भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने बनाए पश्चिमी घाट के भूस्खलन नक्शे

  •  शुभ्रता मिश्रा
  •  सितंबर 30, 2019   16:36
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने बनाए पश्चिमी घाट के भूस्खलन नक्शे

करीब 83.2 प्रतिशत भूस्खलनों का मुख्य कारण भारी बारिश थी। भारी बारिश के अलावा, इन भूस्खलनों के लिए भौगोलिक ढलानों को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। अध्ययन में अत्यधिक ऊंची ढलान वाले क्षेत्रों में करीब 38 प्रतिशत, उच्च ढलानों पर लगभग 36 प्रतिशत और मध्यम ढलानों पर लगभग 18 प्रतिशत भूस्खलन दर्ज किए गए हैं।

वास्को-द-गामा (गोवा)। (इंडिया साइंस वायर): भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों ने पिछले साल अगस्त के महीने में भारी बारिश के कारण पश्चिमी घाट में हुए भूस्खलनों के मानचित्र बनाए हैं और उनकी व्यापक सूची भी तैयार की है।

इस अध्ययन में पिछले साल भारी बारिश से सबसे ज्यादा प्रभावित तीन राज्यों केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के 23 जिलों के कुल 98 हजार 356 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का मानचित्रण किया गया है। इस पूरे क्षेत्र के 22.69 वर्ग किलोमीटर संचयी क्षेत्र में कुल 6,970 भूस्खलन दर्ज किए गए। केरल में सबसे अधिक 5,191 भूस्खलन, कर्नाटक में 993 और तमिलनाडु में 606 भूस्खलन हुए थे। 

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करीब 83.2 प्रतिशत भूस्खलनों का मुख्य कारण भारी बारिश थी। भारी बारिश के अलावा, इन भूस्खलनों के लिए भौगोलिक ढलानों को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। अध्ययन में अत्यधिक ऊंची ढलान वाले क्षेत्रों में करीब 38 प्रतिशत, उच्च ढलानों पर लगभग 36 प्रतिशत और मध्यम ढलानों पर लगभग 18 प्रतिशत भूस्खलन दर्ज किए गए हैं। 

नक्शों को तैयार करने के लिए पृथ्वी का अवलोकन करने वाले उपग्रहों से प्राप्त चित्रों  का उपयोग किया गया है। वर्षा के पहले और उसके बाद उपग्रहों द्वारा लिए गए चित्रों में दिखने वाली भिन्नताओं के विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिकों ने भूस्खलनों की पहचान करके उनकी सूची तैयार की है। 

तीनों राज्यों में हुई दैनिक वर्षा के वितरण का विश्लेषण अमेरिका के नेशनल ओशिनिक ऐंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर (सीपीसी) के आंकड़ों पर आधारित है। अध्ययन में पिछले वर्ष के 1 जून से 21 अगस्त के आंकड़ों को शामिल किया गया है। इसरो के हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया इससे संबंधित अध्ययन शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित किया गया है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि पिछले वर्ष एक दिन में सर्वाधिक वर्षा इन राज्यों में 14 अगस्त को हुई थी। यह भी पता चला है कि 8 अगस्त 2018 को बारिश अधिक थी और दो दिनों के बाद, यह 11 अगस्त को फिर से शुरू हुई जो 17 अगस्त तक जारी रही। वैज्ञानिकों का कहना है कि भारी बारिश से मिट्टी के जल संतृप्त होने से उसकी पकड़ ढीली हो गई थी। लगातार भारी बारिश से भीषण बाढ़ और बड़े पैमाने पर मिट्टी के कटाव होने से भूस्खलन की स्थिति उत्पन्न हो गई। इससे जन-धन का व्यापक नुकसान हुआ और विभिन्न भूमि संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। 

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वैज्ञानिकों का कहना है- हिमालय के बाद भारत का पश्चिमी घाट भूस्खलन के प्रति दूसरा सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र है। यहां खड़ी ढलानें हैं, जो मिट्टी से ढकी हुई हैं। इसलिए बरसात के दौरान भूस्खलन का खतरा यहां सबसे अधिक होता है। भूस्खलन के प्रकोप को कम करने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों के मानचित्र तैयार करना अनिवार्य होता है। 

