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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Gajanan Sankranti 2026: सावन की गजानन चतुर्थी आज, इन Mantras के जाप से चमक सकती है आपकी Fortune]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/today-gajanan-chaturthi-of-sawan-chanting-these-mantras-brighten-fortune]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। वहीं सावन महीने में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा करते हैं, उनके जीवन की सभी परेशानियां दूर होती हैं। साथ ही सुख-समृद्धि आती है। इस बार आज यानी की 02 अगस्त को गजानन संक्रांति का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और मंत्र आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 01 अगस्त की रात 11:07 मिनट से सावन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 02 अगस्त की सुबह 11:15 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 02 अगस्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान गणेश का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। वहीं शाम को पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी लगाकर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। फिर धूप-दीप जलाएं और भगवान गणेश को चंदन, रोली और फूल आदि अर्पित करें।</div><div><br></div><div>भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और दूर्वा अर्पित करें। इसके बाद संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं चंद्रमा निकलने पर दूध, जल, फूल और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।</div><div><br></div><div>ॐ गण गणपतए नमः।।</div><div><br></div><div>गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जंबू फल चारु भक्षणम, उमा शतम् शोक विनाश कार्यक्रम, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 09:55:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/today-gajanan-chaturthi-of-sawan-chanting-these-mantras-brighten-fortune</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Jaya Parvati Vrat 2026: जया पार्वती व्रत का समापन, जानिए Puja Vidhi और Udyapan का सही समय और नियम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/jaya-parvati-fast-concludes-know-correct-time-and-rules-for-puja-vidhi-and-udyapan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन माह की शुरूआत को चुकी है। वहीं आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से जया-विजया पार्वती व्रत शुरू हुआ था। जोकि सावन कृष्ण तृतीया यानी की 5 दिनों तक रखा जाता है। जया पार्वती व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित है। यह व्रत महिलाएं अखंड सुहाग और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं मनचाए वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं। इस बार आज यानी की 01 अगस्त को जया पार्वती व्रत का समापन किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>कैसे करें समापन</h2><div>जया पार्वती व्रत 5 दिनों तक चलने वाला विशेष व्रत है। इसको मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं रखती हैं। वहीं व्रत के अंतिम दिन विधि-विधान से उद्यापन और समापन करना शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती का पूजन करें। पूजा में भगवान शिव और मां पार्वती को अक्षत, फूल, फल, धूप-दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करें। क्योंकि माना जाता है कि बिना कथा सुने व्रत का पूजा पूरा फल मिलता है। मां पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करें और इसमें चूड़ियां, बिंदी, चुनरी, सिंदूर, मेहंदी और श्रृंगार की अन्य वस्तुएं शामिल करें।</div><div><br></div><div>इसके बाद आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए मां पार्वती और भगवान शिव से क्षमायाचना करें। वहीं अपनी श्रद्धा अनुसार ब्राह्मण, जरूरतमंद या किसी सुहागिन को फल, वस्त्र, दक्षिणा या अन्न का दान करें। प्रसाद वितरित करें और सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>धार्मिक मान्यता</h2><div>धार्मिक मान्यता है कि जो भी महिला विधिपूर्वक यह व्रत करके समापन करती हैं, उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वहीं अविवाहित कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 08:46:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/jaya-parvati-fast-concludes-know-correct-time-and-rules-for-puja-vidhi-and-udyapan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Sawan 2026: व्रत शुरू करने से पहले जरूरी है संकल्प लेना, जानें इसका सही तरीका]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/correct-method-of-taking-sankalp-before-starting-the-sawan-2026-fast]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सावन का पवित्र महीना शुरू हो चुका है। इस साल 30 जुलाई से 28 अगस्त तक भगवान शिव की पूजा का विशेष समय रहेगा। इस पूरे महीने में लाखों शिव भक्त कांवड़ यात्रा करते हैं, जबकि कई लोग हर सोमवार का व्रत रखते हैं। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर आप सावन सोमवार का व्रत कर रहे हैं तो सिर्फ व्रत रखना ही काफी नहीं होता। व्रत शुरू करने से पहले संकल्प लेना भी बहुत जरूरी माना जाता है।</p><p><strong>व्रत की शुरुआत खाने से नहीं, संकल्प से होती है</strong><br>अक्सर लोग सोचते हैं कि व्रत की शुरुआत सुबह कुछ न खाने से हो जाती है। लेकिन धार्मिक मान्यता कहती है कि व्रत की असली शुरुआत आपके मन के संकल्प से होती है। जब आप भगवान शिव के सामने पूरे विश्वास और सच्चे मन से संकल्प लेते हैं, तभी व्रत का महत्व और बढ़ जाता है।</p><p><strong>संकल्प कब लेना चाहिए?</strong><br>सावन के पहले सोमवार की सुबह संकल्प लेना सबसे शुभ माना जाता है। अगर संभव हो तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें। स्नान करें। हल्के या साफ रंग के कपड़े पहनें। भगवान शिव के सामने शांत होकर बैठें। कुछ देर मन को शांत करें और पूरे विश्वास के साथ "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें। इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rare-shiva-temples-in-mp-nagchandreshwar-and-someshwar" target="_blank" rel="noopener">Sawan 2026 Special: नागपंचमी और महाशिवरात्रि पर खुलने वाले ये Unique Temples, जानें इनकी पौराणिक परंपराएं</a></p><p><strong>संकल्प के लिए किन चीजों की जरूरत होगी?</strong><br>इस छोटी-सी पूजा के लिए आपको सिर्फ कुछ आसान चीजें चाहिए, जैसे 1 रुपये का सिक्का, थोड़े से कच्चे चावल, एक चम्मच जल, एक फूल (अगर हो तो) और शिवलिंग या भगवान शिव की तस्वीर। पूजा करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और मन को पूरी तरह पूजा में लगाएं।</p><p><strong>संकल्प कैसे लें?</strong><br>भगवान शिव की तस्वीर या शिवलिंग के सामने बैठें। अपने दाहिने हाथ में जल, चावल और 1 रुपये का सिक्का रखें। इसके बाद यह संकल्प मंत्र बोलें,<br>देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते।<br>कर्तुमिच्छाम्यहं देव श्रावण सोमवार व्रतं तव।।<br>तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।<br>कामाधाः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।</p><p><strong>इस मंत्र का मतलब: </strong>हे देवों के देव महादेव, नीलकंठ, आपको मेरा प्रणाम। मैं पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ सावन सोमवार का व्रत रखना चाहता/चाहती हूं। कृपया मुझे आशीर्वाद दें ताकि मेरा यह व्रत बिना किसी परेशानी के पूरा हो सके। मेरे मन से क्रोध, लालच, गलत इच्छाएं और अशांत करने वाले विचार दूर करें। मुझे शांत, पवित्र और हमेशा अपनी भक्ति में बनाए रखें। इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/sawan-2026-spiritual-rules-of-belpatra-plucking-explained" target="_blank" rel="noopener">Sawan 2026: सोमवार को Belpatra तोड़ने की मनाही क्यों? जानें Shivpuran के महत्वपूर्ण Rules और मान्यताओं का विश्लेषण</a></p><p><strong>संकल्प के बाद क्या करें?</strong><br>मंत्र बोलने के बाद भगवान शिव से अपने मन की इच्छा कहें। इसके बाद जल धीरे-धीरे शिवलिंग के चरणों में अर्पित करें। प्रेम और श्रद्धा से चावल चढ़ाएं। 1 रुपये का सिक्का अपने घर के मंदिर या पूजा स्थान पर रख दें। धार्मिक मान्यता है कि जब भक्त पूरे मन से भगवान शिव के सामने अपनी भावना व्यक्त करता है, तो उसकी भक्ति और भी मजबूत होती है।</p><p><strong>क्या सच में संकल्प लेना जरूरी है?</strong><br>ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संकल्प लेने से व्यक्ति का मन एक लक्ष्य पर टिकता है। इससे व्रत केवल एक परंपरा नहीं रहता, बल्कि श्रद्धा, अनुशासन और भगवान शिव के प्रति समर्पण का माध्यम बन जाता है। यही कारण है कि कई विद्वान सावन सोमवार का व्रत शुरू करने से पहले संकल्प लेने की सलाह देते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 18:59:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/correct-method-of-taking-sankalp-before-starting-the-sawan-2026-fast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Kanwar Yatra 2026: 30 जुलाई से 'बम-बम भोले' की गूंज, जानें इस Holy Journey का धार्मिक महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/chanting-of-bam-bam-bhole-begins-on-july-30-and-religious-significance-of-holy-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही भगवान शिव के भक्तों की सबसे बड़ी और धार्मिक कांवड़ यात्रा शुरू हो जाती है। पूरे उत्तर भारत में केसरिया वस्त्र पहने लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगाजल भरने के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश, गोमुख और अन्य पवित्र नदियों के तटों पर पहुंचने के लिए पैदल यात्रा करते हैं। इस दौरान भक्त अपने कंधों पर कांवड़ लेकर हर-हर महादेव के जयकारों के साथ सैकड़ों किमी की यात्रा करके स्थानीय शिव मंदिरों में पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं। तो आइए जानते हैं कांवड़ यात्रा कब से शुरू हो रही है और यह यात्रा कब समाप्त होगी।</div><div><br></div><h2>कांवड़ यात्रा 2026</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक सावन के महीने की शुरूआत के साथ ही कांवड़ यात्रा की शुरूआत हो जाती है। इस बार आज से यानी की 30 जुलाई 2026 से सावन माह की शुरूआत हुई है। वहीं 11 अगस्त 2026 को सावन शिवरात्रि के दिन से कांवड़ यात्रा की समाप्ति होगी। इस बार कुल 13 दिनों तक कांवड़ यात्रा चलेगी।</div><div><br></div><h2>जलाभिषेक की डेट</h2><div>कांवड़ यात्रा का सबसे प्रमुख दिन सावन शिवरात्रि होती है। हरिद्वार, ऋषिकेश और अन्य धामों से जल लेकर आने वाले श्रद्धालु सावन शिवरात्रि पर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। इस बार 11 अगस्त यानी की सावन शिवरात्रि पर जलाभिषेक के साथ कांवड़ यात्रा की समाप्ति होगी।</div><div><br></div><h2>क्यों निकलती है कांवड़ यात्रा</h2><div>पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला, तो भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। विष के प्रभाव से महादेव का कंठ नीला पड़ गया और उनके शरीर का ताप अधिक बढ़ गया।</div><div><br></div><div>भगवान शिव के शरीर के ताप और जलन को शांत करने के लिए देवताओं और परम शिव भक्त रावण ने पवित्र गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। तभी से सावन महीने में गंगाजल से शिवलिंग का जलाभिषेक करने और कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा चल रही है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 09:12:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/chanting-of-bam-bam-bhole-begins-on-july-30-and-religious-significance-of-holy-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Guru purnima 2026: गुरु पूर्णिमा पर्व है आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/guru-purnima-is-a-spiritually-significant-festival]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज गुरु पूर्णिमा है, गुरु पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। गुरु पूर्णिमा पर किए गए अनेक उपाय को करने से दरिद्रता दूरी होती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है तो आइए हम आपको गुरु पूर्णिमा पर्व का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें गुरु पूर्णिमा व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>हिंदू परंपरा में आषाढ़ माह की पूर्णिमा को आने वाली गुरु पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। यह दिन गुरु के प्रति आभार, सम्मान और समर्पण व्यक्त करने का अवसर होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु के मार्गदर्शन से ही जीवन में सही दिशा, ज्ञान और सफलता प्राप्त होती है। इसलिए इस दिन शिष्य अपने गुरु के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और उन्नति के द्वार खुलते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/rare-yoga-formed-on-guru-purnima-know-auspicious-time-and-method-of-worship" target="_blank">Ashadha Purnima 2026: गुरु पूर्णिमा पर बना दुर्लभ योग, जानिए शुभ Muhurat और पूजा की विधि</a></h3><div>यह महापर्व उस गुरु को समर्पित होता है जो अपने शिष्य को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु पूर्णिमा का पर्व न सिर्फ धार्मिक बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ज्यादा मायने रखता है। हिंदू मान्यता के अनुसार गुरू पूर्णिमा के पर्व पर यदि पूजा से जुड़े कुछेक उपायों को श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो न सिर्फ सिद्ध संतों का आशीर्वाद बल्कि सुख-सौभाग्य की भी प्राप्ति भी होती है।</div><h2><br>व्यास पूर्णिमा के नाम से भी प्रसिद्ध है गुरु पूर्णिमा&nbsp;</h2><div>हिन्दू धर्म में गुरु पूर्णिमा महान ऋषि वेद व्यास जी के जन्मदिवस और उनके द्वारा चारों वेदों के संकलन के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है। उन्होंने महाभारत और पुराणों की रचना कर मानवता को ज्ञान का अनमोल खजाना दिया, इसीलिए उनके सम्मान में इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसी तिथि पर महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। वेदव्यास को हिंदू धर्मग्रंथों का संकलनकर्ता और महान गुरु माना जाता है। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर लोग अपने गुरु को प्रसन्न करने के लिए उपहार भी अर्पित करते हैं। यह उपहार केवल वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक होता है। यदि उपहार गुरु की पसंद या उनकी राशि के अनुसार दिया जाए, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व सिर्फ़ एक धर्म तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के तीन प्रमुख धर्मों हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में भी इसका बहुत महत्व है। यह त्योहार हमारे गुरुओं या शिक्षकों की शिक्षाओं और उनके प्रयासों के सम्मान में मनाया जाता है। अगर हमारे मन में ज्ञान न भरा गया होता, तो हम सिर्फ़ मांस और हड्डियों का ढांचा ही होते।