवाद, विज्ञान शिविर, शैक्षणिक सहायता कक्षाएं, संसाधन सामग्री वितरण जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 फरवरी को ‘विज्ञान के क्षेत्र में लड़कियों एवं महिलाओं का अंतरराष्ट्रीय दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया है। इस पहल का उद्देश्य आधी आबादी की विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं गणित (एसटीईएम) जैसे विषयों में सक्रियता को प्रोत्साहन देना है। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत सरकार ने 11 फरवरी को ‘विज्ञान ज्योति’ कार्यक्रम के दूसरे चरण का शुभारंभ किया। 

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‘विज्ञान ज्योति’ कार्यक्रम का लक्ष्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी और गणित जैसे विषयों में लड़कियों की रुचि बढ़ाना है, ताकि वे इनसे जुड़े करियर चुनने की दिशा में अग्रसर हो सकें। आरंभिक स्तर पर इस कार्यक्रम को देश के 50 जिलों में शुरू किया है। दूसरे चरण में 50 जिले और जोड़े गए हैं। एक आम धारणा है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और गणित जैसे विषयों में लड़कियों की इन रुचि अपेक्षाकृत कम होती है। ऐसे में, यह कार्यक्रम इन धारणाओं को बदलने की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने आशा व्यक्त की है कि इस कार्यक्रम में पिछले एक वर्ष में प्राप्त अनुभवों से और सुधार लाया जा सकेगा। साथ ही यह देश के अधिक से अधिक जिलों में महिलाओं को सशक्त बनाने और शीर्ष विज्ञान संस्थानों में उनकी संख्या बढ़ाने में सहायक होगा। प्रोफेसर शर्मा ने कहा, “विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व एक समस्या है। हमें इस समस्या के सभी पहलुओं को देखना है, और वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए आवश्यक उपायों को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति इस राह में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकती है, और विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में मदद के लिए जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग कर सकती है।”

‘विज्ञान ज्योति’ कार्यक्रम दिसंबर, 2019 से 50 जवाहर नवोदय विद्यालयों में सफलतापूर्वक संचालित किया जा रहा है। वर्ष 2021-22 के लिए 50 और ऐसे विद्यालयों में इसे आरंभ कर दिया गया है। फिलहाल यह कार्यक्रम नौवीं से 12 वीं कक्षा की मेधावी लड़कियों के लिए स्कूल स्तर पर शुरू किया गया है, ताकि उन्हें सशक्त बनाकर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में एसटीईएम पाठ्यक्रम में शामिल विषयों की पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

विज्ञान ज्योति कार्यक्रम से जुड़ी गतिविधियों में छात्र-अभिभावक परामर्श, प्रयोगशालाओं और ज्ञान केंद्रों का दौरा, आदर्श व्यक्तित्व संवाद, विज्ञान शिविर, शैक्षणिक सहायता कक्षाएं, संसाधन सामग्री वितरण जैसी गतिविधियां शामिल हैं। छात्रों को ऑनलाइन शैक्षणिक सहायता से संबंधित गतिविधियों में वीडियो कक्षाएं, अध्ययन सामग्री, दैनिक अभ्यास की समस्याएं और किसी भी तरह की शंकाओं का समाधान करने के लिए सुव्यवस्थित तरीके से सत्र आयोजित करना भी इस कार्यक्रम का हिस्सा है।

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डीएसटी के सलाहकार और ‘किरण’ तथा ‘विज्ञान ज्योति’ कार्यक्रमों के प्रमुख डॉ. संजय मिश्रा ने कहा कि निकट भविष्य में इस कार्यक्रम के साथ अधिक से अधिक जिलों को जोड़ने की योजना है। वहीं नवोदय विद्यालय समिति (एनवीएस) के आयुक्त विनायक गर्ग ने कहा कि लड़कियों के लिए अनुकूल परिवेश प्रदान करना बहुत महत्वपूर्ण है और यह कार्यक्रम विज्ञान में रुचि लेने वाली लड़कियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।

इस पहल के अतिरिक्त डीएसटी ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए-आई) और नवाचार प्रोत्साहन के साथ एआई-आधारित नौकरियों के लिए कुशल श्रमशक्ति तैयार करने के लक्ष्य के अनुरूप महिला विश्वविद्यालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रयोगशालाएं भी स्थापित की हैं। 

