विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए संचारकों को राष्ट्रीय पुरस्कार

  •  उमाशंकर मिश्र
  •  मार्च 2, 2019   17:41
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विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए संचारकों को राष्ट्रीय पुरस्कार

पिछले वर्ष विज्ञान दिवस की थीम ‘टिकाऊ भविष्य के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी'' रखी गई थी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने विज्ञान संचार पुरस्कार प्रदान किये।

नई दिल्ली। (इंडिया साइंस वायर): विज्ञान दिवस के अवसर पर देशभर के दस विज्ञान संचारकों को वर्ष 2018 के राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस मौके पर मौजूद भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर के. विजयराघवन ने कहा कि “वैज्ञानिक अभिरुचि के प्रसार के लिए वैज्ञानिकों और आम लोगों के बीच की दूरियों को कम करना होगा। अगर विशेषज्ञ समाज के आम लोगों के मुकाबले खुद को श्रेष्ठ मानकर चलेंगे तो इस खाई को पाटना आसान नहीं होगा। इसके लिए हमें लोगों के करीब जाना होगा और धरातल पर उतरकर उनके साथ संवाद करना होगा।”

प्रोफेसर विजयराघवन ने ये बातें इस बार राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की थीम 'लोगों के लिए विज्ञान और विज्ञान के लिए लोग' के संदर्भ में कही हैं। इस थीम का चयन करने का उद्देश्य वैज्ञानिक खोजों को अधिकतम लोगों से जोड़ने के प्रयासों को बढ़ावा देना है। पिछले वर्ष विज्ञान दिवस की थीम ‘टिकाऊ भविष्य के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी' रखी गई थी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने विज्ञान संचार पुरस्कार प्रदान करते हुए कहा कि- ‘लोगों के लिए विज्ञान' से जुड़े घटकों में विज्ञान संचार सबसे अहम है। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय से विज्ञान संचार को बढ़ावा देने के लिए शुरू किए गए डीडी साइंस और इंडिया साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी इनोवेशन पोर्टल से जुड़ने का आह्वान भी किया है।

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राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 'रामन प्रभाव' की खोज की याद में हर वर्ष 28 फरवरी को मनाया जाता है। इसी खोज के कारण भारतीय भौतिक वैज्ञानिक सी.वी. रामन को नोबेल पुरस्कार मिला था। राष्ट्रीय विज्ञान संचार पुरस्कारों के अंतर्गत पुस्तकों एवं पत्रिकाओं सहित प्रिंट मीडिया के जरिये विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए इस बार इंफाल के डॉ. हुइद्रोम बीरकुमार सिंह, गुवाहाटी के मुनिन्द्र कुमार मजूमदार और भुवनेश्वर की डॉ. मानसी गोस्वामी को यह पुरस्कार प्रदान किया गया है।

जीव वैज्ञानिक डॉ. हुइद्रोम ने अंग्रेजी और मणिपुरी भाषा के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पेयजल, जैव विविधता, जैव संसाधनों पर सैकड़ों लेख एवं पुस्तकें लिखी हैं। वहीं, डॉ. मुनिन्द्र कुमार गणित को असम के दूरदराज में रहने वाले छात्रों एवं अभिभावकों के बीच लोकप्रिय बनाने में जुटे हैं। डॉ. मानसी गोस्वामी को यह पुरस्कार अनुवाद, कार्टून, कविता, नाटक के कथानक, वॉल पत्रिका और लोकप्रिय विज्ञान शब्दावली विकसित करने के लिए दिया गया है। 

बच्चों के बीच विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में उत्कृष्ट प्रयास के लिए आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में कार्यरत संस्था रूरल एग्रीकल्चरल डेवेलपमेंट सोसायटी को प्रथम पुरस्कार मिला है। इस वर्ग में दूसरा पुरस्कार उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, इटावा के उप कुलपति डॉ. राजकुमार को दिया गया है। उन्हें यह पुरस्कार विज्ञान के सरल, सुबोध और प्रेरक व्याख्यानों एवं अनुप्रयोगों के जरिये विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए मिला है। जबकि, इसी श्रेणी में तीसरा पुरस्कार लखनऊ के डॉ जाकिर अली ‘रजनीश’ को उनकी विज्ञान कहानियों एवं सूचनाप्रद लेखों के लिए दिया गया है।