</div><div><br></div><div>गुरु पूर्णिमा का जश्न सिर्फ़ स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों या साधुओं तक ही सीमित नहीं है। कोई भी व्यक्ति शिक्षक हो सकता है चाहे वह आपकी मां हों जिन्होंने आपको चलना सिखाया, या आपका दोस्त जिसने आपको कोई वाद्य यंत्र या खेल सिखाया। असल में, यही असली "टीचर्स डे" (शिक्षक दिवस) है। हालांकि गुरु पूर्णिमा का महत्व सभी धर्मों के लिए एक जैसा है, लेकिन इससे जुड़ी कहानियां अलग-अलग हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>गुरु पूर्णिमा पर पीपल के पेड़ के नीचे जलाएं दीया, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार सनातन परंपरा में तुलसी के पौधे का संबंध धन की देवी मां लक्ष्मी से माना गया है, वहीं पीपल के पेड़ में श्री हरि का वास माना गया है। ऐसे में साधक को गुरु पूर्णिमा वाले दिन पीपल के पेड़ में जल अर्पित करने के बाद शुद्ध देशी घी का दीया जलाना चाहिए। इस उपाय से साधक को श्री हरि संग माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>गुरु पूर्णिमा पर देवालय पर दीया जलाना होता है शुभ&nbsp;</h2><div>हिंदू मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के मंदिर में जाकर शुद्ध देशी घी का दीया जलाने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। देवालयों में इस प्रकार दीए जलाने से जीवन के सभी दुख दूर और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।</div><div>&nbsp;</div><h2>गुरु पूर्णिमा व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक</h2><div>शास्त्रों में वर्णित गुरु पूर्णिमा की पौराणिक कथा बहुत रोचक है। इस पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक बार भ्रमण के लिए महर्षि पराशर निकले थे। इस दौरान उनकी नजर एक महिला पर पड़ी, जिसका नाम सत्यवती था। वह एक मछुआरे की बेटी थी, वह अधिक खूबसूरत थी। उसके शरीर में से मछली की गंध आती रहती थी, क्योंकि उसका जन्म मछुआरे के घर हुआ था। इसलिए उन्हें मत्स्यगंधा भी कहा जाता था। ऋषि उसे देखकर व्याकुल हो गए, लेकिन पराशर ऋषि ने सत्यवती से संतान प्रदान करने की इच्छा जाहिर की। ऋषि की ये बात सुनकर सत्यवती ने अधिक आश्चर्यचकित होकर कहा कि मैं इस तरह से अनैतिक संबंध कैसे बना सकती हूं। इस तरह से संतान का जन्म लेना व्यर्थ है। ऐसे में ऋषि ने कहा कि जो संतान तुम्हारी कोख से जन्म लेगी। वह पूरे संसार के लिए महान काम करेगी। ऋषि की बात को सत्यवती ने मान लिया, लेकिन उसनें पहले ऋषि के सामने अपनी तीन शर्त रखी। पहली शर्त यह कि संभोग क्रीडा करते समय कोई न देखें। दूसरी शर्त में कहा कि होने वाला बच्चा महान ज्ञानी होने के साथ मेरी कौमार्यता को जीवन में कभी भंग न करे। वहीं, तीसरी शर्त थी कि शरीर से आने वाली गंध फूलों की खुशबू में बदल जाएं। इसके बाद सत्यवती की कोख से एक बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम द्वैपायन रखा था जो आगे चलकर वेदव्यास कहलाएं।धार्मिक मान्यता के अनुसार, महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ माह की पूर्णिमा को हुआ। उन्हें महाभारत, अठारह पुराणों, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय वैदिक साहित्य दर्शन के रचयिता माना जाता है।</div><div><br></div><h2>भगवान शिव ने सप्तऋषियों को चुना शिष्य&nbsp;</h2><div>पुराणों के अनुसार शिव ने सप्तर्षियों को तुरंत ज्ञान नहीं दिया था। उन्होंने उन ऋषियों की कई वर्षों की कठोर तपस्या, धैर्य और अटूट पात्रता को देखा। जब सप्तर्षि पूर्णतः ‘खाली’ और ग्रहणशील हो गए, तब पहली गुरु पूर्णिमा के दिन शिव ने उन्हें योग की सूक्ष्मताएं सिखाईं।</div><div><br></div><h2>गुरु पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व&nbsp;</h2><div>पडिंतों के अनुसार गुरु पूर्णिमा का अर्थ है गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना। यह दिन शिष्य के लिए पुनर्जन्म के समान है। पूर्णिमा का चंद्रमा पूर्णता का प्रतीक है, और गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि गुरु के सान्निध्य में हमारा जीवन भी ज्ञान के प्रकाश से पूर्ण हो सकता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:28:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/guru-purnima-is-a-spiritually-significant-festival</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ashadha Purnima 2026: गुरु पूर्णिमा पर बना दुर्लभ योग, जानिए शुभ Muhurat और पूजा की विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/rare-yoga-formed-on-guru-purnima-know-auspicious-time-and-method-of-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 29 जुलाई को आषाढ़ पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है। इसको गुरु पूर्णिमा के नाम से भी जानते हैं। हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इस तिथि पर स्नान-दान का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा पर व्रत और पूजा करने से भगवान श्रीहरि विष्णु, मां लक्ष्मी और चंद्रदेव का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक 28 जुलाई की सुबह 06:18 मिनट पर पूर्णिमा तिथि की शुरूआत हुई थी। वहीं आज यानी की 29 जुलाई की शाम 04:35 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के हिसाब से आषाढ़ पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जा रही है। इस दिन स्नान और दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>दुर्लभ योग</h2><div>बता दें कि आज आषाढ़ पूर्णिमा के दिन दो दुर्लभ योग बने हैं। आज प्रीति और आयुष्मान योग बना है। वैदिक ज्योतिष में इन दोनों योगों को बेहद शुभ और मंगलकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस शुभ योग में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करने से जातक को जीवन में सफलता और समृद्धि मिलती है।</div><div><br></div><h2>दान</h2><div>आषाढ़ पूर्णिमा को अन्न और गेहूं का दान करने से जीवन में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।</div><div><br></div><div>इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को कपड़ों का दान करने से जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।</div><div><br></div><div>आषाढ़ पूर्णिमा पर जल और घी का दान करने से जीवन में आरोग्यता की प्राप्ति होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:27:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/rare-yoga-formed-on-guru-purnima-know-auspicious-time-and-method-of-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Purnima 2026: जानें आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरु पूजा का महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/guru-purnima-2026-know-the-significance-of-guru-puja-on-ashadha-purnima]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है जिसमें गुरु की पूजा का विधान है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन हमें अपने गुरुजनों के चरणों में श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। इस दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर ब्राह्मणों सहित 'गुरु परम्परा सिद्धयर्थं व्यासपूजा करिष्ये' संकल्प करके श्रीपर्गी वृक्ष की चौकी पर तत्सम धौतवस्त्र फैलाकर उस पर प्राग पर (पूर्व से पश्चिम) और उदग पर (उत्तर से दक्षिण) गन्धादि से बारह बारह रेखाएं बनाकर व्यास पीठ निश्चित करें तथा दसों दिशाओं में अक्षत छोड़कर दिग् बंधन करें। तत्पश्चात ब्रह्म, ब्रह्मा परावर शक्ति, व्यास, शुकदेव, गौडपाद, गोविन्द स्वामी और शंकराचार्य के नाम मंत्र से आह्वान आदि पूजन करके अपने दीक्षा गुरु (माता, पिता, पितामह, भ्राता आदि) की देवतुल्य पूजा करें।</div><div><br></div><div>प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धाभाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर कृतार्थ होता था। परिवार में अपने से जो भी बड़ा है, उसे गुरुतुल्य ही समझना चाहिए। जैसे माता, पिता, बड़ा भाई, बड़ी बहन आदि। इस दिन स्नान और पूजा आदि से निवृत्त होकर उत्तम वस्त्र धारण करके गुरु को वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणीमात्र के लिए कल्याणकारी व मंगल करने वाला होता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-guru-purnima-will-be-celebrated-on-july-29" target="_blank">Guru Purnima 2026: 29 जुलाई को मनाया जाएगा गुरु पूर्णिमा का पर्व</a></h3><div>कहा जाता है कि इस दिन से चार महीने तक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेद व्यास ने आज ही के दिन की थी। वेद व्यास ने ही वेद ऋचाओं का संकलन कर वेदों को चार भागों में बांटा था। उन्होंने ही महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी शामिल है। ऐसे जगत गुरु के जन्म दिवस पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है।</div><div><br></div><div>प्राचीन काल से चले आ रहे इस पर्व का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में यह दिन गुरु को सम्मानित करने का होता है। इस दिन मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं। इस दिन विद्यार्थियों को चाहिए कि अपने गुरु को वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इस दिन केवल गुरु ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:26:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/guru-purnima-2026-know-the-significance-of-guru-puja-on-ashadha-purnima</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Purnima 2026: गुरु पूजन से दूर होगा अज्ञान का अंधेरा, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worshiping-guru-dispel-darkness-of-ignorance-know-auspicious-time-and-its-importance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा हिंदू धर्म के एक बेहद महत्वपूर्ण पर्व है। इस बार आज यानी की 29 जुलाई 2026 को यह पर्व मनाया जा रहा है। गुरु पूर्णिमा के मौके पर गुरु का सम्मान, उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा को महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना, चारों वेदों का विभाजन और 18 पुराणों का संकलन कर मानव समाज को ज्ञान का अमूल्य भंडार दिया। इसलिए उनको आदिगुरु माना जाता है। तो आइए जानते हैं गुरु पूर्णिमा की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरूआत 28 जुलाई की शाम 06:19 मिनट से हुई है। जोकि 29 जुलाई की शाम 08:06 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 29 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है।।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर अपने गुरुजनों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें। अगर गुरु पास में नहीं हैं, तो उनके चित्र के जरिए उनको श्रद्धा अर्पित करें। फिर व्रत का संकल्प लें और दिनभर नियम और संयम के साथ इसका पालन करें। शाम को विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। वहीं पूजा के बाद चंद्रदेव को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>उपनिषदों और गुरु परंपरा में गुरु को त्रिदेवों यानी की ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय बताया गया है। क्यों बिना गुरु के मार्गदर्शन के आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष प्राप्त करना कठिन है। गुरु पूर्णिमा आत्ममंथन, आत्मशुद्धि और ज्ञान प्राप्ति का पर्व है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:10:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worshiping-guru-dispel-darkness-of-ignorance-know-auspicious-time-and-its-importance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Purnima 2026: 29 जुलाई को मनाया जाएगा गुरु पूर्णिमा का पर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-guru-purnima-will-be-celebrated-on-july-29]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ मास की पूर्णिमा 29 जुलाई को है। इस तिथि पर गुरु पूजा का महापर्व गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है। आम इंसान ही नहीं, भगवान ने भी गुरु से ज्ञान प्राप्त किया है। गुरु पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास की जन्म तिथि है। वेदव्यास ने वेदों का संपादन किया। 18 मुख्य पुराणों के साथ ही महाभारत, श्रीमद् भागवत कथा जैसे ग्रंथों की रचना की थी। श्रीराम ने ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र से ज्ञान प्राप्त किया, श्रीकृष्ण के गुरु सांदीपनि थे। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार, गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई को शाम 6:18 मिनट से शुरू होकर 29 जुलाई को रात 8:05 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई को मनाया जाएगा। हनुमान जी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए थे। इसीलिए गुरु का स्थान सबसे ऊंचा माना गया है। गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु की पूजा करें, अपने सामर्थ्य के अनुसार कोई उपहार दें और उनकी शिक्षाओं पर चलने का संकल्प लें। तभी जीवन में सुख-शांति के साथ ही सफलता भी मिल सकती है।</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि भारत में इस दिन को बहुत श्रद्धा- भाव से मनाया जाता है। धार्मिक शास्त्रों में भी गुरु के महत्व को बताया गया है। गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि गुरु ही भगवान तक पहुंचने का मार्ग बताते हैं। हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक गुरु पूर्णिमा है। यह शुभ दिन गुरु की पूजा और उनका सम्मान करने के लिए समर्पित है, जो ज्ञान और आत्मज्ञान के मार्ग पर व्यक्तियों का मार्गदर्शन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/simhachalam-temple-only-24-hours-of-actual-darshan" target="_blank">Simhachalam Temple में साल में सिर्फ 24 घंटे होते हैं असली दर्शन, Akshaya Tritiya पर हटती है चंदन की परत</a></h3><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि हिन्दू धर्म में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर माना गया है। इनकी पूजा का दिन होता है गुरु पूर्णिमा, जो हर साल आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा पर्व गुरुजनों को समर्पित है। शिष्य अपने गुरु देव का पूजन करेंगे। वहीं जिनके गुरु नहीं है वे अपना नया गुरु बनाएंगे। पुराणों में कहा गया है कि गुरु ब्रह्मा के समान है और मनुष्य योनि में किसी एक विशेष व्यक्ति को गुरु बनाना बेहद जरुरी है। क्योंकि गुरु अपने शिष्य का सृजन करते हुए उन्हें सही राह दिखाता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा के दिन लोग अपने ब्रह्मलीन गुरु के चरण एवं चरण पादुका की पूजा अर्चना करते हैं। गुरु पूर्णिमा के दिन अनेक मठों एवं मंदिरों पर गुरुओं की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता के अनुसार गुरु पूर्णिमा से ही वर्षा ऋतु का आरंभ होता है और आषाढ़ मास की समाप्ति होती है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान और दान का भी विशेष पुण्य बताया गया है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पूर्णिमा तिथि</h2><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार, गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई को शाम 6:18 मिनट से शुरू होकर 29 जुलाई को रात 8:05 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई को मनाया जाएगा। इस दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व भी मनाया जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2>गुरु पूर्णिमा</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि गुरु पूर्णिमा पर सुबह जल्दी उठें और सूर्य को जल चढ़ाने के बाद घर के मंदिर में पूजा करें। घर में पूजा करने के बाद अपने गुरु के घर जाएं। गुरु को ऊंचे आसन पर बैठाएं और हार-फूल, कुमकुम, चावल से पूजा करें। गुरु को मिठाई, फल और फूल चढ़ाएं। अपने सामर्थ्य के अनुसार उपहार और दक्षिणा दें। गुरु पूर्णिमा पर वेदव्यास की भी पूजा करें और उनके ग्रंथों के अध्यायों का पाठ करें। गुरु के सामने उनके उपदेशों को जीवन में उतारने का संकल्प लें।