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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Shukra Pradosh Vrat 2026: क्यों इतना खास है यह शुक्र प्रदोष व्रत? जानें Lord Shiva की पूजा का Perfect Time और विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-this-shukra-pradosh-fast-so-special-learn-perfect-time-and-method-to-worship-lord-shiva]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। बता दें कि हर महीने की शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत रखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करता है, उस पर महादेव की विशेष कृपा होती है और जीवन के सभी कष्टों का नाश होता है। वहीं अधिकमास में आने वाले प्रदोष व्रत को अधिक फलदायी माना जाता है। इस बार आज यानी की 12 जून 2026 को शुक्र प्रदोष व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं शुक्र प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>ज्येष्ठ अधिकमास भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। यह विशेष महीना 3 साल में एक बार आता है। इस पवित्र अधिकमास में शुक्र प्रदोष व्रत का शुभ संयोग बन रहा है। वैदिक पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ अधिकमास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरूआत 12 जून की शाम 07:36 मिनट से हो रही है। जोकि अगले दिन यानी की 13 जून की शाम 04:07 मिनट पर समाप्त होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/parama-ekadashi-comes-once-in-3-years-know-auspicious-time-and-method-to-please-lord-vishnu" target="_blank">Parama Ekadashi 2026: 3 साल में एक बार आती है Parama Ekadashi, जानें Lord Vishnu को प्रसन्न करने का मुहूर्त और विधि</a></h3><div><br></div><div>प्रदोश काल में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए इस बार 12 जून 2026 को प्रदोष व्रत किया जा रहा है। इस दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। क्योंकि यह व्रत शुक्रवार को पड़ रहा है, इसलिए इसको शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाएगा।</div><div><br></div><div>प्रदोष काल में प्रदोष व्रत की पूजा करना बेहद शुभ माना जाता है। आज प्रदोष काल का शुभ समय शाम 07:36 बजे से 09:20 बजे तक रहेगा। इस अवधि में महादेव की पूजा-अर्चना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और जातक की मनोकामना पूरी होती है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें और भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद घर के मंदिर को साफ करके गंगाजल का छिड़काव करें। फिर लकड़ी की चौकी पर भगवान शिव की प्रतिमा को स्थापित करें। 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र का जाप करते हुए पूजा शुरू करें। शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें और भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग और शमी पत्र अर्पित करें।</div><div><br></div><div>भगवान शिव को अक्षत, चंदन और कनेर के फूल अर्पित करें और घी का दीपक जलाकर भगवान शिव के सामने बैठकर शिव चालीसा का पाठ करें और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें। अब अंत में भगवान शिव की आरती करें और पूजा संपन्न करने के बाद भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 10:48:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-this-shukra-pradosh-fast-so-special-learn-perfect-time-and-method-to-worship-lord-shiva</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Parama Ekadashi 2026: 3 साल में एक बार आती है Parama Ekadashi, जानें Lord Vishnu को प्रसन्न करने का मुहूर्त और विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/parama-ekadashi-comes-once-in-3-years-know-auspicious-time-and-method-to-please-lord-vishnu]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अधिकमास में आने वाली परमा एकादशी का विशेष महत्व होता है। यह एकादशी सभी पापों का नाश करने, कष्टों से मुक्ति देने और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाली मानी जाती है। क्योंकि परमा एकादशी 3 साल में एक बार आती है, इसलिए इस एकादशी का महत्व और भी बढ़ जाता है। परमा एकादशी का व्रत करने से जातक को भगवान श्रीविष्णु की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस बार 11 जून 2026 को परमा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इसकी तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 10 जून की रात 12:57 मिनट पर एकादशी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं आज यानी की 11 जून की रात 10:36 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 11 जून 2026 को परमा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है।</div><div><br></div><h2>शुभ योग</h2><div>इस बार परमा एकादशी पर सर्वार्थ सिद्धि योग और शोभन योग का विशेष संयोग है। ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों योगों को बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन शुभ योगों में भगवान श्रीविष्णु की पूजा, जप-तप, दान और व्रत करने से कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और फिर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करें। उनको पीले भूल, धूप, दीप, पंचामृत और मौसमी फल आदि अर्पित करें। भगवान विष्णु को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं, उसमें तुलसी दल जरूर शामिल करना चाहिए। पूजा के दौरान एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं पूजा के अंत में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।</div><div>हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।</div><div><br></div><div>ॐ नारायणाय विद्महे।</div><div><br></div><div>वासुदेवाय धीमहि ।</div><div><br></div><div>तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।</div><div><br></div><div>ॐ विष्णवे नम:</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 10:26:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/parama-ekadashi-comes-once-in-3-years-know-auspicious-time-and-method-to-please-lord-vishnu</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Parma Ekadashi 2026: परमा एकादशी व्रत से होती है दरिद्रता दूर, आती है समृद्धि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-parama-ekadashi-fast-dispels-poverty-and-brings-prosperity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>11 जून को परमा एकादशी है, हिन्दू धर्म में परमा एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। अधिकमास में पड़ने के कारण इस एकादशी का महत्व बढ़ गया है। परमा एकादशी पावन एकादशी है, इस व्रत को करने से व्रत का पूरा पुण्यफल मिलता है तो आइए हम आपको परमा&nbsp; एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें परमा&nbsp; एकादशी व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>हिन्दू धर्म में इस दिन भगवान विष्णु और धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही अन्न-धन समेत आदि चीजें दान की जाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, परमा&nbsp; एकादशी का व्रत करने से साधक के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। साथ ही सभी पापों से छुटकारा मिलता है। इस दिन कुछ गलतियों को करने से साधक को जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है और भगवान विष्णु नाराज हो सकते हैं। सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। प्रत्येक माह आने वाली एकादशी भक्तों को आत्मशुद्धि और भक्ति का संदेश देती है। लेकिन जब अधिकमास में आने वाली परमा एकादशी का अवसर आता है, तब इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। यह दुर्लभ एकादशी लगभग तीन वर्ष में एक बार आती है, इसलिए इसे अत्यंत विशेष और कल्याणकारी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत एवं पूजा करने से मनुष्य के जीवन के समस्त पाप नष्ट होते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-make-these-5-mistakes-during-ekadashi-fast-otherwise-lord-vishnu-may-get-angry" target="_blank">Ekadashi Rules: एकादशी व्रत में भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, Lord Vishnu हो सकते हैं नाराज</a></h3><h2>परमा एकादशी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के अनुसार अधिकमास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 11 जून 2026 को प्रातः 12 बजकर 57 मिनट पर होगा तथा इसका समापन उसी दिन रात्रि 10 बजकर 36 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार परमा एकादशी का व्रत 11 जून 2026, दिन गुरुवार को रखा जाएगा।</div><div>&nbsp;</div><h2>परमा एकादशी का है विशेष महत्व</h2><div>पंडितों के अनुसार ‘परमा‘ शब्द का अर्थ होता है सर्वोत्तम अथवा श्रेष्ठ। इसी कारण इस एकादशी को सभी एकादशियों में विशेष फलदायी माना गया है। धर्मग्रंथों के अनुसार यह व्रत दरिद्रता और पापों से मुक्ति दिलाने वाला है। पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि धन के देवता कुबेर ने इसी व्रत के प्रभाव से भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद पाया था। वहीं सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने भी परमा एकादशी के पुण्य प्रभाव से अपना खोया हुआ वैभव और परिवार पुनः प्राप्त किया था। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि जो भक्त इस दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की आराधना करता है, उसे मृत्यु के पश्चात बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>परमा एकादशी पर ऐसे करें पूजा, मिलेगा लाभ</h2><div>पंडितों के अनुसार परमा एकादशी का व्रत खास होता है, इसलिए इस पावन दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल को शुद्ध कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।</div><div>&nbsp;</div><div>भगवान को पीले पुष्प, धूप, दीप, चंदन, पंचामृत और फल अर्पित करें। श्रीहरि को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं तथा उसमें तुलसी दल अवश्य रखें, क्योंकि तुलसी के बिना भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते। पूजा के पश्चात परमा एकादशी व्रत कथा का श्रवण करें तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। भक्तजन भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और भगवान के ध्यान में रात्रि व्यतीत करते हैं। परमा एकादशी पर ब्राह्मणों, जरूरतमंदों अथवा दीन-हीन, असहाय लोगों को भोजन एवं दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण किया जाता है।</div><div>&nbsp;</div><h2>परमा एकादशी पर दान का भी है महत्व</h2><div>सनातन संस्कृति में दान को धर्म का प्रमुख आधार माना गया है। विशेष रूप से परमा एकादशी के दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करने वाला बताया गया है। धर्मग्रंथों में वर्णित है कि इस दिन जरूरतमंदों की सहायता करने से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>&nbsp;स्कन्द पुराण में दान का उल्लेख करते हुए कहा गया है-</div><div><br></div><div><b>न्यायोपार्जितवित्तस्य दशमांशेन धीमतः।</b></div><div><b>कर्तव्यो विनियोगश्च ईश्वरप्रीत्यर्थमेव च॥</b></div><div><br></div><div>अर्थात बुद्धिमान मनुष्य को अपने ईमानदारी से अर्जित धन का एक भाग ईश्वर की प्रसन्नता और जनकल्याण के कार्यों में अवश्य लगाना चाहिए। इस दिन अन्नदान, जलसेवा, फल वितरण, धार्मिक ग्रंथों का दान तथा रोगियों एवं दिव्यांगजनों की सहायता करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। नि:स्वार्थ भाव से किया गया दान जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आता है।</div><div><br></div><h2>परमा एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक</h2><div>शास्त्रों के अनुसार काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम का एक अत्यंत धार्मिक लेकिन गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी पवित्रा के साथ रहता था। अत्यधिक निर्धनता के कारण कई बार उन्हें भूखा रहना पड़ता था। इसके बावजूद, पतिव्रता पत्नी ने कभी अपने भाग्य की शिकायत नहीं की और पूरी निष्ठा से अपने पति तथा अतिथियों की सेवा की। अपनी पत्नी के कष्टों को देखकर एक दिन सुमेधा परदेश जाने लगे, लेकिन उनकी पत्नी ने उन्हें रोक लिया और कहा कि मनुष्य को अपने पूर्व कर्मों के अनुसार ही धन-संपत्ति प्राप्त होती है। उसी समय संयोग से वहां कौण्डिन्य मुनि का आगमन हुआ।&nbsp; ब्राह्मण दंपती ने मुनि से दरिद्रता दूर करने का उपाय पूछा। मुनि ने उन्हें अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी के व्रत का विधान बताया। उन्होंने बताया कि यह एकादशी सभी पापों और दरिद्रता को नष्ट करने वाली है। कौण्डिन्य मुनि के निर्देशानुसार सुमेधा और उनकी पत्नी ने पूर्ण श्रद्धा के साथ पांच दिनों तक 'पंचरात्रि' व्रत और परमा एकादशी का उपवास किया। व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और एक राजकुमार के रूप में आकर उन्हें धन-धान्य, सुंदर घर और सुखी जीवन का आशीर्वाद प्रदान किया। पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वयं धन के देवता कुबेर ने भी इसी व्रत के प्रभाव से अपना खोया हुआ वैभव और पद पुनः प्राप्त किया था। इसके अतिरिक्त, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने भी इसी एकादशी के पुण्य से अपने कष्टों से मुक्ति पाई थी।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><h2>परमा एकादशी पर करें महाउपाय</h2><div>हिंदू मान्यताओं के अनुसार किसी भी देवता या व्रत का पुण्यफल पाने के लिए दान का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है। ऐसे में परमा एकादशी वाले दिन व्यक्ति को यथासंभव पीले वस्त्र, पीले फल, पीले मिष्ठान और चने की दाल, गुड़ आदि का दान करना चाहिए। भगवान श्री विष्णु की महिमा का गान करने वाले श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ सभी कष्टों को दूर करके कामनाओं को पूरा करने वाला माना गया है। ऐसे में परमा&nbsp; एकादशी व्रत वाले दिन इसका पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करना चाहिए। परमा एकादशी वाले दिन साधक को श्री हरि के साथ विष्णुप्रिया कहलाने वाली तुलसी जी की विशेष पूजा करनी चाहिए। परमा&nbsp; एकादशी वाले दिन तुलसी जी के पास गाय से बने शुद्ध घी का दीया जलाकर 108 परिक्रमा करने पर लक्ष्मी और नारायण दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 18:39:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-parama-ekadashi-fast-dispels-poverty-and-brings-prosperity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Adhik Bhanu Saptami 2026: Adhik Maas में सूर्य पूजा का महासंयोग, जानें Date और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/great-coincidence-of-surya-puja-in-adhik-maas-know-date-and-importance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सनातन परंपरा में सूर्य देवता के हमें प्रतिदिन दर्शन होते हैं। हिंदू धर्म में सूर्य देव को सौभाग्य और आरोग्य का देवता माना जाता है। सूर्य देव की पूजा के लिए रविवार का दिन शुभ माना जाता है। वहीं जब रविवार को सप्तमी तिथि पड़ती है, तो इसको भानु सप्तमी कहा जाता है। इस बार 07 जून 2026 को यह पर्व मनाया जा रहा है। यह दिन तब अधिक पुण्यफलदायी हो जाता है, जब यह अधिक मास या पुरुषोत्तम मास में पड़ता है। तो आइए जानते हैं यह तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 07 जून की पूर्वाह्न 02:40 मिनट से अधिक ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष की सप्तमी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं अगले दिन यानी की 08 जून 2026 की पूर्वाह्न 00:21 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 07 जून 2026 को अधिक भानु सप्तमी का पर्व मनाया जाएगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनें। अगर संभव हो तो पीले कपड़े पहनें। फिर तांबे के लोटे में जल, रोली, चंदन, अक्षत और लाल पुष्प डालकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को अर्घ्य दें। इस दौरान 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' का जाप करें। फिर सूर्य देव के लिए दीपक जलाकर आदित्य हृदय स्त्रोत, सूर्याष्टक या सूर्य चालीसा का पाठ करें। इस दिन तांबे के बर्तन, गेहूं, गुड़ व लाल रंग के वस्त्र आदि का दान करना शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>धार्मिक महत्व&nbsp;</h2><div>भगवान सूर्य देव को भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना जाता है। इसलिए उनको भक्त सूर्य नारायण कहते हैं। भानु सप्तमी का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह अधिक मास भी भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होता है। इसलिए सुख-सौभाग्य की कामना करने वाले व्यक्ति को इस पावन अवसर पर विधि-विधान से सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 09:43:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/great-coincidence-of-surya-puja-in-adhik-maas-know-date-and-importance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhanu Saptami 2026: अधिकमास भानु सप्तमी व्रत से प्राप्त होता है यश, मिलती है सफलता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-adhikmas-bhanu-saptami-fast-brings-fame-and-success]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>7 जून को अधिकमास भानु सप्तमी व्रत है, हिन्दू धर्म में भानु सप्तमी का बहुत महत्व है। इस व्रत से जीवन में आती है सुख-शांति तो आइए हम आपको अधिकमास भानु सप्तमी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें अधिकमास भानु सप्तमी के बारे में&nbsp;&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार अधिकमास भानु सप्तमी हिंदू धर्म से जुड़ा एक खास व्रत है जो सूर्य भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सूर्यदेव की आराधना और पूजा करने से साधक के बिगड़े काम पूरे हो जाते हैं और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। भानु सप्तमी उस दिन का भी संकेत देती है, जब भगवान सूर्य अपने रथ पर पृथ्वी पर आये थे। भगवान सूर्य के आगमन ने पृथ्वी पर नया जीवन ला दिया। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, सूर्यदेव एक पवित्र कमल के फूल पर स्वर्ण रथ पर सवार थे। सात घोड़े रथ खींचते हैं और ये घोड़े सूर्य की सात किरणों को दर्शाते हैं। हिंदू परंपराओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति भगवान सूर्य की पूजा करने के साथ भानु सप्तमी का व्रत रखता है, उन्हें अच्छी सेहत और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस वर्ष अधिकमास भानु सप्तमी 7 जून को पड़ रही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhar-bhojshala-700-year-wait-over-after-asi-report-chants-of-praise-now-resonate" target="_blank">Dhar Bhojshala का 700 साल पुराना इंतजार खत्म, ASI रिपोर्ट के बाद अब गूंजेंगे स्तुति मंत्र</a></h3><h2>अधिकमास भानु सप्तमी का आध्यात्मिक महत्व भी है खास&nbsp;</h2><div>पुराणों के अनुसार अधिकमास भानु सप्तमी पर जो भी व्यक्ति भगवान सूर्य देव की पूजा करता है, उसे धन, दीर्घायु और अच्छी सेहत का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भानु सप्तमी के दिन भक्त सूर्य देव को खुश करने के लिए कई पवित्र सूर्य स्तोत्रों और आदित्य हृदय स्तोत्रों का जाप करने के साथ सूर्यदेव का महा-अभिषेक भी करते हैं।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी व्रत करने से होते हैं ये लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार अधिकमास भानु सप्तमी व्रत बहुत खास होता है, इस दिन भगवान सूर्य की उपासना और और भानु सप्तमी के दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को कई तरह के लाभ मिलते हैं। भानु सप्तमी की पूर्व संध्या पर पवित्र गंगा में स्नान करने से भक्तों को अपने जीवन में कभी भी आर्थिक चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता है। भानु सप्तमी के दिन पूजा करने वाली महिलाओं को अपने अगले जन्म में अच्छे और योग्य वर की प्राप्ति होती है। भानु सप्तमी के दिन व्रत रखने से स्वस्थ और सुखी जीवन के साथ भगवान सूर्य का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। सूर्य देव के आशीर्वाद से भक्त घातक रोगों से छुटकारा पाने के साथ सच्चे ज्ञान को प्राप्त करते हैं।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास भानु सप्तमी व्रत बहुत खास होता है। इस भानु सप्तमी व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें लाल फूल, अक्षत और रोली डालें। उगते हुए सूर्य को यह जल अर्पित करें और सूर्य मंत्रों का जाप करें। पूजा के दौरान सूर्य देव को लाल पुष्प, गुड़, गेहूं और लाल वस्त्र अर्पित करना और आदित्य हृदय स्तोत्र या सूर्य चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी व्रत पर दीपदान का है विशेष महत्व</h2><div>पंडितों के अनुसार अधिकमास में दीपदान (दीपक जलाना) सबसे उत्तम माना गया है। पंचमी की शाम को घर के मंदिर में, तुलसी के पौधे के पास और संभव हो तो किसी पवित्र नदी या पीपल के पेड़ के नीचे घी का दीपक जरूर जलाएं।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी व्रत पर करें दान इन चीजों का दान&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भानु सप्तमी के दिन लाल वस्त्र, गुड़, गेहूं, तांबे के बर्तन का दान करना शुभ माना गया है। इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है। साथ ही व्यक्ति को मान-सम्मान, आत्मविश्वास और उन्नति का आशीर्वाद मिलता है। इसलिए जरूरतमंद लोगों की सहायता करना और दान-पुण्य करना भी इस दिन विशेष फलदायी माना गया है।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी पर व्रत रखें और नमक का त्याग करें</h2><div>&nbsp;पंडितों के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक व्रत करना चाहिए। इस दौरान नमक का सेवन न करें। साथ ही व्रत से जुड़े नियम का पालन जरूर करें। इससे आपको व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होगा। साथ ही सूर्य देव आपकी हर मुरादें पूरी करेंगे।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भानु सप्तमी के व्रत और कथा का सीधा संबंध भगवान श्रीकृष्ण और जामवंती के पुत्र साम्ब से जुड़ा है। एक बार श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को अपनी शारीरिक सुंदरता और रूप-रंग पर बहुत अहंकार हो गया। अपने इसी घमंड में आकर उन्होंने महर्षि दुर्वासा का अपमान कर दिया। साम्ब के इस व्यवहार से क्रोधित होकर महर्षि दुर्वासा ने उन्हें कुष्ठ रोग (कोढ़) होने का श्राप दे दिया। साम् के कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो जाने पर पूरी द्वारका में शोक की लहर दौड़ गई। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र साम्ब को सूर्य देव की उपासना करने की सलाह दी। पिता की आज्ञा मानकर साम्ब ने चंद्रभागा नदी (वर्तमान कोणार्क, ओडिशा) के तट पर कठोर तपस्या की। उन्होंने कई वर्षों तक केवल सूर्यदेव का ध्यान करते हुए उनका विधिवत व्रत रखा।साम् की सच्ची भक्ति और कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान सूर्य ने उन्हें दर्शन दिए और उनके सभी पापों व श्राप का निवारण कर दिया। सूर्य देव की कृपा से साम्ब का शरीर पहले जैसा निरोगी और अत्यंत कांतिवान हो गया।तब से ही यह मान्यता है कि जो भी भक्त भानु सप्तमी के दिन पूर्ण श्रद्धा और उपवास के साथ सूर्यदेव की पूजा करता है, उसे असाध्य रोगों, विशेषकर त्वचा और नेत्र संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी के दिन भूलकर भी न करें ये गलतियां</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भानु सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना और सूर्य देव को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है। देर तक सोना इस दिन अशुभ माना जाता है। इस दिन मांसाहार, शराब, लहसुन-प्याज और अन्य तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए और सात्विक भोजन को प्राथमिकता दें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भानु सप्तमी पर क्रोध, कटु वचन और किसी का अपमान करने से पूजा का पुण्य फल कम हो सकता है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और जल का दान करना शुभ माना जाता है। इस दिन दान न करने की बजाय अपनी सामर्थ्य के अनुसार पुण्य कार्य करें। भानु सप्तमी पर तांबे के पात्र में जल, लाल फूल और अक्षत डालकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी पर करें ये शुभ कार्य</h2><div>पंडितों के अनुसार अधिकमास भानु सप्तमी सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है। इस दिन पूजा-पाठ के साथ-साथ कुछ गलतियों से बचना भी जरूरी माना गया है। श्रद्धा और नियमपूर्वक सूर्य उपासना करने से जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पंडितों के अनुसार सूर्य मंत्रों का जाप करें। आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। लाल वस्त्र और गेहूं का दान करें। सूर्य देव को गुड़ और लाल फूल अर्पित करें। गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता करें।</div><div><br></div><h2>अधिकमास भानु सप्तमी का महत्व</h2><div>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भानु सप्तमी के दिन ही पहली बार सूर्य देव अपने 7 घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर प्रकट हुए थे। इस दिन सूर्य पूजा करने से मान-सम्मान, यश और उच्च पद की प्राप्ति होती है। कुंडली का सूर्य दोष दूर होता है। सूर्य देव की कृपा से धन और धान्य की प्राप्ति होती है, त्वचा रोग से मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 18:20:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-adhikmas-bhanu-saptami-fast-brings-fame-and-success</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vibhuvan Sankashti Chaturthi: 3 साल में एक बार आई Vibhuvan Sankashti Chaturthi, जानें Lord Ganesha की Puja Vidhi और मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/vibhuvan-sankashti-chaturthi-comes-once-in-3-years-know-worship-method]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 03 जून 2026 को विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान है। बप्पा को सुख-समृद्धि के दाता और विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है। अधिक मास के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी को विभुवन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। बता दें कि 3 साल में एक बार आने वाली इस तिथि को बेहद दुर्लभ माना जा रहा है। वैसे तो हर महीने संकष्टी चतुर्थी पर गणपति बप्पा की पूजा होती है। लेकिन अधिक मास की संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व होता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको विभुवन संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>संकष्टी चतुर्थी व्रत</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 3 जून 2026 को रात 9:22 मिनट पर अधिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि शुरू होगी। वहीं अगले दिन यानी की 04 जून 2026 की रात 11:31 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र देव को अर्घ्य देने के विशेष महत्व होता है। चंद्रोदय के आधार पर विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत 03 जून 2026 को किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। फिर बप्पा का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। अब पूजा स्थल की साफ-सफाई करें और लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। अब चौकी पर बप्पा की प्रतिमा को स्थापित करें। गंगाजल से छिड़काव करें और पंचामृत से बप्पा का अभिषेक करें। इसके बाद भगवान गणेश को दूर्वा, सिंदूर, लाल पुष्प, पान और अक्षत आदि अर्पित करें। बप्पा को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>अधिक मास में पड़ने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन व्रत किया जाता है और गणपति बप्पा की पूजा आराधना की जाती है। भक्त इस दिन परिवार की सुख-समृद्धि की करते हैं। हिंदू धर्म में बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित होता है। ऐसे में बुधवार को पड़ने वाली यह संकष्टी चतुर्थी को खास माना जाता है।</div><div><br></div><h2>पूजा और चंद्र अर्घ्य</h2><div>दिन भर व्रत करने के बाद शाम को भगवान गणेश की पूजा करें। फिर विभुवन संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें और गणेश जी की आरती करें। चंद्रोदय होने के बाद तांबे या चांदी के पात्र में दूध, जल, अक्षत और फूल मिलाकर चंद्र देव को अर्घ्य दें। फिर भगवान गणेश का स्मरण करते हुए व्रत का पारण करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 09:15:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/vibhuvan-sankashti-chaturthi-comes-once-in-3-years-know-worship-method</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jyeshtha Purnima 2026: ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा पर दान पुण्य करने से मिलता है लाभ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/performing-acts-of-charity-and-merit-on-adhikmas-purnima-yields-spiritual-benefits]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>31 मई को अधिकमास पूर्णिमा है, पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में अत्यंत विशेष और पवित्र स्थान है। इस दिन स्नान, दान और भगवान विष्णु की पूजा करने से सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा के बारे में&nbsp;</h2><div>हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की पूजा होती है। जब पूर्णिमा अधिकमास में आती है, तो इसका धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। इस साल ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा 31 मई 2026 को मनाई जाएगी। धार्मिक ग्रंथों जैसे स्कंद पुराण और पद्म पुराण में अधिकमास की पूर्णिमा को “सर्व सिद्धिदायिनी पूर्णिमा” कहा गया है। पंडितों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और दान-पुण्य करने से विशेष फल प्राप्त होता है। पूर्णिमा के दिन दान-पुण्य और नदी में नहाने का विधान है। इस दिन श्री लक्ष्मी नारायण की पूजा भी होती है। भक्त पूर्णिमा के दिन या एक दिन पहले श्रीसत्यनारायण व्रत भी करते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/that-place-in-up-where-there-no-entry-during-kaliyuga-know-mythological-story" target="_blank">Naimisharanya Mystery: UP की वो जगह जहां Kaliyug की 'No Entry', जानें क्या है पौराणिक कहानी</a></h3><h2>ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त</h2><div>पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 30 मई 2026 को सुबह 11 बजकर 57 मिनट पर होगी और इसका समापन 31 मई 2026 को दोपहर 2 बजकर 14 मिनट पर होगा. उदया तिथि के अनुसार, 31 मई को स्नान-दान, व्रत और पूजा की जाएगी।</div><div><br></div><div>ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा पर पूजा और चंद्रोदय का समय</div><div>पूजा का शुभ समय: सुबह 7:08 बजे से दोपहर 12:19 बजे तक</div><div>चंद्रोदय समय: रात 7:36 बजे</div><div><br></div><div>इस दिन चंद्रमा की पूजा करने का भी विशेष महत्व माना जाता है।</div><div><br></div><h2>इसलिए खास है ज्येष्ठ अधिकमास की पूर्णिमा</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अधिक मास की पूर्णिमा पर व्रत और पूजा करने से सामान्य पूर्णिमा की तुलना में कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, सत्यनारायण कथा का पाठ और श्रवण करने से पापों का नाश होता है तथा घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन अन्न, वस्त्र, स्वर्ण और गौदान करने से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।</div><div><br></div><h2>मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का दिन है ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा&nbsp;</h2><div>आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पूर्णिमा सिर्फ धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का भी प्रतीक मानी जाती है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा के दिन ध्यान और मेडिटेशन करने से मानसिक शांति मिलती है और व्यक्ति के फैसले लेने की क्षमता बेहतर होती है। इसके अलावा परिवार और रिश्तों में भी सकारात्मकता बढ़ती है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा के दिन रखें इन बातों का ध्यान</h2><div>पंडितों के अनुसार अधिकमास पूर्णिमा का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन खानपान में संयम रखें और एक समय भोजन करें। ज्यादा से ज्यादा समय मंत्र जाप और ध्यान में लगाएं। किसी की निंदा या विवाद से बचें। भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की श्रद्धा से पूजा करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास में श्रद्धा और भक्ति से भगवान विष्णु की पूजा करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर सुख-समृद्धि प्राप्त करता है।</div><div><br></div><h2>ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा का महत्व</h2><div>ज्येष्ठ अधिकमास की पूर्णिमा का महत्व बहुत अधिक है। अधिक मास भगवान विष्णु को समर्पित है। इसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस दौरान विष्णु जी की पूजा करना मंगलमय होता है। इस मास में आने वाली पूर्णिमा पर विष्णु जी के श्री सत्यनारायण अवतार की अराधना की जाती है। साथ ही व्रत भी किया जाता है। अधिक मास की पूर्णिमा पर स्नान, दान-पुण्य करने पर व्यक्ति को कई गुना लाभ प्राप्त होता है। इस दौरान व्यक्ति श्री सत्यनारायण की कथा भी सुनते हैं। इससे व्यक्ति को मिलने वाला लाभ दोगुना हो जाता है।</div><div><br></div><div>सर्वसिद्धिदायिनी तिथि: स्कंदपुराण और पद्मपुराण के अनुसार, अधिकमास की पूर्णिमा को 'सर्वसिद्धिदायिनी' माना गया है। इस दिन किए गए जप, तप और दान का पुण्य कभी खत्म नहीं होता।</div><div><br></div><div>श्रीहरि और महालक्ष्मी की कृपा: अधिकमास के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु/ पुरुषोत्तम हैं। इस दिन उनकी पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और धन-धान्य की कमी नहीं होती।</div><div><br></div><h2>ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;&nbsp;</h2><div>हिन्दू धर्म में ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा का व्रत बहुत खास है, इसलिए इससे जुड़ी एक कथा भी प्रचलित है। पुराणों में प्रचलित एक कथा के अनुसार एक ब्राह्मण कांतिका नगर में रहता था। इसका नाम धनेश्वर था। धनेश्वर की कोई संतान नहीं थी। ब्राह्मण अपना गुजारा दान मांगकर करता था। इसी तरह एक बार ब्राह्मण की पत्नी भी दान मांगने गई। लेकिन नगर में से किसी ने भी ब्राह्मण की पत्नी को दान नहीं दिया। इसका कारण था कि वो नि:संतान थी। जब वो दान मांग रही थी तब उसे एक व्यक्ति ने सलाह दी कि वो मां काली की आराधना करे। सलाह के अनुसार, ब्राह्मण दंपत्ति ने 16 दिन तक मां काली की आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर मां काली स्वंय प्रकट हुईं। साथ ही ब्राह्मण दंपत्ति को संतान प्राप्त की वरदान दिया। उन्होंने कहा कि वो अपने सामर्थ्य अनुसार, आटे के दीप हर पूर्णिमा को जलाने होंगे। हर पूर्णिमा को एक-एक दीपक बढ़ा देना होगा। यह कर्क पूर्णिमा तक करना होगा। इस पूर्णिमा तक पूरे 22 दीए अवश्य ही जलाने होंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>मां काली ने कहा कि एक आम के पेड़ से आम तोड़कर अपनी पत्नी को देना होगा। जैसा-जैसा देवी ने कहा वैसा-वैसा ब्राह्मण ने किया। उसने एक आम के पेड़ से आम तोड़कर अपनी पत्नी को पूजा के लिए दिए। इसके बाद उसकी पत्नी गर्भवती हो गई। उसने एक बालक को जन्म दिया। उस बालक का नाम देवदास रखा गया। बड़ा होकर वह काशी पढ़ने के लिए गया। देवदास के साथ उसका मामा भी काशी गया। दोनों के साथ रास्ते में एक घटना हुई। देवदास का प्रचंशवश विवाह हो गया। हालांकि, देवदास ने पहले ही बता दिया था उसकी आयु ज्यादा नहीं है। लेकिन उसका विवाह जबरदस्ती करा दिया गया। कुछ समय बाद उसे मारने के लिए काल आया लेकिन उसके माता-पिता द्वारा किया गया पूर्णिमा व्रत का फल उसे मिला और काल उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया।&nbsp;</div><div><br></div><h2>&nbsp;ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा व्रत से मिलती है मानसिक शांति&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से पूर्ण होता है। इस दिन चंद्र देव की पूजा और उन्हें अर्घ्य देने से कुंडली का चंद्र दोष दूर होता है और मानसिक तनाव से राहत मिलती है।</div><div><br></div><h2>ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा के दिन करें ये चीजें दान, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>ज्येष्ठ का महीना होने के कारण गर्मी बहुत होती है, पंडितों के अनुसार अधिकमास की पूर्णिमा पर जल से भरी मटकी (घड़ा), सत्तू, आम, खरबूजा, पंखा, वस्त्र या अन्न का दान करना महापुण्यदायी माना जाता है। किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान जरूर दें।