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नवाचारी एवं परंपरागत तरीकों से विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए नैनीताल के डॉ. बृजमोहन शर्मा को पुरस्कृत किया गया है। डॉ. शर्मा विज्ञान संचारक, लेखक एवं अध्येता हैं, जो पिछले करीब 25 वर्षों से आम लोगों के बीच विज्ञान को प्रचारित-प्रसारित करने लिए नवोन्मेषी तरीकों का उपयोग कर रहे हैं। इस वर्ग में दूसरा पुरस्कार जयपुर की प्राकृतिक चिकित्सक और नाट्यकला एवं मूर्तिकला विशेषज्ञ सुनीता झाला को दिया गया है।

लोकप्रिय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी साहित्य का आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं और अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए जलगांव के कवयित्री बहिनबाई चौधरी उत्तरी महाराष्ट्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मणीष रत्नाकर जोशी को पुरस्कृत किया गया है। जबकि, इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के जरिये हाशिए पर स्थित समुदायों में वैज्ञानिक अभिरुचि पैदा करने के लिए गुवाहाटी के डॉ. अंकुरण दत्ता को पुरस्कृत किया गया है। 

राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एनसीएसटीसी) की प्रमुख डॉ. निशा मेंदीरत्ता ने बताया कि एनसीएसटीसी की ओर से वर्ष 1987 में विज्ञान संचार पुरस्कारों की शुरुआत की गई थी। ये पुरस्कार छह श्रेणियों में हर साल राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर दिए जाते हैं। इन पुरस्कारों का उद्देश्य विज्ञान को लोकप्रिय बनाने, समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करने वाले विज्ञान संचार से जुड़े लोगों एवं संस्थाओं को प्रोत्साहित करना है।”

विज्ञान संचार पुरस्कार से सम्मानित इन सभी प्रतिभागियों को दो लाख रुपये नकद, स्मृति चिह्न और प्रशस्ति पत्र दिया गया है। किसी को भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार में उत्कृष्ट प्रयासों की श्रेणी में पुरस्कार के लिए उपयुक्त नहीं पाया गया। इस श्रेणी के अंतर्गत पुरस्कार में पांच लाख रुपये, एक स्मृति चिह्न और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।

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इस मौके पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा शुरू की गई शोध की अभिव्यक्ति के लिए लेखन कौशल को प्रोत्साहन (अवसर) नामक राष्ट्रीय प्रतियोगिता के तहत चुने गए चार युवा वैज्ञानिकों को भी पुरस्कार प्रदान किए गए हैं। इस प्रतियोगिता में पीएचडी एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोधार्थियों समेत दो वर्गों में पुरस्कार दिए जाते हैं। पोस्ट डॉक्टोरल वर्ग में सर्वश्रेष्ठ लेखन के एक लाख रुपये का पुरस्कार डॉ. पॉलोमी सांघवी (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई) को मिला है।

अवसर प्रतियोगिता के पीएचडी वर्ग के अंतर्गत एक लाख रुपये का प्रथम पुरस्कार आशीष श्रीवास्तव (स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी, यूनिवर्सिटी ऑफ मुंबई), 50 हजार रुपये का द्वितीय पुरस्कार अजय कुमार (आईआईटी-मद्रास) और 25 हजार रुपये का तृतीय पुरस्कार नबनीता चक्रबर्ती (केंद्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोलकाता) को दिया दिया गया है।

(इंडिया साइंस वायर)







टीकाकरण से ही मिल सकती है कोरोना से विश्वसनीय सुरक्षा

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  फरवरी 24, 2021   15:48
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टीकाकरण से ही मिल सकती है कोरोना से विश्वसनीय सुरक्षा

देशव्यापी टीकाकरण की आवश्यकता के संदर्भ में भारत के नियामक प्राधिकारों ने दो वैक्सीनों को मंजूरी दी है– उनमें से एक (कोविशील्‍ड) को बिना शर्त और दूसरी (कोवैक्‍सीन) को क्लिनिकल ट्रायल मोड में मंजूरी मिली है।

