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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Jitiya Vrat 2026 पर माताओं ने रखा Nirjala उपवास, शाम को Pradosh Kaal में ऐसे करें पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/jitiya-vrat-2026-begins-with-mothers-observing-nirjala-fast]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 03 अक्टूबर को जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत किया जा रहा है। जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी जीवन की कामना के साथ किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन माताएं निर्जला व्रत करती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करती हैं। मुख्य रूप से यह व्रत बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों में बेहद श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। तो आइए जानते हैं जीवित्पुत्रिका व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जितिया व्रत किया जाता है। इस बार 03 अक्टूबर की सुबह 07:59 मिनट पर अष्टमी तिथि शुरू हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 04 अक्टूबर की सुबह 05:51 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि और प्रदोष काल के हिसाब से 03 अक्टूबर 2026 को जितिया व्रत किया जा रहा है।</p><p>इससे पहले 02 अक्टूबर 2026 को नहाय-खाय की परंपरा पूरी की गई। आज यानी की 03 अक्टूबर को माताएं निर्जल व्रत करेंगी और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी। फिर 04 अक्टूबर को व्रत का पारण किए जाएगा।</p><h2>पूजा का शुभ समय और विधि</h2><p>इस व्रत में मुख्य पूजा शाम के समय यानी प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा करने की परंपरा है। आज शाम करीब 06:05 मिनट से लेकर 08:29 मिनट तक पूजा का शुभ मुहूर्त है। इस दौरान महिलाएं घर के आंगन में छोटा सा पोखर बनाकर उसमें जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। फिर जितिया व्रत कथा का पाठ किया जाता है और आरती की जाती है।</p><h2>भगवान जीमूतवाहन की पूजा</h2><p>जितिया व्रत में राजा जीमूतवाहन की कथा सुनने का विशेष महत्व होता है। धार्मिक कथा के मुताबिक नागवंश की रक्षा के लिए जीमूतवाहन ने अपने प्राणों का त्याग करने का संकल्प लिया था। उनकी करुणा और त्याग से जुड़ी इस कथा को जितिया व्रत की धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है। इस दौरान महिलाएं पूजा और कथा करती हैं और अपनी संतान की लंबी उम्र व सुखी जीवन की कामना करती हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 03 Oct 2026 10:12:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/jitiya-vrat-2026-begins-with-mothers-observing-nirjala-fast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mahalakshmi Vrat का समापन आज, Kalash Visarjan Muhurat और पूजा की पूरी विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/kalash-visarjan-procedure-and-sacred-thread-rules-for-mahalakshmi-vrat]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 03 अक्टूबर को 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत की समाप्ति हो रही है। इस व्रत की शुरूआत 19 सितंबर 2026 से हुई थी। यह मां लक्ष्मी की कृपा दिलाने वाला महालक्ष्मी व्रत बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत का उद्यापन करना जरूरी होता है। व्रत की समाप्ति के समय कलश विसर्जन का भी शास्त्रों में महत्व बताया गया है। तो आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत का मुहूर्त और उद्यापन विधि के बारे में...</p><h2>कलश विसर्जन का मुहूर्त</h2><p>इस बार आज यानी की 03 अक्टूबर को महालक्ष्मी व्रत की समाप्ति हो रही है। इस दिन प्रातःकाल मुहूर्त सुबह 06:15 मिनट से लेकर 10:45 मिनट तक है। वहीं अभिजी मुहूर्त दोपहर 11:48 मिनट से लेकर 12:35 मिनट तक है।</p><h2>ऐसे करें महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन</h2><p>इस दिन सबसे पहले जल्दी उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। फिर घर में मंदिर में ईशान कोण में लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। फिर मां महालक्ष्मी की तस्वीर या फिर गजलक्ष्मी स्वरूप की प्रतिमा को स्थापित करें।</p><p>चौकी पर चावल की ढेरी बनाएं और उस पर जल से भरा कलश स्थापित करें। फिर कलश पर आम के पत्ते और नारियल रखें। अब मां लक्ष्मी की विधिविधान से पूजा करें। वहीं अगर आपने पहले ही कलश स्थापनी की हुई है, तो फिर इस प्रक्रिया को न दोहराएं।</p><p>अब व्रत के पहले दिन बांधा गया 16 गांठों वाला पवित्र धागा मां महालक्ष्मी के सामने अर्पित करें औऱ उस पर रोली और अक्षत चढ़ाएं। फिर मां महालक्ष्मी को कमल का फूल, 16 श्रृंगार की सामग्री और लाल वस्त्र अर्पित करें। भोग में फल, खीर और पूड़ी चढ़ाएं।</p><p>महालक्ष्मी व्रत के उद्यापन के दिन हवन करने की परंपरा है। हवन के समय 'ऊँ महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र का जाप करते हुए हवन में 108 आहुति दें। अंत में खीर और पूरियों की आहुति दें। फिर 16 घी के दीपक जलाएं और मां महालक्ष्मी और भगवान गणेश की आरती करें। साथ ही पूजा में होने वाली भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p><p>उद्यापन के दिन 16 कन्याओं या 16 सुहागिन महिलाओं को भोजन कराएं और सामर्थ्य के हिसाब से श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, फल और दक्षिणा आदि देकर विदा करें।</p><h2>ऐसे करें कलश विसर्जन</h2><p>व्रत के आखिरी दिन मां महालक्ष्मी की विधिविधान से पूजा करें। फिर कलश पर हाथ रखकर भगवान वरुण देव और पूजा में आमंत्रित सभी देवी-देवताओं से सम्मानपूर्वक विदाई के लिए प्रार्थना करें।</p><p>अब कलश के जल को आम के पत्तों से पूरे घर में छिड़कें और बचे हुए जल को तुलसी के पौधे में डाल दें।</p><p>अब कलश पर रखा नारियल प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बाटें और पूजन सामग्री का विसर्जन कर दें।</p><h2>16 गांठ वाला डोरा</h2><p>इस व्रत में 16 गांठ वाले डोरे का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा पूरी होने के बाद इस डोरे को फेंकने की जगह पर तिजोरी या पूजा स्थान पर रखें।</p><p>अगर डोरा पुराना हो जाए या रखने योग्य नहीं है, तो इसको किसी पवित्र स्थान पर रखें या फिर बहते जल में प्रवाहित कर दें।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 03 Oct 2026 09:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/kalash-visarjan-procedure-and-sacred-thread-rules-for-mahalakshmi-vrat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Vighnaraj Sankashti Chaturthi पर बना Angarki योग, गणेश पूजन का शुभ मुहूर्त और विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/vighnaraj-sankashti-chaturthi-date-shubh-muhurat-and-puja-vidhi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 29 सितंबर 2026 को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है। मंगलवार को यह पर्व पड़ने से इसको अंगारकी संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी जातक श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन में आने वाले सभी संकट और कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 29 सितंबर की शाम 05:09 मिनट से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं अगले दिन यानी की 30 सितंबर की दोपहर 02:55 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 29 सितंबर 2026 को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब व्रत का संकल्प लें और फिर पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर गणपति की प्रतिमा को स्थापित करें। अब बप्पा को जल, दूर्वा, फूल, रोली, अक्षत और फल आदि अर्पित करें। इसके बाद मोदक और उनका प्रिय भोग चढ़ाएं। फिर गणेश मंत्र का जाप करें और गणेश चालीसा या गणेश स्त्रोत का पाठ करें। फिर शाम को विधिविधान से भगवान गणेश की पूजा करें। इसके बाद चंद्र दर्शन करें और चंद्र देव को अर्घ्य दें और फिर व्रत खोलें।</p><h2>महत्व</h2><p>भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। यही कारण है कि इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन बप्पा की पूजा-अर्चना करने से बाधाएं दूर होती हैं। संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से संकटों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृ्द्धि और सौभाग्य का आगमन होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 29 Sep 2026 09:51:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/vighnaraj-sankashti-chaturthi-date-shubh-muhurat-and-puja-vidhi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pitru Paksha 2026: पितरों के आशीर्वाद के लिए दक्षिण दिशा में करें श्राद्ध, कुशा और काले तिल का प्रयोग अनिवार्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/shradh-karma-rules-for-pitru-paksha-offerings-and-tarpan-timing]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 27 सितंबर 2026 से पितृपक्ष की शुरूआत हो रही है। इस दौरान पितरों को तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पितृपक्ष के दौरान पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण ग्रहण कर उनपर कृपा बरसाते हैं। पितरों की आत्मशांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए विधिविधान से श्राद्ध कर्म किया जाता है। इस दौरान पूरे 15 दिनों तक कई नियमों का पालन भी किया जाता है। माना जाता है कि यह समय अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का होता है।</p><h2>पितृपक्ष 2026</h2><p>26 सितंबर - पूर्णिमा श्राद्ध</p><p>27 सितंबर - प्रतिपदा श्राद्ध</p><p>28 सितंबर - द्वितीया श्राद्ध</p><p>29 सितंबर - तृतीया श्राद्ध</p><p>30 सितंबर - चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध</p><p>01 अक्तूबर - षष्ठी श्राद्ध</p><p>02 अक्तूबर - सप्तमी श्राद्ध</p><p>03 अक्तूबर - अष्टमी श्राद्ध</p><p>04 अक्तूबर - नवमी श्राद्ध</p><p>05 अक्तूबर - दशमी श्राद्ध</p><p>06 अक्तूबर - एकादशी श्राद्ध</p><p>07 अक्तूबर - द्वादशी श्राद्ध</p><p>08 अक्तूबर - त्रयोदशी श्राद्ध</p><p>09 अक्तूबर - चतुर्दशी श्राद्ध</p><p>10 अक्तूबर - सर्वपितृ श्राद्ध</p><h2>श्राद्ध करने का समय और जगह</h2><p>श्राद्ध या तर्पण हमेशा दोपहर के समय करना चाहिए। कभी भी सूर्यास्त के बाद यह कर्म नहीं करना चाहिए। पूजा के समय अपना मुंह हमेशा दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए। इससे पितरों की दिशा माना जाता है। वहीं ध्यान रहे कि हमेशा श्रद्धा जमीन, किसी मंदिर या पवित्र नदी के किनारे ही करना चाहिए।</p><p>वहीं किसी दूसरे के घर पर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। तर्पण के दौरान कुशा और काले तिल का इस्तेमाल जरूरी माना जाता है।</p><h2>ब्राह्मण भोज और पंचबली का महत्व</h2><p>श्राद्ध वाले दिन कम से कम 3 ब्राह्मणों को घर पर बुलाकर पूरे सम्मान के साथ सात्विक भोजन कराना चाहिए। उनको दान-दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। क्योंकि बिना दान के श्राद्ध अधूरा माना जाता है। इसके साथ ही भोजन का एक हिस्सा गाय, देवताओं, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए जरूर निकालें। इसको पंचबली कहा जाता है, जोकि पितरों तक खाना पहुंचाने का जरिया माना जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sun, 27 Sep 2026 08:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/shradh-karma-rules-for-pitru-paksha-offerings-and-tarpan-timing</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pitru Paksha में Purnima Shraddh पर तर्पण और Panchabali की पूरी विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/purnima-shraddh-rituals-and-significance-during-pitru-paksha]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में पितृपक्ष में पूर्वजों को याद किया जाता है और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित की जाती है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे धार्मिक काम करते हैं। इस बार 26 सितंबर 2026, शनिवार को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध किया जाएगा। वहीं इसके अगले दिन यानी की 27 सितंबर को आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि शुरू होगी। इस तिथि से मुख्य रूप से पितृपक्ष की शुरूआत मानी जाती है।</p><h2>पूर्णिमा श्राद्ध</h2><p>आज यानी की 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध है, इस दिन उन पूर्वजों का याद किया जाता है और श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को होती है। अगर घर-परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई थी, तो पितृपक्ष में पूर्णिमा श्राद्ध की तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। मुख्य पितृपक्ष से पहले आने वाली पूर्णिमा श्राद्ध को महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है।</p><h2>पूर्णिमा श्राद्ध और प्रतिपदा श्राद्ध में फर्क</h2><p>पूर्णिमा श्राद्ध और प्रतिपदा श्राद्ध के बीच मुख्य अंतर तिथि का है। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध उन पूर्वजों का किया जाता है, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई थी। वहीं 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध में उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को हुई थी।</p><h2>जानें पूर्णिमा श्राद्ध की विधि</h2><p>इस दिन सुबह उठकर स्नान करें और फिर साफ सफेद कपड़े पहनें। इसके बाद रौहिणी या कुतुप मुहूर्त में दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठें। अब दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में कुश की पवित्री पहनें। अब तांबे या कांसे के बर्तन में कच्चा दूध, शुद्ध जल, काले तिल, सफेद फूल और अक्षत मिलाएं। दोनों हाथों में कुश रखें और जल लेकर 'ॐ पितृभ्यः नमः' बोलते हुए अपने गोत्र का नाम लें। फिर अंगूठे के सहारे से जल को किसी बर्तन में गिराएं।</p><p>तर्पण के बाद प्याज-लहसुन के बिना बनाए गए खाने को छोटे-छोटे हिस्सों में कुत्ते, कौवे, गाय, चींटी और देवता के लिए अलग-अलग रखें। इसको पंचबलि भी कहा जाता है। वहीं संभव हो तो ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यथासंभव दान दें। वहीं मंदिर या जरूरतमंद को आटा, चावल, सब्जी और फल आदि का दान दें। वहीं श्राद्ध कर्म के अंत में अगस्त्य ऋषि सहित अपने पूर्वजों से प्रार्थना करें और भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 26 Sep 2026 10:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/purnima-shraddh-rituals-and-significance-during-pitru-paksha</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Anant Chaturdashi पर घर में Ganesh Visarjan करते समय अपनाएं यह सही विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganesh-visarjan-rituals-and-shubh-muhurat-on-anant-chaturdashi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को 10 दिनों तक चलने वाले गणेश उत्सव का समापन हो रहा है। इस दिन गणपति विसर्जन किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और भदगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। इस दिन देशभर में गणेश विसर्जन को लेकर विशेष तैयारी और रौनक देखने को मिलती है। ऐसे में अगर आप भी अनंत चतुर्दशी पर गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन करने के लिए जा रहे हैं। तो आइए जानते हैं इस दिन कि तिथि, मुहूर्त, महत्व और कुछ जरूरी नियमों के बारे में...</p><h2>विसर्जन विधि और पाथेय की परंपरा</h2><p>विसर्जन वाले दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर बप्पा की विधिविधान से पूजा करें और उनको फूल, माला, अक्षत, सिंदूर और मोदक अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान गणेश की आरती उतारें।</p><p>वहीं ध्यान रखें कि गणपति को विदा करने से पहले उनको एक पोटली बांधकर जरूर दें। इस पोटली को पाथेय कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि बप्पा को देवलोक लौटते समय रास्ते में भोजन के लिए यह पोटली दी जाती है। इसके लिए पीले या लाल कपड़े में थोड़ा सा दूर्वा, अक्षत, सिक्का, मोदक, सुपारी और फल बांधकर गणपति के साथ रखें।