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 30 May 2026 18:35:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/performing-acts-of-charity-and-merit-on-adhikmas-purnima-yields-spiritual-benefits</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Eid ul Azha 2026: कुर्बानी और सब्र का पर्व बकरीद, जानें हजरत इब्राहिम के Ultimate Test की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/bakrid-festival-of-sacrifice-and-patience-learn-story-of-hazrat-ibrahim-ultimate-test]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज 28 मई 2026 को देशभर में ईद-उल-अजहा का पर्व मनाया जा रहा है। भारत में इसको बकरीद भी कहा जाता है। बकरीद इस्लाम धर्म का सबसे प्रमुख पर्व है। इस पर्व को कुर्बानी की ईद के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि इस दिन जानवर की कुर्बानी दी जाती है। ईद उल-अजहा का पर्व मुख्य रूप से समर्पण, त्याग और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास का पर्व है। इसके अलावा यह दिन भाईचारे को बढ़ावा देने, अल्लाह का शुक्र अदा करने और जरूरतमंदों की मदद करने के लिए खास माना जाता है।</div><div><br></div><h2>इतिहास और महत्व</h2><div>इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक ईद-उल-अजहा का संबंध हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत इस्माइल के बेहद मुश्किल इम्तिहान से है। धार्मिक मान्यता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के ख्वाब में आकर उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने के लिए कहा। अल्लाह के हुक्म पर इब्राहिम अलैहिस्सलाम के लिए अपने अपने बेटे हजरत इस्माइल सबसे प्रिय थे।</div><div><br></div><div>अल्लाह की रजा के लिए इब्राहिम अलैहिस्सलाम अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए। जैसे ही उन्होंने कुर्बानी के लिए अपने बेटे की गर्दन पर छूरी रखी, अल्लाह ने उनकी ईमानदारी और जज्बे को कुबूल किया। वहीं जिब्रईल के जरिए हजरत इस्माइल की जगह एक भेड़ को रख दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>बता दें कि इस ऐतिहासिक पल को याद करने के लिए हर साल दुनिया भरके मुसलमान अल्लाह की राह में जानवरों की कुर्बानी देते हैं। जिसको 'सुन्नत-ए-इब्राहिम' भी कहा जाता है।</div><div><br></div><h2>कैसे मनाते हैं यह पर्व</h2><div>ईद के दिन सुबह सभी मुसलमान नए कपड़े पहनकर ईदगाह या मस्दिज में एकत्र होते हैं। फिर ईद-उल-अजहा की दो रकात अदा करते हैं। नमाज के बाद खुशहाली और अमन-चैन की दुआ की जाती है। नमाज अदा करने के बाद ऊंट, भेड़, बकरे या अन्य हलाल जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। वहीं इस्लाम में गोश्त को सिर्फ अपने पास रखने की इजाजत नहीं है, इसलिए सामाजिक संदेश मजबूत करने के लिए इसको 3 बराकर के हिस्सों में बांटा जाता है।</div><div><br></div><div>पहला हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है।</div><div><br></div><div>दूसरा हिस्सा दोस्तों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों को दिया जाता है।</div><div><br></div><div>फिर तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए होता है।</div><div><br></div><h2>संदेश</h2><div>इस पर्व का असली संदेश समर्पण, त्याग और इंसानियत से जुड़ा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई के लिए सोचना ही अल्लाह की सच्ची इबादत है। इस दिन घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं और लोग एक-दूसरे के गले मिलकर ईद मुबारक कहते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 10:13:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/bakrid-festival-of-sacrifice-and-patience-learn-story-of-hazrat-ibrahim-ultimate-test</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Adhik Maas में आया Padmini Ekadashi का दुर्लभ संयोग, भगवान विष्णु की कृपा से मिलेगा विशेष फल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-rare-conjunction-of-padmini-ekadashi-occurs-during-adhik-maas]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। प्रत्येक माह में दो एकादशियाँ आती हैं और सभी एकादशियाँ भगवान विष्णु को समर्पित होती हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत पुण्यदायी और दुर्लभ एकादशी है पद्मिनी एकादशी। यह एकादशी केवल अधिक मास में आती है, इसलिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत का पालन करता है, उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।</div><div><br></div><div>पद्मिनी एकादशी का वर्णन पुराणों में विस्तार से मिलता है। कहा जाता है कि अधिक मास को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना गया है और इस मास में आने वाली पद्मिनी एकादशी विशेष फल प्रदान करती है। ‘पद्मिनी’ शब्द का अर्थ होता है ‘कमल के समान पवित्र और सुंदर’। यह एकादशी मनुष्य के जीवन को भी कमल की तरह निर्मल और उज्ज्वल बनाने का संदेश देती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-padmini-ekadashi-fast-grants-liberation-from-all-sins" target="_blank">Padmini Ekadashi 2026: पदमिनी एकादशी व्रत से मिलती है सभी पापों से मुक्ति</a></h3><div>पौराणिक कथा के अनुसार त्रेता युग में कृतवीर्य नामक एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम पद्मिनी था। राजा के पास सब कुछ होते हुए भी उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं था। संतान प्राप्ति की इच्छा से राजा और रानी वन में जाकर तपस्या करने लगे। वर्षों तक कठिन तपस्या के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिली। तब एक दिन माता अनुसूया ने रानी पद्मिनी को अधिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया। रानी ने पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ यह व्रत किया। इसके प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। यही कारण है कि इस एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाने लगा।</div><div><br></div><div>पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने वाले भक्त प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। घर और मंदिर को स्वच्छ कर दीप, धूप, पुष्प, तुलसी और फल अर्पित किए जाते हैं। भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन सात्विक जीवन अपनाने और मन, वचन तथा कर्म की पवित्रता बनाए रखने की सलाह दी जाती है। कई लोग इस दिन निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ भक्त फलाहार करके व्रत का पालन करते हैं। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण किया जाता है।</div><div><br></div><div>इस व्रत का आध्यात्मिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। एकादशी का दिन आत्मसंयम, साधना और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। पद्मिनी एकादशी मनुष्य को यह शिक्षा देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और श्रद्धा बनाए रखनी चाहिए। जब मनुष्य सच्चे मन से ईश्वर की आराधना करता है, तब उसके जीवन की बाधाएँ दूर होने लगती हैं।</div><div><br></div><div>धार्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को अनेक यज्ञों और तीर्थों के समान पुण्य प्राप्त होता है। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करने से पुण्यफल कई गुना बढ़ जाता है। साथ ही यह व्रत मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।</div><div><br></div><div>वर्तमान समय में जब मनुष्य भौतिक सुखों के पीछे भागते हुए मानसिक तनाव और असंतोष का अनुभव करता है, तब पद्मिनी एकादशी जैसे पर्व हमें आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित करते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मबल को बढ़ाने का अवसर भी है। इस दिन किया गया उपवास शरीर को संयम सिखाता है और पूजा-पाठ मन को शुद्ध करता है।</div><div><br></div><div>अंततः कहा जा सकता है कि पद्मिनी एकादशी श्रद्धा, तप, भक्ति और संयम का पावन पर्व है। यह मनुष्य को धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए यह एक अत्यंत शुभ अवसर माना जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार इस व्रत का पालन करना चाहिए तथा अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाने का प्रयास करना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 12:00:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-rare-conjunction-of-padmini-ekadashi-occurs-during-adhik-maas</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Padmini Ekadashi 2026: पदमिनी एकादशी व्रत से मिलती है सभी पापों से मुक्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-padmini-ekadashi-fast-grants-liberation-from-all-sins]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज पदमिनी एकादशी व्रत है, ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनायी जानी ली एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। अधिकमास की पद्मिनी एकादशी को भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा की जाती है और व्रत रखा जाता है, जिससे भक्तों को पुण्य फल मिलता है तो आइए हम आपको पदमिनी एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें पदमिनी एकादशी व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>एकादशी हिंदू धर्म का बहुत ही महत्वपूर्ण और शुभ दिन माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा की जाती है और व्रत रखा जाता है, जिससे भक्तों को पुण्य फल मिलता है। ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता है। अधिकमास की पद्मिनी एकादशी बुधवार, 27 मई 2026 को मनाई जाएगी। यह एकादशी हर तीन साल में एक बार आती है और भगवान विष्णु की पूजा के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/today-padmini-ekadashi-of-adhik-maas-note-best-time-for-vishnu-puja" target="_blank">Padmini Ekadashi 2026: Adhik Maas की Padmini Ekadashi आज, नोट कर लें Vishnu Puja का उत्तम मुहूर्त</a></h3><h2>जानें अधिकमास के बारे में खास बातें&nbsp;&nbsp;</h2><div>हिंदू कैलेंडर (चंद्रमा पर आधारित) और सूर्य कैलेंडर के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर आता है। इस अंतर को पाटने के लिए हर 3 साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। तीन साल में एक बार आने वाले इस दुर्लभ संयोग में 27 मई 2026 को पद्मिनी एकादशी और 11 जून 2026 को परमा एकादशी का व्रत रखा जाएगा। यह आध्यात्मिक उन्नति, धन-वैभव और मोक्ष प्राप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्वयं इन दोनों एकादशियों के व्रत की विधि और महत्व बताया था। चूंकि अधिकमास के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) हैं, इसलिए इन एकादशियों का फल अनंत गुना हो जाता है।</div><div><br></div><h2>पदमिनी एकादशी व्रत का महत्व&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार पदमिनी एकादशी 'परम' सिद्धियों और ऐश्वर्य को देने वाली है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से घोर दरिद्रता और आर्थिक तंगी का नाश होता है। यह अज्ञात पापों से मुक्ति देकर उत्तम गति प्रदान करती है। पद्मिनी एकादशी का महत्व स्कंद पुराण में बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत को करने का सही तरीका भी बताया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने से इंसान अपने पुराने और वर्तमान सभी पापों से मुक्ति पा सकता है। अगर कोई व्यक्ति अधिमास की एकादशी यानी पद्मिनी एकादशी का विधि-विधान से व्रत रखता है, तो उसे वैकुंठ धाम यानी भगवान विष्णु का धाम में स्थान मिलने का लाभ मिलता है।</div><div><br></div><h2>पदमिनी एकादशी व्रत की पूजा शुरू करें दशमी तिथि से&nbsp;&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार अधिकमास की एकादशी (पद्मिनी और परमा एकादशी) खास होती है। व्रत की पूर्व संध्या, एकादशी से एक दिन पहले (दशमी को) सात्विक भोजन करें। कांसे के बर्तन में भोजन करने और नमक का त्याग करने का प्रयास करें।</div><div><br></div><h2>पदमिनी एकादशी व्रत में सुबह के समय करें इन नियमों का पालन&nbsp;</h2><div>सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े (संभव हो तो पीले वस्त्र) पहनें। हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें। तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित करें।</div><div><br></div><h2>पदमिनी एकादशी पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पदमिनी एकादशी का दिन खास है, इसलिए इस दिन चौकी सजाएं, एक साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। यदि लड्डू गोपाल या विष्णु जी की धातु की मूर्ति है, तो उन्हें गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। भगवान को पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले फूल, तुलसी दल (तुलसी का पत्ता बेहद जरूरी है), धूप, दीप और नैवेद्य (पीली मिठाई या फल) अर्पित करें।</div><div><br></div><div>पदमिनी एकादशी व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें।</div><div><br></div><h2>पदमिनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक</h2><div>शास्त्रों के अनुसार यह त्रेता युग की बात है कि राजा कीतृवीर्य की कई रानियां थीं, परंतु उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हो रही थी। संतानहीन होने के कारण राजा और रानियां बहुत दुखी रहते थे। फिर एक दिन संतान की कामना से राज अपनी रानियों के साथ जंगल में तपस्या करने निकल गए। कहते हैं कि तपस्या करने से राजा की हड्डियां ही शेष रह गयी परंतु तपस्या का कोई परिणाम नहीं निकला। तब रानी ने अनुसूया मां से इसका उपाय पूछा।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>माता अनुसूया ने रानियों से अधिकमास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। रानी ने पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान मांगने के लिए कहा। रानी ने भगवान से कहा कि हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे बदले मेरे पति को वरदान दीजिये। तब भगवान ने राजा से वरदान मांगने के लिए कहा। राजा ने प्रमाण करने के बाद कहा कि आप मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण सम्पन्न हो, आपके अतिरिक्त किसी से पराजित न हो और जो तीनों लोकों में आदरणीय हो। यह सुनकर भगवान ने कहा तथास्तु! कुछ समय पश्चात रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से जाना गया। कालान्तर में यह बालक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था। इसकी तीनों लोकों में कीर्ति हो चली थी। बाद में इसे श्रीहरि विष्णु के ही अवतार परशुरामजी ने इसका वध किया था।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पदमिनी एकादशी तिथि और शुभ मुहूर्त का समय</h2><div>एकादशी तिथि शुरू- 26 मई 2026, सुबह 5:10 बजे</div><div>एकादशी तिथि समाप्त- 27 मई 2026, सुबह 6:21 बजे</div><div>पारण का समय- 28 मई 2026, सुबह 5:25 से 7:56 बजे तक</div><div>द्वादशी तिथि समाप्त- 28 मई 2026, सुबह 7:56 बजे</div><div><br></div><h2>जानें पद्मिनी एकादशी व्रत के 5 जरूरी नियम&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत अन्य एकादशियों की तुलना में थोड़ा कठिन होता है और इसके नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है। व्रत के नियम दशमी तिथि यानी एकादशी के एक दिन पहले की रात से ही शुरू हो जाते हैं। दशमी की रात को कांसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए और मांस, मदिरा, मसूर की दाल, प्याज-लहसुन जैसे तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। यह व्रत अत्यंत पवित्र है। सामर्थ्य के अनुसार इसे निर्जला अर्थात् बिना पानी के या फलाहार यानी केवल फल और पानी रखकर किया जाता है। व्रत के दिन अन्न जैसे- चावल, गेहूं आदि का सेवन पूरी तरह वर्जित है।</div><div>&nbsp;</div><div>पद्मिनी एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। इस रात भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक जलाकर रात्रि जागरण करना चाहिए और विष्णु सहस्रनाम का पाठ या भजन-कीर्तन करना चाहिए। व्रत के दिन किसी की निंदा या चुगली न करें, झूठ न बोलें और क्रोध करने से बचें। ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें और मन को पूरी तरह भगवान के चरणों में लगाएं। व्रत का पारण यानी व्रत खोलने का कार्य अगले दिन द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में ही करें। पारण करने से पहले ब्राह्मणों या किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं, दान-दक्षिणा दें और उसके बाद ही स्वयं तुलसी दल और जल ग्रहण करके व्रत खोलें।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 11:01:18 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Padmini Ekadashi 2026: Adhik Maas की Padmini Ekadashi आज, नोट कर लें Vishnu Puja का उत्तम मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/today-padmini-ekadashi-of-adhik-maas-note-best-time-for-vishnu-puja]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में एकादशी तिथि बेहद पवित्र और खास मानी जाती है। बता दें कि साल में कुल 24 एकादशी तिथियां होती है और सभी एकादशी तिथि का अपना महत्व होता है। आज यानी की 27 मई 2026 को पद्मिनी एकादशी व्रत किया जा रहा है। हिंदू पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ अधिक माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा की जाती है और व्रत किया जाता है। तो आइए जानते हैं पद्मिनी एकादशी तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>ज्योतिष पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ अधिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत 26 मई की सुबह 05:10 मिनट पर हुई है। वहीं आज यानी की 27 मई की सुबह 06:21 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर आज यानी की 27 मई 2026 को पद्मिनी एकादशी का व्रत किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और पूजा स्थल की साफ सफाई करें। सूर्य देव को जल अर्पित करें और व्रत का संकल्प लें। फिर लकड़ी की चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें। भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं और पीले कपड़े, फल-फूल, मिठाई और तुलसी माला आदि अर्पित करें। इसके बाद दीपक जलाएं और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें। वहीं शाम के समय तुलसी के पौधे के पास दीपक जरूर जलाएं।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:।