दो सीरोलॉजिकल सर्वेक्षणों और मॉडल अनुमानों के अनुसार भारत की एक बड़ी आबादी में इस समय सार्स-सीओवी-2 वायरस के खिलाफ प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है। हालांकि, मौजूदा प्रमाणों से पता चलता है कि एंटीबॉडिज की उपस्थिति के कारण बनने वाली यह रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक समय तक प्रभावी नहीं रहेगी।  इसकी तुलना में टी-सेल द्वारा बनी रोग प्रतिरोधक क्षमता कहीं लम्बे समय तक प्रभावी रहती है। इसीलिए वैज्ञानिकों का यह स्पष्ट मत है कि  कोरोना वायरस के विरुद्ध दीर्घकालिक एवं विश्वसनीय सुरक्षा सिर्फ टीकाकरण से ही मिल सकती है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी वक्तव्य में यह बात कही गई है।

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चेन्नई स्थित गणितीय संस्थान के निदेशक राजीव एल. करंदीकर, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), हैदराबाद के प्रोफेसर एम. विद्यासागर जैसे विशेषज्ञों की टिप्पणियों पर आधारित इस वक्तव्य में भारत में तेज गति से हो रहे टीकाकरण की तुलना शेष विश्व से की गई है। इसमें कहा गया है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा स्थापित  कोविड-19 नेशनल सुपर मॉडल कमेटी के अनुमान के अनुसार मार्च, 2021 के अंत तक कोविड-19 के सक्रिय मामलों की संख्या गिरकर कुछ हजार में सिमट जाएगी। 

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कहा है कि सार्स-सीओवी-2 वायरस के कारण फैल रही कोविड-19 महामारी में वृद्धि के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों से संकेत मिलता है कि भारत में इसका संक्रमण सितंबर, 2020 में किसी समय अपने चरम पर था और उसके बाद से यह लगातार घट रहा है। 11 सितंबर, 2020 को जहां अधिकतम 97,655 प्रतिदिन नये मामले मिले थे, वहीं फरवरी, 2021 के पहले सप्‍ताह में यह संख्‍या घटकर 11,924 पर आ गई। इसमें से आधे मामले केरल में हैं। इस बात को सुनिश्चित करना जरूरी है कि संक्रमण की दर को दोबारा बढ़ने न दिया जाए। जैसा कि इटली, ब्रिटेन और अमरीका जैसे कई देशों में हुआ है।

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विशेषज्ञों का कहना है कि टीकाकरण से प्राकृतिक संक्रमण के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता मिलती है, जो इस महामारी के नियंत्रण के लिए एक अचूक अस्त्र है। हालांकि कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि पिछले संक्रमणों के कारण बनी एंटीबॉडिज की मौजूदगी, टीकाकरण के मुकाबले वायरस के रूपांतरण से दोबारा होने वाले संक्रमण के खिलाफ कम सुरक्षा देती हैं। इसीलिए, कहा जा रहा है कि मान्य वैक्सीन के जरिये राष्ट्रव्यापी  टीकाकरण कार्यक्रम को शीघ्रता से पूरा किया जाना अनिवार्य  है।

टीकों से संबंधित एक रोचक पहलू मृत वायरस से तैयार किये गए टीके से बनी एंटीबॉडिज और स्पाइक प्रोटीन से तैयार टीके से बनी एंटीबॉडिज को लेकर है। यह उल्लेखनीय है कि मृत वायरस से तैयार टीके से बनी एंटीबॉडिज, स्पाइक प्रोटीन से तैयार टीके से बनी एंटीबॉडिज के मुकाबले रूपांतरित वायरस के विरुद्ध कहीं अधिक  प्रभावी हैं। देशव्यापी टीकाकरण की आवश्यकता के संदर्भ में भारत के नियामक प्राधिकारों ने दो वैक्सीनों को मंजूरी दी है – उनमें से एक (कोविशील्‍ड) को बिना शर्त और दूसरी (कोवैक्‍सीन) को क्लिनिकल ट्रायल मोड में मंजूरी मिली है। विशेषज्ञों की समिति इस बात से सन्तुष्ट है कि दोनों वैक्सीन सुरक्षित हैं और कोरोना वायरस के विरुद्ध प्रभावी प्रतिरक्षा उत्पन्न करती हैं।