</p><h2>ऐसे करें विसर्जन</h2><p>अगर आप घर पर विसर्जन कर रहे हैं, तो साफ पात्र में जल भरें और इसमें थोड़ा सा गंगाजल मिलाएं। अब हाथ में पुष्प लेकर पवित्र नदियों का स्मरण करें और फूल को जल में अर्पित करें। फिर श्रद्धापूर्वक बप्पा की प्रतिमा को जल में विसर्जित करें। इस दौरान बप्पा के मंत्र का जाप करें और 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' का उद्घोष करें। फिर प्रतिमा को पूरी तरह से जल में समर्पित करें। आप बाद में उस जल को दुर्वा या कोई पवित्र पौधे में डाला जा सकता है।</p><h2>महत्व</h2><p>भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू हुआ गणेश उत्सव का पर्व अनंत चतुर्दशी को समाप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा-अर्चना के अलावा गणपति विसर्जन किया जाता है। इस बात अनंत चतु्र्दशी के मौके पर कई शुभ और दुर्लभ योग बन रहे हैं, जिससे बप्पा की पूजा और विसर्जन से भक्तों को कई गुना शुभ फल प्राप्त होंगे।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 10:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganesh-visarjan-rituals-and-shubh-muhurat-on-anant-chaturdashi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Bhadrapada Anant Chaturdashi पर करें Lakshmi Narayan पूजन, इस विधि से मिलेगा व्रत का फल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-worship-on-anant-chaturdashi-with-fourteen-knot-thread]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा-अर्चना होती है और इसी के साथ 10 दिनों तक चलने वाले गणेश उत्सव पर गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पूजा-अर्चना करने और विशेष उपायों को करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन पूजा के दौरान अनंत सूत्र बांधने की भी परंपरा है। तो आइए जानते हैं अनंत चतुर्दशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 24 सितंबर 2026 की रात 11:18 मिनट से भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 25 सितंबर 2026 की रात 11:06 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी का व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सू्र्य देव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु का मन में स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। फिर एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और कलश स्थापित करें। चौकी पर लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा को स्थापित करें। कलश पर अष्टदल और फूल आदि अर्पित करें और फिर विधि-विधान से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करें।</p><h2>14 गांठों वाला अनंत सूत्र</h2><p>अनंत चतुर्दशी की पूजा में अनंत सूत्र का खास महत्व माना जाता है। इसके लिए सूती, कुशा या रेशमी सूत्र लेकर इसमें हल्की और कुमकुम लगाएं, फिर इस सूत्र में 14 गांठें लगाएं। अब इस सूत्र को भगवान श्रीहरि को अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाएं और भगवान विष्णु को भोग लगाएं। इसके बाद अनंत चतुर्दशी व्रत कथा का पाठ करें। पूजा के दौरान 'अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव, अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते' मंत्र का जाप करें।</p><p>इसके बाद महिलाओं बाएं हाथ में और पुरुष दाहिने हाथ में अनंत सूत्र बांधें। पूजा आदि होने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यथासंभव दान दें। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 09:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-worship-on-anant-chaturdashi-with-fourteen-knot-thread</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Vamana Jayanti 2026: जानिए भगवान विष्णु के वामन अवतार का महत्व और पूजन विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/learn-about-the-significance-and-worship-rituals-of-lord-vishnu-vamana-avatar]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सनातन धर्म में भगवान विष्णु के अवतारों का विशेष महत्व है। इन्हीं अवतारों में भगवान वामन को विष्णु का पाँचवाँ अवतार माना जाता है। वामन जयंती भगवान विष्णु के वामन अवतार के प्राकट्य दिवस के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। इस दिन भगवान वामन की पूजा, व्रत और कथा श्रवण का विशेष महत्व है।</p><h2>वामन जयंती 2026 की तिथि</h2><p>वर्ष 2026 में वामन जयंती बुधवार, 23 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व सामान्यतः भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। कुछ क्षेत्रों और पंचांगों में तिथि तथा पूजा-व्रत की परंपराओं में स्थानीय भिन्नता हो सकती है, इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार पूजा का समय निर्धारित करना चाहिए।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-and-worship-on-vaman-dwadashi-bring-happiness-and-prosperity-in-life" target="_blank" rel="noopener">Vamana Jayanti: Vaman Dwadashi पर पंचामृत अभिषेक और तुलसी दल से करें पूजन, जीवन में आएगी सुख-समृद्धि</a></p><h2>वामन जयंती का महत्व</h2><p>वामन अवतार की कथा धर्म की स्थापना, विनम्रता और अहंकार पर सत्य की विजय का संदेश देती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार असुरराज महाबली अत्यंत पराक्रमी, दानी और प्रजावत्सल राजा थे। उन्होंने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था।</p><p>देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने माता अदिति और महर्षि कश्यप के पुत्र के रूप में वामन अवतार धारण किया। भगवान वामन एक छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंचे और उनसे केवल तीन पग भूमि दान में मांगी।</p><p>राजा बलि ने वचन दे दिया। इसके बाद भगवान वामन ने विराट रूप धारण कर लिया। उन्होंने अपने पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग सहित समस्त लोकों को नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान न बचने पर राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में प्रस्तुत कर दिया।</p><p>भगवान वामन ने राजा बलि की दानशीलता और वचनपालन से प्रसन्न होकर उन्हें विशेष सम्मान प्रदान किया। इस प्रकार वामन अवतार की कथा यह संदेश देती है कि अहंकार का अंत निश्चित है, जबकि विनम्रता, सत्य और वचनपालन मनुष्य को महान बनाते हैं।</p><h2>वामन जयंती की पूजन विधि</h2><p>वामन जयंती के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु और भगवान वामन का ध्यान करते हुए व्रत एवं पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान वामन अथवा भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके पश्चात श्रद्धापूर्वक पूजन करें। पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है—</p><p>भगवान विष्णु या वामन जी का चित्र अथवा प्रतिमा<br>पीले पुष्प<br>चंदन और रोली<br>अक्षत<br>धूप और दीप<br>तुलसी दल<br>फल और मिठाई<br>पंचामृत एवं नैवेद्य</p><p>सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके बाद भगवान विष्णु और वामन देव का ध्यान कर उन्हें जल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें। धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान की आरती करें। पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करना शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार विष्णु मंत्रों का जप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ अथवा वामन अवतार की कथा का श्रवण भी कर सकते हैं।</p><h2>वामन जयंती के व्रत का महत्व</h2><p>वामन जयंती पर व्रत रखने की परंपरा भगवान विष्णु के प्रति भक्ति और आत्मसंयम से जुड़ी हुई है। श्रद्धालु अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार निर्जल, फलाहार अथवा सात्त्विक आहार के साथ व्रत रख सकते हैं। व्रत के दौरान सत्य बोलने, क्रोध से बचने, मन को शांत रखने और जरूरतमंदों की सहायता करने का भी विशेष महत्व माना जाता है। पूजा के पश्चात दान-पुण्य करना भी शुभ माना जाता है।</p><h2>वामन जयंती की व्रत कथा</h2><p>पौराणिक कथा के अनुसार असुरराज महाबली प्रह्लाद के वंशज और अत्यंत शक्तिशाली राजा थे। वे वीर होने के साथ-साथ महान दानी भी थे। कहा जाता है कि वे यज्ञ और दान के माध्यम से अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा रहे थे तथा उनके प्रभाव से देवताओं की स्थिति कमजोर हो गई थी। देवमाता अदिति ने अपने पुत्रों, देवताओं के कल्याण के लिए भगवान विष्णु की आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वर दिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने एक छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में वामन अवतार धारण किया। उधर राजा महाबली एक विशाल यज्ञ का आयोजन कर रहे थे और उन्होंने घोषणा की थी कि यज्ञ के दौरान कोई भी याचक खाली हाथ नहीं लौटेगा। भगवान वामन उसी यज्ञ में पहुंचे। राजा बलि ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उनसे इच्छित वस्तु मांगने के लिए कहा। तब वामन भगवान ने कहा— “मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए।”</p><p>राजा बलि ने आश्चर्य से कहा कि वे चाहें तो इससे कहीं अधिक मांग सकते हैं, किंतु भगवान वामन अपनी मांग पर अडिग रहे। राजा बलि ने तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। वचन मिलते ही भगवान वामन ने अपना विराट रूप धारण किया। एक पग में उन्होंने पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग सहित समस्त लोकों को नाप लिया। अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं था। राजा बलि ने अपने वचन का सम्मान करते हुए विनम्रता से अपना सिर भगवान के चरणों में रख दिया और कहा कि तीसरा पग उनके सिर पर रख दिया जाए। राजा बलि की सत्यनिष्ठा, दानशीलता और वचनपालन से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। भगवान ने उन्हें पाताल लोक का राज्य प्रदान किया और अपने संरक्षण का वर दिया। इस प्रकार वामन अवतार की कथा हमें सिखाती है कि शक्ति और संपत्ति के साथ विनम्रता आवश्यक है तथा जीवन में दिया गया वचन निभाना सर्वोच्च धर्मों में से एक है।</p><p>इस प्रकार, वामन जयंती भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के साथ-साथ धर्म, विनम्रता और सत्य के महत्व को स्मरण करने का पर्व है। भगवान वामन और राजा महाबली की कथा हमें बताती है कि बाहरी रूप या आकार से किसी की शक्ति का अनुमान नहीं लगाना चाहिए और सच्ची महानता विनम्रता एवं वचनपालन में निहित होती है। वर्ष 2026 में वामन जयंती 23 सितंबर, बुधवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। इस दिन भगवान वामन की पूजा, व्रत, कथा श्रवण और दान-पुण्य के माध्यम से श्रद्धालु सुख, शांति, समृद्धि और धर्ममय जीवन की कामना कर सकते हैं।</p><p>- शुभा दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 14:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/learn-about-the-significance-and-worship-rituals-of-lord-vishnu-vamana-avatar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vamana Jayanti: Vaman Dwadashi पर पंचामृत अभिषेक और तुलसी दल से करें पूजन, जीवन में आएगी सुख-समृद्धि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-and-worship-on-vaman-dwadashi-bring-happiness-and-prosperity-in-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है और श्रीहरि के विभिन्न अवतारों के विशेष महत्व के बारे में भी बताया गया है। भगवान विष्णु के इन्हीं अवतारों में एक अवतार भगवान वामन का अवतार है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वामन जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान वामन की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>द्रिक पंचांग के मुताबिक 22 सितंबर की रात 09:43 बजे से भाद्रपद शुक्ल द्वादशी तिथि की शुरुआत हुई है। वहीं आज यानी की 23 सितंबर की रात 10:50 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 23 सितंबर 2026 को वामन जयंती मनाई जा रही है। इसको वामन द्वादशी के नाम से भी जानते हैं।</p><h2>कौन सा अवतार हैं वामन</h2><p>पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विष्णु के दशावतारों में पांचवें अवतार भगवान वामन हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह अवतार के बाद श्रीहरि ने वामन रूप धारण किया था। धार्मिक मान्यता है कि वामन भगवान का जन्म भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को हुआ था। इनके माता अदिति और पिता ऋषि कश्यप माने जाते हैं। भगवान वामन ने अपने इस अवतार से राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान वामन का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। फिर एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु या भगवान वामन की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर 'ॐ नमो भगवते वामनाय नमः' मंत्र का जाप करते हुए भगवान विष्णु का पहले पंचामृत और बाद में साफ पानी से अभिषेक करें।</p><p>भगवान विष्णु को पीले पुष्प, अक्षत, चंदन, पीले वस्त्र और तुलसी दल आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान को तुलसी दल के साथ सात्विक भोग और फल अर्पित करें। इसके बाद वामन अवतार से जुड़ी कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और सुख-समृद्धि की कामना करें।</p><h2>महत्व</h2><p>इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-आराधना की जाती है। इस दिन जो भी जातक भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना और उनके वामन स्वरूप की पूजा करता है। व्रत, पूजा, कथा और दान-पुण्य जैसे कार्य करता है। उसके जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य आता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 09:21:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-and-worship-on-vaman-dwadashi-bring-happiness-and-prosperity-in-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Parivartini Ekadashi 2026: परिवर्तिनी एकादशी व्रत से मिलती है सभी पापों से मुक्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/parivartini-ekadashi-fast-gives-freedom-from-all-sins]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज परिवर्तिनी एकादशी है, परिवर्तिनी एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना गया है। परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म में परिवर्तिनी एकादशी विशेष है क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में सोते हुए अपनी करवट बदलते हैं। इस एकादशी पर कुछ विशेष उपाय करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तो आइए हम आपको परिवर्तिनी एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।</p><h2>जानें परिवर्तिनी एकादशी के बारे में</h2><p>पंडितों के अनुसार वर्ष में 24 एकादशी आती हैं और हर महीने शुक्ल व कृष्ण पक्ष में एक-एक एकादशी पड़ती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त होता है। भाद्रपद मास की परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। 22 सितंबर दिन मंगलवार को परिवर्तनी एकादशी तिथि का व्रत किया जाएगा, हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को परिवर्तनी एकादशी का व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखकर विधि विधान से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है, जीवन में सुख-शांति एवं समृद्धि आती है। पुराणों में बताया गया है कि परिवर्तनी एकादशी का व्रत करने से 100 यज्ञ के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है और व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में विश्राम करते हैं। परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं, इसलिए इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it" target="_blank" rel="noopener">Rajasthan के Kalki Temple में संगमरमर के घोड़े का भर रहा घाव, जुड़ी है रहस्यमयी मान्यता</a></p><h2>जानें परिवर्तिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त</h2><p>हिन्दू पंचांग के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी 22 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात करीब 8 बजे आरंभ होगी और 22 सितंबर की रात लगभग 9:43 बजे समाप्त होगी।