</div><div>ऊँ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।ऊं</div><div>ह्रीं श्रीं लक्ष्मीवासुदेवाय नमः।</div><div>शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥.</div><div>श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।</div><div>ॐ विष्णवे नम:</div><div>ॐ हूं विष्णवे नम:</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 10:10:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/today-padmini-ekadashi-of-adhik-maas-note-best-time-for-vishnu-puja</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ganga Dussehra: Haridwar से Kashi तक आस्था की डुबकी, जानें क्यों है ये दिन इतना पावन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-dip-of-faith-from-haridwar-to-kashi-discover-why-this-day-is-so-sacred]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजा भगीरथ ने अपने पुरखों को मुक्ति प्रदान करने के लिए भगवान शिव की आराधना करके गंगा जी को स्वर्ग से उतारा था। जिस दिन वे गंगा को इस धरती पर लाए, वही दिन गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से गंगा का आगमन हुआ था। अतः इस दिन गंगा आदि का स्नान, अन्न वस्त्र आदि का दान, जप तप, उपासना और उपवास किया जाता है। इससे पापों से छुटकारा मिलता है। इस दिन गंगा पूजन का विशेष महत्व है। महर्षि व्यास ने गंगा की महिमा के बारे में पद्म पुराण में लिखा है कि अविलंब सद्गति का उपाय सोचने वाले सभी स्त्री−पुरुषों के लिए गंगा ही ऐसा तीर्थ है, जिनके दर्शन भर से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि जो मनुष्य इस दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार गंगा स्तोत्र को पढ़ता है चाहे वो दरिद्र हो, चाहे असमर्थ हो वह भी गंगा की पूजा कर वांछित फल को पाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस पर्व पर मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है खासकर गंगा किनारे के मंदिरों की सजावट इस दिन देखते ही बनती है। लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाते हैं और पवित्र नदी का पूजन करते हैं। इस पर्व की छटा उत्तर भारत में विशेष रूप से संपूर्ण उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार में अलग ही रूप में देखने को मिलती है। यहां गंगा अवसर के दिन मेले का आयोजन भी किया जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-ganga-dussehra-fast-leads-to-the-attainment-of-salvation" target="_blank">Ganga Dussehra 2026: गंगा दशहरा व्रत से होती है मोक्ष की प्राप्ति</a></h3><h2>पूजन विधि</h2><div><br></div><div>गंगाजी की पूजा करने के लिए मंत्र इस प्रकार है− 'ओम नमो भगवति हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा'। इसका अर्थ है, हे भगवति गंगे! मुझे बार−बार मिल, पवित्र कर, पवित्र कर। इस मंत्र के पठन के साथ पुष्प, दुग्ध, घी, शहद, मिष्ठान, वस्त्र इत्यादि से मां गंगा का पूजन किया जाना चाहिए तथा दान दक्षिणा दी जानी चाहिए। मां गंगा के पूजन के दौरान कोई संकल्प लेकर दस बार डुबकी लगानी चाहिए उसके बाद साफ वस्त्र पहन कर घी से चुपड़े हुए दस मुट्ठी काले तिल हाथ में लेकर जल में डाल दें। इसके बाद गंगाजी की प्रतिमा का पूजन नीचे लिखे मंत्र के साथ करें−</div><div><b><br></b></div><div><b>नमो भगवत्यै दशपापहरायै गंगायै नारायण्यै रेवत्यै।</b></div><div><b>शिवायै अमृतायै विश्वरूपिण्यै नन्दिन्यै ते नमो नमः।।</b></div><div><br></div><div>तत्पश्चात् भगवान नारायण, शिव, ब्रह्मा, सूर्य, राजा भगीरथ व हिमालय को वहां उपस्थित मानकर उनका भी पूजन करना चाहिए। इस दिन सोने अथवा चांदी के मछली, कछुए और मेंढ़क बनाकर उनकी पूजा कर नदी में डालने की भी विधान है। अगर सोने−चांदी के नहीं बनवा पाएं तो आटे के भी बनाए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त दस सेर तिल, दस सेर जौ और दस सेर गेहूं दस ब्राह्मणों को दान दें। इस दिन पुण्य सलिला गंगा का जन्मदिन मनाया जाता है। गंगा को पृथ्वी पर लाने की योजना महाराजा सगर ने बनाई थी। महाराजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने मिलकर अपने श्रम को सफल बनाया था।</div><div><br></div><h2>गंगा दशहर व्रत कथा</h2><div><br></div><div>एक बार महाराज सगर ने बड़ा व्यापक यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला, पर इन्द्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था। परिणामतः अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल छान मारा, पर अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खोदने पर उन्होंने देखा कि साक्षात भगवान महर्षि कपिल के रूप में तपस्या कर रहे हैं। उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है। प्रजा उन्हें देखकर चोर चोर कहने लगी। महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सारी प्रजा भस्म हो गयी।</div><div><br></div><div>इन मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था। उस तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने गंगा की मांग की। इस पर ब्रह्मा ने पूछा− राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो परन्तु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल लेगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है। इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शंकर का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए।</div><div><br></div><div>महाराज भगीरथ ने वैसा ही किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमण्डल से छोड़ा। तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं। इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका। अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई। उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया। तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिवाजी की जटाओं से छूटकर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ीं।</div><div><br></div><div>इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगावतरण करके बड़े भाग्यशाली हुए। उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ के कष्टमयी साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं देतीं, मुक्ति भी देती हैं। इसी कारण भारत तथा विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 10:35:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-dip-of-faith-from-haridwar-to-kashi-discover-why-this-day-is-so-sacred</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ganga Dussehra 2026: गंगा दशहरा व्रत से होती है मोक्ष की प्राप्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-ganga-dussehra-fast-leads-to-the-attainment-of-salvation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज गंगा दशहरा व्रत है, गंगा दशहरा के दिन नदी में स्नान और पूजा करने से जीवन के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है तो आइए हम आपको गंगा दशहरा व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें गंगा दशहरा के बारे में कुछ खास&nbsp;</h2><div>हिंदू धर्म में गंगा दशहरा का पर्व अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। इसलिए इस दिन गंगा स्नान, दान-पुण्य और पूजा-पाठ का विशेष महत्व है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-ganga-descended-on-earth-today-learn-puja-method-and-mantra" target="_blank">Ganga Dussehra 2026: आज धरती पर हुआ था मां गंगा का अवतरण, जानें Puja Vidhi और मंत्र</a></h3><h2>गंगा दशहरा पर इस मुहूर्त में करें पूजा, होगा लाभ&nbsp; &nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस वर्ष गंगा दशहरा पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जो इस दिन की महत्ता को और बढ़ा देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण हस्त नक्षत्र में हुआ था। 2026 में हस्त नक्षत्र 26 मई की सुबह से शुरू हो रहा है, लेकिन उदयातिथि के अनुसार मुख्य पर्व 25 मई को ही मनाया जाएगा। यदि संभव हो तो गंगा नदी में स्नान करें। अगर नदी में स्नान न कर सकें तो तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर 'ओम् नमः शिवाय' और 'गंगे च यमुने चैव...' मंत्र का जप करते हुए स्नान करें।</div><div><br></div><h2>गंगा दशहरा पर बन रहे हैं ये संयोग</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगा दशहरा के दिन रवि योग और व्यतिपात योग बन रहे हैं। इस दिन इन विशेष योगों का होना साधना और दान-पुण्य के लिए अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>गंगा दशहरा पर स्नान-दान है विशेष मुहूर्त</h2><div>पंडितों के अनुसार सोमवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और दान का अत्यधिक महत्व होता है। ऐसे में इस दिन सुबह 4 बजकर 30 मिनट से लेकर 5 बजकर 30 मिनट तक की अवधि इन कार्यों के लिए उत्तम रहेगी। इसके अलावा, सुबह के इन शुभ मुहूर्त में भी स्नान-दान किया जा सकता है।</div><div><br></div><h2>गंगा दशहरा पर गंगा स्नान के समय करें इन मंत्रों का जाप&nbsp;</h2><div>पद्म पुराण में गंगा के महात्म्य का वर्णन किया गया है। साथ ही, गंगा स्नान के समय कुछ मंत्रों का जाप करना भी अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। कहते हैं कि ऐसा करने जातक को अनजाने में किए पापों से मुक्ति मिल सकती है। साथ ही, मनुष्य को विष्णु लोक में स्थान मिल सकता है। ऐसे में गंगा स्नान के समय इन मंत्रों का जाप अवश्य करना चाहिए।</div><div><br></div><div>- गंगा गंगेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि, मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।</div><div>- 'यत्संस्मृतिः सपदि कृन्तति दुष्कृतौघं, पापवलीं जयति योजनलक्षतोअपि। यन्नाम नाम जगदुच्चरितं पुनाति दिष्ट्या हि सा पथि दृशोर्भविताद्या गंगा।', गंगा स्नान के बाद मां गंगा की पूजा करते वक्त इन मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।</div><div>- 'द्रवीभूतं परं ब्रह्म परमानन्ददायिनी, अर्घ्यं गृहाण में गंगे पापं हर नमोस्तुते।' गंगा स्नान करते समय सूर्यदेव और मां गंगा को अर्घ्य देने का खास महत्व बताया गया है। इस दौरान इस मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए। माना जाता है कि गंगा स्नान के इन मंत्रों का जाप करने से जातक के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। क्योंकि नदियों में मां गंगा को श्रेष्ठ माना गया है।</div><div><br></div><h2>गंगा दशहरा के बारे में जानें कुछ खास बातें&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगा दशहरा देवी गंगा को समर्पित पर्व है तथा इस दिन को उस दिन के रूप में मनाया जाता है जब गंगा भागीरथ के पूर्वजों की शापित आत्माओं को शुद्ध करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुयी थीं. पृथ्वी पर आने से पूर्व, देवी गंगा भगवान ब्रह्मा के कमण्डल में निवास करती थीं और अपने साथ देवी गंगा स्वर्ग की पवित्रता को पृथ्वी पर लायी थीं। गंगा दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि, पापों के नाश और मोक्ष की प्राप्ति का दिव्य अवसर है।</div><div><br></div><h2>गंगा दशहरा से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक&nbsp;</h2><div>गंगा दशहरा के विषय पुराणों में एक कथा प्रचलित है, इस कथा के अनुसार एक बार महाराज सगर ने व्यापक यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला। इंद्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था। परिणामतः अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात्‌ भगवान 'महर्षि कपिल' के रूप में तपस्या कर रहे हैं। उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है। प्रजा उन्हें देखकर 'चोर-चोर' चिल्लाने लगी। महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सारी प्रजा भस्म हो गई। इन मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था। भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने 'गंगा' की मांग की। इस पर ब्रह्मा ने कहा- 'राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है। इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए।'</div><div><br></div><div>महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा। तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं। इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका। अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई। उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया। तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी।</div><div><br></div><div>इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करके बड़े भाग्यशाली हुए। उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों-युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ की कष्टमयी साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं देती, मुक्ति भी देती है। इसी कारण भारत तथा विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है।</div><div><br></div><h2>गंगा दशहरा पर ऐसे करें पूजा, होंगे लाभान्वित&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा नदी में स्नान करें। यदि गंगा घाट पर न जा सकें तो घर में नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय यह मंत्र बोलें: “ॐ नमः शिवाय गंगायै नमः”। स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके संकल्प लें कि आप गंगा दशहरा व्रत और पूजा कर रहे हैं। अपने मन में पापों के नाश और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। किसी स्वच्छ स्थान या नदी किनारे चौकी पर गंगा माता की तस्वीर/प्रतिमा स्थापित करें। गंगा माता को जल और पुष्प अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर आरती करें। गंगा स्तोत्र या “गंगा लहरी” का पाठ करें। शाम के समय गंगा या किसी जलाशय में दीपदान करें। 10 दीप जलाना शुभ माना जाता है (दस पापों के नाश का प्रतीक)। इस दिन 10 प्रकार के दान करना श्रेष्ठ माना गया है। जल, अन्न, वस्त्र, फल, घड़ा, छाता, पंखा आदि ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को दान दें। “ॐ गंगायै नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 10:12:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-ganga-dussehra-fast-leads-to-the-attainment-of-salvation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ganga Dussehra 2026: आज धरती पर हुआ था मां गंगा का अवतरण, जानें Puja Vidhi और मंत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-ganga-descended-on-earth-today-learn-puja-method-and-mantra]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 25 मई 2026 को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन मां गंगा स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थीं। इस कारण इस दिन गंगा दशहरा का पर्व भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान करने और दान-पुण्य करने से जातक को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं गंगा दशहरा का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में।</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि की शुरुआत 25 मई 2026 की सुबह 04:30 मिनट पर हुई थी। वहीं अगले दिन यानी 26 मई 2026 की सुबह 05:10 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 25 मई 2026 को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इसके बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें और मंदिर की साफ-सफाई कर दीपक जलाएं। इस दौरान मां गंगा की पूजा और आरती करें। वहीं मंत्रों का जाप करें और गंगा दशहरा का पाठ करें। वहीं इस दिन अन्न-धन समेत आदि चीजों का दान करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>इन बातों का रखें ध्यान</h2><div>इस दिन गंगा नदी में स्नान करना चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><div>अगर आप किसी कारणवश गंगा स्नान के लिए नहीं जा सकते हैं, तो घर पर नहाने के पानी में गंगाजल डालकर स्नान करना चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><div>पूजा के समय श्रीगंगा स्त्रोत और मंत्रों का जाप करना चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><div>गंगा दशहरा के दिन 10 चीजों के दान का विशेष महत्व होता है। इससे धन लाभ के योग बनते हैं और मां गंगा की कृपा प्राप्त होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 10:11:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-ganga-descended-on-earth-today-learn-puja-method-and-mantra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Varada Chaturthi 2026: अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत से जीवन के विघ्न होते हैं दूर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-adhikmas-varada-chaturthi-vrat-removes-obstacles-from-one-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत है, हिन्दू धर्म में इस व्रत को बहुत पवित्र माना जाता है। अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत से जीवन में सुख समृद्धि आती है तो आइए हम आपको अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें अधिकमास वरदा चतुर्थी के बारे में&nbsp;</h2><div>अधिकमास वरदा चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित एक अत्यंत शुभ और पवित्र तिथि मानी गई है, क्योंकि यह अधिक मास की शुक्ल चतुर्थी को पड़ती है। इसे वरद चतुर्थी या वरद विनायक चतुर्थी के नाम से भी कहते हैं। इस साल यह त्योहार बुधवार 20 मई को पड़ रहा है। यह दिन 'वरदा' अर्थात वरदान देने वाला माना गया है इसलिए&nbsp; इस दिन यदि आप गणेश जी की पूजा में इस मंत्रों के जप द्वारा उसकी विशेष कृपा प्राप्त कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2>अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी का शुभ मुहूर्त</h2><div>अधिकमास की वरदा चतुर्थी 19 मई 2026 को दोपहर 2 बजकर 18 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 20 मई 2026 को सुबह 11 बजकर 06 मिनट पर समाप्त होगी।