इन दोनों वैक्सीन को लेकर शुरू किए गए टीकाकरण अभियान को कुछ लोगों ने जल्दबाजी में उठाया गया कदम बताकर इसके महत्व को कम करने का प्रयास किया। हालांकि, डब्‍ल्‍यूएचओ ने कहा है कि किसी वैक्सीन को आपात स्थिति में मंजूरी देने के पहले भी यह देखना जरूरी है कि वह 50 प्रतिशत तक प्रभावी अवश्य हो। कभी-कभी 40 प्रतिशत की प्रभावशीलता वाली वैक्सीन भी कुछ हद तक संरक्षण दे देती हैं। लेकिन, कभी-कभी 80 प्रतिशत की प्रभावशीलता वाली वैक्सीन लगने के बाद भी व्यक्ति संक्रमण की चपेट में आ सकता है। ऐसे में, यह अपेक्षा की जाती है कि नियामक प्राधिकार इस दिशा-निर्देश से बंधे न रहकर विवेकपूर्ण निर्णय लेंगे। इसके साथ ही, यह भी आवश्यक  है कि बेशक लक्षित आबादी में हर किसी का (18 वर्ष से अधिक उम्र) टीकाकरण हो जाए, तब भी लोगों को सुरक्षा  मानदंडों का पालन करते रहना होगा।

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वायरस के प्रसार के साथ-साथ इसके रूपांतरण को रोकने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके लिए सिर्फ किसी एक देश के प्रत्येक व्यक्ति का टीकाकरण ही पर्याप्त नहीं है। महामारी का अंत करने के लिए दुनिया भर के लोगों का शीघ्रता से टीकाकरण किया जाए। भारत सिर्फ अपनी टीकाकरण जरूरतों को पूरा करने में ही सक्षम नहीं है, बल्कि वह इस मामले में पूरे विश्व की मदद कर सकता है। वैक्सीन की वैश्विक मांग को पूरा करने में अपना योगदान देकर और वैश्विक समुदाय में इस महामारी से लड़ने की उम्मीद बँधाकर भारत ने  महामारी-जन्य संकटकाल में विश्व मंच पर अपनी अग्रणी उपस्थिति दर्ज करायी है।

(इंडिया साइंस वायर)







देश की 12 कंपनियों को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी पुरस्कार-2020 के लिए चुना गया

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  फरवरी 23, 2021   19:07
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देश की 12 कंपनियों को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी पुरस्कार-2020 के लिए चुना गया

इन कंपनियों का चयन तीन श्रेणियों-स्वदेशी प्रौद्योगिकी, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उपक्रम और स्टार्टअप्स के अन्तर्गत किया गया है। तीनों श्रेणियों के लिए हर वर्ष प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीबीडी) के पास प्रविष्टियां भेजी जाती हैं।

उद्यमिता में नवाचारों के प्रवर्तन एवं प्रोत्साहन के लिए देश की 12 कंपनियों को अभिनव स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के सफल व्यावसायीकरण के लिए राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी पुरस्कार 2020 के लिए चुना गया है। ये पुरस्कार विभिन्न उद्योगों को उनके और उनके प्रौद्योगिकी प्रदाताओं को एक टीम के रूप में काम करते हुए बाजार में नवीनता लाने और 'आत्मनिर्भर भारत' मिशन में योगदान देने के लिए दिए जाते हैं। इस बार विजेताओं का चयन 128 आवेदनों को परखने के उपरांत किया गया। इसकी परख प्रख्यात प्रौद्योगिकीविदों और एक कड़े द्वि-स्तरीय मूल्यांकन प्रक्रिया द्वारा गहन पड़ताल के माध्यम से की गई।

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इन कंपनियों का चयन तीन श्रेणियों-स्वदेशी प्रौद्योगिकी, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उपक्रम और स्टार्टअप्स के अन्तर्गत किया गया है। तीनों श्रेणियों के लिए हर वर्ष प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीबीडी) के पास प्रविष्टियां भेजी जाती हैं। टीबीडी भारत सरकार का सांविधिक निकाय है, जो प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्य कर रहा है। यह स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण और घरेलू अनुप्रयोगों के लिए आयातित प्रौद्योगिकियों के अनुकूलन के लिए काम करने वाली कंपनियों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है। इसकी स्थापना 1996 में अभिनव स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण के लिए भारतीय कंपनियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। स्थापना के बाद से अब तक बोर्ड ने प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण के लिए 300 से अधिक कंपनियों को वित्तीय सहायता प्रदान की है।