शोधकर्ताओं का कहना है कि विभिन्‍न भौगोलिक क्षेत्रों के लिए तैयार किए ये भूस्खलन मानचित्र तीनों राज्यों में इस प्राकृतिक आपदा के प्रबंधन में महत्‍वपूर्ण हो सकते हैं। भूस्खलन सूची और मानचित्रों के कारण भविष्य में इन क्षेत्रों में संभावित भूस्खलनों से निपटने की तैयारी, पूर्व चेतावनी, त्‍वरित प्रतिक्रिया, राहत, पुनर्वास तथा रोकथाम के लिए आवश्यक जानकारियां और मदद मिल सकेगी। 

अध्ययनकर्ताओं में नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के जियोसाइंस ग्रुप के तापस आर. मार्था, प्रियोम रॉय, कीर्ति खन्ना, के. मृणालनी और के. विनोद कुमार शामिल थे। 

(इंडिया साइंस वायर)







अपने वाहन के रूप में ततैया को ऐसे चुनते हैं सूत्रकृमि

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  जनवरी 27, 2021   12:38
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अपने वाहन के रूप में ततैया को ऐसे चुनते हैं सूत्रकृमि

अध्ययन से पता चला है कि सूत्रकृमि आमतौर पर ऐसे ततैया का चयन करते हैं, जिनकी आंतों में अन्य कीड़ों की भीड़-भाड़ न हो। इसके साथ-साथ सूत्रकृमि ऐसी आंतों में सवारी करना पसंद करते हैं, जिसमें पहले से ही उनकी प्रजाति के कीड़े मौजूद हों।

पेड़-पौधे विभिन्न प्रजातियों के कीट-पतंगों का घर होते हैं। पेड़-पौधों और कीटों-पतंगों की विविध प्रजातियों के बीच प्रायः एक अनूठा पारस्परिक संबंध देखने को मिलता है। अंजीर के पेड़ पर रहने वाले कीटों और अंजीर-ततैया के बीच परस्पर संबंध इसका एक उदाहरण है। अंजीर के पेड़ पर रहने वाले कीट एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक सवारी करने के लिए अंजीर-ततैया को वाहन के रूप में उपयोग करते हैं। ये छोटे-छोटे कीट ततैया को नुकसान पहुँचाए बिना उसकी आंतों में प्रवेश कर जाते हैं, और उसका उपयोग एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक जाने के लिए करते हैं। लाखों वर्षों से कीटों और अंजीर-ततैया के बीच यह संबंध चला आ रहा है। हालांकि, ये कीड़े, जिन्हें सूत्रकृमि के रूप में जाना जाता है, कैसे अंजीर-ततैया का चयन अपने वाहन के रूप में करते हैं, यह वैज्ञानिकों के लिए एक जटिल पहेली रही है। बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के ताजा अध्ययन में ऐसे तथ्यों का पता चला है, जो इस पहेली को हल करने में सहायक हो सकते हैं। 

इस अध्ययन से पता चला है कि सूत्रकृमि आमतौर पर ऐसे ततैया का चयन करते हैं, जिनकी आंतों में अन्य कीड़ों की भीड़-भाड़ न हो। इसके साथ-साथ सूत्रकृमि ऐसी आंतों में सवारी करना पसंद करते हैं, जिसमें पहले से ही उनकी प्रजाति के कीड़े मौजूद हों। शोधकर्ताओं का मानना है कि अपनी प्रजाति के सदस्यों के साथ यात्रा करते हुए गंतव्य पर पहुँचने तक कीड़ों के लिए अपना साथी खोजने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। उनका कहना यह भी है कि जिन ततैया की आंतों में कम कीड़े होते हैं, उनके सुरक्षित रूप से गंतव्य तक पहुँचने की अधिक संभावना होती है। यह अध्ययन शोध पत्रिका जर्नल ऑफ इकोलॉजी में प्रकाशित किया गया है। 