</p><h2>परिवर्तिनी एकादशी व्रत में करें इन नियमों का पालन</h2><p>पंडितों के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद ही करें। एकादशी पूजा में तुलसी का प्रयोग जरूर करें। बिना तुलसी के विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। एकादशी के दिन पीले रंग के वस्त्र पहनें। व्रत के दिन क्रोध न करें और न ही किसी के लिए अपने मन में बुरे विचार लेकर आएं। एकादशी के दिन तुलसी तोड़ना वर्जित होता है। तो इस दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें और न ही जल चढ़ाएं। एकादशी के दिन तामसिक चीजों का सेवन न करें। (लहसुन-प्याज,मांसाहार, शराब) एकादशी के दिन बाल, दाढ़ी और नाखून काटने की मनाही होती है।</p><h2>परिवर्तिनी एकादशी व्रत के पारण का समय</h2><p>- एकादशी तिथि प्रारम्भ - सितंबर 21, 2026 को 08:00 पी एम बजे<br>- एकादशी तिथि समाप्त - सितंबर 22, 2026 को 09:43 पी एम बजे<br>- परिवर्तिनी एकादशी पारण तिथि- 23 सितंबर 2026<br>- पारण (व्रत खोलने का)समय - 06:27 ए एम से 08:53 ए एम<br>- पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय - 10:50 पी एम</p><h2>परिवर्तिनी एकादशी के दिन विष्णु जी को लगाएं इन चीजों का भोग</h2><p>पंडितों के अनुसार जगत के पालनहार भगवान विष्णु को पंचामृत अत्यंत प्रिय है इसलिए इसका भोग जरूर लगाएं। दूध, दही, चीनी, शहर और घी को मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है। एकादशी के दिन विष्णु जी को पंचमेवा भी जरूर चढ़ाएं। पंचमेवा में बादाम, काजू, छुआरा, किशमिश और मखाना आता है। श्री हरि विष्णु को पीला रंग बेहद पसंद है तो एकादशी के दिन बेसन के लड्डू, बूंदी के लड्डू, पीला पेड़ा या केसरिया रंग की खीर भी अर्पित करें। एकादशी के दिन चावल बनाना वर्जित है तो आप खीर साबूदाना की बना सकते हैं।परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को मौसमी फल जैसे- केला, सेब, अनार आदि फलों का भी भोग लगाएं।</p><h2>परिवर्तिनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक</h2><p>शास्त्रों में परिवर्तिनी एकादशी के विषय में राजा मांधाता और अनावृष्टि की कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार त्रेतायुग में मांधाता नाम के एक प्रतापी राजा थे। उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई, जिससे भयंकर सूखा पड़ गया और प्रजा त्रस्त हो गई। कारण जानने के लिए राजा जब वन गए, तो ऋषियों ने बताया कि राज्य में एक शूद्र द्वारा तपस्या करने के कारण यह दोष उत्पन्न हुआ है। राजा मांधाता ने निर्दोष और तपस्यारत व्यक्ति को दंड देने से मना कर दिया और इसका धार्मिक उपाय पूछा। तब ऋषियों ने उन्हें परिवार सहित भाद्रपद शुक्ल एकादशी (परिवर्तिनी एकादशी) का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने विधि-विधान से यह व्रत किया, जिससे राज्य में मूसलाधार बारिश हुई, खेत हरे-भरा हो गए और प्रजा फिर से सुखी हो गई।</p><h2>परिवर्तिनी एकादशी में दशमी से पहलें रखें ये सावधानी</h2><p>शास्त्रों के अनुसार नारद पुराण में एकादशी व्रत के नियम अनुसार तिथि की शुरुआत होने के बाद इनमें मसूर आदि दालें, दूसरे के घर भोजन, और रात्रि भोजन से बचने की बात कही गई है। इसलिए अगर आप शास्त्रीय नियमों के अनुसार व्रत करना चाहते हैं तो 21 सितंबर को दिन में ही सात्त्विक और हल्का भोजन कर लेना बेहतर माना जाता है।</p><h2>परिवर्तिनी एकादशी व्रत में ये खाएं, रहेंगे सेहतमंद</h2><p>पंडितों के अनुसार एकादशी व्रत को लेकर जलाहार, फलाहार, क्षीरभोजी और नक्तभोजी जैसी अलग-अलग व्रत पद्धतियां बताई गई है। आप अपनी क्षमता अनुसार ये व्रत कर सकते हैं। साबूदाना, सिंघाड़ा, शकरकंद, आलू और मूंगफली जैसी चीजें एकादशी व्रत में खा सकते हैं। एकादशी व्रत में सिर्फ अन्न का त्याग ही नहीं बल्कि झूठ, छल-कपट, क्रोध और कठोर वाणी से बचने की सलाह भी दी जाती है। व्रत के दौरान संयम रखें, इंद्रियों पर काबू रखना भी जरुरी है।</p><h2>परिवर्तिनी एकादशी का महत्व</h2><p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, मंत्र जाप और दान-पुण्य करने से भक्तों को श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है। भक्त भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी, फल और पंचामृत अर्पित कर पूजा करते हैं। एकादशी का व्रत मन और इंद्रियों पर संयम रखने तथा भगवान के प्रति भक्ति बढ़ाने का अवसर माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के वामन स्वरूप और राजा बलि से जुड़ी कथा के कारण भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं।</p><p>- प्रज्ञा पाण्डेय</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 22 Sep 2026 12:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/parivartini-ekadashi-fast-gives-freedom-from-all-sins</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Parivartini Ekadashi व्रत से मिलेगा वाजपेय यज्ञ जैसा पुण्य, योगनिद्रा में करवट बदलेंगे श्रीहरि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/parsva-ekadashi-2026-date-muhurat-puja-rituals-and-religious-importance]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार 22 सितंबर 2026 को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जा रहा है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। पार्श्व एकादशी का व्रत करने से जातक के सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। तो आइए जानते हैं पार्श्व एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और धार्मिक महत्व के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 21 सितंबर को रात 08:00 बजे से एकादशी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 22 सितंबर 2026 की रात 09:43 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। इसलिए उदयातिथि के आधार पर 22 सितंबर 2026 को पार्श्व एकादशी का व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठने के बाद साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। इसके बाद भगवान विष्णु या वामन देव की मूर्ति को स्थापित करें। फिर पानी से भरा तांबे का कलश रखें और इसके ऊपर आम के पत्ते रखें और फिर एक नारियल रखें। अब भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल और पंचामृत से साफ करें और फिर साफ पानी से धोकर पोछें।</p><p>श्रीहरि को चंदन का तिलक करें और रोली, अक्षत, पीले फूल, धूप-दीप और शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का इस्तेमाल जरूर करें। तुलसी दल को एकादशी के एक दिन पहले तोड़ कर रख लेना चाहिए। भगवान विष्णु को फल, पंचमेवा और खीर का भोग अर्पित करें। वहीं हर भोग में तुलसी दल का इस्तेमाल जरूर करें। फिर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और परिवर्तनी एकादशी व्रत कथा जरूर पढ़ें। पूजा के अंत में आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p><h2>महत्व</h2><p>पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के मुताबिक एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा के दौरान बाएं से दाएं करवट बदलते हैं। माना जाता है कि पार्श्व एकादशी का व्रत करने से जातक को वाजपेय यज्ञ के बराबर पुण्यफल की प्राप्ति होती है। वहीं इस व्रत के प्रभाव से पापों का नाश होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 22 Sep 2026 09:27:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/parsva-ekadashi-2026-date-muhurat-puja-rituals-and-religious-importance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Mahalaxmi Vrat Puja: Mahalakshmi Vrat आज से शुरू, धन समृद्धि के लिए इस तरह करें कलश स्थापना और पूजन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/goddess-lakshmi-worshipped-during-fifteen-day-fast-for-wealth-and-peace]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए और घर में सुख-सौभाग्य व धन की वृद्धि के लिए महालक्ष्मी का व्रत फलदायी माना जाता है। 15 दिनों तक चलने वाले इस महालक्ष्मी व्रत में धन की देवी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। महालक्ष्मी व्रत करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह व्रत 19 सितंबर से शुरू होकर 03 अक्तूबर तक चलेगा। वहीं व्रत के पहले दिन कलश स्थापना का विशेष महत्व होता है। तो आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत की तिथि, कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग क मुताबिक महालक्ष्मी व्रत के लिए 18 सितंबर की दोपहर 01:00 मिनट से भाद्रपद माह के शुक्ल अष्टमी तिथि की शुरूआत हुई है। जोकि आज यानी की 19 सितंबर की दोपहर 03:26 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 19 सितंबर 2026 से महालक्ष्मी व्रत शुरू हो रहा है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/goddess-radha-appearance-day-celebrated-with-special-puja-rituals-and-fasting" target="_blank" rel="noopener">Radha Ashtami पर देवी राधा और श्रीकृष्ण की पूजा से मिलेगा सुख-सौभाग्य, जानिए पूजन विधि और महत्व</a></p><h2>कलश स्थापना का मुहूर्त</h2><p>महालक्ष्मी व्रत मां लक्ष्मी को समर्पित व्रत है। माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करता है, उसको मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि व शांति बनी रहती है।</p><p>प्रातःकाल मुहूर्त- सुबह 04:57 मिनट से लेकर 06:08 मिनट तक है।</p><p>दूसरा शुभ मुहूर्त- सुबह 07:40 मिनट से लेकर 09:11 मिनट तक है।</p><p>मध्याह्न शुभ मुहूर्त- सुबह 11:01 मिनट से लेकर दोपहर 01:28 मिनट तक है।</p><h2>ऐसे करें कलश स्थापना</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद पूजा स्थल की सफाई करें और गंगाजल का छिड़का करें। फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर मां लक्ष्मी की तस्वीर स्थापित करें। अब एक तांबे के कलश में साफ जल भरें और इसमें सिक्का और अक्षत डालें। फिर कलश के ऊपरी भाग पर आम के पत्ते लगाएं और कलश के मुंह पर नारियल रखे। फिर कलश पर रोली और कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>कलश स्थापना के बाद मन में मां लक्ष्मी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद मां लक्ष्मी को फूल, अक्षत, कुमकुम, चंदन और धूप-दीप आदि अर्पित करें। मां लक्ष्मी को श्रृंगार की सामग्री और 16 गांठों वाला डोरा अर्पित करें। फिर विधि-विधान और श्रद्धा के साथ मां लक्ष्मी की पूजा करें। इस दौरान श्रीसूक्त और महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ करना शुभ माना जाता है। पूजा के अंत में मां लक्ष्मी को खीर, फल, मिठाई या पंचमेवा आदि का भोग लगाएं और घी का दीपक जलाकर आरती करें।</p><h2>महत्व</h2><p>जो व्यक्ति महालक्ष्मी व्रत करता है, उसके जीवन में दरिद्रता नहीं आती है। मां लक्ष्मी की कृपा से धन संकट का सामना नहीं करना पड़ता है। वहीं व्यक्ति के अन्न, भोजन, धन, जमीन, भवन, प्रसिद्धि, आयु और सफलता में वृद्धि होती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 19 Sep 2026 09:23:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/goddess-lakshmi-worshipped-during-fifteen-day-fast-for-wealth-and-peace</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Radha Ashtami पर देवी राधा और श्रीकृष्ण की पूजा से मिलेगा सुख-सौभाग्य, जानिए पूजन विधि और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/goddess-radha-appearance-day-celebrated-with-special-puja-rituals-and-fasting]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय राधारानी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा अष्टमी का व्रत और पूजन किया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की विधि-विधान से पूजा और व्रत किया जाता है। इस दिन पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख-सौभाग्य और समृद्धि का आगमन होता है। तो आइए जानते हैं राधा अष्टमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरूआत 18 सिंतबर 2026 की दोपहर 01:00 बजे शुरू होगी। वहीं अगले दिन यानी की 19 सितंबर 2026 की दोपहर 03:26 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 19 सितंबर 2026 को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। अब एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान श्रीकृष्ण और देवी राधा की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर देवी राधा का मन में ध्यान करते हुए उनको जल, पंचामृत, पुष्प, रोली, धूप, अक्षत और दीप आदि अर्पित करें। राधा रानी को श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। इस दौरान देवी राधा के मंत्र का जाप करें। फिर आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p><h2>धार्मिक महत्व</h2><p>देवी राधा को कृष्ण भक्ति और प्रेम भक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व राधा-कृष्ण की आराधना, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का विशेष अवसर है। इस दिन मंदिरों को सजाया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण-देवी राधा का विशेष श्रृंगार किया जाता है। इसके साथ ही भजन-कीर्तन और पूजा का आयोजन किया जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 19 Sep 2026 08:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/goddess-radha-appearance-day-celebrated-with-special-puja-rituals-and-fasting</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lalita Saptami: राधा रानी की प्रधान ललिता सखी का पूजन आज, इस विधि से लगाएं भोग व आरती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lalita-saptami-muhurat-puja-vidhi-and-significance-in-braj-tradition]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 18 सितंबर 2026 को ललिता सप्तमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व राधा अष्टमी के एक दिन पहले आता है। यह पर्व श्री ललिता सखी को समर्पित है, जिनको ब्रज भक्ति परंपराओं में राधा रानी के अष्टसखियों में सबसे खास माना गया है। ललिता सखी को श्रीकृष्ण और देवी राधा के प्रति सच्ची निष्ठा, बुद्धिमत्ता, समर्पण और साहस के लिए याद किया जाता है। वृंदावन, बरसाना और ब्रज से जुड़े क्षेत्रों में इस पर्व का विशेष महत्व माना जाता है। तो आइए जानते हैं ललिता सप्तमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 17 सितंबर सुबह 10:48 मिनट पर सप्तमी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 18 सितंबर 2026 की दोपहर 01:01 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर ललिता सप्तमी का पर्व 18 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। इसके बाद मंदिर की साफ-सफाई कर उसको गंगाजल से पवित्र करें। अब एक चौकी पर राधा-कृष्ण की प्रतिमा को स्थापित करें और साथ ही ललिता सखी की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर चंदन, अक्षत, कुमकुम, पुष्प आदि अर्पित करें। दीपक जलाकर विधि-विधान से राधा-कृष्ण और ललिता सखी की पूजा-आराधना करें। मिठाइयों और फलों का भोग लगाएं और आरती करें।</p><h2>जानें कौन हैं ललिता सखी</h2><p>ललिता सखी को ब्रज भक्ति परंपरा में श्री राधा रानी की 8 प्रमुख सहेलियों में प्रमुख माना गया है। भगवान कृष्ण और राधा की प्रेममयी सेवा के रूप में इस अष्टसखियों को आज भी याद किया जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 18 Sep 2026 10:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lalita-saptami-muhurat-puja-vidhi-and-significance-in-braj-tradition</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishwakarma Puja 2026: Shubh Muhurat के साथ जानिए Puja Vidhi का धार्मिक और औद्योगिक महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/vishwakarma-puja-2026-date-significance-rituals-and-legend]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का दिव्य शिल्पकार, वास्तुकार और निर्माण कला का अधिष्ठाता देव माना जाता है। मशीनों, औजारों, उद्योगों, कारखानों, कार्यशालाओं और निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों के लिए विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विश्वकर्मा की पूजा कर अपने कार्य में उन्नति, सफलता, सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं।</p><p>विश्वकर्मा पूजा को विशेष रूप से शिल्पकारों, इंजीनियरों, वास्तुकारों, तकनीकी कर्मियों, कारीगरों, वाहन चालकों तथा उद्योग और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों का प्रमुख पर्व माना जाता है। कई स्थानों पर इस अवसर पर औजारों, मशीनों और कार्यस्थल की भी विशेष पूजा की जाती है।</p><h2>विश्वकर्मा पूजा 2026 की तिथि</h2><p>वर्ष 2026 में विश्वकर्मा पूजा गुरुवार, 17 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व सामान्यतः कन्या संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है, जब सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं।</p><p>विश्वकर्मा पूजा की तिथि सौर गणना और संक्रांति पर आधारित होने के कारण इसे कई क्षेत्रों में प्रतिवर्ष लगभग 17 सितंबर के आसपास मनाया जाता है। पूजा का सटीक समय स्थानीय पंचांग और सूर्य संक्रांति के समय के अनुसार निर्धारित किया जा सकता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/vishwakarma-puja-a-tribute-to-labor-skill-and-creation" target="_blank" rel="noopener">विश्वकर्मा पूजा: श्रम, कौशल और सृजन को नमन</a></p><h2>भगवान विश्वकर्मा का महत्व</h2><p>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का दिव्य वास्तुकार और शिल्पकार माना गया है। उन्होंने अपनी अद्भुत निर्माण कला और शिल्प कौशल से अनेक दिव्य नगरों, भवनों और अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया। प्रचलित पौराणिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा द्वारा किए गए प्रमुख निर्माण कार्यों में देवताओं के लिए दिव्य भवन और महल, भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र, भगवान शिव के लिए त्रिशूल, इंद्र के लिए वज्र, श्रीकृष्ण के लिए द्वारका नगरी और रावण के लिए स्वर्णमयी लंका जैसे निर्माण कार्यों का उल्लेख मिलता है।</p><p>भगवान विश्वकर्मा केवल निर्माण और शिल्प के देवता ही नहीं, बल्कि रचनात्मकता, तकनीकी ज्ञान, परिश्रम और कौशल के भी प्रतीक हैं। विश्वकर्मा पूजा हमें अपने कार्य और कार्य में प्रयुक्त साधनों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की प्रेरणा देती है।</p><h2>विश्वकर्मा पूजा की पूजन विधि</h2><p>विश्वकर्मा पूजा के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर, दुकान, कारखाने, कार्यालय या कार्यस्थल की अच्छी तरह सफाई करें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र को पूजा स्थल पर स्थापित करें।</p><h2>पूजन सामग्री</h2><p>पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है—</p><p>भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र<br>कलश<br>रोली और चंदन<br>अक्षत<br>पुष्प और माला<br>धूप और दीप<br>फल और मिठाई<br>पंचामृत और स्वच्छ जल<br>नारियल<br>पान और सुपारी<br>कार्य में उपयोग होने वाले औजार और उपकरण<br>पूजा की विधि</p><p>सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण कर पूजा का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए उन्हें चंदन, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। पूजा स्थल पर रखे औजारों, मशीनों और कार्य उपकरणों को साफ करके उन पर रोली, चंदन और पुष्प अर्पित करें। कई स्थानों पर वाहनों और मशीनों की भी पूजा की जाती है। धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर भगवान विश्वकर्मा की आरती करें और कार्य में सफलता, सुरक्षा तथा उन्नति की प्रार्थना करें। पूजा के बाद प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस दिन कार्यस्थल की स्वच्छता और उपकरणों की देखभाल को भी विशेष महत्व दिया जाता है। आधुनिक संदर्भ में इसे कार्य के प्रति सम्मान और सुरक्षित कार्य संस्कृति के संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है।</p><h2>विश्वकर्मा पूजा का व्रत और नियम</h2><p>विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कुछ श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत भी रखते हैं। हालांकि, इस पर्व में पूजा और कार्य के साधनों के सम्मान को अधिक प्रमुखता दी जाती है। श्रद्धालु इस दिन सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान-पुण्य भी करते हैं। कुछ उद्योगों और कार्यस्थलों पर पूजा के बाद कर्मचारियों तथा श्रमिकों के लिए सामूहिक प्रसाद या भोजन का आयोजन किया जाता है।</p><h2>विश्वकर्मा पूजा की पौराणिक कथा</h2><p>पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ब्रह्मांड के प्रथम शिल्पकार और दिव्य वास्तुकार हैं। देवताओं को जब भी किसी विशेष भवन, नगर, अस्त्र या दिव्य उपकरण की आवश्यकता होती थी, तब भगवान विश्वकर्मा अपनी अद्भुत कला और ज्ञान से उसका निर्माण करते थे। एक प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए स्वर्ग के भव्य भवनों और दिव्य सभाओं का निर्माण किया। उन्होंने अपने कौशल से अनेक अद्भुत नगरों और महलों की रचना की। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र और भगवान शिव के लिए त्रिशूल जैसे दिव्य अस्त्रों का निर्माण किया। इंद्र के वज्र को भी उनकी दिव्य शिल्पकला से जोड़ा जाता है।</p><p>श्रीराम से संबंधित परंपराओं में स्वर्णमयी लंका के निर्माण का संबंध भी भगवान विश्वकर्मा से माना जाता है। कहा जाता है कि यह भव्य नगरी मूल रूप से कुबेर के लिए निर्मित की गई थी और बाद में रावण ने उस पर अधिकार कर लिया। इसी प्रकार श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी के निर्माण से भी भगवान विश्वकर्मा का संबंध बताया जाता है। समुद्र तट पर स्थित इस दिव्य नगरी को अपनी अद्भुत वास्तुकला और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध माना गया। इन कथाओं के माध्यम से भगवान विश्वकर्मा की सृजनात्मक शक्ति, तकनीकी दक्षता और निर्माण कौशल का महत्व सामने आता है। यही कारण है कि शिल्प, वास्तुकला और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोग भगवान विश्वकर्मा को अपना आराध्य मानते हैं।</p><h2>विश्वकर्मा पूजा का संदेश</h2><p>विश्वकर्मा पूजा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह परिश्रम, कौशल और सृजनशीलता के सम्मान का भी अवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है कि किसी भी निर्माण, उद्योग या तकनीकी उपलब्धि के पीछे मानव की मेहनत, ज्ञान और कौशल का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह दिन हमें अपने औजारों, मशीनों और कार्यस्थल के प्रति जिम्मेदार बनने की प्रेरणा भी देता है। कार्यस्थल की स्वच्छता, उपकरणों की उचित देखभाल और सुरक्षित ढंग से कार्य करना इस पर्व के संदेश को आधुनिक जीवन से जोड़ता है।</p><p>इस प्रकार, विश्वकर्मा पूजा सृजन, तकनीकी ज्ञान, श्रम और कौशल के सम्मान का पावन पर्व है। भगवान विश्वकर्मा को दिव्य वास्तुकार और शिल्पकार के रूप में स्मरण करते हुए श्रद्धालु अपने कार्य और कार्य में उपयोग होने वाले उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वर्ष 2026 में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस अवसर पर घरों, दुकानों, कारखानों, कार्यालयों और कार्यशालाओं में भगवान विश्वकर्मा की पूजा कर सुख, समृद्धि, कार्य में सफलता और उन्नति की कामना की जाएगी।</p><p>- शुभा दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 17 Sep 2026 12:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/vishwakarma-puja-2026-date-significance-rituals-and-legend</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishwakarma Jayanti 2026: सृष्टि के पहले इंजीनियर माने जाते है भगवान विश्वकर्मा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishwakarma-is-considered-the-first-engineer-of-the-universe]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>विश्वकर्मा पूजा भारत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। इस दिन देश भर में स्थित कारखानों, कार्यशालाओं और विभिन्न कार्यस्थलों पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। ताकि श्रम और कौशल का सम्मान किया जा सके और आने वाले वर्ष के लिए आशीर्वाद प्राप्त हो सके। हर साल विश्वकर्मा पूजा कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। &nbsp;इसलिए इसे विश्वकर्मा जयंती भी कहते हैं।</p><p>विश्वकर्मा पूजा एक ऐसा त्योहार है जहां शिल्पकार, कारीगर, श्रमिक भगवान विश्वकर्मा का त्योंहार मनाते हैं। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा के पुत्र विश्वकर्मा ने पूरे ब्रह्मांड का निर्माण किया था। विश्वकर्मा को देवताओं के महलों का वास्तुकार भी कहा जाता है। विश्वकर्मा दो शब्दों विश्व (संसार या ब्रह्मांड) और कर्म (निर्माता) से मिलकर बना है। इसलिए विश्वकर्मा शब्द का अर्थ है दुनिया का निर्माण करने वाला। &nbsp;भगवान विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। हिंदू धर्म में इन्हें सृष्टि के दिव्य शिल्पकार, देवताओं के वास्तु विशेषज्ञ और पहले इंजीनियर के रूप में पूजा जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/vishwakarma-jayanti-date-shubh-muhurat-puja-vidhi-and-significance" target="_blank" rel="noopener">Vishwakarma Jayanti पर अष्टदल रंगोली और सात अनाजों से करें मशीनों व औजारों की पूजा</a></p><p>विश्वकर्मा रचनात्मकता, तकनीकी कौशल और नवाचार के प्रतीक हैं। उनके सम्मान में भाद्रपद मास की सूर्यकन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है। यह वह दिन है जब सूर्य सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करता है। इस दिन मजदूर, कारीगर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट और उद्योगपति अपने औजारों और मशीनों की पूजा करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चार युगों में विश्वकर्मा जी ने कई नगर और भवनों का निर्माण किया था।</p><p>विश्वकर्मा शिल्पशास्त्र के आविष्कारक और सर्वश्रेठ ज्ञाता माने जाते हैं। जिन्होने विश्व के प्राचीनतम तकनीकी ग्रंथों की रचना की थी। इन ग्रंथों में न केवल भवन वास्तु विद्या, रथ आदि वाहनों के निर्माण बल्कि विभिन्न रत्नों के प्रभाव व उपयोग आदि का भी विवरण है। माना जाता है कि उन्होनें ही देवताओं के विमानों की रचना की थी। भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति ऋग्वेद में हुई है। जिसमें उन्हें ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान विष्णु और शिवलिंग की नाभि से उत्पन्न भगवान ब्रह्मा की अवधारणाएं विश्वकर्मण सूक्त पर आधारित हैं।<br>विश्वकर्मा प्रकाश को वास्तुतंत्र का अपूर्व ग्रंथ माना जाता है। इसमें अनुपम वास्तुविद्या को गणितीय सूत्रों के आधार पर प्रमाणित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि सभी पौराणिक संरचनाए भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हैं। भगवान विश्वाकर्मा के जन्म को देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से माना जाता है। पौराणिक युग के अस्त्र और शस्त्र भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही निर्मित हैं।</p><p>विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी का वंशज माना गया है। ब्रह्माजी के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तु देव थे। जिन्हें शिल्पशास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तु देव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। अपने पिता के पद चिन्हों परचलते हुए विश्वकर्मा भी वास्तुकला के महान आचार्य बने। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ इनके पुत्र हैं। इन पांचों पुत्रों को वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ मानाजाता है।</p><p>विश्वकर्मा वैदिक देवता के रूप में सर्वमान्य हैं। इनको गृहस्थ आश्रम के लिए आवश्यक सुविधाओं का निर्माता और प्रवर्तक भी कहा गया है। अपने विशिष्ट ज्ञान-विज्ञान के कारण देवशिल्पी विश्वकर्मा मानव समुदाय ही नहीं वरन देवगणों द्वारा भी पूजित हैं। देवता, नर, असुर, यक्ष और गंधर्व सभी में उनके प्रति सम्मान का भाव है। भगवान विश्वकर्मा के पूजन- अर्चना किये बिना कोई भी तकनीकी कार्य शुभ नहीं माना जाता। इसी कारण विभिन्न कार्यो में प्रयुक्त होनेवाले औजारों, कल-कारखानों और विभिन्न उद्योगों में लगी मशीनों का पूजन विश्वकर्मा जयंती पर किया जाता है।</p><p>पौराणिक साक्ष्यों के मुताबिक स्वर्ग लोक की इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, असुर राजरावण की स्वर्णनगरी लंका, भगवान श्रीकृष्णकी समुद्र नगरी द्वारिका और पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर के निर्माण का श्रेय भी विश्वकर्मा को ही जाता है। पौराणिक कथाओं में इन उत्कृष्ट नगरियों के निर्माण के रोचक विवरण मिलते हैं। उड़ीसा का विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर तो विश्वकर्मा के शिल्प कौशल का अप्रतिम उदाहरण माना जाता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जगन्नाथ मंदिर की अनुपम शिल्प रचना से खुश होकर भगवान विष्णु ने उन्हे शिल्पावतार के रूप में सम्मानित किया था।</p><p>महाभारत में पांडव जहां रहते थे उस स्थान को इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था। इसका निर्माण भी विश्ववकर्मा ने किया था। कौरव वंश के हस्तिनापुर और भगवान कृष्ण के द्वारका का निर्माण भी विश्वणकर्मा ने ही किया था। सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेतायुग की लंका, द्वापर की द्वारिका और कलयुग के हस्तिनापुर आदि के रचयिता विश्वकर्मा जी की पूजा अत्यन्त शुभकारी है। सृष्टि के प्रथम सूत्रधार, शिल्पकार और विश्व के पहले तकनीकी ग्रन्थ के रचयिता भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं की रक्षा के लिये अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया था।<br>विष्णु को चक्र, शिव के त्रिशूल, इंद्र को वज्र, हनुमान को गदा और कुबेर को पुष्पक विमान विश्वकर्मा ने ही प्रदान किये थे। सीता स्वयंवर में जिस धनुष को श्रीराम ने तोड़ा था वह भी विश्वकर्मा के हाथों बना था। जिस रथ पर निर्भर रहकर श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन संसार को भस्म करने की शक्ति रखते थे उसके निर्माता विश्वकर्मा ही थे। पार्वती के विवाह के लिए जो मण्डप और वेदी बनाई गई थी वह भी विश्वकर्मा ने ही तैयार की थी।</p><p>माना जाता है कि विश्वकर्मा ने ही लंका का निर्माण किया था। इसके पीछे कहानी है कि शिव ने माता पार्वती के लिए एक महल का निर्माण करने के लिए भगवान विश्वकर्मा को कहा तो विश्वकर्मा ने सोने का महल बना दिया। इस महल के पूजन के दौरान भगवानशिव ने राजा रावण को आंमत्रित किया। रावण महल को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और जब भगवानशिव ने उससे दक्षिणा में कुछ देने को कहा तथा उसने महल ही मांगलिया। भगवान शिव ने उसे महल देकर वापस पर्वतों पर चले गए। विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए उड़ने वाले रथों का निर्माण किया था। विश्वकर्मा ने देवताओं के राजा इंद्र का हथियार वज्र का निर्माण किया था। वज्र को ऋषि दधीचि और अज्ञेयस्त्र की हड्डियों से बनाया गया है। भगवान विष्ण का सुदर्शन चक्र उनकी शक्तिशाली रचनाओं में से एक था।</p><p>विश्वकर्मा जयंती का औद्योगिक जगत और भारतीय कलाकारों, मजदूरो, इंजीनियर्स आदि के लिए खास महत्व है। विश्वकर्मा जयन्ती भारत के जम्मू कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, हरयाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, त्रिपुरा, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में मनायी जाती है। नेपाल में भी विश्वकर्मा पूजा को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। विश्वकर्मा के पूजन और उनके बताये वास्तुशास्त्र के नियमों का अनुपालन कर बनवाये गये मकान और दुकान शुभ फल देने वाले माने जाते हैं। इनमें कोई वास्तुदोष नहीं माना जाता।</p><p>औद्योगिक श्रमिकों द्धारा इस दिन बेहतर भविष्य, सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों और अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए प्रार्थना की जाती हैं। विश्वकर्मा जयन्ती के दिन देश के कई हिस्सों में काम बंद रखा जाता है और खूब पंतगबाजी की जाती है। विभिन्न प्रदेशों की सरकार विश्वकर्मा जयन्ती पर अपने कर्मचारियों को सावेतनिक अवकाश प्रदान करती है। यह त्योहार मुख्य रूप से दुकानों, कारखानों और उद्योगों द्वारा मनाया जाता है। इस अवसर पर, कारखानों और औद्योगिक क्षेत्रों के श्रमिक अपने औजारों की पूजा करते हैं।