पहली श्रेणी में स्वदेशी प्रौद्योगिकी का सफलतापूर्वक विकास और उसके सफल व्यवसायीकरण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाता है। इस पुरस्कार के तहत यदि कंपनी और तकनीक के प्रदाता यानी प्रौद्योगिकी डेवलपर अलग-अलग संगठन से हों तो प्रत्येक को 25 लाख रुपये और एक ट्रॉफी पुरस्कार के रूप में दी जाती है। इस वर्ष सूरत की मैसर्स एलएंडटी स्पेशल स्टील एंड हेवी फोर्जिंग्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और मुंबई स्थित न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड नामक प्रौद्योगिकी प्रदाता को यह पुरस्कार दिया जा रहा है। साथ ही मुंबई की विनती ऑर्गेनिक्स लिमिटेड और प्रौद्योगिकी प्रदाता सीएसआईआर-इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (सीएसआईआर-आईआईसीटी), हैदराबाद को भी इस पुरस्कार के लिए चुना गया है।

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पुरस्कार की दूसरी श्रेणी में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रम (एमएसएमई) को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाता है। इस श्रेणी में चयनित प्रत्येक प्रविष्टि को 15 लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाता है। इस वर्ष नोएडा स्थित मैसर्स एकेएस इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, चेन्नई स्थित मैसर्स एसवीपी लेजर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड, पुणे स्थित मैसर्स कान बायोसिस प्राइवेट लिमिटेड और तंजावुर स्थित मैसर्स एल्गलआर न्यूट्राफार्म्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों को इस पुरस्कार के लिए चुना गया है।

तीसरी श्रेणी में प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिये जाते हैं। यह पुरस्कार व्यावसायीकरण की संभावनाओं के साथ नई तकनीक को लेकर आश्वासन के लिए एक प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप को दिया जाता है। ट्रॉफी के अतिरिक्त पुरस्कार में 15 लाख रुपए का नकद पुरस्कार शामिल है। इस वर्ष इन पुरस्कारों के लिए मैसर्स आरएआर इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड दिल्ली, मैसर्स फाइब्रोहील वूंड केयर प्राइवेट लिमिटेड बेंगलुरु, मैसर्स एलथियन टेक इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड हैदराबाद, मैसर्स केबीकोल्स साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड पुणे, मैसर्स केबीकोल्स साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड पुणे, मैसर्स शिरा मेडटेक प्राइवेट लिमिटेड, अहमदाबाद और मैसर्स न्यूंड्रा इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड, जयपुर नामक छह स्टार्टअप चुने गए हैं। 

(इंडिया साइंस वायर)







भीमबेटका में मिले करोड़ों साल पुराने डिकिंसोनिया जीवाश्म

  •  इंडिया साइंस वायर
  •  फरवरी 20, 2021   15:36
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भीमबेटका में मिले करोड़ों साल पुराने डिकिंसोनिया जीवाश्म

एक नये अध्ययन में भीमबेटका में दुनिया का सबसे दुर्लभ और सबसे पुराना जीवाश्म खोजा गया है। शोधकर्ता इसे भारत में डिकिंसोनिया का पहला जीवाश्म बता रहे हैं, जो पृथ्वी का सबसे पुराना, लगभग 57 करोड़ साल पुराना जानवर है।

भोपाल से करीब 45 किलोमीटर दूर रायसेन जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध भीमबेटका की गुफाओं को आदि-मानव द्वारा पत्थरों पर की गई चित्रकारी के लिए जाना जाता है। यूनेस्को संरक्षित क्षेत्र भीमबेटका का संबंध पुरापाषाण काल से मध्यपाषाण काल से जोड़कर देखा जाता है। एक नये अध्ययन में, भीमबेटका में दुनिया का सबसे दुर्लभ और सबसे पुराना जीवाश्म खोजा गया है। शोधकर्ता इसे भारत में डिकिंसोनिया का पहला जीवाश्म बता रहे हैं, जो पृथ्वी का सबसे पुराना, लगभग 57 करोड़ साल पुराना जानवर है।  

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अमेरिका की ऑरिगोन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक ग्रेगरी जे. रिटालैक के नेतृत्व में यूनिवर्सिटी ऑफ विटवाटर्सैंड, जोहान्सबर्ग और भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के शोधकर्ताओं के संयुक्त अध्ययन में डिकिंसोनिया के जीवाश्म की खोज की गई है। डिकिंसोनिया जीवाश्म से पता चलता है कि इस जानवर की लंबाई चार फीट से अधिक रही होगी, जबकि मध्य प्रदेश स्थित भीमबेटका की गुफा में जो जीवाश्म मिला है, वो 17 इंच लंबा है। डिकिंसोनिया को लगभग 54.1 करोड़ वर्ष पहले, कैम्ब्रियन काल में प्रारंभिक, सामान्य जीवों और जीवन की शुरुआत के बीच प्रमुख कड़ी में से एक के रूप में जाना जाता है।