भारतीय विज्ञान संस्थान के सेंटर फॉर ईकोलॉजिकल साइंसेज (सीईएस) की वरिष्ठ शोधकर्ता प्रोफेसर रेनी बॉर्गेस ने कहा है कि “इस अध्ययन का एक संदेश यह है कि सूत्रकृमि जैसे बेहद सूक्ष्म जीवों की भी निर्णय लेने की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। निर्णय लेने की इसी तरह की प्रवृत्ति मनुष्यों में भी देखने को मिलती है। हम आमतौर पर भीड़भाड़ वाली बस में सफर करने के बजाय अपेक्षाकृत रूप से खाली बस में सफर करना अधिक पसंद करते हैं।”

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अंजीर के पेड़ और ततैया के बीच इस संबंध का लाभ दोनों को परस्पर रूप से होता है। एक ओर ततैया अंजीर के परागण में मदद करते हैं, तो दूसरी ओर पेड़ से ततैया को भी भोजन प्राप्त होता है। अंजीर के पेड़ पर कुछ अन्य प्रकार के कीड़े भी पाए जाते हैं, जो पूरी तरह से ततैया पर निर्भर रहते हैं। ततैया इन युवा कीड़ों को अंजीर के एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक पहुँचाते हैं, जहाँ पहुँचकर कीड़े परिपक्व होते हैं, प्रजनन करते हैं और नई पीढ़ी को जन्म देते हैं। 

एक पूर्व अध्ययन के दौरान नियंत्रित परीक्षणों में शोधकर्ताओं ने दिखाया है कि यदि ततैया पर सवार होने वाले कीटों की संख्या अत्यधिक हो, तो वे परजीवी में रूपांतरित होकर ततैया के साथ-साथ गंतव्य पेड़ को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, सीईएस से जुड़े एक अन्य शोधकर्ता सत्यजीत गुप्ता कहते हैं कि “आमतौर पर आप पाएंगे कि सूत्रकृमि की संख्या हमेशा कम होती है।” उन्होंने कहा कि मेजबान या वाहन का चयन करते हुए सूत्रकृमि वास्तव में कैसे निर्णय लेते हैं, इस सवाल का जवाब खोजे जाने को लेकर किया गया यह एक प्रारंभिक अध्ययन है। 

इस अध्ययन से पता चला है कि सूत्रकृमि ततैया की आंतों में यात्रियों की भीड़ की टोह रासायनिक संकेतों की सहायता से लेते हैं। सूत्रकृमि, उन वाष्पशील यौगिकों को सूँघते हैं, जो ततैया द्वारा अपनी पूंछ पर खड़े होकर सिर को लहराते हुए छोड़ा जाता है। जब शोधकर्ताओं ने सूत्रकृमि के समक्ष अधिक यात्रियों को ले जा रहे ततैया और कम यात्रियों को ले जाने वाले ततैया द्वारा उत्सर्जित यौगिकों के बीच चयन का विकल्प पेश किया, तो कीड़ों ने कम यात्रियों को ले जाने वाले ततैया को चुना। एक हैरान करने वाला तथ्य यह भी उभरकर आया है कि सूत्रकृमि, ततैया द्वारा ले जाए जाने वाले अपनी प्रजाति के कीटों की संख्या का पता तो लगा लेते हैं, पर वे ततैया की आंतों में दूसरी कीट प्रजातियों की मौजूदगी का पता नहीं लगा पाते।

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शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि शाकाहारी और मांसाहारी कीड़े, जो अलग-अलग प्रजातियां हैं, अपने वाहन पर निर्णय लेने के लिए विभिन्न कारकों का उपयोग करते हैं। शाकाहारी कीट खाली वाहनों को पसंद करते हैं, लेकिन वे जोड़े में सफर करना पसंद करते हैं, ताकि गंतव्य तक पहुँचने पर उन्हें प्रजनन हेतु साथी सुनिश्चित रूप-से मिल जाए। दूसरी ओर, मांसाहारी कीट, ततैया के रूप में उन वाहनों को पसंद करते हैं, जिसमें पहले से ही उनकी अपनी प्रजातियों के कुछ सदस्य सवार होते हैं।

(इंडिया साइंस वायर)







आईआईटी दिल्ली में वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी आधारित चार्जिंग स्टेशन