</div><div><br></div><div>चतुर्थी मध्याह्न मुहूर्त - सुबह 10:56 - सुबह 11:06</div><div>वर्जित चंद्रदर्शन का समय - सुबह 8.43 - रात 11.08</div><div><br></div><h2>इसलिए खास है अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत&nbsp;&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस मास को "अतिशय पुण्यप्रद मास" कहा गया है, इसीलिये इसमें किया गया गणपति व्रत सहस्र गुणा पुण्यदायी होता है। ये व्रत समस्त प्रकार की समस्याओं से मुक्त कर उन्हें सुख, शान्ति एवं समृद्धि प्रदान करता है। ग्रंथों के अनुसार मलमास की चतुर्थी व्रत का पालन करने से व्यक्ति के पूर्वजन्म के दोष और वर्तमान जीवन के विघ्न दूर होते हैं। ये व्रत साधक के लौकिक और पारलौकिक, दोनों तरह के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है. साथ ही इसके प्रताप से पितृगणों एवं देवताओं की तृप्ति भी होती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/when-even-pandava-bhima-not-lift-statue-of-bhairav-??baba-this-miraculous-temple-in-delhi" target="_blank">Bhairav ​​Nath Temple: जब पांडव भीम भी नहीं उठा पाए थे Bhairav Baba की प्रतिमा, Delhi में है ये चमत्कारी मंदिर</a></h3><h2>अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा, होगा लाभ</h2><div>पंडितों के अनुसार वरदा चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थान को शुद्ध करके चौकी पर भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। पूजा के दौरान गणपति बप्पा को सिंदूर का तिलक अर्पित करें, क्योंकि यह उन्हें अत्यंत प्रिय माना जाता है। गणेश जी की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व बताया गया है, पूजा करते समय “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए 21 दूर्वा दल अर्पित करें। इसके बाद भगवान गणेश को मोदक या उनके प्रिय मिठाई का भोग लगाएं, विधि-विधान से विघ्नहर्ता गणेश की आराधना करें और अंत में आरती उतारें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वरदा चतुर्थी का व्रत करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। इस दिन गणेश पूजन के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना और अपनी क्षमता अनुसार दान देना शुभ माना जाता है। पंडितों के अनुसार “ॐ गणेशाय नमः” मंत्र का जाप करने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं और स्वास्थ्य संबंधी कष्टों में भी राहत मिलती है।</div><div><br></div><h2>अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत पर गणेश जी को सिंदुर चढ़ाने का मंत्र</h2><div>&nbsp;</div><div><b>सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् । शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥</b></div><div><br></div><div>शास्त्रों के अनुसार धार्मिक दृष्टि से सिंदूर ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। गणेश जी को सिंदूर अर्पित करने से मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।</div><div><br></div><h2>अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत पर जरूर करें ये काम</h2><div>पंडितों के अनुसार अधिकमास वरदा विनायक का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है इसलिए वरदा चतुर्थी पर दिनभर उपवास (व्रत) रखतें हैं और मध्याह्न (दोपहर) में गणेश जी की पूजा करें। भगवान गणेश को सिंदूर बहुत प्रिय है, ऐसे में वरदा चतुर्थी की पूजा में उन्हें सिंदूर का तिलक जरूर लगाएं। 'श्री गणेशाय नमः दूर्वांकुरान् समर्पयामि।' मंत्र का जप करते हुए गणेश जी को 21 दुर्वा (दूब) अर्पित करें। चतुर्थी पर बप्पा की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। पूजा के बाद जरूरतमंदों को अपनी क्षमता के अनुसार अन्न या धन का दान करें।</div><div><br></div><h2>अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी का धार्मिक महत्व भी है खास</h2><div>धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर भविष्य पुराण के अनुसार, अधिकमास में की जाने वाली वरदा विनायक चतुर्थी का व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है। पंडितों के अनुसार इस व्रत का पालन करने से सामान्य 12 मासों की चतुर्थी व्रत के बराबर या उससे भी अधिक पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत सभी प्रकार के विघ्नों को दूर कर जीवन में सुख, शांति, धन, संतान, यश और दीर्घायु प्रदान करता है। इसे आत्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के कल्याण का मार्ग माना गया है।</div><div><br></div><h2>जानें अधिकमास वरदा विनायक चतुर्थी व्रत का महत्व&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार अधिकमास को ‘अतिशय पुण्यप्रद मास’ कहा गया है, इसलिए इस समय किए गए गणपति व्रत का विशेष महत्व होता है। इस व्रत से पूर्व जन्म के दोष और वर्तमान जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। यह व्रत साधक को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है और पितृगणों तथा देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है।</div><div><br></div><h2>अधिकमास विनायक चतुर्थी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा&nbsp;</h2><div>पुराणों में अधिकमास विनायक चतुर्थी व्रत से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती शिवजी के साथ चौपड़ खेल रही थीं। उन्हें खेल खेलने में बड़ी ही दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। वो ये सोच रहे थे कि आखिर इस खेल की हार-जीत का फैसला कौन करेगा। इसके लिए घास-फूस से एक बालक बनाया गया और उसमें प्राण प्रतिष्ठा की गई। साथ ही उस बालक पर हार-जीत का दारोमदार सौंपा गया। खेल में तीन बार पार्वती जी जीतीं। लेकिन बालक ने गलतफहमी ने महादेव को विजेता बता दिया। इस पर पार्वती जी को बहुत गुस्सा आया और उस बालक को कीचड़ में रहने का श्राप दे दिया। बालक ने माता पार्वती से माफी मांगी। तब उन्होंने कहा कि एक वर्ष बाद यहां नागकन्याएं आएंगी। जैसे वो कहें उसी के अनुसार गणेश चतुर्थी का व्रत करना। इससे तुम्हारे कष्ट दूर हो जाएंगे।</div><div><br></div><div>इसके बाद उस बालक ने गणेश जी की उपासना की। उनकी भक्ति देख गणेश जी बेहद प्रसन्न हो गए। गणेश जी ने उन्हें अपने माता-पिता यानी भगवान शिव-पार्वती के पास जाने का वरदान दिया। वह बालक कैलाश पहुंच गया। शिवजी ने भी पार्वती जी को मनाने के लिए 21 दिन तक गणेश जी का व्रत किया। इसके बाद पार्वती जी मान गईं। इसके बाद अपने पुत्र से मिलने के लिए पार्वती जी ने भी 21 दिन तक व्रत किया। मान्यता है कि वह बालक कार्तिकेय थे।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 14:27:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-adhikmas-varada-chaturthi-vrat-removes-obstacles-from-one-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Vat Savitri Vrat 2026: जानें क्यों है यह व्रत इतना खास, कैसे मिलेगा अखंड सौभाग्य का वरदान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/discover-why-this-fast-is-so-special-and-how-to-receive-the-boon-of-eternal-marital-bliss]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वट सावित्री व्रत सौभाग्य देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है। यह स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन सत्यवान सावित्री तथा यमराज की पूजा की जाती है। सावित्री ने इस व्रत के प्रभाव से अपने मृतक पति सत्यवान को धर्मराज से छुड़ाया था।</div><div><br></div><h2>पूजा विधान</h2><div><br></div><div>वट वृक्ष के नीचे मिट्टी की बनी सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यम की मूर्ति स्थापित कर पूजा करनी चाहिए तथा बड़ की जड़ में पानी देना चाहिए। पूजा के लिए जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप होनी चाहिए। जल से वट वृक्ष को सींच कर तने को चारों ओर कच्चा धागा लपेट कर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद सत्यवान−सावित्री की कथा सुननी चाहिए। इसके बाद भीगे हुए चनों का बायना निकालकर उस पर यथाशक्ति रुपए रखकर अपनी सास को देना चाहिए तथा उनके चरण स्पर्श करने चाहिएं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/women-observe-the-vat-savitri-vrat-for-eternal-marital-bliss" target="_blank">Vat Savitri Vrat 2026: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं करती हैं वट सावित्री व्रत</a></h3><h2>वट सावित्री व्रत कथा</h2><div><br></div><div>मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नी सहित संतान के लिए सावित्री देवी का विधिपूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने का वर प्राप्त किया। सर्वगुण संपन्न देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपति के घर कन्या के रूप में जन्म लिया। कन्या के युवा होने पर अश्वपति ने अपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पति चुनने के लिए भेज दिया। सावित्री अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर जब लौटी तो उसी दिन महर्षि नारद उनके यहां पधारे। नारदजी के पूछने पर सावित्री ने कहा कि महाराज द्युमत्सेन जिनका राज्य हर लिया गया है, जो अंधे हो गए हैं और अपनी पत्नी सहित वनों की खाक छानते फिर रहे हैं, उन्हीं के इकलौते पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरण कर लिया है।</div><div><br></div><div>नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहों की गणना कर अश्वपति को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणों की भूरि−भूरि प्रशंसा की और बताया कि सावित्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति का चेहरा मुरझा गया। उन्होंने सावित्री से किसी अन्य को अपना पति चुनने की सलाह दी परंतु सावित्री ने उत्तर दिया कि आर्य कन्या होने के नाते जब मैं सत्यवान का वरण कर चुकी हूं तो अब वे चाहे अल्पायु हों या दीर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने हृदय में स्थान नहीं दे सकती।</div><div><br></div><div>सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय ज्ञात कर लिया। दोनों का विवाह हो गया। सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल में रहने लगी। नारदजी द्वारा बताये हुए दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया। नारदजी द्वारा निश्चित तिथि को जब सत्यवान लकड़ी काटने जंगल के लिए चला तो सास−श्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी। सत्यवान जंगल में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिए वृक्ष पर चढ़ा। वृक्ष पर चढ़ने के बाद उसके सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी। वह नीचे उतरा। सावित्री ने उसे बड़ के पेड़ के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी जांघ पर रख लिया। देखते ही देखते यमराज ने ब्रह्माजी के विधान की रूपरेखा सावित्री के सामने स्पष्ट की और सत्यवान के प्राणों को लेकर चल दिये। 'कहीं−कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डंस लिया था।' सावित्री सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे−पीछे चल दी। पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लौट जाने का आदेश दिया। इस पर वह बोली महाराज जहां पति वहीं पत्नी। यही धर्म है, यही मर्यादा है।</div><div><br></div><div>सावित्री की धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले कि पति के प्राणों के अतिरिक्त कुछ भी मांग लो। सावित्री ने यमराज से सास−श्वसुर के आंखों की ज्योति और दीर्घायु मांगी। यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ गए। सावित्री यमराज का पीछा करती रही। यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापस लौट जाने को कहा तो सावित्री बोली कि पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नहीं। यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान मांगने के लिए कहा। इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की। तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिये। सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही। इस बार सावित्री ने यमराज से सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा। तथास्तु कहकर जब यमराज आगे बढ़े तो सावित्री बोली आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं मां किस प्रकार बन सकती हूं। अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए।</div><div><br></div><div>सावित्री की धर्मिनष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया। सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था। सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा। प्रसन्नचित सावित्री अपने सास−श्वसुर के पास पहुंची तो उन्हें नेत्र ज्योति प्राप्त हो गई। इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें मिल गया। आगे चलकर सावित्री सौ पुत्रों की मां बनी। इस प्रकार चारों दिशाएं सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की कीर्ति से गूंज उठीं।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 12:48:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/discover-why-this-fast-is-so-special-and-how-to-receive-the-boon-of-eternal-marital-bliss</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Vat Savitri Vrat 2026: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं करती हैं वट सावित्री व्रत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/women-observe-the-vat-savitri-vrat-for-eternal-marital-bliss]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज वट सावित्री व्रत है, हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह त्योहार पति की लंबी आयु, और अच्छी सेहत एवं वैवाहिक जीवन में सुख-शांति का प्रतीक है तो आइए हम आपको वट सावित्री व्रत का महत्व और पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें वट सावित्री व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। इस साल ज्येष्ठ अमावस्या 16 मई, शनिवार को पड़ रही है, इसलिए उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में इसी दिन वट सावित्री व्रत मनाया जाएगा। व्रत के दौरान महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर धागा बांधकर परिक्रमा लगाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और बुद्धिमानी से यमराज से सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यही कारण है कि इस व्रत को पति की लंबी आयु और अटूट दांपत्य प्रेम का प्रतीक माना जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/married-women-will-observe-the-vat-savitri-vrat-for-the-longevity-of-their-husbands" target="_blank">Vat Savitri Vrat 2026: पति की लंबी आयु के लिए सुहागिनें 16 मई को रखेंगी वट सावित्री व्रत</a></h3><h2>वट सावित्री व्रत का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>पंचांग के अनुसार, वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस बार अमावस्या तिथि 16 मई 2026, शनिवार के दिन सुबह 05 बजकर 12 मिनट पर शुरू हो जाएगी। जबकि, अमावस्या तिथि का समापन 16 मई की देर रात 01 बजकर 31 मिनट पर होगा। वट सावित्री व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद वट वृक्ष की पूजा करना शुभ माना जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>इसलिए खास है यह वट सावित्री व्रत</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता सावित्री ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और पतिव्रत धर्म के बल पर यमराज को उनके पति सत्यवान के प्राण लौटाने पर मजबूर कर दिया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यमदेव ने बरगद (वट) के पेड़ के नीचे ही सत्यवान को पुनर्जीवन दिया था। इसीलिए इस दिन पर विशेष तौर से वट वृक्ष की पूजा को साक्षात ईश्वर की आराधना माना जाता है।</div><div><br></div><h2>वट सावित्री व्रत में जरूर अर्पित करें ये चीजें</h2><div>पंडितों के अनुसार वट सावित्री व्रत के दिन वट वृक्ष की पूजा के दौरान सूती वस्त्र, लाल फूल, सिंदूर, कच्चा सूत, अक्षत (अटूट चावल), जनेऊ, चंदन और पान-सुपारी अर्पित करने चाहिए। इसके बाद पेड़ के पास घी का दीपक जलाएं और अपनी श्रद्धा के अनुसार, पेड़ के चारों ओर 7 या 108 बार परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत या मौली (लाल/पीला धागा) लपेटें। ऐसा करने से वैवाहिक संबंध मजबूत होते हैं।</div><div><br></div><h2>वट सावित्री व्रत में माता सावित्री को अर्पित करें शृंगार</h2><div>शास्त्रों के अनुसार व्रत के दौरान केवल पेड़ की ही नहीं, बल्कि माता सावित्री की भी विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। माता को सिंदूर, कुमकुम, मेहंदी, चूड़ियां और बिंदी जैसी शृंगार की सामग्री जरूर चढ़ाएं। मान्यता है कि माता सावित्री को सुहाग का सामान चढ़ाने से व्रती महिला को 'अखंड सौभाग्य' का आशीर्वाद मिलता है।</div><div><br></div><h2>वट सावित्री व्रत है महिलाओं के लिए खास&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट अमावस्या का व्रत बहुत प्रभावी माना जाता है जिसमें सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु एवं सभी प्रकार की सुख-समृद्धियों की कामना करती हैं। इस दिन स्त्रियां व्रत रखकर वट वृक्ष के पास पहुंचकर धूप-दीप नैवेद्य से पूजा करती हैं तथा रोली और अक्षत चढ़ाकर वट वृक्ष पर कलावा बांधती हैं। साथ ही हाथ जोड़कर वृक्ष की परिक्रमा लेती हैं। जिससे पति के जीवन में आने वाली अदृश्य बाधाएं दूर होती हैं तथा सुख-समृद्धि के साथ लंबी उम्र प्राप्त होती है। वटवृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति व्रत की प्रभाव से मृत पड़े सत्यवान को पुनः जीवित किया था। तभी से इस व्रत को वट सावित्री नाम से ही जाना जाता है। इसमें वटवृक्ष की श्रद्धा भक्ति के साथ पूजा की जाती है। महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य एवं कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं। सौभाग्यवती महिलाएं श्रद्धा के साथ ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक उपवास रखती हैं।</div><div><br></div><h2>वट सावित्री व्रत का महत्व</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास माना जाता है। इसे अक्षय वट के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और माता सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती हैं। वट सावित्री व्रत के दिन जरूरतमंदों लोगों को कपड़े, भोजन और अन्य जरूरी वस्तुओं का दान करना अत्यंत शुभ फल देने वाला माना जाता है।</div><div><br></div><h2>वट सावित्री व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक</h2><div>हिन्दू मान्यताओं के अनुसार एक समय मद्र देश में अश्वपति नाम का राजा राज करता था। वह अत्यंत ही दयालु एवं धार्मिक प्रवृत्ति का था, लेकिन उसके कोई संतान न थी। जिसके बाद उसके यहां एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम उसने सावित्री रखा। जब सावित्री बड़ी हुई तो उसने विवाह के लिए सत्यवान नाम के नवयुवक को चुना। जब यह बात देवर्षि नारद को जब यह बात पता चली तो उन्होंने सावित्री के पिता अश्वपति को बताया कि जिस सत्यवान् से सावित्री विवाह करने जा रही है, उसकी आयु बहुत कम है, ऐसे में उसे कोई दूसरा वर चुनना चाहिए। नारद मुनि से यह बात पता चलते ही राजा अश्वपति ने सावित्री को बहुत समझाने का प्रयास किया, लेकिन सावित्री ने यह तर्क देते हुए अपनी बात पर अड़ी रही कि हिन्दू स्त्रियां वर के रूप में केवल एक ही बार किसी पुरुष को चुनती हैं. इसके बाद राजा अश्वपति ने ने सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ कर दिया।