&nbsp;<br>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना प्रारम्भ की थी। जिसमें अपने हाथों और औजारों से काम करने वाले कारीगरों और शिल्पकारों को संपूर्ण सहायता प्रदान की जाती है। इस योजना में 18 व्यवसायों में लगे कारीगर और शिल्पकार शामिल हैं। पीएम विश्वकर्मा योजना में पीएम विश्वकर्मा प्रमाणपत्र और पहचान पत्र के माध्यम से मान्यता, कौशल सत्यापन के माध्यम से कौशल उन्नयन, बुनियादी कौशल, उन्नत कौशल प्रशिक्षण, उद्यमशीलता ज्ञान, 15,000 रुपये तक के टूलकिट प्रोत्साहन, तीन लाख रुपये तक की ऋण सहायता दी जाती है।</p><p>- रमेश सर्राफ धमोरा<br>(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 17 Sep 2026 11:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishwakarma-is-considered-the-first-engineer-of-the-universe</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kanya Sankranti पर सूर्य पूजा और तर्पण से दूर होगा कालसर्प दोष, पितरों का मिलेगा आशीर्वाद]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/surya-dev-enters-virgo-on-kanya-sankranti-creating-sarvartha-siddhi-yoga]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>जब सूर्य देव एक राशि से निकलकर दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उसको संक्रांति कहा जाता है। आज सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर कर रहे हैं। इस दौरान कन्या संक्रांति होगी। आज यानी की 17 सितंबर 2026 को कन्या संक्राति का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन दान-पुण्य और पितरों का जल से तर्पण किया जाता है। तो आइए जानते हैं कि कन्या संक्रांति की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और उपायों आदि के बारे में...</p><h2>शुभ मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 17 सितंबर 2026 को कन्या संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन सुबह 07:58 मिनट पर कन्या राशि में सूर्य देव ने प्रवेश किया है। वहीं इस दिन रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। आज महापुण्य काल 02:03 मिनट का होगा। महापुण्य काल सुबह 07:58 मिनट से लेकर सुबह 10:01 मिनट तक रहेगा।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह संभव हो, तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें। अगर नदी में स्नान करना संभव नहीं है, तो जल में थोड़ा सा गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद व्रत और दान का संकल्प लें। फिर तांबे के लोटे में जल, रोली, लाल फूल, तिल, चंदन और थोड़ा गुड़ मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य दें। इस दौरान 'ऊँ सूर्याय नम:' मंत्र का जाप करें। इसके बाद श्रद्धा और क्षमता अनुसार गरीबों और जरूरतमंदों को दाल, आटा, चावल, तिल के लड्डू और खिचड़ी आदि का दान करें। फिर शाम को किसी पवित्र नदी या जलाशय में दीप दान करें।</p><h2>महत्व</h2><p>बता दें कि कन्या संक्रांति का पर्व हिंदू सौर पंचांग के छठे महीने की शुरूआत का प्रतीक है। कालसर्प दोष और पितृ दोष निवारण के लिए और यह दिन पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और पंचबलि कर्म के लिए शुभ और पवित्र माना जाता है। इससे कालसर्प दोष और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 17 Sep 2026 10:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/surya-dev-enters-virgo-on-kanya-sankranti-creating-sarvartha-siddhi-yoga</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishwakarma Jayanti पर अष्टदल रंगोली और सात अनाजों से करें मशीनों व औजारों की पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/vishwakarma-jayanti-date-shubh-muhurat-puja-vidhi-and-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को वास्तुकला, निर्माण, शिल्प और तकनीकी कौशल से जुड़ा देवता माना जाता है। इस पर्व का विशेष महत्व होता है। खासतौर पर यह पर्व इंजीनियरों, कारीगरों, फैक्ट्री कर्मचारियों, मेकैनिक, व्यापारियों, बिल्डरों और मशीनों व उपकरणों के साथ काम करने वाले लोगों के लिए अहम होता है। इस बार आज यानी की 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती मनाई जा रही है। इस दिन लोग मशीनों और औजारों की पूजा करते हैं और भगवान विश्वक्रमा से काम में सफलता, तरक्की और सुरक्षा आदि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं विश्वकर्मा जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>इस बार 17 सितंबर 2026 को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी। यह पर्व कन्या संक्रांति के दिन मनाया जाता है, जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर करेंगे। इस बार कन्या संक्रांति का समय सुबह करीब 07:58 मिनट माना गया है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। इसके बाद ऑफिस, कार्यस्थल, कारखाने, मशीने और औजारों को अच्छे से साफ कर लें। फिर चारों ओर गंगाजल से छिड़काव करे। अब अष्टदल रंगोली बनाएं और उस पर सात तरह के अनाजों को रखें। फिर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा को स्थापित करें और मशीनों व उपकरणों पर फूल, तिलक और कलावा आदि अर्पित करें। अब धूप-दीप जलाकर पूजा करें और अंत में भगवान विश्वकर्मा की आरती करें।</p><h2>महत्व</h2><p>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के दिव्य निर्माणकर्ता के रूप में जाना जाता है। भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए कई भव्य और दिव्य भवनों और नगरों का निर्माण किया है। इस कारण भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, सृजन और शिल्पकला का देवता माना जाता है।</p><h2>मंत्र</h2><p>ॐ विश्वकर्मणे नमः</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 17 Sep 2026 09:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/vishwakarma-jayanti-date-shubh-muhurat-puja-vidhi-and-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Baldev Chhath 2026: शेषनाग अवतार भगवान बलराम की पूजा से मिलता है सुख-समृद्धि का फल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-balarama-incarnation-of-sheshnag-worshipped-on-baldev-chhath]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 16 सितंबर 2026 को बड़े भाई बलराम जयंती का पर्व मनाया जा रहा है। हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी की जयंती मनाई जाती है। इसको बलदेव छठ और बलभद्र जयंती के नाम से भी जाना जाता है। भगवान बलराम को शेषनाग का अवतार माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान बलराम की पूजा-अर्चना करने से जीवन में खुशहाली का आगमन होता है। तो आइए जानते हैं बलराम जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि की शुरूआत 16 सितंबर 2026 को सुबह 08:59 मिनट पर हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 17 सितंबर 2026 की सुबह 10:47 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के आधार पर 16 सितंबर 2026 को यह व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और मंदिर की साफ-सफाई करें। मंदिर में गंगाजल छिड़कर पवित्र करें और एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान बलराम की प्रतिमा को स्थापित करें। अब हाथ में जल लेकर पूजा और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान बलराम को अक्षत, पु्ष्प, चंदन और दूध आदि अर्पित करें। फिर फल और मिठाइयों का भोग लगाएं। इसके बाद धूप-दीप जलाकर भगवान बलराम का ध्यान करें और अंत में आरती करें। वहीं पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें। फिर परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद बांटें।</p><h2>महत्व</h2><p>बता दें कि कई जगहों पर बलराम जयंती के मौके पर भगवान बलराम की पूजा के साथ-साथ हल की पूजा भी की जाती है। भगवान बलराम हल और मूसल धारण किए हैं, जिस कारण उनको हलधारी भी कहा जाता है। वहीं हल का संबंध खेती-किसानी से होता है। इसलिए इस दिन किसान हल की पूजा करके अच्छी फसल, खेतों की उर्वरता और कृषि में समृद्धि की कामना करते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 16 Sep 2026 10:24:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-balarama-incarnation-of-sheshnag-worshipped-on-baldev-chhath</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rishi Panchami पर सप्तऋषियों और देवी अरुंधती की पूजा, 15 सितंबर को बना शुभ संयोग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/rishi-panchami-date-auspicious-muhurat-and-sacred-worship-rituals]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व हरतालिका तीज के दो दिन बाद और गणेश चतु्र्थी के अगले दिन मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 15 सितंबर 2026 को ऋषि पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन सप्तऋषियों और देवी अरुंधती की पूजा करने की परंपरा है। मान्यता के मुताबिक ऋषि पंचमी का व्रत आत्मशुद्धि और जाने-अनजाने हुए दोषों के प्रायश्चित से जुड़ा है। तो आइए जानते हैं ऋषि पंचमी की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरूआत सुबह 07:44 मिनट से शुरू हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 16 सितंबर 2026 की सुबह 08:59 पर होगा। वहीं आज पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 10:50 मिनट से दोपहर 01:18 बजे तक रहेगा।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और व्रत का संकल्प लें। फिर पूजा स्थल को साफ करें और हल्दी-रोली से पूजा का मंडप बनाएं। फिर कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ इन सप्त ऋषियों के साथ देवी अरुंधती की स्थापना करें। फिर उनको अक्षत, पुष्प, गंध, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें और पूजा करें। इस व्रत में हल से जोती गई भूमि में उगने वाले अनाज का सेवन नहीं किया जाता है। इसकी जगह पर समां के चावल और शाकाहारी आहार खाने की परंपरा है।</p><h2>धार्मिक महत्व</h2><p>ऋषि पंचमी का पर्व सप्तऋषियों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का अवसर है। मान्यताओं के मुताबिक महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुए धार्मिक नियमों के उल्लंघन के प्रायश्चित करने के लिए यह व्रत किया जाता है। वहीं इस दिन व्रत रखने और सप्तऋषियों की पूजा-अर्चना करने और कथा सुनने से मन की शुद्धि होती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 10:37:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/rishi-panchami-date-auspicious-muhurat-and-sacred-worship-rituals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[भगवान गणेश: मंगल, समृद्धि और विकसित भारत के प्रेरणास्रोत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-ganesha-a-source-of-inspiration-for-auspiciousness-prosperity-and-a-developed-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान श्री गणेश भारतीय संस्कृति के ऐसे बहुआयामी एवं सर्वस्वीकार्य देवता हैं, जिनका स्मरण किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में किया जाता है। वे केवल विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता के रूप में पूजित नहीं हैं, बल्कि उनका संपूर्ण व्यक्तित्व ज्ञान, विवेक, दूरदर्शिता, नेतृत्व, धैर्य, आत्मसंयम, संवाद, समावेशिता और कर्मशीलता का अद्भुत संदेश देता है। आज जब भारत विकसित भारत 2047 के संकल्प के साथ आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, सामाजिक समरसता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब गणेशजी के प्रतीकात्मक व्यक्तित्व को केवल पूजा तक सीमित रखने के बजाय उनके जीवन-संदेश को राष्ट्रीय चरित्र और विकास-दृष्टि का आधार बनाना समय की बड़ी आवश्यकता है। गणेश चतुर्थी केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा का पर्व बन सकती है।</div><div><br></div><div>गणेशजी का सबसे बड़ा संदेश है—शुभारंभ करो, लेकिन विवेक के साथ। किसी भी कार्य के पहले गणेशजी का स्मरण इस बात का प्रतीक है कि सफलता केवल गति से नहीं, सही दिशा से मिलती है। विकसित भारत का निर्माण भी केवल बड़े आर्थिक आंकड़ों, आधुनिक शहरों, नई तकनीक और विशाल परियोजनाओं से नहीं होगा। इसके लिए ऐसी विकास-दृष्टि चाहिए जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ मानवीय संवेदना, नैतिकता, पर्यावरण-संतुलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक न्याय का समन्वय हो। गणेशजी का स्मरण हमें बताता है कि विकास का पहला कदम बाहर नहीं, भीतर उठता है—विचारों की शुद्धता और संकल्प की दृढ़ता से।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/women-observe-the-hartalika-teej-fast-for-the-blessing-of-unbroken-marital-bliss" target="_blank">Hartalika Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं करती हैं हरितालिका तीज व्रत</a></h3><div>गणेशजी का गजमुख उनकी सबसे विशिष्ट पहचान है। हाथी भारतीय मानस में बुद्धि, स्मृति, धैर्य और शक्ति का प्रतीक रहा है। बड़ा मस्तक हमें बड़ा सोचने की प्रेरणा देता है। आज भारत को भी सीमित सोच से बाहर निकलकर वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप दीर्घकालीन और व्यापक दृष्टि विकसित करनी होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित ऊर्जा, जैव-प्रौद्योगिकी और नई औद्योगिक क्रांति के युग में वही राष्ट्र आगे बढ़ेगा जो ज्ञान को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बनाएगा। गणेशजी का मस्तक मानो संदेश देता है—ज्ञान जितना व्यापक होगा, विकास उतना ही दूरगामी होगा।</div><div><br></div><div>उनके बड़े कान लोकतांत्रिक नेतृत्व की अनूठी सीख देते हैं। अच्छा नेतृत्व वह नहीं जो केवल बोलता है, बल्कि वह है जो सुनता है। जनता की आकांक्षाओं, युवाओं के सपनों, किसानों की समस्याओं, श्रमिकों की चुनौतियों, महिलाओं की अपेक्षाओं और वंचित वर्गों की आवाज को सुनना ही संवेदनशील शासन की पहचान है। भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बने, इसके लिए विकास का मॉडल जनभागीदारी पर आधारित होना चाहिए। गणेशजी के बड़े कान हमें सिखाते हैं कि जनता की आवाज सुनना ही सुशासन की पहली शर्त है।</div><div><br></div><div>उनकी छोटी आंखें एकाग्रता और सूक्ष्म दृष्टि का प्रतीक मानी जाती हैं। आज सूचना और विकल्पों की अधिकता के दौर में ध्यान भटकना आसान है। राष्ट्र के सामने भी अनेक चुनौतियां हैं। इसलिए लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए और ऊर्जा अनावश्यक विवादों में नहीं, राष्ट्र के निर्माण में लगनी चाहिए। विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब व्यक्ति से लेकर शासन तक प्राथमिकताओं की स्पष्टता, कार्य में एकाग्रता और परिणाम के प्रति प्रतिबद्धता हो।</div><div><br></div><div>गणेशजी की सूंड अत्यंत संवेदनशील होने के साथ शक्तिशाली भी है। वह सूक्ष्म वस्तु को भी संभाल सकती है और भारी कार्य भी कर सकती है। यह क्षमता हमें परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की प्रेरणा देती है। आज के भारत को भी यही लचीलापन चाहिए। तकनीक बदल रही है, रोजगार के स्वरूप बदल रहे हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था बदल रही है और पर्यावरणीय चुनौतियां बढ़ रही हैं। जो समाज परिवर्तन को समझकर अपनी क्षमता विकसित करेगा, वही भविष्य का नेतृत्व करेगा।</div><div><br></div><div>गणेशजी का लंबोदर भी गहरा जीवन-संदेश देता है। इसे विशाल हृदय, सहनशीलता और जीवन की विविधताओं को आत्मसात करने की क्षमता का प्रतीक माना जा सकता है। राष्ट्रनिर्माण में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मनभेद विनाशकारी हो सकते हैं। भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। भाषा, संस्कृति, परंपरा, विचार और जीवन-पद्धति की विविधता को संघर्ष का कारण नहीं, राष्ट्रीय शक्ति का आधार बनाना होगा। गणेशजी का व्यक्तित्व हमें समावेशी भारत की प्रेरणा देता है—ऐसा भारत जिसमें विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और कोई स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग महसूस न करे।