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  जनवरी 25, 2021   15:33
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आईआईटी दिल्ली में वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी आधारित चार्जिंग स्टेशन

वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी आधारित यह चार्जिंग स्टेशन आईआईटी, दिल्ली के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग की सस्टेनेबल एन्वायरोनर्जी रिसर्च लैब (एसईआरएल) के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित एक प्रोटोटाइप है।

कम लागत में बड़ी मात्रा में ऊर्जा भंडारण करने में सक्षम वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी लीथियम-आयन बैटरी का सबसे आशाजनक विकल्प बनकर उभर रही है। वैज्ञानिक अक्षय ऊर्जा के भंडारण के विकल्प के रूप में वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी को बेहतर मानते हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी),दिल्ली के शोधकर्ता वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।

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आईआईटी, दिल्ली परिसर में वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी आधारित चार्जिंग स्टेशन स्थापित किया गया है, जिसमें भंडारित ऊर्जा का उपयोग पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को चार्ज करने में किया जा सकता है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट और पावर बैंक जैसे पोर्टेबल उपकरण चार्च करने के लिए इसमें विभिन्न चार्जिंग पोर्ट उपलब्ध कराए गए हैं। 

वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी आधारित यह चार्जिंग स्टेशन आईआईटी, दिल्ली के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग की सस्टेनेबल एन्वायरोनर्जी रिसर्च लैब (एसईआरएल) के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित एक प्रोटोटाइप है। प्रभावी रिडॉक्स फ्लो बैटरी विकसित करने के क्रम में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं की टीम इसी विभाग के डॉ अनिल वर्मा के नेतृत्व में अध्ययन कर रही है।

उन्होंने बताया कि “हम इस प्रोटोटाइप के परिचालन डेटा को एकत्र कर रहे हैं, ताकि डिजाइन और संचालन में उचित बदलाव अगले संस्करण में शामिल किए जा सकें।”

वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी में विद्युतीय ऊर्जा के भंडारण के लिए तरल इलेक्ट्रोलाइट का उपयोग किया जाता है। चार्जिंग के दौरान, विद्युतीय ऊर्जा तरल इलेक्ट्रोलाइट में भंडारित होती है, और डिस्चार्जिंग के दौरान भंडारित ऊर्जा का उपयोग विभिन्न अनुप्रयोगों में किया जाता है। वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी अक्षय ऊर्जा को कुशलता से भंडारित करने में सक्षम है।

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इसका उपयोग ग्रामीण विद्युतीकरण, ई-व्हीकल चार्जिंग स्टेशन, घरेलू एवं व्यावसायिक पावर बैक-अप जैसे अनुप्रयोगों में हो सकता है। यह प्रदूषण-रहित और अत्यधिक टिकाऊ है, जिसे आसानी से विस्तारित किया जा सकता है। वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी किलोवाट/घंटा से लेकर मेगावाट/घंटा की रेंज में ऊर्जा भंडारित करने में सक्षम है। यह किफायती है, और इस प्रौद्योगिकी का उपयोग उन स्थानों पर प्रमुखता से हो सकता है, जहाँ डीजल जेनरेटर उपयोग किए जाते हैं।  

इस चार्जिंग स्टेशन को आईआईटी, दिल्ली की स्मार्ट कैंपस पहल क अंतर्गत विकसित किया गया है। शोधकर्ताओं ने एक दिन में लगभग नौ घंटे के चार्जिंग ऑपरेशन के लिए इसे डिजाइन किया है। इस चार्जिंग स्टेशन का लाभ आईआईटी, दिल्ली से जुड़े कर्मचारियों एवं छात्रों के अलावा वहाँ आने वाले अन्य लोगों को भी हो सकता है। आईआईटी, दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर वी. रामगोपाल राव ने सोमवार को इस चार्जिंग सुविधा का उद्घाटन किया है।

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डॉ अनिल वर्मा ने बताया कि “एसईआरएल में यह रिडॉक्स फ्लो बैटरी का यह दूसरा प्रोटोटाइप विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य समाज को ईको-फ्रेंडली व्यवहारिक उत्पाद के रूप में प्रौद्योगिकीय एवं वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध कराना है।” उन्होंने बताया कि उनकी अध्ययन टीम किलोवाट स्तर की बैटरी विकसित करने पर काम कर रही है। 

