देश की नदी घाटियों में नहीं है सूखे से उबरने की क्षमता

देश की नदी घाटियों में नहीं है सूखे से उबरने की क्षमता

एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वर्ष 1982 से 2010 तक 29 वर्षों के तापमान, वर्षा और मिट्टी की नमी के आंकड़ों आधार पर एक सूचकांक तैयार किया है। इस सूचकांक का उपयोग वनस्पतियों पर जलवायु के प्रभाव को समझने के लिए किया जा सकता है।

नई दिल्ली। 25 मार्च (इंडिया साइंस वायर): तापमान, वर्षा और मिट्टी की नमी जैसे जलवायु कारकों में बदलाव का असर वनस्पतियों के फैलाव और उनकी वृद्धि पर पड़ता है। इन बदलावों के चलते भारत की विभिन्न नदी घाटियों के दो तिहाई हिस्से में मौजूद वन एवं कृषि क्षेत्रों में सूखे से उबरने की क्षमता नहीं है। एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वर्ष 1982 से 2010 तक 29 वर्षों के तापमान, वर्षा और मिट्टी की नमी के आंकड़ों आधार पर एक सूचकांक तैयार किया है। इस सूचकांक का उपयोग वनस्पतियों पर जलवायु के प्रभाव को समझने के लिए किया जा सकता है।

देश की 24 में से 16 नदी घाटियों के कम से कम आधे हिस्से में मिट्टी की नमी का स्तर कम होने के कारण यह क्षेत्र सूखे से सबसे अधिक प्रभावित हो सकता है। गंगा घाटी का सबसे अधिक क्षेत्र सूखे की संभावना से प्रभावित पाया गया है, जहां 25 प्रतिशत क्षेत्र सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील है।

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उत्तर-पश्चिम में स्थित माही, साबरमती और लूनी नदी घाटियों में भी सूखे का खतरा है। दक्षिण में पेन्नार घाटी का 96 प्रतिशत क्षेत्र मिट्टी की नमी कम होने पर सूखे से ग्रस्त हो सकता है। जबकि, कृष्णा, कावेरी और तापी नदी घाटियों का 50 प्रतिशत हिस्सा सूखे के प्रति संवेदनशील है। इस अध्ययन में चरागाह, कृषि भूमि और प्राकृतिक वनस्पतियों सहित 10 वनस्पति प्रकारों को शामिल किया गया है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इंदौर के शोधकर्ता श्रीनिधि झा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “सूखे जैसी चरम जलवायु घटनाएं वनस्पति विकास को प्रभावित कर सकती हैं और सूखे की संभावना के चलते वनस्पतिक पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो सकता है। इसी कारण, बदलती जलवायु परिस्थितियों को केंद्र में रखते हुए हमने वनस्पति सूखे की स्थिति का आकलन किया है और जानने की कोशिश की है कि भारत के वनस्पति आवरण में जलवायु में किसी उथल-पुथल का सामना करने के लिए कितना लचीलापन है।”

शोधकर्ताओं ने बताया कि देश के कुल फसल क्षेत्र का दो-तिहाई हिस्सा वनस्पति सूखे के प्रति संवेदनशील है, जिससे खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं बढ़ सकती हैं। वनस्पति सूखे का अर्थ यहां जलवायु परिवर्तन के कारण मिट्टी की नमी के स्तर में कमी से वनस्पतियों की वृद्धि एवं उनके वितरण पर पड़ने वाले प्रभाव से है।

अध्ययन में शामिल शोधकर्ता डॉ. मनीष गोयल ने बताया कि “अधिकतर नदी घाटियों के कम से कम एक तिहाई क्षेत्र में वनस्पति सूखे को सहन करने लिए लचीलापन नहीं है। इन क्षेत्रों में वनस्पति सूखा अधिक समय तक बना रह सकता है, जिससे पारिस्थितिक तंत्र खतरे में पड़ सकता है। सदाबहार वनों और फसल क्षेत्रों सहित प्रत्येक वनस्पति प्रकारों का 50 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र सूखे को झेलने के लिए तैयार नहीं है।” 

श्रीनिधि झा और डॉ. मनीष गोयल के अलावा इस अध्ययन में आईआईटी, गुवाहाटी के आशुतोष शर्मा और बुधादित्य हज़रा शामिल थे। यह अध्ययन शोध पत्रिका ग्लोबल प्लेनेटरी चेंजेस में प्रकाशित किया गया है।

(इंडिया साइंस वायर)