(इंडिया साइंस वायर)







रहस्यमय ‘आइंस्टीनियम’ को समझने के लिए नया शोध

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  फरवरी 26, 2021   18:04
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रहस्यमय ‘आइंस्टीनियम’ को समझने के लिए नया शोध

अमेरिका की बर्कलेज नेशनल लैबोरेटरी में आइंस्टीनियम पर किये गए शोध में वैज्ञानिकों ने इस तत्व के कुछ अवयवों का पता लगाया है। अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने आइंस्टीनियम के सबसे स्थिर Es-254 आइसोटोप का प्रयोग किया है।

हमारा वातावरण कई सूक्ष्म और अ-सूक्ष्म पदार्थों से मिलकर बना है। इन सभी पदार्थों के निर्माण में उनके अणुओं और परमाणुओं की बेहद खास भूमिका होती है। वातावरण में मौजूद कुछ पदार्थों को हम नग्न आँखों से देख सकते हैं, तो कुछ पदार्थों को देखने के लिए हमें सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है। हमारे वातावरण में उपस्थित इन पदार्थों को वैज्ञानिकों ने उनके गुणों के आधार पर आवर्त सारणी में व्यवस्थित किया है। लेकिन, वर्षों पहले एक ऐसा तत्व सामने आया, जिसने विज्ञान जगत को भी अचंभित कर दिया। उस समय वैज्ञानिक यह बताने में असमर्थ थे कि उसके क्या गुण हैं, और वह कैसे हमारे लिए उपयोगी हो सकता है। इस रहस्यमयी तत्व को आइंस्टीनियम नाम दिया गया, और आवर्त सारणी में 99 नंबर के स्थान पर अंकित किया गया। 

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पहली बार जब हाइड्रोजन बम का धमाका हुआ, तो उससे एक नया रासायनिक तत्व निकलकर आया, जिसे वैज्ञानिकों ने आइंस्टीनियम नाम दिया। यह नाम मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन के नाम पर रखा गया था। लगभग 70 साल तक आइंसटीनियम वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बना रहा, क्योंकि यह एक ऐसा रेडियोधर्मी तत्व है, जो प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता। इसे लैब में तैयार करना भी दुष्कर था। एक ताजा घटनाक्रम में वैज्ञानिकों को आइंस्टीनियम से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुई हैं। 

अमेरिका की बर्कलेज नेशनल लैबोरेटरी में आइंस्टीनियम पर किये गए शोध में वैज्ञानिकों ने इस तत्व के कुछ अवयवों का पता लगाया है। अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने आइंस्टीनियम के सबसे स्थिर Es-254 आइसोटोप का प्रयोग किया है। वैज्ञानिकों के पास सिर्फ 200 नैनो-ग्राम आइंस्टीनियम उपलब्ध था, जिसे अमेरिका की ओक रिज नेशनल लैबोरेटरी में बनाया गया था। आइंस्टीनियम के इस आइसोटोप की रेडियो-सक्रियता 276 दिन में घटकर आधी हो जाती है। अपनी उच्च रेडियोधर्मिता और छोटी आयु के कारण आइंस्टीनियम आइसोटोप अपने निर्माण की प्रक्रिया में धरती पर मौजूद होते हुए भी क्षरण के कारण विलुप्त हो गए। अब इनको अत्यंत गहन और दुष्कर विधि से केवल प्रयोगशालाओं में बनाया जा सकता है।

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एक विशिष्ट विधि के उपयोग से वैज्ञानिक यह पता लगाने में सफल हुए हैं कि आइंस्टीनियम अपने अणुओं से कैसे संयुक्त होता है, और उनके बीच की दूरी (बॉन्ड लेंथ) कितनी है। आणविक संरचना का यह अध्ययन परमाणु ऊर्जा और विकिरण-औषधियों के उत्पादन में उपयोगी कई अन्य तत्वों और आइसोटोप के अध्ययन में मददगार हो सकता है। इस अध्ययन से, आइंस्टीनियम की रासायनिक  संरचना का अंदाजा लगाने में भी मदद मिलेगी, जो पहले संभव नहीं था। अध्ययन के निष्कर्ष शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित किए गए हैं।