</div><div><br></div><h2>कर सकते हैं ये शुभ काम&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि आषाढ़ पूर्णिमा पर अनाज, धन, कपड़े, जूते-चप्पल, छाता, कंबल, चावल, खाना और ग्रंथों का दान कर सकते हैं। किसी गौशाला में गायों की देखभाल के लिए धन का दान करें। गायों को हरी घास खिलाएं। किसी मंदिर में पूजन सामग्री भेंट में दें। शिवलिंग पर जल, दूध चढ़ाएं। ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करते हुए शिवलिंग पर चंदन का लेप करें। हनुमान जी के सामने दीपक जलाएं और सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें। भगवान श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग तुलसी के साथ लगाएं।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास&nbsp;</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 17:58:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-guru-purnima-will-be-celebrated-on-july-29</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kokila Vrat 2026: आज अखंड सौभाग्य के लिए कोकिला व्रत, जानें Muhurat, Puja Vidhi और धार्मिक महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/kokila-fast-for-unbroken-good-fortune-know-auspicious-time-and-puja-method]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ माह की पूर्णिमा का दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-उपासना के लिए बेहद शुभ माना जाता है। वहीं इस दिन महिलाएं कोकिला व्रत करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख और सौभाग्य बना रहता है। वहीं कुंवारी लड़कियों योग्य जीवनसाथी की कामना के साथ कोकिला व्रत करती हैं। इस बार आज यानी की 28 जुलाई 2026 को कोकिला व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं कोकिला व्रत कि तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और शुभ मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरूआत 28 जुलाई की शाम 06:18 मिनट पर होगी। वहीं अगले दिन यानी की 29 जुलाई 2026 की रात 08:05 मिनच पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक यह व्रत 28 जुलाई 2026 को किया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजा का समय</h2><div>कोकिला व्रत की पूजा शाम के समय प्रदोष काल में करना शुभ माना जाता है। आज प्रदोष काल का समय शाम 07:15 मिनट से लेकर रात 09:20 मिनट तक रहेगा। इस दौरान सुहागिन महिलाएं पूजा-अर्चना कर सकती हैं।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और गंगाजल से मंदिर की सफाई करें। फिर मंदिर में भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद पवित्र मिट्टी से कोयल की छोटी प्रतिमा बनाएं। क्योंकि कोयल को मां पार्वती का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><div>इसके बाद इस कोयल की प्रतिमा को भगवान शिव और मां पार्वती की मूर्ति के पास चौकी पर स्थापित करें। फिर फूल, धूप, चंदन, दीप, बेलपत्र, भांग, धतूरा, मौसमी फल और मिठाई आदि अर्पित कर भगवान शिव और मां पार्वती की विधि-विधान से पूजा करें।&nbsp;</div><div><br></div><div>बता दें कि प्रदोष काल में कोकिला व्रत की पूजा करना सबसे फलदायी माना जाता है। पूजा के दौरान कोकिला व्रत की कथा जरूर सुनना चाहिए। अंत में मां पार्वती की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 08:15:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/kokila-fast-for-unbroken-good-fortune-know-auspicious-time-and-puja-method</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sawan 2026: इस बार 13 दिन की होगी Kanwar Yatra, जानें कब से होगी शुरू?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sawan-2026-kanwar-yatra-will-last-for-13-days-find-out-when-it-begins]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देवों के देव महादेव का सबसे प्रिय महीना सावन 30 जुलाई से शुरू हो रहा है। सावन का महीना शुरू होते ही पवित्र कांवड़ यात्रा भी आरंभ हो जाएगी। इस बार सावन की शुरुआत 30 जुलाई, गुरुवार से हो रही है, इसलिए इसी दिन से यात्रा शुरू होगी। इस यात्रा का समापन सावन शिवरात्रि के दिन यानी 11 अगस्त, मंगलवार को होगा। मुख्य रूप से कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त तक चलेगी, हालांकि कई जगह यह पूरे सावन चलती है।</p><p><strong>3 से 11 अगस्त का समय रहेगा बेहद खास</strong><br>3 अगस्त को सावन का पहला सोमवार है और 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि है। इसलिए 3 से 11 अगस्त के बीच सड़कों और मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलेगी। इस दौरान शिव भक्त 'हर हर महादेव' और 'बम बम भोले' के जयकारे लगाते हुए अपने घरों और मंदिरों की ओर बढ़ते हैं। इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/shravan-2026-month-16-somvar-vrat-rules-and-mantra-analysis" target="_blank" rel="noopener">Shravan Month 2026 Rules: सावन व्रत में भगवान शिव के सामने जरूर बोलें ये एक मंत्र, पूरी होगी हर Wish</a></p><p><strong>सावन में कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व</strong><br>कांवड़ यात्रा को बहुत ही शुभ और पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने में भगवान शिव की पूजा करने से जितना पुण्य मिलता है, उससे कहीं ज्यादा पुण्य कांवड़ यात्रा से मिलता है। भक्त नंगे पांव पैदल चलकर या गाड़ियों से पवित्र नदियों का जल लाते हैं और शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। माना जाता है कि कांवड़ उठाने और जल चढ़ाने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं, भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं और मोक्ष के द्वार खोलते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 17:45:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sawan-2026-kanwar-yatra-will-last-for-13-days-find-out-when-it-begins</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jaya Parvati Vrat 2026: 27 जुलाई से 31 जुलाई तक चलेगा आस्था का पर्व, जानें Shubh Muhurat और व्रत पारण की Date]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/festival-of-faith-run-from-july-27-to-july-31-know-auspicious-time-and-date-of-breaking-fast]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में जया पार्वती के व्रत का खास महत्व होता है। इसमें लगातार 5 दिनों तक व्रत किया जाता है। इस दौरान भगवान शिव और मां पार्वती की जया के रूप में पूजा की जाती है। जया पार्वती व्रत अविवाहित कन्याएं और विवाहित महिलाएं दोनों रखती हैं। कुंवारी लड़कियां योग्य पति के लिए यह व्रत करती हैं। वहीं शादीशुदा महिला पति की लंबी उम्र और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए यह व्रत करती हैं। इसके साथ ही संतान प्राप्ति के लिए भी जया पार्वती व्रत रखा जाता है। तो आइए जानते हैं जया पार्वती व्रत की तिथि, महूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक हर साल आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से जया पार्वती व्रत की शुरूआत होती है। इस बार 26 जुलाई 2026 की दोपहर 01:57 मिनट से त्रयोदशी तिथि की शुरूआत हुई थी। इस तिथि की समाप्ति आज यानी 27 जुलाई की दोपहर 04:14 मिनट पर होगा। ऐसे में जया पार्वती व्रत 27 जुलाई को शुरू हो रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद शुद्ध कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर में एक छोटे पात्र में पानी में ज्वार और गेहूं के दाने बोएं। अब पात्र के ऊपर 3 या 7 बार कलावा लपेटें। जिसको कुमकुम से रंग लें। लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान शिव और मां पार्वती की मूर्ति को स्थापित करें। फिर हाथ में जल लेकर व्रत रखने का संकल्प लें।&nbsp; इसके बाद भगवान शिव और मां पार्वती को जल, चंदन, अक्षत, वस्त्र, श्रृंगार का सामान, फल, फूल और मिठाई आदि अर्पित करें।</div><div><br></div><div>घी का दीपक जलाकर 'ऊँ नम: शिवाय' और 'ऊँ पार्वतीपतये नम:' मंत्र का 11 या 21 बार जाप करें। इसके बाद जया पार्वती व्रत की कथा पढ़ें और आरती करें। वहीं पूजा के अंत में क्षमायाचना करके पूजा का समापन करें।</div><div><br></div><h2>व्रत के नियम</h2><div>व्रत के हर दिन गेहूं, ज्वार और शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करें।</div><div>5 दिन व्रत के दौरान आप सिर्फ दूध, फल, दही, फलों का जूस और दूध से बनी चीजों का सेवन करें।</div><div>इस व्रत में नमक वाला भोजन नहीं किया जाता है।</div><div>वहीं 5 दिनों तक अनाज नहीं खाना चाहिए।</div><div>व्रत में सभी तरह की सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए।</div><div>दोपहर के समय सोना नहीं चाहिए।</div><div>बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए।</div><div>5वें दिन रात में सोने के बजाय जागरण करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>व्रत की समापन तिथि</h2><div>हर साल आषाढ़ माह की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर जया पार्वती व्रत की समाप्ति होती है। इस बार 31 जुलाई 2026 को जया पार्वती व्रत का समापन होगा। लेकिन इन 5 दिनों के व्रत का पारण 01 अगस्त 2026 को किया जाएगा। जया पार्वती व्रत लगातार 5, 7, 9 या 11 वर्षों तक करना होगा है। वहीं अधिकतम 20 सालों तक करने का नियम है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 11:02:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/festival-of-faith-run-from-july-27-to-july-31-know-auspicious-time-and-date-of-breaking-fast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ravi Pradosh Vrat 2026: Ravi Pradosh Vrat पर दूर होंगी जीवन की सभी बाधाएं, शाम को इस Muhurat में करें Lord Shiva की आराधना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/obstacles-in-life-removed-on-ravi-pradosh-vrat-worship-lord-shiva-in-auspicious-evening]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 26 जुलाई 2026 को आषाढ़ मास का आखिरी प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। इस दिन भगवान शिव की पूजा-उपासना करने का विधान है। वैदिक पंचांग के मुताबिक हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी पर यह व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति आती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। आषाढ़ माह का यह प्रदोष व्रत रविवार को पड़ रहा है, इसलिए इसको रवि प्रदोष व्रत कहा जा रहा है। तो आइए जानते हैं रवि प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...&nbsp;</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरूआत 26 जुलाई की दोपहर 01:58 मिनट पर होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति 27 जुलाई 2026 की शाम 04:15 मिनट पर होगी। ऐसे में प्रदोष काल का व्रत 26 जुलाई 2026 को किया जा रहा है।</div><div><br></div><div>बता दें कि प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल में करना बेहद शुभ माना जाता है। आज पूजा का शुभ मुहूर्त 26 जुलाई की शाम 07:16 मिनट से लेकर रात 09:21 मिनट तक है। इस अवधि में भगवान शिव की पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। फिर 11 या 21 धतूरा, बेलपत्र, सुपारी, फल, आक के फूल, लौंग, फूल, इलायची, धूप, दीप, चावल और गंध आदि नौवेद्य आद अर्पित करें। इसके बाद शक्कर और घी से बनी मिठाई का भोग अर्पित करें। फिर शिव के मंत्र और शिव चालीसा का पाठ करें।</div><div><br></div><div>अब प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें और अंत में घी का दीपक जलाकर भगवान शिव की आरती करें। पूरा दिन व्रत रखें और भगवान शिव का मन में स्मरण करते रहें। शाम के समय फिर स्नान आदि करें। वहीं प्रदोष काल में भगवान शिव की पूरे विधि-विधान से पूजा और आरती करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 10:51:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/obstacles-in-life-removed-on-ravi-pradosh-vrat-worship-lord-shiva-in-auspicious-evening</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Devshayni Ekadashi 2026: भगवान विष्णु के शयन के साथ चतुर्मास शुरू, जानें क्या हैं पूजा के नियम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/chaturmas-begins-with-lord-vishnu-entering-his-slumber-learn-the-rules-of-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। कहीं कहीं इस तिथि को पद्मनाभा भी कहा जाता है। इसी दिन से चौमासे का आरम्भ हो जाता है। इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु क्षीर सागर में शयन करते हैं। इस दिन उपवास करके श्री हरि विष्णु की सोना, चांदी, तांबा या पीतल की मूर्ति बनवाकर उसका षोडशोपचार सहित पूजन करके पीताम्बर आदि से विभूषित कर सफेद चादर से ढके गद्दे तकिये वाले पलंग पर उसे शयन कराना चाहिए।</div><div><br></div><div>पुराणों में ऐसा भी मत है कि भगवान विष्णु इस दिन से चार मास तक पाताल में राजा बलि के द्वार पर निवास करके कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं। इसी प्रयोजन से इस दिन को देवशयनी तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी कहते हैं। इन चार माह तक सभी मांगलिक कार्य बंद रहते हैं। व्यक्ति को चाहिए कि इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि अथवा अभीष्ट के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग और ग्रहण करें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/chaturmas-begins-with-devshayani-ekadashi-know-auspicious-time-for-vishnu-worship" target="_blank">Devshayani Ekadashi 2026: Devshayani Ekadashi से Chaturmas शुरू, जानें Lord Vishnu पूजा का Muhurat</a></h3><h2>इस दिन त्याग करें</h2><div><br></div><div>मधुर स्वर के लिए गुड़ का, दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए तेल का, शत्रु नाश आदि के लिए कड़वे तेल का, सौभाग्य के लिए मीठे तेल का और स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का त्याग करें।</div><div><br></div><h2>इस दिन ग्रहण करें</h2><div><br></div><div>देह शुद्धि या सुंदरता के लिए परिमित प्रमाण के पंचगव्य का, वंश वृद्धि के लिए नियमित दूध का, कुरुक्षेत्र आदि के समान फल मिलने के लिए बर्तन में भोजन करने की बजाय पत्र का तथा सर्वपाप क्षय पूर्वक सकल पुण्य फल प्राप्त होने के लिए एकभुक्त, नक्तव्रत, अयाचित भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें। चतुर्मासीय व्रतों में भी कुछ वर्जनाएं हैं। जैसे- पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि शाक पात्र खाना त्याग देना चाहिए। इन दिनों अर्थात् इन चार माह में तपस्वी भ्रमण नहीं करते, वे एक ही स्थान पर रहकर तप कार्य करते हैं। इन दिनों केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है क्योंकि इन चार महीनों में पृथ्वी के सभी तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते हैं। इस व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।</div><div><br></div><h2>देवशयनी एकादशी व्रत कथा</h2><div><br></div><div>एक बार देवऋषि नारदजी ने ब्रह्माजी से इस एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की, तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि सतयुग में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। राजा इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके राज्य में शीघ्र ही भयंकर अकाल पड़ने वाला है। उनके राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा। इससे चारों ओर त्राहि त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन, पिण्डदान, कथा व्रत आदि सबमें कमी हो गई।