</div><div><br></div><div>सत्यवान के पिता का नाम द्युमत्सेन था, जिनका राजपाट छिन चुका था. सत्यवान के माता और पिता दोनों की दृष्टि भी जा चुकी थी और वे वन में रहा करते थे। विवाह के बाद सावित्री भी अपने पति के सत्यवान के साथ उसी वन में रहकर अपने पति के साथ सास-ससुर की सेवा करने लगी। कुछ दिनों बाद नारद मुनि सावित्री के पास आए और उसे बताया कि अब सत्यवान की मृत्यु का समय आ गया है। जब यह बात सावित्री को पता चली तो उसने अपने पति की लंबी आयु की प्राप्ति के लिए उपवास करना प्रारंभ कर दिया।&nbsp; सत्यवान उस दिन जब जंगल में लकड़ी काटने के लिए जाने लगा तो सावित्र भी उसके साथ गई। जंगल में सत्यवान जब लकड़ी काट रहा था तो उसके सिर में अचानक से बहुत ज्यादा पीड़ा होने लगी औ वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। सावित्री ने अचानक देखा कि वहां पर यम देवता अपने दूतों के साथ आ पहुंचे हैं। इसके बाद जब यमराज सत्यवान के प्राण हर ने के बाद दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। सावित्री को पीछे आता देख यमराज ने कहा कि हे पतिव्रता नारी! जहां तक तमु अपने पति का साथ दे सकती थी तुमने दिया, अब तुम वापस लौट जाओ। तब सावित्री ने कहा कि "जहां मेरे पति रहेंगे, मुझे भी उनके साथ वहीं रहना है. यही मेरा पति के प्रति धर्म है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सावित्री की बात को सुनकर यमराज प्रसन्न हो गये और उन्होंने उससे वर मांगने को कहा। तब सावित्री ने उनसे अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी लौटाने को कहा। यमराज ने तथास्तु कहते हुए सावित्री को लौट जाने को कहा, लेकिन फिर सावित्री उनके पीछे-पीछे चलती रही। सावित्री की पतिव्रता को देखते हुए एक बार फिर यमराज ने उससे वर मांगने को कहा। तब सावित्री ने उनसे अपने सास-ससुर से खोया हुआ राज्य वापस मांगा. यमराज ने तथास्तु कहते हुए उसकी यह मनोकामना भी पूरी कर दी, लेकिन सावित्री फिर भी यम देवता के पीछे-पीछे चलती रही। सावित्री के द्वारा पतिव्रत धर्म को निभाता देख एक बार फिर यमराज ने सावित्री से वर मांगने को कहा, तब उसने बोला मैं सत्यवान के 100 पुत्रों की मां बनना चाहती हूं। यमराज ने सावित्री के पतिव्रता को देखते हुए यह वरदान भी दिया और सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिये। इस प्रकार सावित्री ने न सिर्फ अपने पति के प्राण बल्कि अपने सास-ससुर की दृष्टि और राज्य को भी वापस दिलवा दिया। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस वट सावित्री की इस पावन कथा को कहने या सुनने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>वट सावित्री पर भूल कर न करें ये काम</h2><div>पंडितों के अनुसार पूजा के बाद बरगद के फल या कोपल (नई पत्ती) को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसके साथ ही वट वृक्ष के नीचे बैठकर सावित्री-सत्यवान की कथा जरूर पढ़ें या सुनें, तभी आपका व्रत पूर्ण माना जाता है। चूंकि इस बार यह व्रत शनिवार के दिन पड़ रहा है, जो कि शनिदेव का दिन है, इसलिए इस दिन शनिदेव की पूजा से भी आपको अद्भुत लाभ देखने को मिल सकते हैं।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 12:15:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/women-observe-the-vat-savitri-vrat-for-eternal-marital-bliss</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shani Jayanti 2026: ज्येष्ठ अमावस्या पर अद्भुत संयोग, इस Puja Vidhi से बरसेगी शनिदेव की कृपा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/wonderful-coincidence-on-jyeshtha-amavasya-this-puja-vidhi-shower-shanidev-blessings]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में शनिदेव को न्याय और कर्मफल देवता माना जाता है। शनि देव व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर फल देते हैं। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और अन्य कई धार्मिक ग्रंथों में शनि देव को न्यायाधीश का पद मिलने की कथा का उल्लेख है। शास्त्रों के मुताबिक ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को शनिदेव का जन्म हुआ था। इस कारण हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को शनि जयंती मनाई जाती है। इस बार 16 मई 2026 को शनि जयंती मनाई जाती है। वहीं शनिवार का दिन पड़ने के कारण इसका महत्व और भी अधिक माना जा रहा है। तो आइए जानते इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक इस बार 16 मई की सुबह 05:11 मिनट से ज्येष्ठ माह के अमावस्या तिथि की शुरूआत होगी। वहीं 17 मई की रात 01:30 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 16 मई 2026 को शनि जयंती मनाई जाएगी।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। इस दिन नीले रंग के कपड़े पहनने चाहिए। फिर सूर्योदय से पहले पीपल के पेड़ को जल अर्पित करें और पीपल पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इसके बाद शनिदेव को उड़द दाल, काले तिल, नीले फूल और तेल आदि अर्पित करें। अगर घर के पास शनि मंदिर है तो वहां पर पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठें और चाहें तो घर के मंदिर में भी बैठ सकते हैं। अब रुद्राक्ष की माला से शनि देव के मंत्रों का जाप करें।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ओम शं शनैश्चराय नमः</div><div><br></div><div>ओम शन्नो देविर्भिष्ठयः आपो भवन्तु पीतये।</div><div><br></div><div>ओम नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्‌।&nbsp;</div><div>छाया मार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्‌।।</div><div><br></div><div>ओम प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 08:35:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/wonderful-coincidence-on-jyeshtha-amavasya-this-puja-vidhi-shower-shanidev-blessings</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vat Savitri Vrat 2026: पति की लंबी आयु के लिए Vat Savitri Vrat 2026 पर करें यह खास Upay, जानें बरगद Puja का सही समय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/for-long-life-of-husband-do-this-special-remedy-on-vat-savitri-vrat-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत को सबसे अहम और बड़ा व्रत माना जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए व्रत किया जाता है। इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को वट सावित्री व्रत किया जाएगा। इस बार 16 मई 2026 को वट सावित्री व्रत रखा जा रहा है। मान्यता के मुताबिक इस दिन माता सावित्री ने अपने सतीत्व और दृढ़ संकल्प के चलते यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। तब से वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>वट सावित्री व्रत 2026</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस बार 16 मई 2026 की सुबह 05:12 मिनट पर अमावस्या तिथि शुरू हो जाएगी। वहीं 16 मई की रात 01:31 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 16 मई 2026 को वट सावित्री व्रत किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>शुभ मुहूर्त</h2><div>वट सावित्री व्रत के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद वट वृक्ष की पूजा करना शुभ माना जाता है। वट वृक्ष की पूजा के लिए सुबह का समय विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। वट सावित्री व्रत करने वाली महिलाएं सुबह 10:26 मिनट तक सौभाग्य योग में पूजा कर सकती हैं। इस दिन शनि अमावस्या भी है। ऐसे में शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव को कम करने का भी यह एक उत्तम दिन माना जाता है।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव तीनों देवताओं का वास माना जाता है। इसको अक्षय वट के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और जीवन में सुख-शांति के लिए व्रत करती हैं। वहीं सत्यवान और सावित्री की कथा सुनती हैं। इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन, कपड़े और अन्य जरूरी वस्तुओं का दान करना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 08:08:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/for-long-life-of-husband-do-this-special-remedy-on-vat-savitri-vrat-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vat Savitri Vrat 2026: पति की लंबी आयु के लिए सुहागिनें 16 मई को रखेंगी वट सावित्री व्रत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/married-women-will-observe-the-vat-savitri-vrat-for-the-longevity-of-their-husbands]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इस बार वट सावित्री व्रत और सोमवती अमावस्या का खास संयोग बन रहा है। वट सावित्री व्रत 16 मई को है। ज्येष्ठ मास में पड़ने वाले सारे व्रतों में वट सावित्री व्रत को बहुत प्रभावी माना जाता है। जिसमें सौभाग्यवती महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सभी प्रकार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार वट सावित्री व्रत 16 मई को पड़ रहा है। वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस्या तक उत्तर भारत में और ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में इन्हीं तिथियों में वट सावित्री व्रत दक्षिण भारत में मनाया जाता है। वट सावित्री व्रत को उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा समेत कई जगहों पर मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जितनी उम्र बरगद के पेड़ की होती है, सुहागिनें भी बरगद के पेड़ की उम्र के बराबर अपने पति की उम्र मांगती हैं। हिंदू धर्म में बरगद का वृक्ष पूजनीय माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इस वृक्ष की पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसके अलावा इस दिन जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें।</div><div>&nbsp;</div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन महिलाएं व्रत रखकर वट वृक्ष के पास जाकर धूप, दीप नैवेद्य आदि से पूजा करती हैं। साथ ही रोली और अक्षत चढ़ाकर वट वृक्ष पर कलावा बांधती हैं और हाथ जोड़कर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं। जिससे उनके पति के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और लंबी उम्र की प्राप्ति होती है। वहीं सोमवती अमावस्या पर स्नान, दान, पितरों की पूजा और धन प्राप्ति के खास उपाय भी किए जाते हैं। अमावस्या तिथि के दिन महिलाएं बांस की टोकरी में सप्त धान्य के ऊपर ब्रह्मा और वट सावित्री और दूसरी टोकरी में सत्यवान एवं सावित्री की प्रतिमा स्थापित करके वट के समीप जाकर पूजन करती हैं। साथ ही इस दिन यम का भी पूजन करती हैं और वट की परिक्रमा करते समय 108 बार वट वृक्ष में कलावा लपेटा जाता है। मंत्र का जाप करते हुए सावित्री को अर्घ्य दिया जाता है। वहीं सौभाग्य पिटारी और पूजा सामग्री किसी योग्य साधक को दी जाती है। इस व्रत में सत्यवान और सावित्री की कथा का श्रवण किया जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/celebrate-shani-jayanti-on-may-16th-here-is-how-to-please-lord-shani-dev" target="_blank">Shani Jayanti 2026: 16 मई को मनाएं शनि जयंती, इस प्रकार करें भगवान शनिदेव को प्रसन्न</a></h3><h2>वट सावित्री व्रत</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के मुताबिक वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर रखा जाता है। ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई को प्रातः 05:11 मिनट से शुरू होगी और इसका समापन 17 मई को देर रात&nbsp; 01:30 मिनट पर होगी। ऐसे में 16 मई 2026 को वट सावित्री व्रत का व्रत रखा जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए होता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, सफलता, सेहत और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जला उपवास रखती हैं। इसके प्रभाव से रिश्तों में प्रेम-विश्वास और खुशियां वास करती हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>शुभ योग&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार 16 मई को शनि जयंती के साथ शनिश्चरी अमावस्या का भी योग बन रहा है, जिससे यह दिन दोगुना फलदायी हो गया है। शनि अमावस्या पर व्रत और शनि देव की पूजा का विशेष महत्व होता है, इसलिए इस बार का संयोग भक्तों के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है। इसके अलावा इस दिन सौभाग्य योग और शोभन योग भी बन रहे हैं। सौभाग्य योग 15 मई दोपहर 2:21 बजे से 16 मई सुबह 10:26 बजे तक रहेगा, जिसके बाद शोभन योग शुरू होगा और यह 17 मई सुबह 6:15 बजे तक प्रभावी रहेगा। इन दोनों योगों को शुभ कार्यों और पूजा-पाठ के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। शनि जयंती के दिन भरणी नक्षत्र प्रातःकाल से लेकर शाम 5:30 बजे तक रहेगा, इसके बाद कृत्तिका नक्षत्र का प्रभाव शुरू होगा। भरणी नक्षत्र के स्वामी शुक्र और देवता यमराज माने जाते हैं, जबकि कृत्तिका नक्षत्र के स्वामी सूर्य और देवता अग्नि हैं। इन सभी संयोगों के कारण इस वर्ष शनि जयंती का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।</div><div><br></div><h2>पूजन सामग्री</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि वट सावित्री व्रत की पूजन सामग्री में सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां, धूप, दीप, घी, बांस का पंखा, लाल कलावा, सुहाग का समान, कच्चा सूत, चना (भिगोया हुआ), बरगद का फल, जल से भरा कलश आदि शामिल करना चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><h2>पूजा विधि</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन प्रातःकाल घर की सफाई कर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें। इसके बाद पवित्र जल का पूरे घर में छिड़काव करें। बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें। ब्रह्मा के वाम पार्श्व में सावित्री की मूर्ति स्थापित करें।&nbsp; इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान तथा सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करें।&nbsp; इन टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रखें।&nbsp; इसके बाद ब्रह्मा तथा सावित्री का पूजन करें।&nbsp; अब सावित्री और सत्यवान की पूजा करते हुए बड़ की जड़ में पानी दें। पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें। जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें। बड़ के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें। भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर अपनी सास के पैर छूकर उनका आशीष प्राप्त करें। यदि सास वहां न हो तो बायना बनाकर उन तक पहुंचाएं। पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें। इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण करना न भूलें। यह कथा पूजा करते समय दूसरों को भी सुनाएं।</div><div>&nbsp;</div><h2>महत्व</h2><div>शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष के नीचे बैठकर ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान को दोबारा जीवित कर लिया था। दूसरी कथा के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि को भगवान शिव के वरदान से वट वृक्ष के पत्ते में पैर का अंगूठा चूसते हुए बाल मुकुंद के दर्शन हुए थे, तभी से वट वृक्ष की पूजा की जाती है। वट वृक्ष की पूजा से घर में सुख-शांति, धनलक्ष्मी का भी वास होता है।</div><div>&nbsp;</div><h2>सावित्री की कथा</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि राजर्षि अश्वपति की एकमात्र संतान थीं सावित्री। सावित्री ने वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति रूप में चुना। लेकिन जब नारद जी ने उन्हें बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं, तो भी सावित्री अपने निर्णय से डिगी नहीं। वह समस्त राजवैभव त्याग कर सत्यवान के साथ उनके परिवार की सेवा करते हुए वन में रहने लगीं। जिस दिन सत्यवान के महाप्रयाण का दिन था, उस दिन वह लकड़ियां काटने जंगल गए।&nbsp; वहां मू्च्छिछत होकर गिर पड़े। उसी समय यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। तीन दिन से उपवास में रह रही सावित्री उस घड़ी को जानती थीं, अत: बिना विकल हुए उन्होंने यमराज से सत्यवान के प्राण न लेने की प्रार्थना की। लेकिन यमराज नहीं माने। तब सावित्री उनके पीछे-पीछे ही जाने लगीं। कई बार मना करने पर भी वह नहीं मानीं, तो सावित्री के साहस और त्याग से यमराज प्रसन्न हुए और कोई तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने सत्यवान के दृष्टिहीन&nbsp; माता-पिता के नेत्रों की ज्योति मांगी, उनका छिना हुआ राज्य मांगा और अपने लिए 100 पुत्रों का वरदान मांगा। तथास्तु कहने के बाद यमराज समझ गए कि सावित्री के पति को साथ ले जाना अब संभव नहीं। इसलिए उन्होंने सावित्री को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया और सत्यवान को छोड़कर वहां से अंतर्धान हो गए।