नवंबर, 1952 में पहली बार हाइड्रोजन बम का परिक्षण किया गया। उस समय परीक्षण के दौरान जिस हाइड्रोजन बम का विस्फोट हुआ, उसकी क्षमता दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए विस्फोट की तुलना में कई गुणा ज्यादा प्रभावी थी। यह परीक्षण दक्षिणी प्रशांत महासागर में स्थित एक छोटे-से द्वीप एल्युजलैब आइलैंड में हुआ। परीक्षण के दौरान इतना तेज धमाका हुआ कि पूरा द्वीप विस्फोट के कारण गायब हो गया। परीक्षण के बाद वैज्ञानिकों के सामने था विस्फोट से निकला हुआ मलबा, और मलबे में मौजूद कई रासायनिक तत्व। वैज्ञानिकों ने इस मलबे से एक तत्व खोज निकाला, जिसको बाद में आइंस्टीनियम नाम दिया गया। इसको प्रतिकात्मक रूप में Es लिखा जाता है। यह अत्याधिक रेडियोधर्मी तत्व है, यानी एक ऐसा तत्व, जो बहुत जल्द अपना स्वरूप बदल लेता है, और अपनी एक निश्चित अवस्था में स्थिर नहीं रह पाता। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक ऐसा तत्व है, जिसका अभी तक कोई उपयोग ज्ञात नहीं है।







प्रदूषित वायु को साफ करने के लिए नया यंत्र

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  फरवरी 25, 2021   18:04
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प्रदूषित वायु को साफ करने के लिए नया यंत्र

आउटडोर एयर प्यूरीफायर को संस्थान परिसर में स्थापित किया गया है। इस अवसर पर मौजूद सूक्ष्म, मध्यम एवं लघु उद्योग (एमएसएमई) विकास संस्थान, दुर्गापुर के संयुक्त निदेशक प्रदीप कुमार दास ने अनुसंधान के क्षेत्र में सीएसआईआर-सीएमईआरआई के योगदान को सराहनीय बताया है।

वायु प्रदूषण आज एक जटिल और गंभीर समस्या है, जो स्वास्थ्य पर घातक प्रहार कर रहा है। इनडोर और आउटडोर दोनों ही प्रकार के वायु प्रदूषण, भारत में हो रही मौतों के प्रमुख कारणों में से एक हैं। वायु प्रदूषण को कम करने की दिशा में निरंतर काम किया जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप आज हमारे पास कई ऐसे एयर प्यूरीफायर उपलब्ध हैं, जो इनडोर वायु प्रदूषण को कम करते हैं। वहीं, आउटडोर वायु प्रदूषण को कम करने की दिशा में दुर्गापुर स्थित वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) से संबद्ध केन्द्रीय मैकेनिकल इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (सीएमईआरआई) ने एक वायु-शोधक यंत्र (एयर प्यूरीफायर) विकसित किया है।

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सीएसआईआर-सीएमईआरआई के निदेशक प्रोफेसर डॉ हरीश हिरानी ने बताया कि “यह एयर प्यूरीफायर पाँच मीटर की परिधि में हवा को स्वच्छ करने में सक्षम है। यह हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों को 50 प्रतिशत तक कम कर सकता है। यदि किसी समय विशेष पर वायु प्रदूषण को कम करना है, तो इसके लिए इसमें टाइमर का विकल्प उपलब्ध है। इस एयर प्यूरीफायर की लागत भी बेहद कम है।” उन्होंने बताया कि इसे तैयार करने में 25 से 30 हजार रुपये का खर्च आ सकता है, जो इस पर निर्भर करता है कि आप इस प्यूरीफायर की बॉडी के लिए स्टील या प्लास्टिक में से किसका चयन करते हैं। इसका संचालन सौर ऊर्जा के माध्यम से भी किया जा सकता है। वहीं, इसे सड़क के किनारे भी स्थापित किया जा सकता है, जिससे वाहनों द्वारा हो रहे प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है।