</div><div><br></div><div>दुखी राजा सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है जिसका दण्ड पूरी प्रजा को मिल रहा है। फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का उपाय खोजने के लिए राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए। वहां वह ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उन्हें प्रणाम कर सारी बातें बताईं। उन्होंने ऋषिवर से समस्याओं के समाधान का तरीका पूछा तो ऋषि बोले− राजन! सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी भयंकर दण्ड मिलता है।</div><div><br></div><div>ऋषि अंगिरा ने कहा कि आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी। राजा अपने राज्य की राजधानी लौट आए और चारों वर्णों सहित पद्मा एकादशी का पूरी निष्ठा के साथ व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई और अकाल दूर हुआ तथा राज्य में समृद्धि और शांति लौटी इसी के साथ ही धार्मिक कार्य भी पूर्व की भांति आरम्भ हो गये।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 10:30:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/chaturmas-begins-with-lord-vishnu-entering-his-slumber-learn-the-rules-of-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Devshayani Ekadashi 2026: Devshayani Ekadashi से Chaturmas शुरू, जानें Lord Vishnu पूजा का Muhurat]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/chaturmas-begins-with-devshayani-ekadashi-know-auspicious-time-for-vishnu-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 25 जुलाई 2026 को देवशयनी एकादशी मनाई जा रही है। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। देवशयनी एकादशी से भगवान श्रीहरि विष्णु 4 महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरूआत होती है। ऐसे में हम आपको देवशयनी एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत 24 जुलाई की सुबह 09:12 मिनट से हुई है। वहीं आज यानी की 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:34 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के मुताबिक 25 जुलाई 2026 को देवशयनी एकादशी मनाई जा रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-and-prayers-observed-during-the-devshayani-ekadashi-fast-yield-meritorious-rewards" target="_blank">Devshayani Ekadashi Vrat 2026: देवशयनी एकादशी व्रत पर पूजा-अर्चना से होती है पुण्य फलों की प्राप्ति</a></h3><div><br></div><div>वहीं एकादशी तिथि व्रत का पारण द्वादशी तिथि पर किया जाता है। देवशयनी एकादशी व्रत का पारण 26 जुलाई 2026 को किया जाएगा। वहीं पारण का समय सुबह 05:39 मिनट से लेकर 08:22 मिनट तक है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद पीले वस्त्र धारण करें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें और मंदिर की साफ-सफाई करें। इसके बाद मंदिर में गंगाजल का छिड़काव करें और फिर लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। अब इस चौकी पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर उन्हें पीले फूल, तुलसी दल और फल आदि अर्पित करें। देसी घी का दीपक जलाकर आरती करें। इसके बाद एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और मंत्रों का जाप करें। फिर पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>विष्णु मंत्र</h2><div>ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।</div><div>यद्दीदयच्दवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्”।।</div><div><br></div><div>ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्||</div><div>ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्||</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 08:03:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/chaturmas-begins-with-devshayani-ekadashi-know-auspicious-time-for-vishnu-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Devshayani Ekadashi Vrat 2026: देवशयनी एकादशी व्रत पर पूजा-अर्चना से होती है पुण्य फलों की प्राप्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-and-prayers-observed-during-the-devshayani-ekadashi-fast-yield-meritorious-rewards]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>25 जुलाई को देवशयनी एकादशी व्रत है, देवशयनी एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन से विष्णुजी चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास शुरु होता है। देवशयनी एकादशी के दिन सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने से घर में खुशहाली और समृद्धि आती है तो आइए हम आपको देवशयनी एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें देवशयनी एकादशी व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन से चातुर्मास, यानी चार महीने का पवित्र समय प्रारंभ होता है। इस साल 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी। देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु राजा बलि के पास पाताल लोक में चार महीने के लिए विश्राम करने चले जाते हैं और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। यह समय आंतरिक शांति, ध्यान, भक्ति और साधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस एकादशी तिथि से श्रीहरि 4 महीनों के लिए क्षीसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। पंडितों के अनुसार अगर आपके जीवन में परेशानी चल रही है या कोई भी काम नहीं बन रहा है, तो इस दिन विष्णुजी की श्रद्धापूर्वक पूजा करने के साथ-साथ आप उन्हें उनके प्रिय फूल अर्पित कर सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को चढाएं ये फूल, होंगे लाभान्वित&nbsp;</h2><div>शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु को पीले रंग के फूल बेहद प्रिय हैं। ऐसे में उनकी पूजा के दौरान पीले पुष्प जरूर अर्पित करें। साथ ही, आप उन्हें ताजे गेंदे के फूलों की माला भी अर्पित कर सकते हैं। उनके वस्त्र का रंग भी पीला ही है, ऐसे में इस रंग की माला उन्हें चढ़ाने से विष्णुजी प्रसन्न हो सकते हैं। ऐसे में जातक के कार्यों में आ रही बाधा दूर हो सकती है। साथ ही प्रगति के योग भी बनते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु को कमल के फूल भी बहुत प्रिय हैं। साथ ही, इस पुष्प को देवी लक्ष्मी का भी प्रिय माना गया है। ऐसे में देवशयनी एकादशी के दिन संभव हो तो विष्णु भगवान को कमल के फूल जरूर अर्पित करने चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु के साथ-साथ माता लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त हो सकती है। साथ ही, घर की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी रहती है। इसके अलावा, आप देवशयनी एकादशी पर आप अन्य पीले रंग के फूल भी भगवान विष्णु को अर्पित कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2>चातुर्मास है संयम, साधना और दान का काल</h2><div>देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक मास तक चलने वाले चातुर्मास को आत्मसंयम, भक्ति, तप, जप और दान का श्रेष्ठ काल माना जाता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों को स्थगित कर दिया जाता है, क्योंकि इस दौरान भगवान विष्णु की अनुपस्थिति मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास में सात्त्विक जीवन अपनाने तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इस चार माह की अवधि में संयम, साधना, सत्संग, सेवा और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। यह समय स्वयं को ईश्वर भक्ति में लीन करने और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त है।</div><div><br></div><h2>देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व भी है खास&nbsp;</h2><div>देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु राजा बलि के पास पाताल लोक में चार महीने के लिए विश्राम करने चले जाते हैं और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। यह समय आंतरिक शांति, ध्यान, भक्ति और साधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।</div><div><br></div><h2>देवशयनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक&nbsp;</h2><div>पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक धर्मात्मा और पराक्रमी राजा मान्धाता का राज्य था। उनके राज्य में प्रजा सुखी और संतुष्ट थी। एक समय वहां वर्षा रुक गई, जिससे सूखा और भयंकर अकाल पड़ गया। प्रजा दुखी और भूख से त्रस्त होने लगी। राजा ने कई धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और तप करवाए, लेकिन फिर भी कोई समाधान नहीं हुआ। तब राजा तपोभूमि पर महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुँचे और उन्होंने स्थिति बताई। महर्षि अंगिरा ने कहा— "हे राजन्! यह समय देवताओं की विशेष कृपा का है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'देवशयनी एकादशी' कहा जाता है। इस दिन जो व्यक्ति व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करता है और रात्रि जागरण करता है, वह सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति पाता है। आप स्वयं यह व्रत कीजिए और प्रजा को भी प्रेरित कीजिए।" राजा ने महर्षि की आज्ञा का पालन किया और पूरे राज्य में देवशयनी एकादशी का आयोजन कराया। लोगों ने उपवास रखा, पूजन किया, रात्रि जागरण और भजन-संकीर्तन किया। फलस्वरूप भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और जल्द ही मेघ गर्जना के साथ भारी वर्षा हुई। धरती पुनः हरी-भरी हो गई और प्रजा को अन्न-जल की प्राप्ति हुई। तब से इस व्रत का विशेष महत्त्व स्थापित हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार, जब देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से पूछा कि "हे प्रभु! आप दिन-रात जागकर सृष्टि का संचालन करते हैं, क्या आपको कभी विश्राम नहीं चाहिए?" तब श्रीहरि विष्णु ने उत्तर दिया – "हे लक्ष्मी! मैं आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक क्षीरसागर में योगनिद्रा में विश्राम करूँगा। इस काल में सृष्टि का संचालन देवगण करेंगे।" तभी से इस तिथि को "देवशयनी एकादशी" कहा जाने लगा। इसी काल में भगवान विष्णु राजा बलि के लोक में निवास करते हैं। वामन अवतार की कथा के अनुसार जब भगवान ने तीन पग में सारा ब्रह्मांड माँग लिया, तब बलि ने आत्मसमर्पण कर दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने वचन दिया कि वे चातुर्मास में उसके लोक में निवास करेंगे। देवशयनी एकादशी से ही चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जिसमें विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन आदि शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। यह समय तप, संयम, साधना और सेवा का काल माना गया है। इस दिन का उपवास, पूजन और कथा श्रवण करने से समस्त पापों का नाश होता है और भक्त को वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>देवशयनी एकादशी पर करें इन चीजों का दान, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन अन्न दान को बहुत पुण्यकारी माना गया है। इस दिन गरीबों, जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को भोजन कराना शुभ माना जाता है। गेहूं, चावल, दाल, फल और अन्य खाद्य सामग्री का दान करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। इसके अलावा, इस दिन जरूरतमंद लोगों को वस्त्र दान करना भी शुभ माना जाता है। साफ और नए कपड़ों का दान करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shani-sade-sati-and-dhaiyya-reduced-chant-vedic-mantras-and-shani-stotra-on-saturday" target="_blank">Shani Dev Mantra: Shani Sade Sati और ढैय्या का कष्ट होगा कम, शनिवार को जरूर जपें ये विशेष Vedic Mantras और शनि स्त्रोत</a></h3><div>इस दिन जल से जुड़ी वस्तुओं का दान भी विशेष फलदायी माना जाता है। गर्मी के मौसम को देखते हुए पानी के घड़े, शरबत या अन्य पेय पदार्थों का दान करना पुण्य का कार्य माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जल दान करने से व्यक्ति को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।</div><div>&nbsp;</div><div>इस दिन पीला चंदन, पीला केसर, पीले फूल और गरीबों व जरूरतमंदों को जूते-चप्पल का दान करें। इन चीजों का दान करना बहुत शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><div>देवशयनी एकादशी के दिन मौसमी फल जैसे आम, तरबूज आदि करें। साथ ही पीले वस्त्र, नए वस्त्र का दान करें।&nbsp; इन चीजों के दान से सुख-समृद्धि बढ़ती है। इसके अलावा गाय की सेवा करना, जरूरतमंदों की मदद करना और धार्मिक कार्यों में सहयोग देना भी इस दिन अच्छा माना जाता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 18:37:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-and-prayers-observed-during-the-devshayani-ekadashi-fast-yield-meritorious-rewards</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Asha Dashami Vrat 2026: आशा दशमी व्रत से होते हैं सभी मनोरथ पूरे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/all-wishes-are-fulfilled-through-the-asha-dashami-vrat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धर्मग्रंथों में प्राप्त आशा दशमी के माहात्म्य से यह सिद्ध होता है कि दुर्लभ से दुर्लभ मनोरथों की पूर्ति के लिए आशा दशमी व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए। यह व्रत विशेष रूप से स्त्रियों के लिए अत्यंत फलदायी, आरोग्यप्रद और श्रेयस्कर माना गया है।</div><div><br></div><h2>जानें आशा दशमी व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>हिंदू धर्म में व्रत और त्यौहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये जीवन में सकारात्मकता, आशा और उमंग का संचार करते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत कल्याणकारी पर्व है 'आशा दशमी व्रत' (Asha Dashami Vrat)। मान्यता है कि इस व्रत को सच्चे मन से करने से व्यक्ति की अधूरी आशाएं पूरी होती हैं और जीवन में कभी निराशा का सामना नहीं करना पड़ता। सनातन परंपरा में आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है क्योंकि इसी पावन तिथि पर आशा दशमी व्रत रखा जाता है. अपने नाम के अनुरूप इस व्रत को आशाओं या फिर कामनाओं की पूर्ति की लिए विशेष रूप से रखा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन 10 आशा देवियों की विशेष रूप से साधना-आराधना और व्रत किया जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हुए माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना करती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-pleased-with-unwavering-devotion-of-nag-vasuki-and-honored-him-by-wearing-neck" target="_blank">Nag Vasuki की अनन्य भक्ति से प्रसन्न हुए Lord Shiva, गले में धारण कर दिया सम्मान</a></h3><div>सनातन धर्म की विशाल आध्यात्मिक विरासत में 'आशा दशमी' का व्रत एक ऐसा प्रकाशपुंज है जो मनुष्य को घोर हताशा, अवसाद और संकट के अंधकार से बाहर निकालकर 'उम्मीद' की नई ऊर्जा से भर देता है। 'आशा' शब्द का अर्थ केवल इच्छा नहीं, बल्कि वह अटूट विश्वास है जो असंभव को संभव बनाने की शक्ति रखता है। 'दशमी' तिथि पूर्णता का प्रतीक है, जो यह सुनिश्चित करती है कि साधक को दसों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, आग्नेय, आकाश और पाताल) से शुभ फल प्राप्त हों। यह महापर्व मूलतः जगदंबा माता पार्वती और दसों दिशाओं की अधिष्ठात्री 'आशा देवियों' की आराधना का संगम है।