 भारत में डिकिंसोनिया जीवाश्म भीमबेटका की ‘ऑडिटोरियम गुफा’ में पाया गया है। यह जीवाश्म भांडेर समूह के मैहर बलुआ पत्थर में संरक्षित है, जो विंध्य उप-समूह चट्टानों का हिस्सा है। शोधकर्ताओं को भीमबेटका की यात्रा के दौरान जमीन से 11 फीट की उँचाई पर चट्टान पर एक पत्‍तीनुमा आकृति देखने को मिली है, जो शैलचित्र की तरह दिखती है। इतने वर्षों तक इस जीवाश्म पर पुरातत्व-विज्ञानियों की नज़र नहीं पड़ने पर शोधकर्ताओं ने हैरानी व्यक्त की है। भीमबेटका की गुफा को 64 साल पहले वीएस वाकणकर ने ढूँढा था। तब से, हजारों शोधकर्ताओं ने इस पुरातत्व स्थल का दौरा किया है। यहाँ लगातार हो रहे शोधों के बावजूद इस दुर्लभ जीवाश्म से अब तक परदा नहीं उठ सका था।

इस शोध में, शोधकर्ताओं ने पृथ्वी के सबसे पुराने जीवों के इतिहास का अध्ययन किया है, जिनका संबंध इडिऐकरन काल से है। दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया की इडिऐकरा पहाड़ियों के नाम पर इस कालखंड नाम पड़ा है। पृथ्वी के इतिहास में यह कालखंड 64.5 करोड़ से 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व माना जाता है, जब डिकिंसोनिया और अन्य कई बहु-कोशकीय जीव अस्तित्व में थे। इससे पहले डिकिंसोनिया जीवाश्म रूस और ऑस्ट्रेलिया में पाए गए हैं। 

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अध्ययन में, जीवाश्म चट्टानों की आयु का निर्धारण आइसोटोप्स के उपयोग से किया गया है। मध्य प्रदेश में सबसे कम उम्र के मैहर बलुआ पत्थर की जिरकॉन डेटिंग से इसकी उम्र 54.8 करोड़ होने का अनुमान लगाया गया है। जबकि, सोन एवं चंबल घाटियों में पाए जाने वाले चूना पत्थर की आइसोटोप डेटिंग से इनकी उम्र का अनुमान 97.8 करोड़ वर्ष से 107.3 करोड़ वर्ष के बीच माना जा रहा है, जिसका संबंध पुरातन टोनियाई कालखंड से है। इडिऐकरन काल, कैम्ब्रियन काल का अग्रदूत था (लगभग 54.1 करोड़ से 485.4 करोड़ वर्ष), जब पृथ्वी पर विभिन्न जीवन रूपों का विस्फोट देखा गया।

मैहर बलुआ पत्थर में डिकिंसोनिया जीवाश्मों की आयु संबंधी प्रोफाइल, जिरकॉन डेटिंग का उपयोग करके निर्धारित की गई है, जो उन्हें रूस के श्वेत सागर क्षेत्र के लगभग 55.5 करोड़ वर्ष पुरानी चट्टानों से तुलना योग्य बनाती है। इस तरह की तुलना से संबंधित अधिक साक्ष्य करीब 55 करोड़ वर्ष पुराने दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के डिकिंसोनिया टेन्यूइस और डिकिंसोनिया कोस्टाटा जीवाश्मों से मिलते हैं। भीमबेटका और इसके आसपास की चट्टानों के अध्ययन से पता चलता है कि उनकी कई विशेषताएं ऑस्ट्रेलियाई चट्टानों से मिलती-जुलती हैं। इन विशेषताओं में, ‘बूढ़े हाथी की त्वचा’ जैसी बनावट और ट्रेस जीवाश्म शामिल हैं। भारत में मिले डिकिंसोनिया जीवाश्म दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के रॉनस्ले क्वार्टजाइट से मिलते-जुलते हैं।

यह अध्ययन शोध पत्रिका गोंडवाना रिसर्च में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं में ग्रेगरी जे. रिटालैक के अलावा, यूनिवर्सिटी ऑफ विटवाटर्सैंड के शरद मास्टर और भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के शोधकर्ता रंजीत जी. खांगर एवं मेराजुद्दीन खान शामिल हैं।

(इंडिया साइंस वायर)







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