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 19:07:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/married-women-will-observe-the-vat-savitri-vrat-for-the-longevity-of-their-husbands</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shani Jayanti 2026: 16 मई को मनाएं शनि जयंती, इस प्रकार करें भगवान शनिदेव को प्रसन्न]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/celebrate-shani-jayanti-on-may-16th-here-is-how-to-please-lord-shani-dev]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में शनि जयंती का विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के मुताबिक हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को शनि जयंती मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष शनि जयंती 16 मई को मनाई जाएगी। ऐसा माना जाता है कि शनि देव न्याय के देवता है और शनि जयंती के दिन विधि विधान के साथ यदि पूजा अर्चना के बाद व्रत किया जाता है तो भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि&nbsp; शनि देव सभी भक्तों को उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। लोग शनि देव को प्रसन्न करने के लिए और किसी भी तरह के कुप्रभाव से बचने के लिए कई प्रकार से आराधना करते हैं। धर्म और ज्योतिष की दृष्टि से सूर्य पुत्र शनिदेव को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि इस दिन शनिदेव की विधि पूर्वक उपासना करने से शनिजनित दोषों को कम किया जा सकता है। शनिदेव को न्यायप्रिय व कर्मों के अनुसार फल देने वाला देवता कहा गया है। अच्छे कर्म करने वालों पर शनि देव की सदैव कृपा बनी रहती है और उनकी समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है। जबकि बुरे कर्म करने वाले व्यक्ति को शनिदेव कठोर दंड देते है। शनि देव की कुदृष्टि से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि शनि जयंती के दिन कुछ उपायों को करने से शनिदेव प्रसन्न होकर अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं तो वहीं कुछ कार्य ऐसे हैं जिनको करने से वे रुष्ट हो सकते हैं, ऐसे कार्यों को इस दिन भूलकर भी न करें। शनि देव सूर्य के पुत्र हैं और मृत्यु के देवता यम के बड़े भाई हैं। शनि देव को न्यायकारी ग्रह माना जाता है। शनि की महादशा अंतर्दशा, साढ़ेसाती एवं ढैया को लोग अशुभ मानते हैं, किंतु यह हमेशा सत्य नहीं है। अनैतिक कार्य करने वाले व्यक्ति को शनि अपनी ढैया, साढ़ेसाती या महादशा में दारुण दुख देते हैं। उन्हें आकस्मिक हानि, शारीरिक विकार धन हानि एवं अपमान सहन करना पड़ता है जबकि नैतिक कार्य करने वाले लोग शनि की महादशा में फर्श से अर्श पर जाते हुए देखे गये हैं। शनि मकर एवं कुंभ राशियों के स्वामी हैं। तुला राशि में उच्च के होते हैं। यदि किसी जातक की कुंडली में शनि अच्छे भाव में है तो उसको जीवन में शनि उन्नति की ओर ले जाएंगे और इस शनि कुंडली में मेष राशि के अथवा शत्रु राशि के हो तो ऐसे व्यक्ति को कष्ट प्रदान करते हैं। शनि से डर उनको लगता है जो गलत कार्य करते हैं। जैसे घूस लेना, गरीबों को सताना, माता-पिता की सेवा ना करना, झूठी गवाही देना, अत्याचार आदि करना। शनि सबके कर्मों का हिसाब रखते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>शनि जयंती तिथि&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 16 मई को है और इस तिथि पर शनि जन्मोत्सव का पर्व मनाया जाएगा। ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई को प्रातः 05:11 मिनट से शुरू होगी और इसका समापन 17 मई को देर रात&nbsp; 01:30 मिनट पर होगी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/where-shakti-resides-with-shiva-only-such-temple-in-world" target="_blank">Baba Vaidyanath Jyotirlinga: जहां शिव के साथ विराजती हैं शक्ति, विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर</a></h3><h2>शुभ योग&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार 16 मई को शनि जयंती के साथ शनिश्चरी अमावस्या का भी योग बन रहा है, जिससे यह दिन दोगुना फलदायी हो गया है। शनि अमावस्या पर व्रत और शनि देव की पूजा का विशेष महत्व होता है, इसलिए इस बार का संयोग भक्तों के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है। इसके अलावा इस दिन सौभाग्य योग और शोभन योग भी बन रहे हैं। सौभाग्य योग 15 मई दोपहर 2:21 बजे से 16 मई सुबह 10:26 बजे तक रहेगा, जिसके बाद शोभन योग शुरू होगा और यह 17 मई सुबह 6:15 बजे तक प्रभावी रहेगा। इन दोनों योगों को शुभ कार्यों और पूजा-पाठ के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। शनि जयंती के दिन भरणी नक्षत्र प्रातःकाल से लेकर शाम 5:30 बजे तक रहेगा, इसके बाद कृत्तिका नक्षत्र का प्रभाव शुरू होगा। भरणी नक्षत्र के स्वामी शुक्र और देवता यमराज माने जाते हैं, जबकि कृत्तिका नक्षत्र के स्वामी सूर्य और देवता अग्नि हैं। इन सभी संयोगों के कारण इस वर्ष शनि जयंती का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।</div><div><br></div><h2>भगवान शनि को प्रसन्न करने के उपाय</h2><div>कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि ज्योतिषीय दृष्टि से देखें तो पीपल का संबंध शनि से माना जाता है। पीपल की जड़ में हर शनिवार को जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के चलते पीपल के पेड़ की पूजा करना और उसकी परिक्रमा करने से शनि की पीड़ा झेलनी नहीं पड़ती। वहीं पीपल का वृक्ष लगाने से शनि की कृपा प्राप्त होती है। जीवन में आए कष्टों को दूर करने के लिए शनि दोष से पीड़ित व्यक्ति को शनि जयंती से शुरू कर हर शनिवार के दिन शनिदेव के मंत्र ‘ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:’का जाप करना चाहिए। शनिदेव के आराध्य भगवान शिव हैं। इस दिन शनिदेव के साथ शिवजी पर काले तिल मिले हुए जल से अभिषेक करना चाहिए। शनि दोष की शांति के लिए प्रतिदिन महामृत्युंजय मंत्र या 'ॐ नमः शिवाय' का जाप और सुंदरकाण्ड का पाठ करना चाहिए इससे शनि देव प्रसन्न होते हैं। शनिदेव की कृपा पाने के लिए जातक को शनिवार के दिन व्रत रखना चाहिए और गरीब लोगों की सहायता करनी चाहिए, ऐसा करने से मनुष्य के कष्ट दूर होने लगते हैं। शनिदेव, हनुमानजी की पूजा करने वालों से सदैव प्रसन्न रहते हैं,इसलिए इनकी प्रसन्नता के लिए शनि पूजा के साथ-साथ हनुमान जी की भी पूजा करनी चाहिए</div><div><br></div><h2>क्या न करें</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि शनि जयंती के दिन ध्यान रखें कि घर पर लोहे से बनी कोई वस्तु ना लेकर आए। लोहे की चीजें खरीदने से भगवान शनि रुष्ट हो जाते हैं और ऐसा करने से आपकी शारीरिक और आर्थिक परेशानियां बढ़ सकती हैं। शनि जयंती के दिन इस बात का ध्यान रखें कि आप शमी या पीपल के वृक्ष को हानि न पहुचाएं, ऐसा करने से आप शनि के प्रकोप के घेरे में आ सकते हैं। सरसों का तेल, लकड़ी, जूते-चप्पल और काली उड़द को आप भूल से भी शनि जयंती पर खरीदकर नहीं लाएं,वरना आपको शनिदेव की कुदृष्टि का सामना करना पड़ सकता है। शनि जयंती पर शनि मंदिर में शनिदेव के दर्शन करने जाएं तो इस बात का ध्यान रखें कि भूल से भी उनकी आंखों को न देखें माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इनकी आखों में देख कर दर्शन करने से अनिष्ट होता हैं।&nbsp; इस दिन भूलकर भी बड़े बुर्जुर्गों का अपमान नहीं करें। शनिदेव, माता-पिता और बड़े लोगों का अनादर करने और उनसे झूठ बोलने वालों से रुष्ट होकर बुरे फल प्रदान करते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>ऐसे करें शनि देव की पूजा</h2><div>कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन सुबह उठकर नित्यकर्म और स्नानादि करने के बाद व्रत और पूजा का संकल्प लेना चाहिए।&nbsp; घर में पूजा स्थल पर शनिदेव की मूर्ति स्थापित करें। शनि देव को तेल, फूल, माला आदि चढ़ाएं। शनिदेव को काला उड़द और तिल का तेल चढ़ाना बहुत शुभ होता है। शनि देव को तेल का दीपक जलाएं और शनि चालीसा का पाठ करें। शनि देव की आरती करने के बाद हाथ जोड़कर प्रणाम करें और बाद में प्रसाद का वितरण करें। शनि जयंती के दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं तथा सामर्थ्य के अनुसार दान- पुण्य करने से लाभ मिलता है।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 18:19:50 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vrishabha Sankranti 2026: वृषभ राशि में सूर्य का प्रवेश लाएगा बड़ा Change, नोट करें पुण्यकाल का Time]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sun-entry-into-taurus-will-bring-big-change-note-time-of-punyakaal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इस साल 15 मई 2026 को वृषभ संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इस दिन सूर्य देव मेष राशि से निकलकर वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे। इस दिन का विशेष आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व माना जाता है। वृषभ संक्रांति का दिन सूर्य उपासना, दान-पुण्य और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान किए गए पुण्य कर्मों से जातक को सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं वृषभ संक्रांति की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 15 मई 2026 को 06:28 मिनट पर सूर्य देव वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे। उदयातिथि के हिसाब से 15 मई 2026 को वृषभ संक्रांति मनाई जाएगी। इस दिन सुबह 05:30 मिनट पर पुण्यकाल शुरू होगा। वहीं पुण्य काल 06:28 मिनट तक रहेगा। वहीं महा पुण्यकाल भी इतनी ही समय में रहने वाला है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और हाथ में जल लेकर व्रत और पूजा का संकल्प लें। तांबे के लोटे से सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। इस दौरान सूर्यदेव के मंत्र 'ऊँ सूर्याय नम:' या 'ऊँ घृणि सूर्याय नम:' का जप करना चाहिए। इसके बाद मंदिर में चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर सूर्यदेव की प्रतिमा को विराजमान करें। चंदन, रोली, पुष्प और अक्षत आदि अर्पित करें। देसी घी का दीपक जलाएं और आरती करें और फिर सूर्य चालीसा का पाठ करें। फल और मिठाई समेत आदि चीजों का भोग लगाएं।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>वृषभ संक्रांति का धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है। इसको शुभ बदलाव और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा-आराधना और दान-पुण्य करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति और खुशहाली बनी रहती है। इस दिन किए गए दान-पुण्य से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 11:52:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sun-entry-into-taurus-will-bring-big-change-note-time-of-punyakaal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Apara Ekadashi 2026: अपरा एकादशी पर बन रहा दिव्य संयोग, इस विधि से पूजा करने पर मिलेगा Akshay Punya]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/divine-coincidence-taking-place-on-apara-ekadashi-worshipping-this-way-give-akshay-punya]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 13 मई 2026 को अपरा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है और यह भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-आराधना की जाती है। हर महीने में दो एकादशी तिथि आती हैं- एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष की एकादशी। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को करने से जातक के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। तो आइए जानते हैं अपरा एकादशी तिथि का मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक अपरा एकादशी तिथि की शुरूआत 12 मई की दोपहर 02:52 मिनट से शुरू हो गई है। वहीं आज यानी की 13 मई की दोपहर 01:29 मिनट पर एकादशी तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर आज 13 मई को अपरा एकादशी का व्रत किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें औऱ व्रत का संकल्प लें। इसके बाद एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। पूजा के दौरान श्रीहरि को पंचामृत, अक्षत, मौली, रोली, गोपीचंदन, फल-फूल और मिठाई आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर आरती करें और भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें। पूजा के समय 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें। संभव को तो इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। वहीं पूजा के अंत में क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक अपरा एकादशी का व्रत करने से जातक के सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में भी सकारात्मकता आती है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से धन-वैभव की प्राप्ति होती है। यह व्रत सिर्फ भौतिक सुख नहीं देती है, बल्कि आध्यात्मिक और मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करती है।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय॥</div><div>ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥</div><div>मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुडध्वजः। मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥</div><div>शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम् विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।&nbsp;</div><div>लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 09:55:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/divine-coincidence-taking-place-on-apara-ekadashi-worshipping-this-way-give-akshay-punya</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Apara Ekadashi 2026: अपरा एकादशी व्रत से होती है सभी मनोकामनाएं पूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/all-wishes-are-fulfilled-through-the-observance-of-the-apara-ekadashi-fast]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अपरा एकादशी व्रत ज्येष्ठ मास में आने वाली पहली एकादशी का नाम अपरा एकादशी है। हिन्दू धर्म में घर परिवार में भी सुख समृद्धि बनी रहती है तो आइए हम आपको अपरा एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें अपरा एकादशी के बारे में&nbsp;</h2><div>अपरा एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हर महीने दो एकादशी आती हैं एक कृष्ण पक्ष (अंधेरे पखवाड़े) में और दूसरी शुक्ल पक्ष (उजले पखवाड़े) में। हर महीने की एकादशी का अलग नाम होता है। ज्येष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। पंडितों के अनुसार इस व्रत को करने से सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/do-not-make-this-mistake-during-kal-bhairav-??puja-know-important-rules-and-mantras-of-fast" target="_blank">Kal Bhairav ​​Fast Rules: Kal Bhairav Puja में भूलकर भी न करें ये Mistake, जानें व्रत के सभी जरूरी नियम और मंत्र</a></h3><h2>अपरा एकादशी का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>हिन्दू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 मई को दोपहर 2:52 बजे शुरू होगी और 13 मई को दोपहर 1:29 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत 13 मई 2026 को रखा जाएगा।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी व्रत के पारण का समय</h2><div>अपरा एकादशी व्रत में पारण (व्रत खोलना) का विशेष महत्व होता है। अपरा एकादशी का पारण 14 मई 2026 को किया जाएगा। पारण का सबसे अच्छा समय सुबह 6:04 से 8:41 बजे तक है।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>पुराणों में अपरा एकादशी कथा को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं, इसमें एक कथा सबसे अधिक प्रचलित है। इस कथा के अनुसार महिध्वज नाम का एक शासक था, जो बहुत ही दयालु था। लेकिन, उसका छोटा भाई वज्रध्वज उससे एकदम विपरीत स्वभाव का था। उसने अपने मन में अपने भाई के खिलाफ द्वेष भर रखा था। उसे अपने भाई का व्यवहार पसंद नहीं आया। वह हमेशा ही इस फिराक में रहता था कि किस तरह से राज्य को हथिया लिया जाए। वह हमेशा अपने भाई को मारने और अपनी शक्ति और राज्य प्राप्त करने के अवसर की तलाश में रहता था। एक दिन मौका पाकर उसने अपने भाई को मार दिया और एक पीपल के पेड़ के नीचे दफना दिया। अकाल मृत्यु के कारण राजा की आत्मा भटकने लगी, वह उस पेड़ के पास से गुजरने वाले हर राहगीर को परेशान करने लगी। संयोगवश एक दिन एक ऋषि उसी रास्ते से गुजर रहे थे। जब उनका सामना उस आत्मा से हुआ, तो उन्होंने उस आत्मा से अब तक मोक्ष प्राप्ति न होने का कारण पूछा। राजा की आत्मा ने अपने साथ हुए विश्वासघात की सारी कहानी ऋषि को बता दी। इसके बाद उस ऋषि ने अपनी शक्ति से, आत्मा को मुक्त कर दिया और उसे जीवन के बारे में सिखाया।</div><div><br></div><div>राजा की मुक्ति के लिए, ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत रखा और उसे प्रेत योनि से छुटकारा पाने में मदद की। द्वादशी के दिन व्रत करने से प्राप्त पुण्य उन्होंने राजा की आत्मा को अर्पित कर दिया। अपरा एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो गई और प्रेत योनि से छुटकारा मिल गया।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी का है खास महत्व&nbsp;</h2><div>हिंदू मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार इस एकादशी का महत्व भगवान कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को बताया था। जो व्यक्ति इस एकादशी व्रत और अनुष्ठान को करता है, वह अतीत और वर्तमान के पापों से छुटकारा पाता है और सकारात्मकता के मार्ग पर आगे बढ़ता है। इस एकादशी को करने का एक मुख्य कारण समाज में अपार धन, प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त करना है। यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति इस एकादशी के अनुष्ठान को अत्यंत भक्ति के साथ करके पुनर्जन्म और मृत्यु के इस चक्र से बाहर निकल सकता है और मोक्ष के अंतिम द्वार तक पहुंच सकता है।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी पर दान भी है जरूरी&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग इस व्रत को करते हैं, उन्हें कार्तिक के महीने में गंगा में पवित्र डुबकी लगाने के बराबर लाभ मिलता है। अपरा एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा करने से जो पुण्य कर्म और कर्म होते हैं, वे एक हजार गायों का दान और यज्ञ करने के बराबर होते हैं। लेकिन इस एकादशी का लाभ प्राप्त करने के लिए इसे विधिपूर्वक करना जरूरी है क्योंकि अनुष्ठान और व्रत करना ही सफलता की कुंजी है।</div><div><br></div><div>पंडितों के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत रखने से वही पुण्य मिलता है जो कार्तिक महीने में स्नान करने या गंगा किनारे पिंडदान करने से मिलता है। इसके अलावा, गोमती नदी में स्नान, कुंभ मेले के दौरान केदारनाथ के दर्शन, बद्रीनाथ में निवास और सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करने जितना फल भी इस व्रत से प्राप्त होता है।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ</h2><div>पंडितों के अनुसार अपरा एकादशी के दिन उपवास रखने से शरीर को अपने पापों से छुटकारा मिल जाएगा और वह खुद को ब्रह्मांडीय महासागरों के सामने आत्मसमर्पण कर देगा यानि उसे मत्यु और जीवन के चक्र के जीवन से छुटकारा मिल जाएगा। सभी एकादशी को करने की मूल बातें कुछ हद तक समान हैं। अपरा एकादशी करने वाले भक्त को सुबह जल्दी उठना होता है और पूजा के लिए कोई भी अनुष्ठान शुरू करने से पहले स्नान करना होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भगवान विष्णु की पूजा और पूजा के लिए पूर्व दिशा में पीले रंग का कपड़ा या लकड़ी का स्टूल भी रखा जाता है। भगवान विष्णु की तस्वीर में एक मूर्ति को कपड़े या लकड़ी के स्टूल पर बैठाया जाता है, उसके बाद दीया और अगरबत्ती जलाई जाती है। यह पूजा की शुरुआत का प्रतीक है, और अत्यंत भक्ति के साथ भगवान विष्णु से प्रार्थना करनी चाहिए। चंदन, पान, सुपारी, लौंग, फल और गंगाजल के साथ तुलसी के पत्ते डाले बिना भगवान विष्णु की गई पूजा अधूरी है। पूजा के बाद भक्त को कोई भोजन नहीं करना चाहिए और अपरा एकादशी व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। प्रसाद तैयार कर भगवान विष्णु को चढ़ाया जाता है और फिर भक्तों में वितरित किया जाता है। कुछ पर्यवेक्षक भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए विष्णु मंदिरों में भी जाते हैं।