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी व्रत का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>पंचांग के अनुसार जिस आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि पर दसों दिशाओं की देवियों की पूजा पूजा और आशा दशमी व्रत रखा जाता है, वह 23 जुलाई 2026, बृहस्पतिवार को प्रात:काल 7:03 बजे प्रारंभ होकर अगले दिन 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को प्रात:काल 09:12 बजे समाप्त होगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार आशा दशमी का व्रत 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी व्रत 2026</h2><div>आशा दशमी व्रत हिंदू धर्म में श्रद्धा, विश्वास और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। "आशा" का अर्थ है उम्मीद, विश्वास और सकारात्मक अपेक्षा। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी व्रत का धार्मिक महत्व</h2><div>आशा दशमी व्रत सकारात्मक सोच, धैर्य और ईश्वर में अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा और व्रत करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है।</div><div>इस दिन पूजा करने से मान्यता है कि—</div><div><br></div><div>- मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।</div><div>- जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।</div><div>- परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।</div><div>- मानसिक तनाव कम होता है।</div><div>- सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</div><div>- भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी व्रत कथा</h2><div>धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में एक धर्मपरायण परिवार अनेक कठिनाइयों से गुजर रहा था। उन्होंने श्रद्धा और विश्वास के साथ आशा दशमी व्रत रखा और भगवान की आराधना की। उनकी निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके सभी संकट दूर किए तथा उन्हें सुख, समृद्धि और संतोष का आशीर्वाद दिया।</div><div><br></div><div>यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और सकारात्मक विश्वास से कठिन परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी व्रत पूजा विधि</h2><div>यदि आप आशा दशमी का व्रत कर रहे हैं, तो यह पूजा विधि अपनाएं—</div><div><br></div><div>- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।</div><div>- पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें।</div><div>- भगवान विष्णु या अपने इष्ट देव की प्रतिमा स्थापित करें।</div><div>- दीपक और धूप जलाएं।</div><div>- फल, फूल, तुलसी और नैवेद्य अर्पित करें।</div><div>- विष्णु सहस्रनाम या अपने इष्ट मंत्र का जाप करें।</div><div>- व्रत कथा का पाठ करें।</div><div>- आरती कर परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी व्रत के नियम</h2><div>- सात्विक भोजन करें या फलाहार रखें।</div><div>- क्रोध, झूठ और विवाद से बचें।</div><div>- मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का त्याग करें।</div><div>- जरूरतमंदों की सहायता करें।</div><div>- दिनभर भगवान का स्मरण करें।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी पर क्या करें?</h2><div>- भगवान की विधि-विधान से पूजा करें।</div><div>- गरीबों को भोजन और वस्त्र दान करें।</div><div>- धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें।</div><div>- परिवार के साथ भजन-कीर्तन करें।</div><div>- सकारात्मक विचार रखें।</div><div><br></div><h2>क्या नहीं करना चाहिए?</h2><div>- किसी का अपमान न करें।</div><div>- क्रोध और नकारात्मकता से बचें।</div><div>- असत्य और छल-कपट से दूर रहें।</div><div>- नशे और तामसिक भोजन का सेवन न करें।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी व्रत के नियम&nbsp;</h2><div>हिंदू मान्यता के अनुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाले आशा दशमी व्रत को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष से प्रारंभ करके कम से कम 6 महीने या फिर 1 या 2 साल तक रखना चाहिए. यदि आप किसी कारणवश आषाढ़ मास में इस व्रत को न प्रारंभ कर पाएं तो आप इसे किसी भी मास के शुक्लपक्ष से प्रारंभ कर सकते हैं. व्रत के पूर्ण होने पर विधि-विधान से उद्यापन करें और सुहागिन स्त्रियों के साथ मिलकर रात्रि जागरण करें. व्रत के पूर्ण होने पर अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी मंदिर के पुजारी को अन्न, वस्त्र और धन आदि का दान करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी से जुड़ी पौराणिक कथा&nbsp;</h2><h2>1. सती दमयंती और राजा नल की गाथा: बिछोह से मिलन तक</h2><div>प्राचीन काल में निषध देश के धर्मात्मा राजा नल अपने भाई से द्यूत (जुए) में सर्वस्व हार गए। विपत्ति के समय वे अपनी पत्नी दमयंती के साथ निर्जन वनों में भटकने लगे। एक समय ऐसा आया जब राजा नल के पास स्वयं को ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र भी नहीं रहे। घोर मानसिक पीड़ा और लज्जा के वश में, राजा नल अपनी सोती हुई पत्नी दमयंती को अकेले वन में छोड़कर चले गए।</div><div><br></div><div>जब दमयंती की आँख खुली, तो अपने प्रियतम को न पाकर वह विलाप करने लगी। भटकते हुए वह चेदि देश की राजमाता की शरण में पहुँची। वहाँ एक तपस्वी ब्राह्मण ने उसे 'आशा दशमी' व्रत की महिमा बताई। दमयंती ने पूर्ण निष्ठा और अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह व्रत किया। इस व्रत के दिव्य प्रभाव से राजा नल के हृदय में अपनी पत्नी के प्रति विरह और कर्तव्य बोध जागा। अंततः दोनों का पुनर्मिलन हुआ और खोया हुआ राज्य व वैभव पुनः प्राप्त हुआ। यह कथा सिखाती है कि यह व्रत टूटे हुए रिश्तों और खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस लाने में सक्षम है।</div><div><br></div><h2>आशा दशमी व्रत के लाभ&nbsp;</h2><div>हिंदू मान्यता के अनुसार जिस आशा दशमी का व्रत महाभारत काल से होता चला आ रहा है, उसे करने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं और उसे सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मान्यता यह भी है कि जिस स्त्री का पति रूठ कर चला गया हो या फिर विदेश में फंसा हो तो वह इस व्रत के पुण्य प्रभाव से शीघ्र ही उसके पास वापस लौट आता है। आशा देवी के आशीर्वाद से उसे सुखी दांपत्य जीवन का सुख प्राप्त होता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पांडेय</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 19:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/all-wishes-are-fulfilled-through-the-asha-dashami-vrat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Bhadli Navami 2026: भड़ली नवमी होती है सकारात्मक ऊर्जा एवं सौभाग्य का प्रतीक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/bhadli-navami-is-a-symbol-of-positive-energy-and-good-fortune]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज भड़ली नवमी है, यह व्रत आषाढ़ मास की नवमी तिथि को रखा जाता है। इसे भड़रिया नवमी के नाम से जाना जाता है। इस तिथि को अक्षय तृतीया के समान पुण्य फलदायी माना जाता है। इस तिथि पर किए गए शुभ कार्यों में सफलता, समृद्धि और शुभ फल की प्राप्ति होती है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें भड़ली नवमी के बारे में रोचक बातें&nbsp;</h2><div>आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भड़ली नवमी कहा जाता है। भड़ली नवमी को भड़रिया नवमी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में भड़रिया नवमी का विशेष महत्व बताया गया है। भड़ली नवमी को अक्षय तृतीया के समान ही पुण्य फलदायी माना गया है।&nbsp; भड़ली नवमी का दिन इसलिए भी खास होता है क्योंकि इसके ठीक दो दिन बाद यानी 25 जुलाई 2026 से 'चातुर्मास' शुरू हो जाते हैं। इसके बाद चार महीनों के लिए सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/bhadli-navami-holds-special-significance-in-sanatan-dharma" target="_blank">Bhadli Navami 2026: भडल्या नवमी पर बिना मुहूर्त देखे किए जाते हैं शुभ काम, गुरु अस्त होने के बाद भी होंगे विवाह</a></h3><h2>जानें भड़ली नवमी का शुभ मुहूर्त</h2><div>हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की शुरुआत 22 जुलाई को सुबह में 5 बजकर 16 मिनट पर होगा। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 23 जुलाई को सुबह 7 बजकर 3 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि को देखते हुए भड़ली नवमी का व्रत 22 जुलाई को रखा जाएगा।</div><div><br></div><h2>हिन्दू धर्म में भड़ली नवमी का है खास महत्व</h2><div>धर्म शास्त्रों के अनुसार जिस लोगों के विवाह के लिए कोई शुभ मुहूर्त नहीं निकलता है उनका विवाह इस दिन किया सकता है। भड़ली नवमी के बाद चातुमास लग जाता है जिसके बाद अगले 4-5 महीनें तक कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किए जाते है। ऐसा कहा जा सकता है कोई भी मांगलिक कार्य करने के लिए यह तीथि शुभ होता है। धार्मिक मान्यता है कि देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार माह की निद्रा के बाद जागृत होते हैं। तभी मांगलिक कार्य किए जाते है।</div><div><br></div><h2>इसलिए खास है भड़ली नवमी</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भड़ली नवमी को अबूझ मुहूर्त कहा जाता है। 'अबूझ मुहूर्त' का अर्थ ऐसे शुभ समय से है, जिसमें पूरे दिन में कभी भी किसी भी मुहूर्त में शुभ कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है। इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत इसी तिथि पर करना पसंद करते हैं। देवशयनी एकादशी से पहले आने वाली भडल्या नवमी को अबुझ मुहूर्त माना जाता है यानी इस दिन विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या नए काम की शुरुआत जैसे शुभ काम बिना मुहूर्त देखे किया जा सकते हैं। अभी आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि चल रही है, इस नवरात्रि की अंतिम भड़ली नवमी रहती है। इस नवमी पर गणेश जी, शिव जी और देवी दुर्गा की विशेष पूजा करनी चाहिए। जरूरतमंद लोगों को धन, अनाज, छाता, जूते-चप्पल, कपड़े का दान करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>भड़ली नवमी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भड़ली नवमी का सम्बन्ध जगत के पालनकर्ता श्री विष्णु से है। भड़ली नवमी के ठीक दो दिन बाद यानी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। सनातन धर्म में, विवाह जैसे मांगलिक कार्य भगवान विष्णु की साक्षी और आशीर्वाद के बिना पूर्ण नहीं माने जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के बाद चातुर्मास शुरू होने पर देवता सो जाते हैं और अगले 4 महीनों तक (देवउठनी एकादशी तक) कोई भी शादी-ब्याह या शुभ संस्कार संपन्न नहीं होते हैं। भड़ली नवमी वह आखिरी दिन होती है, जब भगवान विष्णु के शयन में जाने से पहले भक्त उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। इस दिन गुप्त नवरात्र का समापन भी होता है, इसलिए देवी दुर्गा और भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तों को सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है। यह दिन उन लोगों के लिए विशेष वरदान समान है जिनके विवाह में कोई अड़चन आ रही हो या कोई अन्य शुभ मुहूर्त न मिल रहा हो।&nbsp;</div><div><br></div><h2>शुभ कार्यों के लिए इसलिए चुनी जाती है भड़ली नवमी&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भड़ली नवमी सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय का शुभारंभ, संपत्ति खरीदना, धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्य करना शुभ माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन शुरू किए गए कार्यों में आने वाली बाधाएं कम होती हैं और सफलता की संभावना बढ़ती है।</div><div><br></div><h2>भड़ली नवमी पर रखें इन बातों का ध्यान&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार भड़ली नवमी का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन भगवान विष्‍णु और देवी दुर्गा की पूजा जरूरी करें। इस दिन परिवार में या दूर की रिश्‍तेदारी में भी शोक हो जाए, तो कोई भी शुभ काम टाल दें। भड़ली नवमी को अत्यंत शुभ तिथि मानी जाती है, फिर भी किसी बड़े धार्मिक या पारिवारिक आयोजन से पहले अपनी पारिवारिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं पर जरूर विचार कर लें।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 11:20:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/bhadli-navami-is-a-symbol-of-positive-energy-and-good-fortune</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhadli Navami 2026: भडल्या नवमी पर बिना मुहूर्त देखे किए जाते हैं शुभ काम, गुरु अस्त होने के बाद भी होंगे विवाह]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/bhadli-navami-holds-special-significance-in-sanatan-dharma]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सनातन धर्म में भडल्या नवमी का विशेष महत्व है। इसे अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है। आसान शब्दों मंं कहें तो भडल्या नवमी पर बिना किसी ज्योतिषीय सलाह के सभी प्रकार के शुभ कार्य कर सकते हैं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 22 जुलाई 2026 को सुबह 5:16 बजे से आरंभ होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 23 जुलाई 2026 की सुबह 7:03 बजे होगा। उदया तिथि के अनुसार 22 जुलाई को भडल्या नवमी मनाई जाएगी।&nbsp; यह दिन अक्षय तृतीया की तरह शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। भडल्या नवमी स्वंयसिद्ध तिथि है। इस तिथि पर सभी प्रकार के शुभ कार्य कर सकते हैं। साथ ही शुभ कार्यों की शुरुआत कर सकते हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि भडल्या नवमी 22 जुलाई को है। यह इस सीजन का आखिरी विवाह मुहूर्त है। हालांकि इस समय गुरु अस्त चल रहे हैं, इसलिए मांगलिक कार्यों पर रोक लगी हुई है, फिर भी भडल्या नवमी को अबूझ मुहूर्त माने जाने से इस दिन काफी संख्या में विवाह होंगे। इसके 2 दिन बाद 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चार महीने के लिए सभी मांगलिक कार्य थम जाएंगे, जो एक नवंबर को देवों के जागने के साथ शुरू होंगे।</div><div><br></div><div><b>अद्ये कस्यापि मूढत्वे शुभकर्म न दोषकृत्। द्वयो मूढत्व मे प्रोक्तं दोषदं गुरुशुक्रयो:।।</b></div><div><br></div><div>ज्योतिष विद्वानों और शास्त्र के अनुसार अबूझ मुहूर्त में किसी प्रकार का पंचांग या मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती है और इसमें गुरु या शुक्र तारा अस्त भी नहीं देखा जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-powerful-mantras-bring-special-blessings-from-lord-hari" target="_blank">Lord Vishnu Mantras: गुरुवार को Lord Vishnu की पूजा से दूर होगा Guru Dosha, इन Powerful Mantras के जाप से बरसेगी श्रीहरि की विशेष कृपा</a></h3><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि 22 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल नवमी है। इसे भडल्या नवमी कहते हैं। इस दिन आषाढ़ गुप्त नवरात्रि भी खत्म हो रही है। इसके बाद 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी है, इस तिथि से चार महीनों के लिए श्रीहरि विश्राम करते हैं, इसलिए शुभ कामों के लिए मुहूर्त नहीं रहते हैं। देवशयनी एकादशी से पहले आने वाली भडल्या नवमी को अबुझ मुहूर्त माना जाता है यानी इस दिन विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या नए काम की शुरुआत जैसे शुभ काम बिना मुहूर्त देखे किया जा सकते हैं। अभी आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि चल रही है, इस नवरात्रि की अंतिम भड़ली नवमी रहती है। इस नवमी पर गणेश जी, शिव जी और देवी दुर्गा की विशेष पूजा करनी चाहिए। जरूरतमंद लोगों को धन, अनाज, छाता, जूते-चप्पल, कपड़े का दान करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>भडल्या नवमी तिथि</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 22 जुलाई 2026 को सुबह 5:16 बजे से आरंभ होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 23 जुलाई 2026 की सुबह 7:03 बजे होगा। उदया तिथि के अनुसार 22 जुलाई को मनाई जाएगी।