</div><div><br></div><div>गणेशजी का वाहन मूषक भी अत्यंत अर्थपूर्ण प्रतीक है। विशालकाय गजानन का वाहन एक छोटा-सा मूषक है। यह मानो अहंकार पर नियंत्रण और छोटे से छोटे तत्व के महत्व को स्वीकार करने का संदेश देता है। आधुनिक भारत में बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और बड़ी परियोजनाओं के साथ छोटे उद्यमी, कारीगर, किसान, स्टार्टअप, स्थानीय व्यवसाय और सामान्य नागरिक भी विकास की धुरी हैं। विकसित भारत का अर्थ केवल बड़े भारत से नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को अवसर देने वाले भारत से है।</div><div><br></div><div>गणेशजी की चार भुजाएं कर्म, ज्ञान, विवेक और संतुलन के समन्वय का संदेश देती हैं। आज भारत को ज्ञान और कौशल से संपन्न युवा चाहिए, उद्यमशील नागरिक चाहिए और ऐसे संस्थान चाहिए जो नवाचार को प्रोत्साहित करें। केवल डिग्री नहीं, उपयोगी ज्ञान; केवल नौकरी नहीं, रोजगार सृजन; केवल उपभोग नहीं, उत्पादन—यही विकसित भारत की आधारभूमि बन सकती है।</div><div><br></div><div>गणेशजी को विघ्नहर्ता कहा जाता है, लेकिन विघ्नों को समाप्त करने का वास्तविक अर्थ समस्याओं से पलायन नहीं, बल्कि उनका साहसपूर्वक सामना करना है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, प्रदूषण और अंधविश्वास जैसे राष्ट्रीय विघ्न केवल कानूनों से नहीं, सामूहिक चेतना और नागरिक जिम्मेदारी से दूर होंगे। गणेशजी का साहस हमें बताता है कि कठिनाई जितनी बड़ी हो, संकल्प उससे बड़ा होना चाहिए।</div><div><br></div><div>ऋद्धि और सिद्धि का गणेशजी से जुड़ाव भी विकास की व्यापक अवधारणा को स्पष्ट करता है। केवल धन-संपदा ऋद्धि नहीं और केवल उपलब्धि सिद्धि नहीं; दोनों का संतुलन आवश्यक है। भारत की आर्थिक समृद्धि के साथ ज्ञान, संस्कार, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की सिद्धि भी होनी चाहिए। तभी समृद्धि स्थायी और सार्थक बनेगी। शुभ और लाभ का संदेश भी यही है कि उपलब्धि तभी शुभ है जब वह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के व्यापक हित में हो।</div><div><br></div><div>गणेशजी को प्रथम पूज्य और बुद्धि के देवता के रूप में स्मरण करने की भारतीय परंपरा आज के भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। जब देश 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब आवश्यकता केवल सरकारों के प्रयासों की नहीं, बल्कि विकसित सोच वाले नागरिकों की है। प्रत्येक भारतीय अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदारी, उत्कृष्टता, नवाचार, अनुशासन और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दे, तो विकास का लक्ष्य जनआंदोलन बन सकता है।</div><div><br></div><div>गणेश चतुर्थी इसलिए हमें केवल प्रतिमा स्थापित करने और उत्सव मनाने का अवसर न दे, बल्कि अपने भीतर गणेशत्व जगाने का संकल्प दे। बुद्धि में विशालता हो, दृष्टि में दूरदर्शिता हो, कानों में संवेदनशीलता हो, वाणी में मधुरता हो, कर्म में शक्ति हो, मन में धैर्य हो और व्यवहार में समावेशिता हो—यही गणेशजी की वास्तविक आराधना है। जब भारत का नागरिक अपने भीतर के विघ्नों—अज्ञान, आलस्य, अहंकार, स्वार्थ और संकीर्णता—पर विजय प्राप्त करेगा, तभी विकसित भारत का सपना साकार होगा।</div><div><br></div><div>भगवान गणेश का संदेश अंततः यही है कि मंगल बाहर से नहीं आता, उसे अपने विचार, व्यवहार और कर्म से निर्मित करना पड़ता है। यदि गणेशजी की बुद्धि, विवेक, धैर्य, साहस, श्रवणशीलता, आत्मसंयम और समावेशी दृष्टि को राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा बनाया जाए, तो भारत केवल आर्थिक रूप से विकसित राष्ट्र नहीं, बल्कि समृद्ध, संस्कारित, संवेदनशील, आत्मनिर्भर और विश्व को दिशा देने वाला आदर्श राष्ट्र बन सकता है। यही गणेश चतुर्थी की सबसे बड़ी राष्ट्रीय साधना और विकसित भारत 2047 के संकल्प की सार्थक परिणति होगी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 10:45:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-ganesha-a-source-of-inspiration-for-auspiciousness-prosperity-and-a-developed-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hartalika Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं करती हैं हरितालिका तीज व्रत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/women-observe-the-hartalika-teej-fast-for-the-blessing-of-unbroken-marital-bliss]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शिव-गौरी की पूजा करना विशेषकर सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए पति-पुत्र संतति एवं पौत्रादि सुखों को बढ़ाने वाला है। जिस परिवार की महिलाएँ श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत-त्योहारों का पालन करती हैं, उनके शुभ आचरण और संकल्प से परिवार की उन्नति होती है, हरतालिका तीज का व्रत शुभ ग्रहों को जागृत कर घर में सुख-समृद्धि का कारण बनता है। नियमपूर्वक हरतालिका तीज का व्रत-उपवास करने से सौभाग्य एवं ग्रहों की अनुकूलता जागृत होती है।</div><div><br></div><h2>जानें हरितालिका तीज व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>हरतालिका तीज भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना को समर्पित हिंदू धर्म का प्रमुख त्योहार है। यह पर्व हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। महिलाएं इस व्रत को वैवाहिक सुख, एक समर्पित पति, पति की लंबी उम्र के लिए करती हैं। यही नहीं अविवाहित महिलाएं भगवान शिव जैसे समर्पित और नेक पति पाने के लिए रखती भी यह व्रत रखती हैं। नारी का दृढ़ संकल्प पति के भाग्य को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। शिव-गौरी की पूजा करना विशेषकर सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए पति-पुत्र संतति एवं पौत्रादि सुखों को बढ़ाने वाला है। जिस परिवार की महिलाएं श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत-त्योहारों का पालन करती हैं, उनके शुभ आचरण और संकल्प से परिवार की उन्नति होती है, हरतालिका तीज का व्रत शुभ ग्रहों को जागृत कर घर में सुख-समृद्धि का कारण बनता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए सुहागिन महिलाएं इस वर्ष 14 सितंबर 2026, सोमवार को हरतालिका तीज व्रत रखेंगी। वहीं कुंवारी कन्याएं सुयोग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए विधि-विधान से यह व्रत करती हैं। हरतालिका तीज को कुछ जगहों पर तीजा व्रत भी कहा जाता है। यह व्रत हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस व्रत को भारतीय परंपराओं के कुछ कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित इस व्रत में 24 घंटे का निर्जला उपवास किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है। सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/when-bappa-birth-anniversary-falls-the-auspicious-timings-and-significance-of-the-puja-rituals" target="_blank">Ganesh Chaturthi Celebration: गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त और Vrat Katha, क्या है चंद्र दर्शन की मनाही?</a></h3><h2>हरतालिका तीज पर पूजा का मुहूर्त</h2><div>पंडितों के अनुसार हरतालिका तीज के दिन भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन पूजा के समय व्रत कथा का पाठ या श्रवण करना भी अत्यंत शुभ और लाभकारी माना गया है। हरतालिका तीज के दिन प्रात: काल पूजा का समय सुबह 06:05 बजे से सुबह 07:06 बजे तक रहेगा। हिंदू धर्म में भगवान शिव के पूजन के लिए प्रदोष काल सबसे उत्तम मुहूर्त माना गया है। इस दिन प्रदोष काल शाम 05:43 बजे से शाम 07:13 बजे तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>हरतालिका तीज व्रत के पारण का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>हरतालिका तीज व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के पश्चात करना सबसे उत्तम माना गया है। हालांकि तीज व्रत पारण के दिन भी भद्रा विद्यमान रहेगी। इसलिए व्रत पारण के लिए भद्रा समाप्त होने का इंतजार करना पड़ेगा। तीज व्रत का पारण 15 सितंबर 2026 को सुबह 07:44 बजे के बाद किया जा सकेगा।</div><div><br></div><h2>हरतालिका तीज व्रत से जुड़ी कथा भी है रोचक</h2><div>शास्त्रों में हरतालिका तीज व्रत से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने शिवजी से पूछा, ‘हे नाथ! कौन-सा व्रत ऐसा है जो स्त्री के लिए शीघ्र फलदायी हो और जिससे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हो?’ तब भगवान शिव ने कहा, ‘हे पार्वती! जिस व्रत को तुमने पहले जन्म में मेरे लिए किया था, वह हरितालिका तीज व्रत ही था, वही सबसे श्रेष्ठ है। इसे तुम पुनः करो और अन्य स्त्रियों को भी उपदेश दो, क्योंकि यह व्रत स्वयं आदिशक्ति द्वारा प्रतिपादित और मेरे द्वारा अनुमोदित है।’ हरतालिका व्रत से स्त्री को अगणित जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। हरितालिका तीज सौभाग्यवर्द्धक होने के साथ स्त्रियों की जन्मकुण्डली में वर्णित वैधव्ययोग का नाश करने वाला और संतान सुख प्रदान करने वाला होता है, स्त्रियों का सम्मान करने से शुक्र ग्रह बलवान होता है।</div><div><br></div><h2>इसलिए मनायी जाती है हरतालिका तीज&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने हिमालय पर बिना अन्न-जल हजारों वर्ष कठिन तप किया था। माता पार्वती के पिता हिमालय उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते थे। जब यह बात माता पार्वती को पता चली, तो उनकी सखियों ने उनका हरण कर लिया और उन्हें एक जंगल में छिपा दिया। संस्कृत में हरत का अर्थ हरण करने से है और आलिका का अर्थ सखी होता है। सखियों द्वारा हरण किए जाने के कारण ही इस पर्व का नाम हरतालिका तीज पड़ा।</div><div><br></div><h2>हरितालिका तीज व्रत से होती है दैवीय शक्तियां जागृत</h2><div>शास्त्रों के अनुसार यह व्रत स्त्री की आध्यात्मिक शक्ति को सक्रिय कर घर में सुख-शांति और समृद्धि का आधार बनता है। जिस घर की स्त्रियां धर्म, कर्म पूर्वक मर्यादित ढंग से आचरण करती हैं, वहां खुशियों का अम्बार लग जाता है। स्त्रियां इस दिन व्रत आदि के माध्यम से अपने भीतर की दैवीय शक्ति को जाग्रत करती है। जब नारी अन्तर्मन में शुभ संकल्प करती है, तो ब्रह्मांड भी उसकी शक्ति के आगे नतमस्तक हो जाता है। एक स्त्री के संकल्प में अपार शक्ति निहित है, वह यमराज से भी अपने पति के प्राणों की रक्षा करने में सक्षम है, बस इस कलिकाल में उस शक्ति को जागृत करने की आवश्यकता है।</div><div><br></div><h2>हरितालिका तीज व्रत के दिन प्रदोष काल में करें पूजा&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार व्रती महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखकर शाम को प्रदोष काल में पूजन-अर्चन करेंगी। इस दौरान मिट्टी से बने उमा-महेश्वर और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से पूजा होगी। व्रती माता पार्वती और शिव जी से परिवार की सुख-शांति व सौभाग्य की प्रार्थना करेंगी।</div><div><br></div><h2>जानें हरितालिका तीज व्रत पर्व पर पारण का शुभ समय</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महिलाएं हरितालिका तीज की व्रत कथा का श्रवण कर रात्रि जागरण करेंगी। इसके बाद अगले दिन 15 सितंबर की सुबह विधिपूर्वक व्रत का पारण किया जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 10:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/women-observe-the-hartalika-teej-fast-for-the-blessing-of-unbroken-marital-bliss</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ganesh Chaturthi Puja: कलश स्थापना, पंचामृत स्नान और मोदक भोग के साथ करें बप्पा की आराधना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganesh-chaturthi-2026-date-shubh-muhurat-and-ganpati-sthapana-vidhi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन से गणेश उत्सव शुरू होता है। इस बार आज यानी की 14 सितंबर 2026 को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दौरान बप्पा की स्थापना की जाती है और उनकी पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक बप्पा की पूजा करने से जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं। क्योंकि गणेश भगवान का एक नाम विघ्नहर्ता भी है। तो आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी कीतिथि, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के इस बार 14 सितंबर को 07:06 मिनट पर भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 15 सितंबर 2026 की सुबह 07:44 मिनट पर होगी। मान्यताओं के मुताबिक बप्पा का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था। ऐसे में गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है।</p><h2>गणपति स्थापना और पूजा मुहूर्त</h2><p>गणेश चतुर्थी पर पूजा का मुहूर्त सुबह 11:02 मिनट से लेकर दोपहर 01:31 मिनट तक रहेगा। इस दौरान आप गणपति बप्पा की विधि-विधान से स्थापना और पूजा कर सकते हैं। अगर इस दौरान पूजा नहीं कर पाते हैं, तो आप अभिजीत मुहूर्त में भी बप्पा की पूजा-अर्चना कर सकते हैं।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>पूजा शुरू करने से पहले भगवान गणेश का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद कलश की स्थापना करें और कलश में चावल, जल, सुपानी और एक सिक्का डालें। अब भगवान गणेश की प्रतिमा का पंचामृत से स्नान कराएं। फिर बप्पा को हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक करें। गणपति को दूर्वा जरूर अर्पित करें। वहीं भोग में लड्डू, मोदक और अन्य प्रसाद अर्पित करें। पूजा के अंत में आरती करें और 'ऊँ गणेशाय नम:' मंत्र का जाप करते रहें। पूजा खत्म होने के बाद सभी को प्रसाद बांटें।</p><h2>मंत्र</h2><p>वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।<br>निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 08:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganesh-chaturthi-2026-date-shubh-muhurat-and-ganpati-sthapana-vidhi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Teej 2026: अखंड सौभाग्य और सुयोग्य वर के लिए 14 सितंबर को रखा जा रहा Hartalika Teej का निर्जला व्रत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/hartalika-teej-date-puja-muhurat-and-traditional-worship-rituals]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत किया जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत करती हैं और विधि-विधान से शिव परिवार की पूजा-अर्चना करती हैं। यह हिंदू धर्म के सबसे कठिन व्रत में से एक माना जाता है। क्योंकि इस व्रत में 23 घंटे बिना कुछ खाए-पिए रहा जाता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की मिट्टी से बनी मूर्ति की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि मां पार्वती ने महादेव को पति के रूप में पाने के लिए बालू और शुद्ध मिट्टी से शिवलिंग बनाकर कठोर तपस्या की थी। तो आइए जानते हैं हरतालिका तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और धार्मिक मान्यता के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 13 सितंबर को सुबह 7 बजकर 08 मिनट से होगी, जो 14 सितंबर 2026 को सुबह 7 बजकर 06 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर 2026 को ही रखा जाएगा। हरतालिका तीज की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 05 मिनट से लेकर सुबह 7 बजकर 06 मिनट तक रहेगा।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर हाथों में फूल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें और पूरा दिन निर्जला व्रत करें। अब विधि-विधान से भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा हैं। इसक बाद शाम को प्रदोष काल के लिए पूजा की तैयारी कर लें। मां पार्वती और भगवान शिव की मिट्टी मूर्ति को बनाने के लिए केला और आम के पत्तों से चौकी को सजाएं। वहीं प्रदोष काल के दौरान भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा शुरू करें। चौकी पर भगवान शिव और मां पार्वती की मूर्ति स्थापित करें और जल से आचमन करके पूजा शुरू करें।</p><p>मां पार्वती को फूल, माला, सिंदूर, कुमकुम और सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। अब भोलेनाथ को बेलपत्र, धतूरा, सफेद चंदन, धतूरे का फूल, फूल, माला, धोती और अंगोछा आदि अर्पित करें। फिर शिव-पार्वती को भोग लगाएं और जल अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर हरतालिका व्रत कथा का पाठ करें और पूजा के अंत में आरती करें। रात भर जागरण करें और अगले दिन सुबह पूजा-पाठ करके व्रत का पारण करें। वहीं मिट्टी की शिव-पार्वती की प्रतिमा को जल में प्रवाहित कर दें।