आईआईटी दिल्ली में वैनेडियम रिडॉक्स फ्लो बैटरी विकसित करने से संबंधित यह परियोजना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुदान पर आधारित है। 

(इंडिया साइंस वायर)







History Revisited: क्या नेताजी सुभाष चंद्र ही थे गुमनामी बाबा

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 23, 2021   10:50
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History Revisited: क्या नेताजी सुभाष चंद्र ही थे गुमनामी बाबा

इंदिरा सरकार के दौरान जस्टिस मुखर्जी की अध्यक्षता में तीसरी बार जांच आयोग गठित किया गया। आयोग ने रिपोर्ट पेश करते हुए दावा किया कि विमान हादसे में नेताजी की मौत नहीं हुई है और इस मामले में आगे और जांच की जरूरत है।

समकालीन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गवर्नर को नवंबर 1945 में पत्र लिखा जिसमें कहा गया था कि आंदोलनकारियों की बढ़ती तादाद साफ दिखाती है कि बोस लोगों की नजर में गांधी की जगह लेते नजर आ रहे हैं। इन सबके बीच नेताजी कहां थे? जवाब मिला द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में ताइवान में है क्या हवाई दुर्घटना में चल बसे थे? लेकिन बोस का मृत शरीर कभी नहीं मिला, इससे उन अफवाहों को बल मिला कि वे उस हवाई दुर्घटना में बच गए थे। सन 1956 और फिर 1970 में नेहरू और क्रमशः इंदिरा गांधी सरकार के ऊपर दबाव बना कि वह इस मुद्दे की जांच कराएं। शाहनवाज खान और जाने माने जज रहे जीडी खोसला दोनों ही ने हवाई दुर्घटना की बात को सही ठहराया। लेकिन भूलने वाले ना भूले ना विश्वास कर पाए। उनका कहना था कि जांच निष्पक्ष नहीं थी। 1960 के दशक में एक नई कहानी ने जन्म लिया इस बार बोस को भारत के एक सुदूर कोने में एक संन्यासी के वेश में देखे जाने का दावा किया गया। आज से लगभग 15-20 वर्ष पहले एक बार फिर से इस मुद्दे पर नई थ्योरी सामने आई जब एक कोर्ट के निर्णय की वजह से नेताजी की गुत्थी को दोबारा खोला गया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रह चुके मुखर्जी की जांच ने पासा पलट दिया था। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने सरकार को उनकी जांच में पूरा सहयोग न करने के लिए जबरदस्त फटकार लगाई। उन्होंने यह भी लिखा कि ताइवान में बोस की मृत्यु की कहानी अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकने की एक जापानी चाल थी, ताकि वह बोस के रूस जाने की बात छिपा सके। सन 2005 में सरकार को जब यह रिपोर्ट मिली और वह तिलमिला उठी।

सन 1995 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आईएनए से जुड़े कुछ वृद्ध जापानी सैनिक ने भारत सरकार से अपील की कि वह नेता जी की अस्थियों को भारत लेकर आए। माना यह जाता था कि ताइवान की हवाई दुर्घटना के बाद नेताजी का अंतिम संस्कार वहीं कर दिया गया था और तत्पश्चात उनके अस्थियों को जापान लाकर टोक्यो के एक बौद्ध मंदिर जिसका नाम रेनकोजी मंदिर था में रख दिया गया। 

प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव, गृह मंत्री एसबी चव्हाण, विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस अपील को लेकर विचार विमर्श किया। इंटेलिजेंस ब्यूरो की टिप्पणी तर्कसंगत थी- "अगर अस्थियां भारत में लाई गयी तो बहुत संभव है कि पश्चिम बंगाल के लोग इसे नेताजी की मृत्यु की आधिकारिक कहानी को उन पर थोपने का एक तरीका समझें, यह गलत हो सकता है।" 