</div><div><br></div><h2>15 जुलाई को गुरु कर्क राशि में अस्त&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत होती है। इसके बाद भगवान विष्णु के योग निद्रा में होने की वजह से अगले 4 महीने तक कोई भी मांगलिक काम नहीं किया जा सकता है। ऐसे में चातुर्मास शुरू होने से पहले शुभ काम करने का अंतिम दिन भडल्या नवमी तिथि को होता है। 15 जुलाई को गुरु कर्क राशि में अस्त हो गए है। और 10 अगस्त को गुरु उदय होंगे।</div><div><br></div><h2>15 दिसंबर 2026 से 14 जनवरी 2027 तक खरमास</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस वर्ष नवंबर में केवल सात दिन और दिसंबर में सिर्फ पांच दिन विवाह मुहूर्त है। 15 दिसंबर 2026 से 14 जनवरी 2027 तक खरमास होने से विवाह नहीं हो सकेंगे। विवाह मुहूर्त 15 दिसंबर से चार फरवरी तक भी नहीं होंगे। शुक्र ग्रह के उदित होने के बाद पांच फरवरी से शुरुआत होगी।</div><div><br></div><h2>अबूझ या स्वयंसिद्ध मुहूर्त</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि भडल्या नवमी अबूझ या स्वयंसिद्ध मुहूर्त के रूप में मानी गई है। यानी इस दिन शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त के विचार की जरूरत नहीं होती।&nbsp;</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि भडल्या नवमी तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्त है। इस तिथि पर शुभ कार्य करने के लिए ज्योतिष गणना की आवश्यकता नहीं पड़ती है। किसी भी समय जातक अपनी सुविधा के अनुसार शुभ कार्य कर सकते हैं। साथ ही शुभ कार्य का श्रीगणेश कर सकते हैं। इस तिथि पर शुभ कार्य करने से अक्षय तृतीया के समतुल्य फल प्राप्त होता है।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 17:27:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/bhadli-navami-holds-special-significance-in-sanatan-dharma</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[माता पार्वती जयंती व्रत है प्रेम, समर्पण एवं विश्वास का पर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-mata-parvati-jayanti-fast-is-a-festival-of-love-devotion-and-faith]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>21 जुलाई को माता पार्वती जयंती व्रत है, सनातन धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। पार्वती जयंती के दिन देवों के देव महादेव की पत्नी माता पार्वती की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है तो आइए हम आपको माता पार्वती जयंती व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें माता पार्वती जयंती व्रत के बारे में</h2><div>सनातन धर्म में प्रत्येक व्रत का विशेष महत्व होता है। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन जया पार्वती का व्रत रखा जाता है। ये व्रत सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं दोनों के लिए बड़ा खास होता है। भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए यह कठिन व्रत 5 दिनों में पूरा किया जाता है। जया पार्वती व्रत के दिन विधि-विधान से माता पार्वती का पूजन किया जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/sun-enters-cancer-auspicious-period-of-dakshinayan-begins-today" target="_blank">Kark Sankranti 2026: सूर्य का कर्क राशि में प्रवेश, आज से शुरू होगा Dakshinayan का शुभ काल</a></h3><div><br></div><h2>माता पार्वती जयंती व्रत का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस बार 21 जुलाई 2026 की सुबह 4 बजकर 2 मिनट से आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ हो रहा है, जो कि कल 22 जुलाई 2026 की सुबह 5 बजकर 16 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में 21 जुलाई 2026, वार मंगलवार को इस बार पार्वती जयंती मनाई जाएगी।</div><div><br></div><h2>आषाढ़ शुक्ल अष्टमी तिथि का महत्व</h2><div>आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि यानी पार्वती जयंती का दिन देवी पार्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो कि शक्ति, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य और मातृत्व (माता होने का भाव) का प्रतीक हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो लोग सच्चे मन से माता पार्वती की उपासना करते हैं, उन्हें जीवन की तमाम समस्याओं से लड़ने की शक्ति मिलती है। साथ ही पाप नष्ट होते हैं और वैवाहिक जीवन खुशियों से भरा रहता है।</div><div><br></div><h2>माता पार्वती जयंती व्रत पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार माता पार्वती जयंती व्रत बहुत खास होता है इसलिए पार्वती जयंती व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कार्य करने के पश्चात लाल या हरे रंग के शुद्ध कपड़े धारण करें। घर के मंदिर में शिव जी और मां पार्वती की साथ वाली मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। व्रत का संकल्प लेने के बाद घी का दीपक जलाएं। देवी-देवताओं को जल, वस्त्र, अक्षत, हल्दी, फल और फूल अर्पित करें। मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करने के बाद उन्हें समर्पित 'ॐ नमः शिवायै च शिवायै च नमो नमः' मंत्र का 11 बार जाप करें। इसके बाद अपनी इच्छा को व्यक्त करके पूजा का समापन करें। पार्वती जयंती का व्रत अगले दिन अष्टमी तिथि के समाप्त होने के बाद या मुख्य तिथि वाले संध्या पूजा के पश्चात खोला जा सकता है।</div><div><br></div><h2>इसलिए मनाया जाता है माता पार्वती जयंती व्रत</h2><div>पार्वती जयंती देवी पार्वती के अवतरण (प्रकट होने) की याद में मनाई जाती है। वे प्रेम, भक्ति, शक्ति, मातृत्व और दैवीय स्त्री शक्ति की प्रतीक हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान शिव की शाश्वत संगिनी और सृष्टि, पालन व परिवर्तन का स्रोत हैं। यह दिन वैवाहिक सुख, परिवार की भलाई, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रार्थना करने की दृष्टि से बहुत शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>सिद्धि-विद्या देवी के रूप में भी प्रसिद्ध हैं माता पार्वती</h2><div>शास्त्रों के अनुसार माता पार्वती को 'जगदंबा' यानी ब्रह्मांड की माता के रूप में व्यापक रूप से पूजा जाता है, लेकिन प्राचीन ग्रंथों में उन्हें बारह सिद्धि-विद्या देवियों में से एक भी माना गया है। तांत्रिक परंपराओं में, भक्त देवी के सिद्धि-विद्या स्वरूपों के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं। पंडितों के अनुसार अनुशासित पूजा और ध्यान के माध्यम से की जाने वाली ये साधनाएं भक्तों को उनकी सच्ची इच्छाएं पूरी करने, बाधाओं को दूर करने और आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ने में मदद करती हैं।</div><div><br></div><h2>माता पार्वती जयंती व्रत का महत्व</h2><div>पंडितों के अनुसार माता पार्वती को शक्ति, भक्ति, समर्पण और अखंड सौभाग्य की देवी माना जाता है। इस दिन का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। माता पार्वती प्रकृति और शक्ति का स्वरूप हैं। इनकी पूजा से जीवन में नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने और माता पार्वती की पूजा करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है और वैवाहिक जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। यह दिन सौभाग्य और वैवाहिक सुख देने वाला होता है। अविवाहित कन्याएं यदि सच्चे मन से यह व्रत रखती हैं, तो उन्हें योग्य और मनचाहा जीवनसाथी मिलता है या मनवांछित वर की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>माता पार्वती जयंती व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक&nbsp;</h2><div>पौराणिक कथा के अनुसार, माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हिमालयराज हिमवान और माता मैना के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। माता पार्वती बाल्यकाल से ही भगवान शिव को अपना पति मानती थीं। महर्षि नारद ने उन्हें बताया कि शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करनी होगी। नारद जी के मार्गदर्शन पर माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। उन्होंने जल, अन्न और यहां तक कि पत्ते यानी पर्ण खाना भी छोड़ दिया, जिसके कारण उन्हें 'अपर्णा' भी कहा गया।</div><div><br></div><div>&nbsp;उनकी अटूट भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसके बाद शिव और पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ। यही कारण है कि पार्वती जयंती को अटूट दांपत्य प्रेम और सौभाग्य का पर्व माना जाता है। पार्वती जयंती केवल देवी पार्वती के जन्मोत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रेम, तपस्या, समर्पण और अटूट विश्वास का संदेश भी देता है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से माता पार्वती तथा भगवान शिव की आराधना करने से दांपत्य जीवन में सुख, परिवार में समृद्धि और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने की मान्यता है। इसलिए इस पावन अवसर पर पूरे श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना कर माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करें।</div><div><br></div><h2>माता पार्वती जयंती व्रत से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन सुहागिन महिलाएं मां पार्वती को सुहाग के सामान जिसमें लाल चूड़ी, लाल जोड़ा, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी और आलता अर्पित करने की विशेष मान्यता है। इसके बाद इस सामग्री को किसी ब्राह्माण स्त्री या जरूरतमंद महिला को दान दे दिया जाता है। इस पवित्र दिन गौरी-शंकर की संयुक्त पूजा की जाती है, इस प्रकार की पूजा से अच्छा फल मिलता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 18:32:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-mata-parvati-jayanti-fast-is-a-festival-of-love-devotion-and-faith</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hariyali Teej 2026 : सुहागिनों के लिए खास है  हरियाली तीज व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और Vrat Rules की पूरी जानकारी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-2026-know-correct-date-muhurat-and-puja-vidhi-guide]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में व्रत-त्योहारों का विशेष महत्व माना जाता है। सावन का पूरा महीना व्रत के लिए जाना जाता है। भगवान शिव के सोमवार व्रत, मंगला गौरी व्रत, कामिका और पुत्रदा एकादशी, हरियाली तीज और नाग पंचमी के व्रत प्रमुख हैं।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">हरियाली तीज का व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए करती हैं। इस दौरान महिलाएं निर्जला व फलाहार व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस व्रत के रखने से वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौहार्द और स्थिरता बनी रहती है। इसके साथ ही पति की आयु में वृद्धि और जीवन में खुशहाली आती है। हरियाली तीज के मौके पर महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी लगाती हैं, झूला झूलती हैं और सावन के मधुर गीत गाती है। आइए आपको बताते हैं कब रखा जाएगा हरियाली तीज का व्रत और शुभ मुहूर्त।</span></div><div><br></div><div><b>हरियाली तीज 2026 कब है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">हिंदू पंचांग के अनुसार हरियाली तीज का पावन पर्व सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में तृतीया तिथि का आरंभ 14 अगस्त को सायं 6:46 बजे से होगा तथा यह 15 अगस्त को सायं 5:28 बजे तक प्रभावी रहेगी। उदया तिथि को मान्यता देने की परंपरा के अनुसार हरियाली तीज का व्रत और पर्व 15 अगस्त 2026, शनिवार को मनाया जाएगा।</span></div><div><br></div><div><b>हरियाली तीज 2026 शुभ मुहूर्त</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">-ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:50 से 05:35 तक</span></div><div>-अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:17 से 01:08 तक</div><div>-विजय मुहूर्त: दोपहर 02:51 से 03:42 तक</div><div>-गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:06 से 07:29 तक</div><div>-अमृत काल: रात 08:18 से 09:53 तक</div><div><br></div><div><b>हरियाली तीज 2026 चौघड़िया मुहूर्त</b></div><div><br></div><div>-शुभ (उत्तम): सुबह 07:55 से 09:31 तक</div><div>-लाभ (उन्नति): दोपहर 02:19 से 03:55 तक</div><div>-अमृत (सर्वोत्तम): दोपहर 03:55 से 05:30 तक</div><div>-चर (सामान्य): दोपहर 12:43 से 02:19 तक</div><div><br></div><div><b>हरियाली तीज व्रत के नियम</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">- इस दिन हरे और लाल रंग के वस्त्र पहनना काफी शुभ माना जाता है। भूलकर भी काले सफेद या भूरे रंग के कपड़े न पहनें।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- व्रत के दौरान पानी या दूध का सेवन न करने की परंपरा भी प्रचलित है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- इस बात का ध्यान रखें कि पूजा में वही सामग्री का इस्तेमाल करें, जो मायके से प्राप्त हुई हो।</div><div><br></div><div>&nbsp;- व्रत का पारण शुभ मुहूर्त से पहले न करें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- पूजा का सारा सामान मंगलवार को न खरीदें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- व्रत वाले दिन महिलाओं को किसी भी प्रकार का विवाद और नकारात्मकता से दूर रहना चाहिए।</div><div><br></div><div>&nbsp;- मान्यता के अनुसार, इस रात जागरण कर भजन-कीर्तन के जरिए शिव-पार्वती की आराधना करना चाहिए।</div><div><br></div><div><b>हरियाली तीज की पूजा विधि</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">-हरियाली तीज व्रत वाले दिन महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर साफ वस्त्र पहनें।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- इसके बाद मंदिर स्थल व पूजा स्थल को साफ करें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- अब एक चौकी पर कपड़ा बिछाकर पूजन सामग्री रखें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- इसके बाद शुद्ध मिट्टी या बालू से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा बनाएं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- अगर मिट्टी की प्रतिमा बनाना संभव न हो, तो आप उनकी तस्वीर या मूर्ति को स्थापित करें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- इसके बाद आप माता पार्वती को लह श्रृंगार का सामान जैसे साड़ी, चुनरी, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, चूड़ियां, महावर, काजल, आदि अर्पित करें। फिर फल, फूल, मिठाई (घेवर और फीणी) चढ़ाएं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- अब आप भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद फूल, फल, जल, गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी, चीनी (पंचामृत) चंदन, अक्षत अर्पित करें।</div><div><br></div><div>- इसके बाद हरियाली तीज व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- आखिर में भगवान शिव और देवी पार्वती की आरती करें और हाथ जोड़कर पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगे।</div><div>&nbsp;</div><div>&nbsp;- अगले दिन जब आप व्रत को खोलें, तो मिट्टी की प्रतिमाओं और पूजा सामग्री को किसी नदी या पवित्र जल में विसर्जित कर दें।