</p><h2>धार्मिक मान्यता</h2><p>हरतालिका तीज व्रत को तपस्या और निष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं। वहीं कुंवारी लड़कियां मनचाहे और सुयोग्य वर की कामना से यह व्रत करती हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 07:32:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/hartalika-teej-date-puja-muhurat-and-traditional-worship-rituals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Varaha Jayanti पर पंचामृत से करें श्रीहरि का अभिषेक, 13 सितंबर को बन रहा पूजा का शुभ संयोग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-incarnation-varaha-jayanti-puja-rituals-and-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भगवान विष्णु की पूजा सृष्टि के पालनहार के रूप में की जाती है। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और सृष्टि का संतुलन बिगड़ता है, तब-तब भगवान विष्णु अलग-अलग रूपों में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। भगवान विष्णु के इन्हीं अवतारों में वराह अवतार है। भगवान विष्णु ने समुद्र में डूबी पृथ्वी को बाहर निकालने के लिए और असुर हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह अवतार लिया था। इस बार 13 सितंबर 2026 को वराह जयंती मनाई जा रही है। भगवान श्रीहरि के इस स्वरूप में साहस, शक्ति और संरक्षण का संगम देखने को मिलता है। तो आइए जानते हैं वराह जंयती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और पौराणिक कथा के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 13 सितंबर 2026 की सुबह 07:08 मिनट पर हो रहा है। वहीं अगले दिन यानी की 14 सितंबर 2026 की सुबह 07:08 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं उदयातिथि के आधार पर 13 सितंबर 2026 को वराह जयंती मनाई जा रही है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर व्रत और पूजा का संकल्प लें। अब सू्र्य देव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की प्रतिमा को पूजा स्थान पर स्थापित करें। इसके बाद जल से भरा कलश रखें और भगवान श्रीहरि के वराह स्वरूप का पंचामृत से अभिषेक करें। भगवान वराह को पीले फूल, फल और पीले वस्त्र आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर श्रीहरि की आरती करें। पूजा के दौरान 'ॐ वाराहाय नमः' मंत्र का जाप करें। पूजा के अंत में श्रीहरि विष्णु से परिवार की सुख-शांति व समृद्धि के लिए कामना करें।</p><h2>पौराणिक कथा</h2><p>धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक हिरण्याक्ष नामक एक शक्तिशाली असुर तीनों लोकों में आतंक मचाने लगा। उसके अत्याचार से देवता, ऋषि-मुनि और अन्य प्राणी परेशान थे। वहीं हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र के गहरे जल में ले जाकर छिपा दिया। पृथ्वी के जल में समा जाने से सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा और चारों तरफ संकट पैदा होने लगा। तब पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया और वह गहरे समुद्र में उतरे। भगवान वराह ने अपने दांतों पर पृथ्वी को उठाया और जल से बाहर ले आए।</p><p>फिर हिरण्याक्ष के लिए भगवान विष्णु का भयंकर युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को उसके आतंक से मुक्त कराया। इस कारण से भगवान विष्णु के वराह अवतार को उन रूपों में गिना जाता है, जिन्होंने सृष्टि की रक्षा और अधर्म का विनाश किया।</p><h2>धार्मिक महत्व</h2><p>वराह जयंती श्रीहरि विष्णु की शक्ति और उनके रक्षक स्वरूप की याद दिलाने वाला पर्व है। जो भी व्यक्ति इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान वराह की पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन में आने वाले सभी दोष और परेशानियां दूर होती हैं और व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sun, 13 Sep 2026 08:45:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-incarnation-varaha-jayanti-puja-rituals-and-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ganesh Chaturthi Celebration: गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त और Vrat Katha, क्या है चंद्र दर्शन की मनाही?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/when-bappa-birth-anniversary-falls-the-auspicious-timings-and-significance-of-the-puja-rituals]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सनातन धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य, पूजा, यज्ञ या नए कार्य के आरंभ से पहले भगवान गणेश का स्मरण और पूजन करने की परंपरा है। वे बुद्धि, विवेक, शुभारंभ और विघ्नों को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजनीय हैं। गणेश चतुर्थी भगवान श्रीगणेश के जन्मोत्सव का पावन पर्व है, जिसे पूरे भारत में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित की जाती है, पूजा-अर्चना होती है और भजन-कीर्तन के साथ उत्सव मनाया जाता है।</div><div><br></div><h2>गणेश चतुर्थी 2026 की तिथि</h2><div>वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी सोमवार, 14 सितंबर को मनाई जाएगी। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की स्थापना और पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। हालांकि, पूजा का सटीक शुभ मुहूर्त स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने शहर या क्षेत्र के पंचांग के अनुसार पूजा का समय निर्धारित करना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/hartalika-teej-2026-date-significance-worship-rituals-and-fasting-legend" target="_blank">Hartalika Teej 2026: तिथि, महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा</a></h3><h2>गणेश चतुर्थी का महत्व</h2><div>भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी नए कार्य को आरंभ करने से पहले उनका स्मरण करने की परंपरा है, ताकि कार्य में आने वाली बाधाएं दूर हों और सफलता प्राप्त हो। गणेश उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी पर्व है। सार्वजनिक गणेशोत्सव के माध्यम से लोग एक साथ आते हैं, पूजा करते हैं और विभिन्न सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।</div><div><br></div><h2>गणेश चतुर्थी की पूजन विधि</h2><div>गणेश चतुर्थी के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर और पूजा स्थल की सफाई करने के बाद भगवान गणेश का स्मरण करते हुए पूजा और व्रत का संकल्प लें।</div><div><br></div><h2>गणपति स्थापना</h2><div>पूजा स्थल पर स्वच्छ चौकी रखें और उस पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। प्रतिमा स्थापित करते समय श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश का ध्यान करें। प्रतिमा स्थापित करने के बाद गणपति का आवाहन कर पूजा प्रारंभ की जाती है।</div><div><br></div><h2>पूजन सामग्री</h2><div>पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है—</div><div><br></div><div>भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र</div><div>रोली और चंदन</div><div>अक्षत</div><div>दूर्वा घास</div><div>लाल या पीले पुष्प</div><div>धूप और दीप</div><div>फल</div><div>मोदक और लड्डू</div><div>नारियल</div><div>पान और सुपारी</div><div>पंचामृत एवं स्वच्छ जल</div><div>पूजा की विधि</div><div><br></div><div>सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और पूजा का संकल्प लें। इसके बाद उन्हें जल से स्नान कराएं अथवा श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करें। फिर चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प और दूर्वा अर्पित करें। भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग विशेष रूप से प्रिय माना जाता है। उन्हें फल और अन्य सात्त्विक नैवेद्य भी अर्पित किया जा सकता है। पूजा के दौरान श्रद्धालु “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जप कर सकते हैं। इसके पश्चात गणेश चतुर्थी की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है और अंत में भगवान गणेश की आरती की जाती है।</div><div><br></div><h2>गणेश चतुर्थी व्रत का महत्व</h2><div>गणेश चतुर्थी के दिन कई श्रद्धालु व्रत रखते हैं। व्रत की विधि और नियम परिवार तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ लोग दिनभर फलाहार करते हैं और पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। व्रत का मुख्य उद्देश्य भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा, आत्मसंयम और सकारात्मक संकल्प की भावना रखना है। इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना भी शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>गणेश चतुर्थी की व्रत कथा</h2><div>पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने एक दिन स्नान करने से पहले अपने शरीर के उबटन से एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण प्रतिष्ठित कर दिए। उन्होंने उस बालक को अपना पुत्र बनाया और उसे द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया। माता पार्वती ने बालक से कहा कि जब तक वे भीतर से बाहर न आएं, किसी को भी अंदर प्रवेश न करने देना।</div><div><br></div><div>कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे और भीतर जाने लगे। बालक गणेश ने उन्हें रोक दिया। भगवान शिव ने स्वयं को माता पार्वती का पति बताते हुए प्रवेश करने की अनुमति मांगी, लेकिन गणेश जी ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। इससे भगवान शिव और गणेश जी के बीच संघर्ष हुआ। पौराणिक कथा के अनुसार संघर्ष के दौरान भगवान शिव ने क्रोधित होकर गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब माता पार्वती को इस घटना का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं। उन्होंने भगवान शिव से अपने पुत्र को पुनः जीवित करने का आग्रह किया।</div><div><br></div><div>तब भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा की ओर जाएं और जो भी प्राणी सबसे पहले दिखाई दे, उसका सिर लेकर आएं। गणों को एक हाथी दिखाई दिया और वे उसका सिर लेकर आए। भगवान शिव ने हाथी का सिर गणेश जी के शरीर पर स्थापित कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें अपना पुत्र स्वीकार किया और वरदान दिया कि संसार में किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाएगी। तभी से भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है।</div><div><br></div><h2>गणेश चतुर्थी और चंद्र दर्शन की मान्यता</h2><div>गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक प्रचलित मान्यता के अनुसार इस दिन चंद्रमा के दर्शन से बचने की परंपरा भी है। इसके पीछे भगवान गणेश और चंद्रमा से संबंधित एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार एक बार भगवान गणेश को मोदक और अन्य प्रिय व्यंजनों का भोग लगाया गया। अधिक भोजन करने के बाद वे अपने वाहन मूषक पर सवार होकर जा रहे थे। मार्ग में मूषक के अचानक डर जाने से भगवान गणेश नीचे गिर पड़े। यह देखकर चंद्रमा हंसने लगा। चंद्रमा के इस उपहास से भगवान गणेश क्रोधित हुए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि जो व्यक्ति चतुर्थी के दिन उसका दर्शन करेगा, उस पर झूठे आरोप लग सकते हैं। बाद में चंद्रमा ने क्षमा मांगी, तब भगवान गणेश ने श्राप को पूर्ण रूप से समाप्त न करते हुए उसमें परिवर्तन कर दिया। इसी कारण कुछ परंपराओं में गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से बचने की मान्यता प्रचलित है।</div><div><br></div><div>इस प्रकार, गणेश चतुर्थी आस्था, बुद्धि, शुभारंभ और सामाजिक एकता का पर्व है। भगवान गणेश का स्वरूप हमें सिखाता है कि जीवन में बुद्धि, धैर्य, विवेक और विनम्रता का विशेष महत्व है। वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर, सोमवार को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान गणेश की स्थापना और पूजा कर सुख, समृद्धि, बुद्धि और जीवन की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 18:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/when-bappa-birth-anniversary-falls-the-auspicious-timings-and-significance-of-the-puja-rituals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hartalika Teej 2026: तिथि, महत्व, पूजन विधि और व्रत कथा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/hartalika-teej-2026-date-significance-worship-rituals-and-fasting-legend]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सनातन धर्म में हरतालिका तीज का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार के मंगल की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनोवांछित एवं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। हरतालिका तीज को श्रद्धा, तप, प्रेम और अटूट संकल्प का पर्व माना जाता है। इस दिन माता पार्वती के कठोर तप और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा का स्मरण किया जाता है।</div><div><br></div><h2>हरतालिका तीज 2026 की तिथि</h2><div>वर्ष 2026 में हरतालिका तीज का व्रत मुख्य रूप से सोमवार, 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर को प्रातः लगभग 7:08 बजे प्रारंभ होकर 14 सितंबर को प्रातः लगभग 7:06 बजे समाप्त हो रही है। उदयातिथि के आधार पर अधिकांश पंचांग 14 सितंबर को हरतालिका तीज मानते हैं। हालांकि, कुछ क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं में प्रदोषकाल या स्थानीय मान्यता के अनुसार 13 सितंबर को भी व्रत रखा जा सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग का पालन करना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/job-seekers-and-hopeful-parents-make-unique-offerings-at-indian-temple" target="_blank">Unique Temple: संतान सुख और नौकरी के लिए इन प्रसिद्ध Temple में चढ़ाते हैं Resume व लौकी</a></h3><h2>हरतालिका तीज का महत्व</h2><div>हरतालिका तीज माता पार्वती के भगवान शिव के प्रति अटूट प्रेम और तपस्या का प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। उनकी दृढ़ भक्ति और संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस व्रत के माध्यम से श्रद्धालु विशेष रूप से निम्न कामनाएं करते हैं—</div><div><br></div><div>सुखी और समृद्ध दांपत्य जीवन</div><div>पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य</div><div>परिवार में सुख-शांति</div><div>मनोवांछित एवं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति</div><div>भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद</div><div><br></div><div>हरतालिका तीज का नाम भी इसकी पौराणिक कथा से जुड़ा है। प्रचलित व्याख्या के अनुसार ‘हरत’ या ‘हरण’ का संबंध किसी को दूर ले जाने से और ‘आलिका’ का अर्थ सखी से माना जाता है। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें वन में ले गई थीं, ताकि वे अपनी इच्छा के विरुद्ध होने वाले विवाह से बच सकें और भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए तपस्या कर सकें।</div><div><br></div><h2>हरतालिका तीज की पूजन विधि</h2><div>हरतालिका तीज के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके चौकी स्थापित करें। परंपरा के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी, रेत या अन्य पारंपरिक सामग्री से शिव-पार्वती की प्रतीकात्मक प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं।</div><div><br></div><h2>पूजन सामग्री</h2><div>पूजा में सामान्यतः निम्न सामग्री का उपयोग किया जाता है—</div><div><br></div><div>भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र</div><div>गणेश जी की प्रतिमा या चित्र</div><div>बेलपत्र</div><div>धतूरा, आक आदि, स्थानीय परंपरा के अनुसार</div><div>पुष्प और माला</div><div>रोली, चंदन और अक्षत</div><div>धूप और दीप</div><div>फल एवं नैवेद्य</div><div>सुहाग की सामग्री, जैसे चूड़ियां, सिंदूर और बिंदी</div><div>वस्त्र या चुनरी</div><div>पंचामृत और स्वच्छ जल</div><div>पूजा की विधि</div><div><br></div><div>सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान कर उन्हें जल, चंदन, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। भगवान शिव को बेलपत्र और अन्य प्रिय सामग्री श्रद्धापूर्वक चढ़ाई जाती है। इसके बाद हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती कर सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार के मंगल की प्रार्थना की जाती है। प्रातःकाल पूजा को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। यदि किसी कारण से प्रातःकाल पूजा संभव न हो, तो कई परंपराओं में प्रदोषकाल में भी शिव-पार्वती की पूजा की जाती है।