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प्रणब मुखर्जी सन 1995 में नेताजी के निधन के रहस्य को सुलझाने के लिए निकल पड़े। करीब दस साल बाद जस्टिस मुखर्जी की रिपोर्ट के अनुसार प्रणब मुखर्जी उन गवाहों में से थे जिन्होंने ताईवान में नेताजी के निधन की पुष्टि की थी। 

जांच और नतीजे 

नेताजी की रहस्यमई मौत की जांच को लेकर अब तक तीन आयोग का गठन किया जा चुका है लेकिन इनके निष्कर्ष विवादास्पद ही बने रहे हैं। जांच आयोग की भूल भुलैया में नेताजी किसी जासूसी कथा के चरित्र बनाकर रखती है गए हैं। 

शाहनवाज आयोग 1956 

आयोग के सदस्यों ने जापान जाकर घटना की जांच की है आयोग ने रिपोर्ट में बताया कि जापान के रेनकोजी मोनेस्ट्री में नेताजी की अस्थियां रखी हुई है। अता उनकी मृत्यु हवाई दुर्घटना के कारण ताइवान में ही हुई थी। 

जस्टिस जीडी खोसला आयोग 1970 

खोसला आयोग ने भी कुछ इन्हीं निष्कर्षों के साथ रिपोर्ट पेश की। 

जस्टिस मुखर्जी आयोग 1999 

इंदिरा सरकार के दौरान जस्टिस मुखर्जी की अध्यक्षता में तीसरी बार जांच आयोग गठित किया गया। आयोग ने रिपोर्ट पेश करते हुए दावा किया कि विमान हादसे में नेताजी की मौत नहीं हुई है और इस मामले में आगे और जांच की जरूरत है। आयोग ने 2005 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी लेकिन 2006 में सरकार ने रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया। 

एक दावा यह भी 

जम्मू कश्मीर के राजौरी शहर में 25 किलोमीटर दूर दलहनी गांव के लोगों का भी दावा है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस 70 के दशक में उनके गांव आए थे और यही कुटिया बनाकर रहते थे। गांव में उनकी समाधि होने की बात भी की जाती है। इस गांव के मंदिर में नेताजी से जुड़े कई तथ्य हैं लेकिन इसकी पुष्टि सिर्फ इस इलाके के लोग ही करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार 1970 के दशक में एक महात्मा इस गांव में आया और कुटिया बनाकर रहने लगा। धीरे-धीरे वहां लोगों का आना-जाना शुरू हो गया और 1973 में यहां पहुंचने वालों की संख्या हजारों में हो गई 15 लोगों ने महात्मा जी कहते थे और मानते थे कि महात्मा जी नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। इस मंदिर में हर साल नेता जी की जन्म तिथि व पुण्यतिथि मनाई जाती है। महात्मा जी के करीबियों के अनुसार उनको डरता कि कांग्रेस सरकार उनको पकड़ कर अंग्रेजों के हवाले कर देगी। दावा किया गया कि उनके पास बंगाल से लोग मिलने आते थे और वह बंगाली में बातचीत भी करते थे। यहां तक कहा गया कि अगर किसी को कोई शक है तो वह समाधि से महात्मा जी की अस्थियां निकाल कर उनका डीएनए टेस्ट करवा सकता है सच्चाई सामने आ जाएगी। 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे गुमनामी बाबा! 