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 17:35:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-2026-know-correct-date-muhurat-and-puja-vidhi-guide</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Devshayani Ekadashi 2026: 25 जुलाई से बदलेगा इन 3 राशियों का भाग्य, करियर में होगा बड़ा उछाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/3-zodiac-signs-set-for-success-this-devshayani-ekadashi-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इस साल देवशयनी एकादशी 25 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी के साथ चातुर्मास की भी शुरुआत होती है। हालांकि इस दौरान भी भगवान विष्णु की पूजा और एकादशी का व्रत उतना ही शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><div>ज्योतिष के मुताबिक, इस बार की देवशयनी एकादशी 3 राशियों के लिए खास तौर पर शुभ मानी जा रही है। इन लोगों को करियर, पैसे और रिश्तों में अच्छे बदलाव देखने को मिल सकते हैं।</div><div><br></div><h2><b>मेष राशि वालों को करियर में मिल सकती है नई सफलता</b></h2><div>देवशयनी एकादशी मेष राशि वालों के लिए अच्छी खबर लेकर आ सकती है। भगवान विष्णु की कृपा से कमाई के नए मौके मिल सकते हैं। अगर आपने पहले कहीं निवेश किया है, तो उससे फायदा होने की संभावना है। हालांकि कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले अच्छी तरह सोच लें।</div><div><br></div><div>नौकरी या बिजनेस में आगे बढ़ने के मौके मिल सकते हैं और आपकी मेहनत का अच्छा रिजल्ट देखने को मिलेगा। बस जरूरत से ज्यादा कॉन्फिडेंट होने से बचें, क्योंकि इससे काम बिगड़ भी सकता है। लव लाइफ और शादीशुदा जिंदगी में भी खुशियां बढ़ सकती हैं और पार्टनर के साथ अच्छा समय बिताने का मौका मिलेगा।</div><div><b>शुभ रंग: </b>नीला</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/sawan-2026-solah-somvar-vrat-rules-and-significance" target="_blank">Sawan 2026 में Solah Somvar Vrat शुरू करने से पहले जानें ये 3 बड़े Rules और इसका विशेष धार्मिक महत्व</a></h3><div><br></div><h2><b>वृषभ राशि वालों को मेहनत का मिलेगा पूरा फायदा</b></h2><div>वृषभ राशि वालों के लिए यह एकादशी करियर के लिहाज से काफी अच्छी रह सकती है। ऑफिस या काम की जगह पर आपकी मेहनत की तारीफ होगी और अच्छे नतीजे मिल सकते हैं।</div><div><br></div><div>भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा से आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हो सकती है। पुराने निवेश से अचानक फायदा मिलने के योग हैं, जिससे बचत भी बढ़ सकती है। अगर आप किसी क्रिएटिव फील्ड में हैं, तो आपको नई पहचान और अच्छे मौके मिल सकते हैं।</div><div><b>शुभ रंग: </b>लाल</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/sawan-2026-start-date-know-somwar-vrat-days" target="_blank">Sawan 2026 Calendar: शिव का प्रिय महीना कब होगा शुरू? जानें सावन सोमवार व्रत की पूरी Dates.</a></h3><div><br></div><h2><b>कन्या राशि वालों को पैसों और परिवार दोनों में मिलेगी खुशियां</b></h2><div>कन्या राशि वालों के लिए देवशयनी एकादशी आर्थिक मामलों में शुभ मानी जा रही है। मां लक्ष्मी की कृपा से पैसों से जुड़ी परेशानियां कम हो सकती हैं और आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है।</div><div><br></div><div>अगर आप कोई नया काम शुरू करने की सोच रहे हैं, तो समय आपके पक्ष में रह सकता है। करियर में आगे बढ़ने के अच्छे मौके मिलेंगे। सेहत ठीक रहेगी और परिवार का माहौल भी खुशहाल रहेगा। दोस्तों और करीबियों का साथ मिलेगा। किसी पुराने दोस्त से मुलाकात भी हो सकती है, जो आपको खुशी देगी।</div><div><b>शुभ रंग: </b>सफेद</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 14:58:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/3-zodiac-signs-set-for-success-this-devshayani-ekadashi-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kark Sankranti 2026: सूर्य का कर्क राशि में प्रवेश, आज से शुरू होगा Dakshinayan का शुभ काल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sun-enters-cancer-auspicious-period-of-dakshinayan-begins-today]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 16 जुलाई 2026 को कर्क संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में कर्क संक्रांति का विशेष महत्व होता है। इस दिन सूर्य देव मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में प्रवेश करते हैं। वहीं आज से ही दक्षिणायन की शुरूआत भी होती है। जोकि 6 महीने तक चलता है। इस मौके पर पूजा-पाठ और स्नान-दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसे में आइए जानते हैं कर्क संक्रांति का मुहूर्त, स्नान-दान और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>शुभ मुहूर्त</h2><div>धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक कर्क संक्रांति के दिन स्नान-दान का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने से तन और मन दोनों की शुद्धि होती है। वहीं दान करने से जातक के जीवन की निगेटिविटी दूर होती है और सुख-समृद्धि का मार्ग खुलता है।</div><div><br></div><div>आज स्नान-दान का शुभ मुहूर्त सुबह 04:12 मिनट से लेकर 04:53 मिनट तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:06 मिनट से लेकर 12:59 मिनट तक रहेगा। किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत के लिए अभिजीत मुहूर्त बेहद उत्तम माना जाता है।</div><div><br></div><h2>क्या दान करें</h2><div>धार्मिक मान्यता के मुताबिक इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन, अनाज, कपड़े, गुड़ और फल का दान करना शुभ माना जाता है। इस दिन गाय को हरा चारा खिलाना, पानी रखना और पक्षियों को दाना देना पुण्यदायी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>सुबह जल्दी किसी पवित्र नदी में स्नान करके साफ कपड़े पहनना चाहिए।</div><div><br></div><div>अगर किसी पवित्र नदी में स्नान करना संभव न हो, तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए।</div><div><br></div><div>स्नान आदि के बाद भगवान सूर्य देव को तांबे के लोटे से जल अर्पित करना चाहिए।</div><div><br></div><div>फिर भगवान विष्णु और भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 11:19:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sun-enters-cancer-auspicious-period-of-dakshinayan-begins-today</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jagannath Rath Yatra 2026: Jagannath Rath Yatra 2026 में उमड़ा आस्था का सैलाब, जानें महत्व और Full Schedule]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/faith-surged-in-jagannath-rath-yatra-2026-know-its-significance-and-full-schedule]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 16 जुलाई 2026 से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की शुरूआत हो रही है। यह यात्रा 24 जुलाई 2026 तक चलेगी। हिंदू धर्म में ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली इस रथ यात्रा को बेहद पवित्र माना जाता है। हर साल आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को इस दिव्य यात्रा की शुरूआत होती है। इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं।</div><div><br></div><div>इस मौके पर भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों पर सवार होकर मंदिर के गर्भगृह से बाहर निकलते हैं। इस दौरान भगवान अपने मुख्य मंदिर से मौसी के घर यानी की गुंडिचा मंदिर जाते हैं। तो आइए जानते हैं रथ यात्रा के पूरे शेड्यूल और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>रथ यात्रा 2026 शेड्यूल</h2><div>बता दें कि आज यानी की 16 जुलाई 2026 को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का शुभारंभ होगा। भगवान अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे।</div><div><br></div><div>वहीं 24 जुलाई 2026 को भगवान जगन्नाथ की अपने मुख्य मंदिर में वापसी होगी।</div><div><br></div><div>वहीं 25 जुलाई 2026 को भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का दिव्य सोने के आभूषणों से अलौकिक श्रृंगार किया जाता है।</div><div><br></div><h2>क्यों खास है रथयात्रा</h2><div>आमतौर पर श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए मंदिर के गर्भगृह तक जाते हैं। लेकिन रथ यात्रा एक ऐसी अनोखी परंपरा है, जिसमें भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त मंदिर के अंदर नहीं जा पाते हैं, महाप्रभु जगन्नाथ स्वयं उन पर अपनी कृपा बरसाने के लिए मंदिर से बाहर आते हैं। तीनों देव पूरे 9 दिनों तक गुंडिचा मंदिर में रहते हैं। शास्त्रों के मुताबिक गुंडिचा मंदिर में भगवान के आड़प दर्शन करने से जातक को 100 यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।</div><div><br></div><h2>रथ खींचने की परंपरा</h2><div>पुरी की रथयात्रा में धर्म, जाति, ऊंच-नीच और रंग-भेद का कोई स्थान नहीं होता है। रथ के रस्सों को थामने के लिए हर वर्ग के लोग एक साथ आते हैं।</div><div><br></div><div>इसमें बिना किसी भेदभाव के भक्त भगवान का रथ खींच सकता है।</div><div><br></div><div>भक्तों को पवित्र और शुद्ध मन, पारंपरिक वेशभूषा में ही रथ के रस्सों को स्पर्श करना चाहिए।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता है कि यदि कोई भक्त सच्चे मन से भगवान का रथ कम से कम तीन कदम भी खींच लेता है, तो उन व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाते हैं। साथ ही वह जीवन-मरण के चक्र से भी मुक्ति पा जाता है।</div><div><br></div><h2>उमड़ता है सैलाब</h2><div>मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर की दूरी करीब 3 किमी है। इस 3 किमी के लंबे मार्ग पर आस्था का सैलाब देखने को मिलता है। ढोल-मंजीरों की थाप, शंख की ध्वनि और 'जय जगन्नाथ' की गगनभेदी जयकारों से पुरी की धरा बैकुंठ जैसी नजर आने लगती है। इस अलौकिक दृश्य का हिस्सा बनने के लिए पूरी दुनिया से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 10:45:13 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/faith-surged-in-jagannath-rath-yatra-2026-know-its-significance-and-full-schedule</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gupt Navratri 2026: 10 Mahavidyas की साधना का महापर्व शुरू, गृहस्थ नोट करें Shubh Muhurat और नियम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/festival-of-10-mahavidyas-begun-householders-note-auspicious-time-and-rules]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व मां शक्ति की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। हर साल यह पर्व चार बार मनाया जाता है। जिसमें दो नवरात्रि सार्वजनिक रूप से मनाई जाती हैं। तो वहीं दो गुप्त नवरात्रि होती हैं। माघ और आषाढ़ महीने में आने वाली नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि की शुरूआत 15 जुलाई 2026 से हुई है। तो वहीं इसकी समाप्ति 23 जुलाई 2026 को होगी।</div><div><br></div><div>गुप्त नवरात्रि के दौरान व्यक्तिगत और गोपनीय साधना को अधिक महत्व दिया जाता है। माना जाता है कि यह नवरात्रि तांत्रिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेकिन गृहस्थ लोग भी कुछ नियमों के पालन के साथ इन नवरात्रि का लाभ ले सकते हैं।</div><div><br></div><h2>घटस्थापना मुहूर्त</h2><div>आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी की 15 जुलाई को घटस्थापना के साथ इस पर्व की शुरूआत होगी। आज कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त 05:33 मिनट से लेकर सुबह 10:09 मिनट तक है। वहीं 23 जुलाई 2026 को नवमी तिथि है, इस दिन गुप्त नवरात्रि की समाप्ति होगी।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद घर के ईशान कोण को साथ करें। फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित करें। एक पात्र में मिट्टी डालकर इसमें जौ बोए जाते हैं। फिर तांबे या मिट्टी के कलश में जल, अक्षत, सिक्का और एक सुपारी डालकर आम के पत्ते लगाएं और इसके ऊपर नारियल स्थापित करें। फिर दीपक जलाकर मां दुर्गा से अपनी मनोकामना का संकल्प लें।</div><div><br></div><h2>पूजा के नियम</h2><div>गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की पूजा-उपासना की जाती है। दस महाविद्याओं में काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला शामिल हैं। ऐसे में गृहस्थ लोग मां मातंगी, मां कमला और मां भुवनेश्वरी की पूजा कर सकते हैं। अन्य देवियों की उग्र साधनाएं बिना गुरु के नहीं करना चाहिए।</div><div><br></div><div>गुप्त नवरात्रि के दौरान विशेष सावधानियां रखनी चाहिए। इस दौरान की जाने वाली पूजा सामान्य भक्ति से अलग होती है। इनके लिए कठोर नियमों का पालन करना जरूरी होता है। पूरे 9 दिनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस दौरान प्याज, लहसुन, मांस और शराब जैसे तामसिक चीजों से दूरी बनानी चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 10:03:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/festival-of-10-mahavidyas-begun-householders-note-auspicious-time-and-rules</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ashadha Amavasya 2026: 14 जुलाई को है आषाढ़ अमावस्या, Bhaumvati Amavasya पर बन रहा विशेष शुभ Muhurat]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/ashadha-amavasya-on-july-14th-bhaumvati-amavasya-special-auspicious-time]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व होता है। यह तिथि दान-पुण्य करने, पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और आध्यात्मिक साधना करने के लिए बेहद शुभ माना जाता है। हर अमावस्या तिथि का अपना महत्व होता है। वहीं आषाढ़ की अमावस्या को विशेष रूप से स्नान-दान, पितृ तर्पण और ईश्वर की उपासना के लिए अहम माना जाता है। इस बार 14 जुलाई 2026 को आषाढ़ अमावस्या है। वहीं मंगलवार को पड़ने के कारण इसको भौमवती अमावस्या कहा जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं आषाढ़ भौमवती अमावस्या की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 13 जुलाई 2026 की शाम 06:49 मिनट पर आषाढ़ अमावस्या तिथि शुरू हुई है। वहीं आज यानी की 14 जुलाई 2026 की दोपहर 03:12 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 14 जुलाई 2026 को आषाढ़ अमावस्या मनाई जाएगी।</div><div><br></div><h2>धार्मिक महत्व</h2><div>इस दिन पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर्म करना बेहद शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><div>आषाढ़ अमावस्या पर दान-पुण्य करने से पुण्य फल प्राप्त होता है।</div><div><br></div><div>भौमवती अमावस्या होने से हनुमान जी की विशेष पूजा-अर्चना करनी चाहिए।</div><div><br></div><div>यह दिन सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति और पितरों की कृपा पाने का श्रेष्ठ दिन है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>करें ये शुभ कार्य</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करें। अगर संभव को तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें। लेकिन अगर नदी में स्नान करना संभव नहीं हो, तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। फिर काले तिल मिल जल से पितरों का तर्पण करें। इस दिन अन्न, वस्त्र, फल, काले तिल और जरूरतमंदों व गरीबों को भोजन कराना चाहिए। वहीं पीपल को जल अर्पित करें और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।