ऊष्मीय अनुकूलन से कम हो सकती है एअर कंडीशनिंग की मांग

By उमाशंकर मिश्र | Publish Date: Jun 24 2019 2:21PM
ऊष्मीय अनुकूलन से कम हो सकती है एअर कंडीशनिंग की मांग
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भविष्य में यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिल सकती है क्योंकि ताप सूचकांक और जलवायु परिवर्तन का दबाव देशभर में लगातार बढ़ रहा है। भारत का ताप सूचकांक 0.56 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है। गर्मी (मार्च-मई) और मानसून (जून-सितंबर) के दौरान ताप सूचकांक में प्रति दशक वृद्धि दर 0.32 डिग्री सेल्सियस देखी गई है।

नई दिल्ली। (इंडिया साइंस वायर): गर्मी के मौसम में भारतीय शहरों में एअर कंडीशनिंग का उपयोग लगातार बढ़ रहा है जो ऊर्जा की खपत बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के लिए भी एक चुनौती बन रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए शहरों एवं भवनों को ऊष्मीय अनुकूलन के अनुसार डिजाइन करने से एअर कंडीशनिंग की मांग को कम किया जा सकता है। 


सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की आज जारी की गई रिपोर्ट में ये बातें उभरकर आई हैं। इसमें कहा गया है कि भारत के प्रत्येक घर में साल में सात महीने एअर कंडीशनर चलाया जाए तो वर्ष 2017-18 के दौरान देश में उत्पादित कुल बिजली की तुलना में बिजली की आवश्यकता 120 प्रतिशत अधिक हो सकती है। यह रिपोर्ट राजधानी दिल्ली में बिजली उपभोग से जुड़े आठ वर्षों की प्रवृत्तियों के विश्लेषण पर आधारित है। रिपोर्ट में दिल्ली में बिजली के 25-30 प्रतिशत वार्षिक उपभोग के लिए अत्यधिक गर्मी को जिम्मेदार बताया गया है। प्रचंड गर्मी के दिनों में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। इस वर्ष 7-12 जून के बीच प्रचंड गर्मी की अवधि में दिल्ली में बिजली की खपत में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है जो इस मौसम में होने वाली औसत बिजली की खपत की तुलना में काफी अधिक है। 
 
भविष्य में यह समस्या राष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिल सकती है क्योंकि ताप सूचकांक और जलवायु परिवर्तन का दबाव देशभर में लगातार बढ़ रहा है। भारत का ताप सूचकांक 0.56 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है। गर्मी (मार्च-मई) और मानसून (जून-सितंबर) के दौरान ताप सूचकांक में प्रति दशक वृद्धि दर 0.32 डिग्री सेल्सियस देखी गई है। ताप सूचकांक में बढ़ोत्तरी बीमारियों के संभावित खतरों का संकेत करती है। गर्मी के मौसम में देश के दक्षिण-पूर्वी तटीय क्षेत्रों (आंध्रप्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु) और मानसून में उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (गंगा के मैदानी भाग और राजस्थान) में यह खतरा सबसे अधिक हो सकता है।
इस रिपोर्ट के लेखक अविकल सोमवंशी ने बताया कि “ऊर्जा दक्षता ब्यूरो का अनुमान है कि एअर कंडीशनरों के उपयोग से कुल कनेक्टेड लोड वर्ष 2030 तक 200 गीगावाट हो सकता है। यहां कनेक्टेड लोड से तात्पर्य सभी विद्युत उपकरणों के संचालन में खर्च होने वाली बिजली से है। ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, वर्ष  2015 में उपकरणों का कुल घरेलू कनेक्टेड लोड 216 गीगावाट था। इसका अर्थ है कि जितनी बिजली आज सभी घरेलू उपकरणों पर खर्च होती है, उतनी बिजली वर्ष 2030 में सिर्फ एअर कंडीशनर चलाने में खर्च हो सकती है।”
 
इस अध्ययन में पता चला है कि 25-32 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर बिजली की खपत में अधिक वृद्धि नहीं होती। पर, तापमान 32 डिग्री से अधिक होने से बिजली की मांग बढ़ जाती है, जिसके लिए ठंडा करने वाले यांत्रिक उपकरणों का अत्यधिक उपयोग और कम दक्षता से उपयोग जिम्मेदार हो सकता है। 


 
सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी ने बताया कि “अत्यधिक गर्मी से निजात पाने के लिए व्यापक स्तर पर वास्तु डिजाइन के अलावा शीतलन से जुड़ी मिश्रित पद्धतियों को प्रोत्साहित करने जरूरत है। इन पद्धतियों में कम बिजली खपत एवं ऊर्जा दक्षता वाले उपकरणों का उपयोग प्रमुखता से शामिल है। ऐसा न करने पर जलवायु परिवर्तन के शमन और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े भारत के प्रयासों को गहरा धक्का लग सकता है।”
रिपोर्ट बताती है कि यह स्थिति राष्ट्रीय कूलिंग एक्शन प्लान के लक्ष्यों को निष्प्रभावी कर सकती है। भारत पहले ही ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है, जहां एअर कंडीशनिंग की शहरी पैठ 7-9 प्रतिशत है, और 2016-17 में (भारत ऊर्जा सांख्यिकी रिपोर्ट 2018 के अनुसार) बिजली की घरेलू मांग कुल बिजली खपत का 24.32 प्रतिशत थी। राष्ट्रीय कूलिंग एक्शन प्लान का कहना है कि सभी भवनों के निर्माण में ऊष्मीय अनुकूलन के मापदंडों पर अमल करना जरूरी है और सस्ते आवासीय क्षेत्र को भी इस दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। 
 
(इंडिया साइंस वायर)

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