बात 1985 की है माह सितंबर की 16 तारीख उत्तर प्रदेश में अयोध्या से सटे फैजाबाद के सिविल लाइंस स्थित राम भवन के बाहर अचानक लोगों का हुजूम उमड़ने लगा था। राम भवन के अंदर भी उस दिन गतिविधियां अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा बढ़ी हुई थी। घर के अंदर मौजूद कुछ लोग आपस में कोलकाता वालों को सूचना दे दिए जाने की बातें कर रहे थे। बाहर जमा लोग उस शख्स की एक झलक को बेताब हुए जा रहे थे जो अब इस दुनिया में ही नहीं रहा था। उसकी मौत की खबर सुनकर ही लोग वहां भागे भागे पहुंचे थे। भगवन और गुमनामी बाबा नामक उस शख्स के बारे में लोग यह फुसफुसाहट सुनते रहे थे कि वह शायद नेताजी सुभाष चंद्र बोस है जो वहां गुमनामी में रह रहे हैं। यह भी कहा जाता रहा था कि उनकी शक्ल बिल्कुल नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिलती है। जिनकी कथित तौर पर 1945 में ताइवान में एक विमान हादसे में मौत हो चुकी थी। जाहिर है कि इस बात के कौतुहल में ही कि क्या क्या वाकई गुमनामी बाबा ही नेताजी हैं, आखिर वे दिखते कैसे हैं। लोग उनकी एक झलक पाने को व्यग्र हुए जा रहे थे। वैसे भी राम भवन के पिछवाड़े में बने दो कमरे के मकान में लगभग 2 वर्षों से रह रहे भगवन उर्फ गुमनामी बाबा लोगों के लिए एक अबूझ पहेली बने हुए थे। ना तो वह किसी अपरिचित से मिलते थे ना बात करते थे। उन्होंने अपने आप कौन दो कमरों के उस मकान में ही कैद कर रखा था। जहां कुछ खास लोगों को ही उनसे मिलने बात करने की इजाजत थी। शायद यही वजह थी कि अपना नाम भगवन बताने वाले साधु बाबा का नाम लोगों ने गुमनामी बाबा रख दिया था। गुमनामी बाबा की मौत के 2 दिनों के बाद बड़े गोपनीय तरीके से वही सरयू किनारे गुप्ता घाट पर उनके करीबियों ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया। शायद यह सोच कर कि जो रहस्य है उस पर पर्दा ही पड़ा रहे तो बेहतर। रहस्य पर से तो अभी भी पूरी तरह से पर्दा नहीं उठ पाया, लेकिन गुमनामी बाबा की मौत के बाद उनके कमरे से बरामद सामानों ने जरूर उस पहेली को उलझा दिया जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ी रही है। हैरत की बात है कि गुमनामी बाबा के 24 संदूक में रखे जो 2760 सामान दुनिया की नजरों में आए उसने कहीं न कहीं इस बात को और भी बल दिया कि गुमनामी बाबा कोई और नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस ही थे जो रूस से भागने के बाद यहां गुमनामी में अपनी जिंदगी बसर कर रहे थे। 

गुमनामी बाबा का सामान 

सुभाष चंद्र बोस के माता पिता और परिवार की निजी तस्वीरें। 

कोलकाता में हर वर्ष 23 जनवरी को मनाए जाने वाले नेता जी के जन्मोत्सव की तस्वीरें। 

लीला राय की मृत्यु पर शोक सभा की तस्वीरें। 

नेताजी की तरह के दर्जनों गोल चश्में। 

555 सिगरेट और विदेशी शराब का बड़ा जखीरा। 

रोलेक्स की जेब घड़ी। 

आजाद हिंद फौज के यूनिफॉर्म। 

1974 में कोलकाता के दैनिक आनंद बाजार पत्रिका में 24 किस्तों में छपी खबर ताइहोकू विमान दुर्घटना एक बनी हुई कहानी की कटिंग

जर्मनी जापानी और अंग्रेजी साहित्य की ढेरों किताबें 

सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु की जांच पर बने शाहनवाज और खोसला आयोग की रिपोर्ट 

हाथ से बने हुए नक्शे जिनमें उस जगह को इंगित किया गया जहां कहा जाता है कि नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था 

आजाद हिंद फौज की गुप्तचर शाखा के प्रमुख पवित्र मोहन राय के लिखे गए बधाई संदेश

जब गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनकी नेताजी होने की बातें फैलने लगे तो नेता जी की भतीजी ललिता बोस भी कोलकाता से फैजाबाद आई थी और वह भी इन सामानों को देख कर फफक कर रो पड़ी थी यह कहते हुए कि यह सब कुछ मेरे चाचा का ही है। उन्होंने इस सामानों को सहेजने की मांग को लेकर अदालत में याचिका भी दाखिल की थी जिस पर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने फैजाबाद के तत्कालीन डीएम को निर्देश दिया था कि राम भवन में रहने वाले संत के सामानों को सूचीबद्ध राजकीय संरक्षण में लें। सरयू नदी के तट पर गुमनामी बाबा की समाधि है जिस पर जन्म की तारीख लिखी है 23 जनवरी संयोग है कि यही तारीख नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्म तिथि है जबकि मृत्यु की तारीख के सामने तीन सवालिया निशान लगे। समाधि पर अंकित इंसान निसानों की तरह गुमनामी बाबा भी सवालों के घेरे में हैं। 

बोस की हत्या में नेहरू का हाथ? 