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी व्रत में करें इन नियमों का पालन, मिलेगा पुण्य&nbsp;</h2><div>पुराणों के अनुसार अपरा एकादशी का पालन करने वाले व्यक्ति को एकादशी के एक दिन पहले से ही विधि शुरू कर देनी चाहिए। एकादशी 11वें दिन पड़ती है, इसलिए दशमी को सूर्यास्त के बाद भक्त को कुछ भी नहीं खाना चाहिए। सोने से पहले भगवान की पूजा करनी चाहिए। एकादशी के दिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। उन्हें हाथ में पानी और फूल लेकर व्रत शुरू करने और पूरा करने का संकल्प लेना होता है।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी के दिन ये करें, होंगे समृद्ध</h2><div>पंडितों के अनुसार एकादशी व्रत को विधिपूर्वक करें। सुबह भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें। विष्णु जी को पीला चंदन, पीले फूल अर्पित करें। व्रत कथा का पाठ करें। भोग में तुलसी के पत्ते जरूर शामिल करें। विष्णु चालीसा का पाठ और मंत्रों का जप करें। सात्विक भोजन का सेवन करें। द्वादशी तिथि पर दान करें। दिन में भजन-कीर्तन करें और पीले कपड़े धारण करें। इस दिन जल का दान जरूर करें और घर और मंदिर में गंगाजल का छिड़काव कर शुद्ध करें।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी के दिन ये न करें&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन चावल का सेवन भूलकर भी न करें। किसी से बातचीत के दौरान अभद्र भाषा का प्रयोग न करें। किसी के बारे में गलत न सोचें। वाद- विवाद न करें। एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें। तामसिक चीजों के सेवन से दूर रहें। इसके अलावा बड़े बुर्जुगों और महिलाओं का अपमान न करें। सुबह की पूजा के बाद दिन में सोना वर्जित है। घर और मंदिर में गंदगी न होने दें। एकादशी के दिन बाल कटवाना, शेविंग करना या नाखून काटना वर्जित है। झूठ न बोलें और चुगली करने से बचें।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 18:42:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/all-wishes-are-fulfilled-through-the-observance-of-the-apara-ekadashi-fast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ekdant Sankashti Chaturthi 2026: इस खास विधि से करें Puja, Lord Ganesha हर लेंगे आपके सारे संकट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-lord-ganesha-with-this-special-method-and-he-take-away-all-troubles]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत करने से पहले भगवान गणेश की पूजा-आराधना की जाती है। वहीं ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को एकदंत संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भगवान गणेश को समर्पित है और उनकी पूजा-अर्चना करने का विधान है। इस बार आज यानी की 05 मई 2026 को एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं एकदंत संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और मंत्र आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 05 मई की सुबह 05:24 मिनट पर हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 06 मई 2026 की सुबह 07:51 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 05 मई को एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजा विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें और व्रत का संकल्प लें। अब एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर गंगाजल से अभिषेक कराएं और फूल, अक्षत, धूप-दीप और दूर्वा आदि अर्पित करें। इसके बाद सिंदूर का तिलक करें। भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और 'ऊँ गं गणपतये नम:' मंत्र का जाप करते रहें। फिर संकष्टी चतुर्थी की कथा का पाठ करें। वहीं पूरा दिन श्रद्धा और नियम के साथ व्रत करें। वहीं रात में चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>गणेश मंत्र</h2><div>ॐ गं गणपतये नमः</div><div>वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥</div><div>ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात्॥</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 05 May 2026 09:21:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-lord-ganesha-with-this-special-method-and-he-take-away-all-troubles</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Narada Jayanti 2026: ज्ञान-बुद्धि का मिलेगा वरदान, इस Special Puja विधि से करें देवर्षि को प्रसन्न]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/get-blessing-of-knowledge-and-wisdom-please-devarshi-with-this-special-puja-method]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर नारद जयंती मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवर्षि नारद प्रकट हुए थे। पौराणिक कथाओं के मुताबिक देवर्षि नारद ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में से एक हैं। वहीं भगवान श्रीहरि विष्णु के जिन 24 अवतारों के बारे में बताया गया है, उनमें से एक देवर्षि नारद हैं। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु और नारद जी की पूजा करना शुभ माना जाता है। इससे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। तो आइए जानते हैं नारद जयंती की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>द्रिक पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि की शुरूआत 02 की रात 12:51 मिनट पर होगा। वहीं अगले दिन यानी की 03 मई की रात 03:02 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं उदयातिथि के मुताबिक 02 मई 2026 को नारद जयंती मनाई जा रही है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद पूजा घर की साफ-सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव करें। फिर पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की पूजा करें और भगवान श्रीहरि को फल, ताजे फूल, चंदन और कुमकुम आदि अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप आदि के साथ विधिविधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करें। फिर नारद जी की पूजा-अर्चना करें। पूजा के दौरान श्रीहरि को पंचामृत का भोग जरूर लगाएं और उसमें तुलसी दल शामिल करें।</div><div><br></div><div>भगवान विष्णु और नारद जी की पूजा करें। इससे शुभ फल की प्राप्ति होती है। वहीं जातक पर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक नारद जयंती पर पूजा करने से बल, बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति होती है। वहीं इस दिन भगवान विष्णु के मंदिर जाकर बांसुरी अर्पित करनी चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 02 May 2026 10:08:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/get-blessing-of-knowledge-and-wisdom-please-devarshi-with-this-special-puja-method</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kurma Jayanti 2026: आज शाम करें कच्छप अवतार की पूजा, जानें Perfect Puja Vidhi और मंत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-tortoise-incarnation-this-evening-learn-perfect-puja-method-and-mantra]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में जगत के पालनहार भगवान विष्णु की पूजा सभी दुखों को दूर करने और कामनाओं को पूरा करने वाली मानी जाती है। आज यानी की 01 मई को कूर्म जयंती मनाई जा रही है। वैशाख मास की पूर्णिमा को भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लिया था। इस दिन भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की पूजा और व्रत करने से अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं कूर्म जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>द्रिक पंचांग के मुताबिक हर साल बैशाख माह की पूर्णिमा तिथि को कूर्म जयंती मनाई जाती है। 30 अप्रैल की रात 09:12 मिनट से पूर्णिमा तिथि की शुरूआत हुई है। जोकि आज यानी की 01 मई 2026 की रात 10:52 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर आज 01 मई को कूर्म जयंती मनाई जा रही है। पूजा का उत्तम मुहूर्त शाम को 04:17 मिनट से 06:56 मिनट तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजा विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर एक चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें। प्रतिमा पर गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। फिर भगवान विष्णु को पीले चंदन, केसर, हल्दी आदि से तिलक करें। अब पीले रंग के पुष्प, पीले वस्त्र, पीले फल, पीले रंग की मिठाई अर्पित करें। भगवान विष्णु के कच्छप अवतार की कथा का पाठ करें। अंत में पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और आरती करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>जो भी जातक पूरे विधि विधान से इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत आदि करता है। श्रीहरि उसकी सभी बाधाओं को हर लेते हैं। कूर्म जयंती की पूजा के पुण्यफल से जातक के पाप नष्ट होते हैं और चिंताएं दूर होती हैं। व्यक्ति को जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 01 May 2026 14:03:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-tortoise-incarnation-this-evening-learn-perfect-puja-method-and-mantra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vaishakha Purnima 2026: वैशाख पूर्णिमा पर करें ये खास काम, जानें स्नान-दान की Full Details]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/do-this-special-work-on-vaishakh-purnima-know-full-details-of-bathing-and-donation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 01 अप्रैल 2026 को सिद्धि योग में वैशाख पूर्णिमा मनाई जा रही है। आज के दिन स्नान-दान और व्रत करने का महत्व होता है। इस दिन पूजा और व्रत किया जाता है। स्नान के बाद दान करने के बाद अपनी क्षमता के मुताबिक दान करने से पाप मिटते हैं और पुण्य मिलता है। इस दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा सुनने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। वहीं प्रदोष काल में मां लक्ष्मी और रात में चंद्र देव की पूजा करके अर्घ्य देते हैं। आइए जानते हैं वैशाख पूर्णिमा के स्नान, दान, पूजा विधि और मुहूर्त और मंत्र आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैशाख पूर्णिमा तिथि की शुरूआत - 30 अप्रैल 2026 की रात 9:12 मिनट से</div><div>वैशाख पूर्णिमा तिथि का समापन - 1 मई 2026 की रात 10:52 मिनट पर</div><div>वैशाख पूर्णिमा स्नान का मुहूर्त - सुबह 04:15 से 04:58 मिनट तक, सूर्योदय बाद भी कर सकते हैं।</div><div>सत्यनारायण भगवान की पूजा का शुभ मुहूर्त - सुबह 07:20 से लेकर 10:39 मिनट तक</div><div>वैशाख पूर्णिमा पर लक्ष्मी पूजन का समय - शाम 06:56 के बाद</div><div><br></div><h2>चंद्रोदय का समय</h2><div>आज यानी की वैशाख पूर्णिमा का 06:52 मिनट पर चंद्रोदय होना है। वहीं रात में जब पूर्ण चंद्रमा निकला हो, तो अर्घ्य देकर पूजा करें। अर्घ्य देने के बाद वैशाख पूर्णिमा का व्रत और पूजा संपन्न मानी जाती है। वहीं व्रत का पारण 02 मई 2026 की सुबह 05:40 मिनट के बाद होगा।</div><div><br></div><h2>स्नान और दान की विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर गंगा स्नान करें। गंगा स्नान संभव न हो तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। फिर साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद वैशाख पूर्णिमा के व्रत और पूजा का संकल्प लें। इस दिन आप चीनी, खीर, चावल, दूध, सफेद रंग के वस्त्र, मखाना, मिश्री, चांदी आदि का दान कर सकते हैं। इसके अलावा आप जल का भी दान कर सकते हैं, इससे पुण्य लाभ होगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 01 May 2026 10:23:54 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Buddh Purnima 2026: Lord Vishnu के 9वें अवतार Gautam Buddha का महासंयोग, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/coincidence-of-gautam-buddha-9th-incarnation-of-lord-vishnu-know-method-of-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल बैसाख माह की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा मनाई जाती है। इस दिन को बैसाख पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह दिन हिंदू और बौद्ध धर्म दोनों के लिए बेहद अहम है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु के 9वें अवतार महात्मा बुद्ध का इसी दिन अवतार हुआ था। वहीं बैसाख पूर्णिमा को गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और महापरिनिर्वाण भी हुआ था। इस दिन स्नान और दान करने का विशेष महत्व माना जाता है। तो आइए जानते हैं बुद्ध पूर्णिमा की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक हर साल बैसाख माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। 30 अप्रैल 2026 की रात 09:13 मिनट से बैसाख पूर्णिमा तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 01 मई की रात 10:53 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 01 मई 2026 को बुद्ध पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>क्यों मनातें हैं बुद्ध पूर्णिमा</h2><div>गौतम बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाएं बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही घटित हुई थी। भगवान विष्णु के 9वें अवतार महात्मा बुद्ध का जन्म बैसाख पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। इसी दिन महात्मा बुद्ध को बोध गया में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। वहीं इसी दिन कुशीनगर में महात्मा बुद्ध ने सांसारिक बंधनों से पूर्ण मुक्ति प्राप्त की थी। इस दिन बौद्ध धर्म के लोग घरों में पवित्र ग्रंथ त्रिपिटक और धम्मपद का पाठ करते हैं।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। बैसाख पूर्णिमा पर सूर्य उच्च राशि मेष में और तुला राशि में चंद्रमा विराजमान होते हैं। इस दिन स्नान-दान का विशेष महत्व माना जाता है। वहीं इस दिन दान-पुण्य करने से जातक को पुण्य फल की प्राप्ति होती है। बैसाख पूर्णिमा के दिन मिट्टी के घड़े का दान करना गौ दान के समान फल प्रदान करने वाला माना जाता है। वहीं बैसाख पूर्णिमा पर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना शुभ माना जाता है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 01 May 2026 09:53:40 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bodh Gaya से Sri Lanka तक 'Vesak' की धूम, जानें दुनिया कैसे मना रही है भगवान बुद्ध का पर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/find-out-how-the-world-is-celebrating-the-festival-of-lord-buddha]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैशाखी पूर्णिमा बड़ी ही पवित्र तिथि है। दान पुण्य और धर्म कर्म के अनेक कार्य इस दिन किये जाते हैं। वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध पूर्णिमा भी मनायी जाती है। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। इसलिए हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है। यह 'सत्य विनायक पूर्णिमा' भी मानी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र दरिद्र ब्राह्मण सुदामा जब द्वारिका उनके पास मिलने पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने उनको सत्यविनायक व्रत का विधान बताया था। इसी व्रत के प्रभाव से सुदामा की सारी दरिद्रता जाती रही तथा वह सर्वसुख सम्पन्न और ऐश्वर्यशाली हो गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस दिन कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। हर देश में स्थानीय परंपराओं के हिसाब से इसे मनाया जाता है, जैसे कि श्रीलंका में इसे वेसाक कहा जाता है। इस दिन अहिंसा और सदाचार अपनाने का प्रण लिया जाता है। इस दिन मांसाहार भी नहीं किया जाता, क्योंकि महात्मा बुद्ध किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ थे। चीन, तिब्बत और विश्व के अनेक कोनों में फैले बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे अपने अपने ढंग से मनाते हैं। बिहार स्थित बोधगया नामक स्थान हिन्दू व बौद्ध धर्मावलंबियों के पवित्र तीर्थ स्थान है। गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सात वर्षों तक वन में भटकते रहे। यहां पर उन्होंने कठोर तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/buddha-purnima-will-be-celebrated-on-may-1st" target="_blank">Buddha Purnima 2026: 1 मई को मनाई जाएगी बुद्ध पूर्णिमा, इस दिन करें जरूरतमंदों को वस्त्रों का दान</a></h3><div>इस दिन बौद्ध घरों में दीपक जलाए जाते हैं और फूलों से घरों को सजाया जाता है। इस पर्व पर दुनियाभर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थना करते हैं। इस दिन बोधिवृक्ष की पूजा की जाती है। उसकी शाखाओं पर हार व रंगीन पताकाएं सजाई जाती हैं। जड़ों में दूध व सुगंधित पानी डाला जाता है और वृक्ष के आसपास दीपक जलाए जाते हैं। इस दिन पक्षियों को पिंजरे से मुक्त कर खुले आकाश में छोड़ा जाता है और गरीबों को भोजन व वस्त्र दान दिए जाते हैं। दिल्ली संग्रहालय इस दिन बुद्ध की अस्थियों को बाहर निकालता है जिससे कि बौद्ध धर्मावलंबी वहां आकर प्रार्थना कर सकें।</div><div><br></div><div>इस दिन अलग अलग पुण्य कर्म करने से अलग अलग फलों की प्राप्ति होती है। धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन धर्मराज के निमित्त जलपूर्ण कलश और पकवान दान करने से गौ दान के समान फल प्राप्त होता है। साथ ही पांच या सात ब्राह्मणों को शर्करा सहित तिल दान देने से सब पापों का क्षय हो जाता है। इस दिन यदि तिलों के जल से स्नान करके घी, चीनी और तिलों से भरा हुआ पात्र भगवान विष्णु को निवेदन करें और उन्हीं से अग्नि में आहुति दें अथवा तिल और शहद का दान करें, तिल के तेल के दीपक जलाएं, जल और तिलों का तर्पण करें अथवा गंगा आदि में स्नान करें तो व्यक्ति सब पापों से मुक्त हो जाता है। यदि इस दिन एक समय भोजन करके पूर्णिमा, चंद्रमा अथवा सत्यनारायण भगवान का व्रत करें तो सब प्रकार के सुख, संपदा और श्रेय की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><div>-शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:42:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/find-out-how-the-world-is-celebrating-the-festival-of-lord-buddha</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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