</div><div><br></div><h2>हरतालिका तीज के व्रत का महत्व</h2><div>हरतालिका तीज का व्रत अनेक परिवारों में निर्जला व्रत के रूप में रखा जाता है। हालांकि, व्रत के नियम क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल भोजन और जल का त्याग नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम, आत्मनियंत्रण और भगवान के प्रति समर्पण भी है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>हरतालिका तीज की व्रत कथा</h2><div>पौराणिक कथा के अनुसार पर्वतराज हिमवान की पुत्री माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। उन्होंने मन ही मन भगवान शिव को अपना सर्वस्व मान लिया था। माता पार्वती की इच्छा से अनजान उनके पिता हिमवान ने उनका विवाह भगवान विष्णु से करने का विचार किया। जब माता पार्वती को इस बात का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुईं। उनकी एक प्रिय सखी ने उन्हें सलाह दी कि यदि वे भगवान शिव को ही पति रूप में प्राप्त करना चाहती हैं, तो उन्हें एकांत स्थान पर जाकर कठोर तपस्या करनी चाहिए।</div><div><br></div><div>कथा के अनुसार माता पार्वती की सखी उन्हें घर से दूर घने वन में ले गईं। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव की आराधना करते हुए कठोर तप किया और अन्न-जल का त्याग कर अपनी भक्ति में लीन रहीं। उनकी कठिन तपस्या और अटूट श्रद्धा से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनके समक्ष प्रकट हुए। भगवान शिव ने माता पार्वती से उनकी इच्छा पूछी। माता पार्वती ने विनम्रतापूर्वक भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की।</div><div><br></div><div>भगवान शिव ने उनकी तपस्या और दृढ़ संकल्प से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। बाद में पर्वतराज हिमवान ने भी भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के लिए सहमति दे दी। इस प्रकार माता पार्वती की अटूट भक्ति, तपस्या और दृढ़ निश्चय सफल हुआ। तभी से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए हरतालिका तीज का व्रत और पूजन करने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।</div><div><br></div><div>इस प्रकार, हरतालिका तीज केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, तपस्या और दृढ़ संकल्प का संदेश देने वाला पर्व है। माता पार्वती का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि सच्ची श्रद्धा और अटल संकल्प के साथ किए गए प्रयास जीवन में सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकते हैं। वर्ष 2026 में हरतालिका तीज मुख्य रूप से 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। तिथि को लेकर क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं में अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा-व्रत का निर्णय करना उचित रहेगा। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना कर सुख, शांति, सौभाग्य और मंगलमय जीवन की कामना कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 17:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/hartalika-teej-2026-date-significance-worship-rituals-and-fasting-legend</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhadrapada Amavasya 2026: भाद्रपद अमावस्या को स्नान- दान से होती है पुण्य की प्राप्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-and-charity-on-bhadrapada-amavasya-bring-spiritual-merit]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज भाद्रपद अमावस्या है, हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का खास महत्व है। भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहणी (कुशोत्पाटिनी) अमावस्या और पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है। यह अमावस्या पितरों के तर्पण और संतान की लंबी उम्र व सुख-समृद्धि के लिए समर्पित है तो आइए हम आपको भाद्रपद अमावस्या तिथि का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें भाद्रपद अमावस्या के बारे में&nbsp;</h2><div>हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। विशेष रूप से भाद्रपद माह की अमावस्या को पिठोरी अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। यह दिन माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए व्रत रखने के लिए समर्पित होता है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद अमावस्या के दिन कुशा इकट्ठी की जाती है। इसे पिठौरा, कुशोत्पाटनी, कुशग्रहणी अमावस्या इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।&nbsp; इस दिन सुहागिन स्त्रियां व्रत रखकर भगवान भोलेनाथ एवं देवी दुर्गा की पूजा करती है। यह दिन पितरों की तृप्ति, पिंड दान, तर्पण और वंश वृद्धि के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।</div><div><br></div><div>अमावस्या की शाम पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीया लगाने, पितरों का स्मरण, शिव जी और शनि देव की आराधना करने से जीवन में चारों तरफ लाभ मिलता है। इस वर्ष भाद्रपद अमावस्या की तिथि 11 सितंबर को है। भाद्रपद अमावस्या को स्नान और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है एवं पाप मिटते हैं। इस दिन नाराज पितरों को खुश करने और पितृ दोष की शांति के उपाय किए जाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>भाद्रपद अमावस्या में स्नान का शुभ मुहूर्त</h2><div>पंडितों के अनुसार 11 सितंबर को भाद्रपद अमावस्या के दिन आप ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर सकते हैं क्योंकि यह नहाने का सबसे उत्तम समय होता है। भाद्रपद अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त 04:32&nbsp; से 05:18 तक है। जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में स्नान न कर पाएं, वे सूर्योदय के बाद भी स्नान कर सकते हैं। उसके बाद अपनी क्षमता के अुनसार दान करें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-puja-during-auspicious-time-seek-blessing-of-progeny-and-relief-from-pitra-dosh" target="_blank">Pithori Amavasya 2026: संतान सुख और Pitra Dosh मुक्ति के लिए आज जरूर करें Shubh Muhurat में पूजा</a></h3><h2>भाद्रपद अमावस्या पर ये चीजें करें दान, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>भाद्रपद अमावस्या को स्नान करने के बाद आप किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को कपड़े का दान कर सकते है। इसके अलावा चावल, गेहूं, दाल, हरी सब्जियां, फल, अनाज, गुड़, बर्तन, छाता आदि का दान कर सकते हैं। दान के साथ कुछ पैसे भी दे सकते हैं।</div><div><br></div><h2>भाद्रपद अमावस्या के दिन पितरों की नाराजगी दूर करने के उपाय</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद अमावस्या पर सुबह स्नान के बाद पितरों का ध्यान करें और उनके निमित्त तर्पण करें। अन्न-वस्त्र का दान कर जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं। इसके अलावा गाय, कौआ, कुत्ता और अन्य जीवों को भी भोजन कराएं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पितृ दोष से मुक्ति पाने का दिन</h2><div>ज्योतिषीय दृष्टि से पितृ दोष होने पर व्यक्ति को करियर में बार-बार बाधा, आर्थिक अस्थिरता, पारिवारिक तनाव, संतान संबंधी चिंता या काम में अनावश्यक रुकावट जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।</div><div><br></div><h2>भाद्रपद अमावस्या के दिन भूलकर भी न करें ये गलती</h2><div>पंडितों के अनुसार भाद्रपद अमावस्या के दिन पितरों के नाम पर किए जाने वाले कर्म श्रद्धा और नियमपूर्वक करने चाहिए। दिखावे के लिए पूजा-पाठ करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार तर्पण, दान और भोजन कराएं। इस दिन किसी का अपमान करना, झूठ बोलना, क्रोध करना या जानबूझकर किसी को कष्ट पहुंचाने की गलती न करें।</div><div><br></div><h2>पितृ दोष मुक्ति के उपाय</h2><div>अमावस्या के दिन स्नान के बाद पितरों का स्मरण कर जल, काले तिल और कुश से तर्पण करें। घर में पितरों का स्मरण करते हुए ॐ पितृभ्यः नमः मंत्र का जाप कर सकते हैं। परिवार की ओर से जाने-अनजाने हुई भूल के लिए पितरों से क्षमा प्रार्थना करें। इस दिन क्रोध, झूठ, अपमान और किसी जरूरतमंद को खाली हाथ लौटाने से बचें।</div><div><br></div><h2>पितरों का इसलिए भी होता है आशीर्वाद&nbsp;</h2><div>हिंदू परंपरा में पितरों को परिवार की वंश परंपरा का आधार माना गया है इसलिए अमावस्या जैसे अवसरों पर पूर्वजों का स्मरण केवल दोष दूर करने के लिए नहीं, बल्कि उनके प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा भी है। पूर्वजों का आशीर्वाद हो तो परिवारजन पर कष्ट नहीं आते।</div><div><br></div><h2>भाद्रपद अमावस्या से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक गांव में सात भाई रहते थे। उनके साथ उनकी सात पत्नियां भी रहती थीं जो हर साल भाद्रपद अमावस्या पर पिठोरी व्रत करती थीं। सबसे बड़े भाई की पत्नी ने जब पहली बार यह व्रत किया, तो उसके नवजात शिशु की मृत्यु हो गई। इसके बाद क्रमानुसार दूसरे, तीसरे और इसी तरह छह भाइयों की पत्नियों ने जब-जब यह व्रत किया, तो उनके यहां भी संतानों की अकाल मृत्यु जैसी घटनाएं होने लगीं। केवल सबसे छोटे (सातवें) भाई की पत्नी ने जब व्रत किया, तो उसके बच्चे सुरक्षित रहे। दुखी होकर उन छह बहुओं ने अपनी छोटी देवरानी से इसका कारण पूछा। छोटी बहू ने बताया कि माता पार्वती और षष्ठी देवी की सच्चे मन से पूजा न करने और विधि में त्रुटि होने के कारण ऐसा हुआ है। तब सभी बहुओं ने अपनी भूल का पश्चाताप किया और माता पार्वती (पिठोरी माता) की विधि-विधान से आटे की मूर्तियां बनाकर क्षमा-प्रार्थना के साथ दोबारा व्रत और पूजन किया। माता की कृपा से सभी के मरे हुए बच्चे जीवित हो गए और उनके घरों में खुशहाली लौट आई।&nbsp;</div><div><br></div><h2>भाद्रपद अमावस्या दिन जरूर करें ये उपाय</h2><div>शास्त्रों के अनुसार पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अमावस्या के दिन पूजा-अर्चना करने के बाद मंदिर में या जरूरतमंदों को पितरों का ध्यान करते हुए अन्न, वस्त्र, जूते-चप्पल और छाते का दान करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस उपाय को करने से पितृ दोष की समस्या दूर होती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। इसके अलावा रोजाना पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकालें। ऐसा माना जाता है कि इस उपाय को नियमित रूप से करने से जीवन में किसी चीज की कमी नहीं होती है। पितरों के तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध के दौरान पितृ मंत्रों और पितृ चालीसा का पाठ करें। इससे पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार के सदस्यों पर अपनी कृपा बरसाते हैं।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 12:32:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-and-charity-on-bhadrapada-amavasya-bring-spiritual-merit</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Pithori Amavasya 2026: संतान सुख और Pitra Dosh मुक्ति के लिए आज जरूर करें Shubh Muhurat में पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-puja-during-auspicious-time-seek-blessing-of-progeny-and-relief-from-pitra-dosh]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन पितरों का तर्पण, दान और धार्मिक कार्य आदि किए जाते हैं। भाद्रपद माह की अमावस्या तिथि को पिठोरी अमावस्या मनाई जाती है। इस बार आज यानी की 10 सितंबर को पिठोरी अमावस्या मनाई जा रही है। इस अमावस्या का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत करती हैं। तो वहीं दूसरी ओर यह तिथि पितरों के तर्पण, दान-पुण्य और पिंडदान के लिए भी बेहद फलदायी मानी जाती है। तो आइए जानते हैं पिठोरी अमावस्या की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 10 सितंबर 2026 की सुबह 10:33 मिनट से पिठोरी अमावस्या तिथि की शुरूआत हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 11 सितंबर 2026 की सुबह 08:56 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। बता दें कि आज प्रदोष काल में पूजा का मुहूर्त शाम 06:39 मिनट से लेकर रात 08:57 मिनट तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को जल अर्पित करें। अब पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करें और फिर पूजा स्थल को साफ करें। इसके बाद चौकी पर देवी पिठोरी की स्थापना करें। अब आटे या फिर गोबर से 64 योगिनियों और सप्त मातृकाओं की आकृति को बनाएं। अब इन देवियों को हल्दी, रोली, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें। इसके बाद खीर, पूड़ी, रोटी, चूरमा, घी और गुड़ आदि का भोग लगाएं। इसके बाद पिठोरी अमावस्या व्रत की कथा का पाठ करें और मां की आरती हैं। पूजा के अंत में संतान की लंबी आयु, अच्छी सेहत और घर-परिवार की सुख-शांति व समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>इस तिथि को मातृशक्ति और संतान के बीच प्रेम एवं आस्था का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि पिठोरी अमावस्या के लिए श्रद्धापूर्वक देवी-देवताओं की पूजा और व्रत करने से संतान के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। अमावस्या तिथि की वजह से इस दिन दान, तर्पण और प्रार्थना आदि करने की भी परंपरा होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 10:17:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bhaum Pradosh Vrat: 08 सितंबर को सर्वार्थ सिद्धि Yoga में भौम प्रदोष, जानें Puja Muhurat]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/bhaum-pradosh-falls-on-september-8-during-sarvartha-siddhi-yoga-know-puja-muhurat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में हर एक तिथि का खास महत्व होता है। हर तिथि अलग-अलग देवी-देवता को समर्पित है। सिंतबर महीने का पहला प्रदोष व्रत मंगलवार को है। वहीं हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का खास महत्व होता है। वहीं जब प्रदोष व्रत मंगलवार को पड़ता है, तो इसको भौम प्रदोष के नाम से जाना जाता है। इस बार 08 सितंबर 2026 को भौम प्रदोष व्रत किया जा रहा है। </div><div>&nbsp;</div><div>प्रदोष व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित होता है। इस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। इस बार भौम प्रदोष व्रत के मौके पर सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। तो आइए जानते हैं भौम प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक इस बार 08 सितंबर की दोपहर 02:42 मिनट से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरूआत हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 09 सितंबर 2026 को दोपहर 12:30 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 08 सितंबर 2026 को भौम प्रदोष व्रत किया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करें और फिर साफ कपड़े पहनें। इसके बाद शिवलिंग पर जल, दूध और गंगाजल से अभिषेक करें और फिर शिवलिंग पर&nbsp; बेलपत्र, धतूरा, सफेद, दूथ और अक्षत आदि अर्पित करें। अब दीपक जलाकर भगवान शिव की आरती करें और 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र का जाप करें। अंत में पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता के हिसाब से जो भी जातक प्रदोष व्रत करता है, उसके जीवन से संकट और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। वहीं व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 10:21:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/bhaum-pradosh-falls-on-september-8-during-sarvartha-siddhi-yoga-know-puja-muhurat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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