हाल में, इस आउटडोर एयर प्यूरीफायर को संस्थान परिसर में स्थापित किया गया है। इस अवसर पर मौजूद सूक्ष्म, मध्यम एवं लघु उद्योग (एमएसएमई) विकास संस्थान, दुर्गापुर के संयुक्त निदेशक प्रदीप कुमार दास ने अनुसंधान के क्षेत्र में सीएसआईआर-सीएमईआरआई के योगदान को सराहनीय बताया है। उन्होंने आउटडोर एयर प्यूरीफायर को नवीन और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए संस्थान के तकनीकी विकास और नवाचार के साथ परस्पर लाभ के लिए सूक्ष्म, मध्यम एवं लघु उद्योगों से इस दिशा में आगे आने का अनुरोध किया है।

दुर्गापुर स्थित पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय प्रभारी अरूप कुमार डे ने सीएसआईआर-सीएमईआरआई द्वारा विकसित आउटडोर एयर प्यूरीफायर तकनीक को प्रभावी बताते हुए कहा है कि इस तरह के उत्पाद भारत जैसे विकासशील समाज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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सीएमईआरआई के निदेशक प्रोफेसर डॉ हरीश हिरानी ने बताया कि यह आउटडोर एयर प्यूरीफायर कई मापदंडों पर पश्चिम बंगाल में अपनी तरह का पहला उत्पाद है। उन्होंने कहा कि यह एयर प्यूरीफायर कुछ महीने पहले विकसित कर लिया गया था और इस पर कई प्रयोग चल रहे थे।







टीकाकरण से ही मिल सकती है कोरोना से विश्वसनीय सुरक्षा

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  फरवरी 24, 2021   15:48
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टीकाकरण से ही मिल सकती है कोरोना से विश्वसनीय सुरक्षा

देशव्यापी टीकाकरण की आवश्यकता के संदर्भ में भारत के नियामक प्राधिकारों ने दो वैक्सीनों को मंजूरी दी है– उनमें से एक (कोविशील्‍ड) को बिना शर्त और दूसरी (कोवैक्‍सीन) को क्लिनिकल ट्रायल मोड में मंजूरी मिली है।

दो सीरोलॉजिकल सर्वेक्षणों और मॉडल अनुमानों के अनुसार भारत की एक बड़ी आबादी में इस समय सार्स-सीओवी-2 वायरस के खिलाफ प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है। हालांकि, मौजूदा प्रमाणों से पता चलता है कि एंटीबॉडिज की उपस्थिति के कारण बनने वाली यह रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक समय तक प्रभावी नहीं रहेगी।  इसकी तुलना में टी-सेल द्वारा बनी रोग प्रतिरोधक क्षमता कहीं लम्बे समय तक प्रभावी रहती है। इसीलिए वैज्ञानिकों का यह स्पष्ट मत है कि  कोरोना वायरस के विरुद्ध दीर्घकालिक एवं विश्वसनीय सुरक्षा सिर्फ टीकाकरण से ही मिल सकती है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी वक्तव्य में यह बात कही गई है।

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चेन्नई स्थित गणितीय संस्थान के निदेशक राजीव एल. करंदीकर, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), हैदराबाद के प्रोफेसर एम. विद्यासागर जैसे विशेषज्ञों की टिप्पणियों पर आधारित इस वक्तव्य में भारत में तेज गति से हो रहे टीकाकरण की तुलना शेष विश्व से की गई है। इसमें कहा गया है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा स्थापित  कोविड-19 नेशनल सुपर मॉडल कमेटी के अनुमान के अनुसार मार्च, 2021 के अंत तक कोविड-19 के सक्रिय मामलों की संख्या गिरकर कुछ हजार में सिमट जाएगी। 