</div><div><br></div><div>मंगलवार को अमावस्या पड़ने के कारण हनुमान चालीसा का पाठ करें और हनुमान जी को बूंदी या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। फिर शाम के समय पीली सरसों, गुग्गल और काले तिल की धूप पूरे घर में देने से वातावरण शुद्ध और सकारात्मक होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 10:55:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/ashadha-amavasya-on-july-14th-bhaumvati-amavasya-special-auspicious-time</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Yogini Ekadashi 2026: 88 हजार ब्राह्मणों के भोजन समान पुण्य, जानें Lord Vishnu पूजा की सही विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/virtue-equal-to-food-of-88-thousand-brahmins-know-method-of-worshipping-lord-vishnu]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। हर साल आषाढ़ माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को योगिनी एकादशी का व्रत किया जाता है। इस बार आज यानी की 10 जुलाई को योगिनी एकादशी का व्रत किया जा रहा है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है। योगिनी एकादशी के व्रत का पुण्य 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर माना जाता है। तो आइए जानते हैं योगिनी एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक योगिनी एकादशी तिथि की शुरूआत 09 जुलाई की रात 09:31 मिनट से हो रही है। वहीं इसकी समाप्ति 10 जुलाई की रात 10:11 मिनट पर हो रही है। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से योगिनी एकादशी का व्रत 10 जुलाई 2026 को किया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। फिर व्रत का संकल्प लें और घर के मंदिर को गंगाजल से पवित्र करें। फिर पूजा स्थल पर पीले कपड़े बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा का स्थापित करें। भगवान को पीले रंग के फूल, चंदन, अक्षत, फल और भोग आदि अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल जरूर शामिल करें।&nbsp;</div><div><br></div><div>एकादशी को तुलसी पत्ते नहीं तोड़े जाते हैं, इसलिए एक दिन पहले इसको तोड़कर रख दें। पूजा के दौरान घी का दीपक जलाएं और योगिनी एकादशी व्रत का पाठ करें। इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और आरती करें। वहीं पूजा के अंत में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।&nbsp;</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ऊँ श्री विष्णवे नम:</div><div><br></div><div>ऊँ श्री परमात्मने नम:</div><div><br></div><div>ऊँ श्री विराट पुरुषाय नम:</div><div><br></div><div>ऊँ श्री क्षेत्र क्षेत्राज्ञाय नम:</div><div><br></div><div>ऊँ श्री केशवाय नम:</div><div><br></div><div>ऊँ श्री पुरुषोत्तमाय नम:</div><div><br></div><div>ऊँ श्री ईश्वराय नम:</div><div><br></div><div>ऊँ श्री हृषीकेशाय नम:</div><div><br></div><div>ऊँ श्री पद्मनाभाय नम:</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 09:55:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/virtue-equal-to-food-of-88-thousand-brahmins-know-method-of-worshipping-lord-vishnu</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Krishnapingal Sankranti 2026: 3 जुलाई को कृष्णपिंगल चतुर्थी, जानें सही Puja Vidhi और प्रभावशाली मंत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/krishnapingal-chaturthi-on-july-3-know-puja-vidhi-and-effective-mantras]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 03 जुलाई 2026 को आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि है। इसको कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। आज यानी की 03 जुलाई 2026 को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है। इस दिन भगवान गणेश की विधिविधान से पूजा की जाती है। माना जाता है कि जो भी जातक इस दिन व्रत और पूजन करता है। उसके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। वहीं जीवन में सुख-सौभाग्य और समृद्धि का आगमन होता है। तो आइए जानते हैं कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी की तिथि, पूजन विधि, महत्व और मंत्र आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत 03 जुलाई की सुबह 11:20 मिनट पर हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 04 जुलाई 2026 की दोपहर 12:39 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 03 जुलाई 2026 को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान श्री गणेश की प्रतिमा को एक लकड़ी की चौकी पर स्थापित करें। अब गणेश जी को सिंदूर, दूर्वा, अक्षत और पुष्प आदि अर्पित करें। इसके बाद मोदक या बूंदी के लड्डुओं का भोग लगाएं। पूजा के दौरान 'ऊँ गं गणपतये नम:' मंत्र का जाप करें। इसके बाद संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करें और गणेश चालीसा करें। फिर भगवान गणेश की आरती करें। वहीं रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद अर्घ्य दें और व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ऊँ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ ।</div><div>निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा ॥</div><div><br></div><div>ॐ एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात् ॥</div><div><br></div><div>ॐ महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात् ॥</div><div><br></div><div>ॐ गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात् ॥</div><div><br></div><div>ॐ श्रीं गं सौभाग्य गणपतये वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नम:।।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 09:58:03 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/krishnapingal-chaturthi-on-july-3-know-puja-vidhi-and-effective-mantras</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Krishnapingala Sankashti Chaturthi: कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत से जीवन की सभी बाधाएं होती हैं दूर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-krishnapingal-sankashti-chaturthi-fast-removes-all-obstacles-from-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>03 जुलाई को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत है, सनातन धर्म में संकष्टी चतुर्थी के व्रत का विशेष महत्व है। ये व्रत विघ्नहर्ता और प्रथमपूज्य भगवान गणेश को समर्पित किया गया है, संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है तो आइए हम आपको कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी को ‘कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी’ के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को रखने से गणेश जी की विशेष कृपा जीवन पर बनी रहती है और घर की सुख-शांति बढ़ती है। हिंदू धर्म में गणेश जी बुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा के देवता माने जाते हैं। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य की शुरुआत गणेश जी की उपासना के साथ की जाती है, ऐसा करने से सभी कार्य बिना विघ्न के संपन्न होते हैं। भगवान गणेश का आह्वान कर किसी भी कार्य की शुरुआत करने से सभी बाधाओं का अंत होता है।&nbsp; भगवान गणेश को संकष्टी चतुर्थी व्रत समर्पित है जो हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखा जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/secret-of-jagannath-rath-yatra-why-one-get-blessing-of-salvation-by-visiting-this-temple-in-puri" target="_blank">Jagannath Rath Yatra का रहस्य: Puri के इस मंदिर में दर्शन से क्यों मिलता है मोक्ष का वरदान?</a></h3><div>कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत 03 जुलाई को है, जो भगवान गणेश को समर्पित है। यह व्रत जीवन की बाधाएं दूर कर सुख-समृद्धि लाता है। इस दिन गणेश जी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। चंद्रोदय का विशेष महत्व है। ब्रह्म मुहूर्त और सर्वार्थ सिद्धि योग जैसे शुभ मुहूर्तों में गणेश पूजन अत्यंत फलदायी होता है, जिससे घर में शांति बनी रहती है।</div><div><br></div><h2>सर्वार्थ सिद्धि योग में करें गणेश जी का पूजन</h2><div>पंडितों के अनुसार इस साल की कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बनेगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह में 05 बजकर 28 मिनट से 11 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। इस योग में गणेश जी की पूजा करें।</div><div><br></div><h2>आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन सबसे पहले जल्दी उठकर घर की साफ सफाई करें और स्नान करें। फिर भगवान गणेश की पूजा के लिए संकल्प लें, इसके बाद भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर उनकी पूजा करें। पूजा में दीप, धूप, फल, फूल आदि का उपयोग करें। भगवान गणेश की कथा सुनें और भजन कीर्तन करें। व्रत के आखिर में व्रती को भगवान गणेश को अर्पित किया गया भोजन (प्रसाद) खिलाएं। इस भोजन के बाद व्रत की पूर्णता का संकल्प लें।</div><div><br></div><h2>आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत रखने से होते हैं ये फायदे</h2><div>शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत रखने और गणेश जी के ‘कृष्णपिंगल’ स्वरूप की पूजा करने से भक्तों के सभी दुखों का नाश होता है। गणेश जी का ‘कृष्णपिंगल’ स्वरूप काले वर्ण का होता है। इस रूप की पूजा करने से काम में आने वाली सभी बाधाओं और विघ्नों का अंत होता है। जो भक्त इस दिन श्रद्धा और विधि अनुसार व्रत रखें तो भय, भ्रम और मानसिक तनाव से मुक्ति मिल जाती है।</div><div><br></div><h2>आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर ये करें, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ या नए वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के पूजा स्थल को साफ करके भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा के दौरान गणेश जी को दूर्वा, लाल पुष्प, सिंदूर, मोदक, लड्डू और फल अर्पित करें।</div><div>&nbsp;</div><div>“ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। गणेश चालीसा का पाठ करने से भी विशेष फल प्राप्त होता है। यदि आपने व्रत रखा है तो पूरे दिन संयम, सात्विकता और ब्रह्मचर्य का पालन करें। संध्या के समय पुनः गणेश जी की पूजा करें और रात में चंद्र दर्शन के बाद उन्हें अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें। इसके साथ ही अपनी क्षमता अनुसार दान करना भी पुण्यकारी माना गया है।</div><div><br></div><h2>आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर ये न करें, होगा नुकसान</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन तामसिक भोजन जैसे मांस, मछली, अंडा, शराब तथा लहसुन-प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। व्रत के दौरान क्रोध, झूठ, अपशब्द और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणेश पूजा में तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाता, इसलिए इसका विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। इस दिन घर में कलह, विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।</div><div><br></div><h2>आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक&nbsp;</h2><div>पुराणों में कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के विषय में यह कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में माहिष्मती पुरी में महीजित नाम के एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। राजा बहुत धर्मात्मा और प्रजापालक थे, लेकिन वे निसंतान थे। संतान सुख न मिलने के कारण वे हमेशा दुखी रहते थे। एक दिन राजा ने अपने राज्य के विद्वानों और ब्राह्मणों से इसका समाधान पूछा। ब्राह्मणों ने राजा की भलाई के लिए उन्हें लोमश ऋषि के आश्रम में जाने की सलाह दी। राजा वन में लोमश ऋषि के पास गए और अपनी व्यथा सुनाई। राजा बोले, "हे मुनिवर! मैंने कोई पाप नहीं किया है। फिर भी मैं संतानहीन हूँ। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताएं जिससे मुझे संतान की प्राप्ति हो।" लोमश ऋषि ने राजा को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में बताया।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऋषि ने कहा, "आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत करें। भगवान गणेश के 'कृष्णपिंगल' रूप का ध्यान करें। इस दिन उपवास रखें और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलें। राजा महीजित ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं और उन्हें एक सुंदर व तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। इस कथा के अनुसार, जो भी भक्त पूरी निष्ठा से कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत करता है, उसके सभी संकट दूर हो जाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पर विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन गणपति बप्पा की कृपा से बाधाएं समाप्त होती हैं और कार्यों में सफलता मिलने लगती है। यह व्रत विशेष रूप से विद्यार्थियों, नौकरीपेशा लोगों और व्यापारियों के लिए लाभकारी माना जाता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 18:21:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-krishnapingal-sankashti-chaturthi-fast-removes-all-obstacles-from-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Jyestha Purnima 2026: क्यों है यह साल की सबसे खास पूर्णिमा, जानें Puja Vidhi और इसका महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-this-most-special-full-moon-of-year-learn-puja-vidhi-and-its-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि को बेहद शुभ और पुण्यदायी तिथि माना जाता है। हर महीने की आने वाली पूर्णिमा पूजा-पाठ, आध्यात्मिक साधना, स्नान और दान के लिए विशेष महत्व रखती है। ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा का महत्व कई गुना अधिक माना जाता है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। इस दिए किए गए दान-पुण्य और व्रत का फल गई गुना अधिक मिलता है। तो आइए जानते हैं ज्येष्ठ पूर्णिमा की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि की शुरूआत 29 जून की सुबह 03:06 मिनट पर शुरू हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 30 जून 2026 की सुबह 05:26 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के मुताबिक 29 जून 2026 को ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाई जा रही है।</div><div><br></div><h2>स्नान-दान का मुहूर्त</h2><div>इस बार 29 जून 2026 को ज्येष्ठ पूर्णिमा मनाई जा रही है। यह सूर्योदय से लेकर रात में चंद्र दर्शन तक प्रभावी रहेगी। इसलिए इस दिन पूजा-पाठ, व्रत, स्नान और दान-पुण्य के धार्मिक कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन पवित्र नदी या फिर नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। इसके अलावा इस दिन जरूरतमंदों को वस्त्र, अन्न, जल और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना चाहिए। इससे व्यक्ति पर मां लक्ष्मी और श्रीहरि की कृपा बनी रहती है।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>हिंदू धर्म में ज्येष्ठ पूर्णिमा को बेहद शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति आती है। वहीं इस दिन सत्यनारायण की पूजा और कथा करना चाहिए। इससे परिवार में सौभाग्य, खुशहाली और सकारात्मकता बनी रहती है। इस दिन संध्या काल में मां लक्ष्मी की पूजा और प्रिय भोग अर्पित करने से उन्नति के मार्ग खुलते हैं। वहीं चंद्र देव को अर्घ्य देने से मानसिक शांति मिलती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 13:13:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-this-most-special-full-moon-of-year-learn-puja-vidhi-and-its-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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