एक धारणा यह भी है कि नेताजी की मौत विमान हादसे में नहीं बल्कि जवाहरलाल नेहरू के इशारे पर रूस में स्टालिन ने उनकी हत्या कराई थी। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इससे जुड़ा दावा किया। 

मौत क्यों आज भी रहस्य? 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवित होने की बात को इससे भी बल मिला कि ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया विभाग लगातार उनकी तलाश करते रहे। 

नेहरू की मृत्यु के बाद भी एक तस्वीर वायरल हुई थी इसमें साधु के वेश में एक आदमी उनके दर्शन कर रहा है उन्होंने उस आदमी के गोलाकार चश्मे की वजह से यह कहा गया था कि वह कोई और नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस ही थे।

आजाद हिंद फौज में नेताजी के ड्राइवर रहे उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिला निवासी निजामुद्दीन ने दावा किया था कि सुभाष चंद्र बोस की 1945 में विमान हादसे में मौत नहीं हुई थी उनका कहना था कि विमान हादसे के तीन चार महीने बाद उन्होंने खुद नेता जी को वर्मा और थाईलैंड के बॉर्डर पर सीतापुर नदी के किनारे कार से छोड़ा था। 

जब गांधी जी की मृत्यु हुई तो अनेक लोगों ने यह दावा किया था कि शव यात्रा में नेताजी को देखा था।

नेताजी की तथाकथित मृत्यु के 7 दिन बाद एक अमेरिकी पत्रकार अल्फ्रेड में नहीं आ दावा किया था कि नेताजी जिंदा है और 4 दिन पहले उनको साइगोन नामक जगह में देखा गया। 

ताइवान में कथित विमान हादसे के वक्त नेताजी के साथ रहे कर्नल हबीबुर रहमान ने आजाद हिंद सरकार के सूचना मंत्री एस ए नय्यर, रूसी व अमेरिकी जासूसों और शाहनवाज समिति के सामने विरोधाभासी बयान दिए थे। 

नेताजी के जीवित होने को महात्मा गांधी ने भी हवा दी थी उन्होंने एक भाषण में कहा था कि कोई मुझे अस्थियां दिखा दे तब भी मैं इस बात को नहीं मानूंगा कि सुभाष जीवित नहीं बचे। ताइवान सरकार ने अपना रिकॉर्ड देखकर खुलासा किया था कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान में कोई विमान हादसा हुआ ही नहीं था। 

उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद ही उनको रूस में होने के दावे किए जाने लगे थे और मेरा पिछले दिनों सुब्रमण्यम स्वामी ने भी दावा किया था कि नेताजी को रूस में स्टालिन ने मरवा दिया था।

विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए 31 जनवरी 2013 को आयोग गठित करने के आदेश दिए। 28 जून 2016 को सेवानिवृत्त जज विष्णु सहाय की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 19 सितंबर 2017 को दी। न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश की गई जिसमें कहा गया कि गुमनामी बाबा नेताजी के अनुयायी थे और उनकी आवाज नेताजी की तरह थी। कुल 130 पन्नों की रिपोर्ट में 11 बिंदु बताए गए जिनमें गुमनामी बाबा के नेताजी होने के संकेत नहीं मिलते हैं। 

आज बरसों बीत चुके हैं। नेताजी के अपने राज्य बंगाल में भी शायद ही उनका राजनैतिक साथ देने वाला कोई बाकी हो। पर उनकी मृत्यु की रहस्य गाथा आज भी हमें उकसाती है। जाहिर सी बात है, अफवाहों और निराधार चिंतन से कुछ ज्यादा है इस मसले में तभी तो हम लोग इसे आज तक भूले नहीं।

- अभिनय आकाश







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