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कहा है कि सार्स-सीओवी-2 वायरस के कारण फैल रही कोविड-19 महामारी में वृद्धि के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों से संकेत मिलता है कि भारत में इसका संक्रमण सितंबर, 2020 में किसी समय अपने चरम पर था और उसके बाद से यह लगातार घट रहा है। 11 सितंबर, 2020 को जहां अधिकतम 97,655 प्रतिदिन नये मामले मिले थे, वहीं फरवरी, 2021 के पहले सप्‍ताह में यह संख्‍या घटकर 11,924 पर आ गई। इसमें से आधे मामले केरल में हैं। इस बात को सुनिश्चित करना जरूरी है कि संक्रमण की दर को दोबारा बढ़ने न दिया जाए। जैसा कि इटली, ब्रिटेन और अमरीका जैसे कई देशों में हुआ है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि टीकाकरण से प्राकृतिक संक्रमण के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता मिलती है, जो इस महामारी के नियंत्रण के लिए एक अचूक अस्त्र है। हालांकि कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि पिछले संक्रमणों के कारण बनी एंटीबॉडिज की मौजूदगी, टीकाकरण के मुकाबले वायरस के रूपांतरण से दोबारा होने वाले संक्रमण के खिलाफ कम सुरक्षा देती हैं। इसीलिए, कहा जा रहा है कि मान्य वैक्सीन के जरिये राष्ट्रव्यापी  टीकाकरण कार्यक्रम को शीघ्रता से पूरा किया जाना अनिवार्य  है।

टीकों से संबंधित एक रोचक पहलू मृत वायरस से तैयार किये गए टीके से बनी एंटीबॉडिज और स्पाइक प्रोटीन से तैयार टीके से बनी एंटीबॉडिज को लेकर है। यह उल्लेखनीय है कि मृत वायरस से तैयार टीके से बनी एंटीबॉडिज, स्पाइक प्रोटीन से तैयार टीके से बनी एंटीबॉडिज के मुकाबले रूपांतरित वायरस के विरुद्ध कहीं अधिक  प्रभावी हैं। देशव्यापी टीकाकरण की आवश्यकता के संदर्भ में भारत के नियामक प्राधिकारों ने दो वैक्सीनों को मंजूरी दी है – उनमें से एक (कोविशील्‍ड) को बिना शर्त और दूसरी (कोवैक्‍सीन) को क्लिनिकल ट्रायल मोड में मंजूरी मिली है। विशेषज्ञों की समिति इस बात से सन्तुष्ट है कि दोनों वैक्सीन सुरक्षित हैं और कोरोना वायरस के विरुद्ध प्रभावी प्रतिरक्षा उत्पन्न करती हैं।

इन दोनों वैक्सीन को लेकर शुरू किए गए टीकाकरण अभियान को कुछ लोगों ने जल्दबाजी में उठाया गया कदम बताकर इसके महत्व को कम करने का प्रयास किया। हालांकि, डब्‍ल्‍यूएचओ ने कहा है कि किसी वैक्सीन को आपात स्थिति में मंजूरी देने के पहले भी यह देखना जरूरी है कि वह 50 प्रतिशत तक प्रभावी अवश्य हो। कभी-कभी 40 प्रतिशत की प्रभावशीलता वाली वैक्सीन भी कुछ हद तक संरक्षण दे देती हैं। लेकिन, कभी-कभी 80 प्रतिशत की प्रभावशीलता वाली वैक्सीन लगने के बाद भी व्यक्ति संक्रमण की चपेट में आ सकता है। ऐसे में, यह अपेक्षा की जाती है कि नियामक प्राधिकार इस दिशा-निर्देश से बंधे न रहकर विवेकपूर्ण निर्णय लेंगे। इसके साथ ही, यह भी आवश्यक  है कि बेशक लक्षित आबादी में हर किसी का (18 वर्ष से अधिक उम्र) टीकाकरण हो जाए, तब भी लोगों को सुरक्षा  मानदंडों का पालन करते रहना होगा।

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वायरस के प्रसार के साथ-साथ इसके रूपांतरण को रोकने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके लिए सिर्फ किसी एक देश के प्रत्येक व्यक्ति का टीकाकरण ही पर्याप्त नहीं है। महामारी का अंत करने के लिए दुनिया भर के लोगों का शीघ्रता से टीकाकरण किया जाए। भारत सिर्फ अपनी टीकाकरण जरूरतों को पूरा करने में ही सक्षम नहीं है, बल्कि वह इस मामले में पूरे विश्व की मदद कर सकता है। वैक्सीन की वैश्विक मांग को पूरा करने में अपना योगदान देकर और वैश्विक समुदाय में इस महामारी से लड़ने की उम्मीद बँधाकर भारत ने  महामारी-जन्य संकटकाल में विश्व मंच पर अपनी अग्रणी उपस्थिति दर्ज करायी है।

(इंडिया साइंस वायर)







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