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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Apara Ekadashi 2026: अपरा एकादशी पर बन रहा दिव्य संयोग, इस विधि से पूजा करने पर मिलेगा Akshay Punya]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/divine-coincidence-taking-place-on-apara-ekadashi-worshipping-this-way-give-akshay-punya]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 13 मई 2026 को अपरा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है और यह भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-आराधना की जाती है। हर महीने में दो एकादशी तिथि आती हैं- एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष की एकादशी। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। अपरा एकादशी को अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को करने से जातक के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। तो आइए जानते हैं अपरा एकादशी तिथि का मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक अपरा एकादशी तिथि की शुरूआत 12 मई की दोपहर 02:52 मिनट से शुरू हो गई है। वहीं आज यानी की 13 मई की दोपहर 01:29 मिनट पर एकादशी तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर आज 13 मई को अपरा एकादशी का व्रत किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें औऱ व्रत का संकल्प लें। इसके बाद एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। पूजा के दौरान श्रीहरि को पंचामृत, अक्षत, मौली, रोली, गोपीचंदन, फल-फूल और मिठाई आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर आरती करें और भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें। पूजा के समय 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें। संभव को तो इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। वहीं पूजा के अंत में क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक अपरा एकादशी का व्रत करने से जातक के सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में भी सकारात्मकता आती है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से धन-वैभव की प्राप्ति होती है। यह व्रत सिर्फ भौतिक सुख नहीं देती है, बल्कि आध्यात्मिक और मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करती है।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय॥</div><div>ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥</div><div>मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुडध्वजः। मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥</div><div>शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम् विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।&nbsp;</div><div>लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 09:55:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/divine-coincidence-taking-place-on-apara-ekadashi-worshipping-this-way-give-akshay-punya</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Apara Ekadashi 2026: अपरा एकादशी व्रत से होती है सभी मनोकामनाएं पूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/all-wishes-are-fulfilled-through-the-observance-of-the-apara-ekadashi-fast]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अपरा एकादशी व्रत ज्येष्ठ मास में आने वाली पहली एकादशी का नाम अपरा एकादशी है। हिन्दू धर्म में घर परिवार में भी सुख समृद्धि बनी रहती है तो आइए हम आपको अपरा एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें अपरा एकादशी के बारे में&nbsp;</h2><div>अपरा एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हर महीने दो एकादशी आती हैं एक कृष्ण पक्ष (अंधेरे पखवाड़े) में और दूसरी शुक्ल पक्ष (उजले पखवाड़े) में। हर महीने की एकादशी का अलग नाम होता है। ज्येष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। पंडितों के अनुसार इस व्रत को करने से सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/do-not-make-this-mistake-during-kal-bhairav-??puja-know-important-rules-and-mantras-of-fast" target="_blank">Kal Bhairav ​​Fast Rules: Kal Bhairav Puja में भूलकर भी न करें ये Mistake, जानें व्रत के सभी जरूरी नियम और मंत्र</a></h3><h2>अपरा एकादशी का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>हिन्दू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 मई को दोपहर 2:52 बजे शुरू होगी और 13 मई को दोपहर 1:29 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत 13 मई 2026 को रखा जाएगा।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी व्रत के पारण का समय</h2><div>अपरा एकादशी व्रत में पारण (व्रत खोलना) का विशेष महत्व होता है। अपरा एकादशी का पारण 14 मई 2026 को किया जाएगा। पारण का सबसे अच्छा समय सुबह 6:04 से 8:41 बजे तक है।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>पुराणों में अपरा एकादशी कथा को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं, इसमें एक कथा सबसे अधिक प्रचलित है। इस कथा के अनुसार महिध्वज नाम का एक शासक था, जो बहुत ही दयालु था। लेकिन, उसका छोटा भाई वज्रध्वज उससे एकदम विपरीत स्वभाव का था। उसने अपने मन में अपने भाई के खिलाफ द्वेष भर रखा था। उसे अपने भाई का व्यवहार पसंद नहीं आया। वह हमेशा ही इस फिराक में रहता था कि किस तरह से राज्य को हथिया लिया जाए। वह हमेशा अपने भाई को मारने और अपनी शक्ति और राज्य प्राप्त करने के अवसर की तलाश में रहता था। एक दिन मौका पाकर उसने अपने भाई को मार दिया और एक पीपल के पेड़ के नीचे दफना दिया। अकाल मृत्यु के कारण राजा की आत्मा भटकने लगी, वह उस पेड़ के पास से गुजरने वाले हर राहगीर को परेशान करने लगी। संयोगवश एक दिन एक ऋषि उसी रास्ते से गुजर रहे थे। जब उनका सामना उस आत्मा से हुआ, तो उन्होंने उस आत्मा से अब तक मोक्ष प्राप्ति न होने का कारण पूछा। राजा की आत्मा ने अपने साथ हुए विश्वासघात की सारी कहानी ऋषि को बता दी। इसके बाद उस ऋषि ने अपनी शक्ति से, आत्मा को मुक्त कर दिया और उसे जीवन के बारे में सिखाया।</div><div><br></div><div>राजा की मुक्ति के लिए, ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत रखा और उसे प्रेत योनि से छुटकारा पाने में मदद की। द्वादशी के दिन व्रत करने से प्राप्त पुण्य उन्होंने राजा की आत्मा को अर्पित कर दिया। अपरा एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो गई और प्रेत योनि से छुटकारा मिल गया।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी का है खास महत्व&nbsp;</h2><div>हिंदू मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार इस एकादशी का महत्व भगवान कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को बताया था। जो व्यक्ति इस एकादशी व्रत और अनुष्ठान को करता है, वह अतीत और वर्तमान के पापों से छुटकारा पाता है और सकारात्मकता के मार्ग पर आगे बढ़ता है। इस एकादशी को करने का एक मुख्य कारण समाज में अपार धन, प्रसिद्धि और सम्मान प्राप्त करना है। यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति इस एकादशी के अनुष्ठान को अत्यंत भक्ति के साथ करके पुनर्जन्म और मृत्यु के इस चक्र से बाहर निकल सकता है और मोक्ष के अंतिम द्वार तक पहुंच सकता है।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी पर दान भी है जरूरी&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग इस व्रत को करते हैं, उन्हें कार्तिक के महीने में गंगा में पवित्र डुबकी लगाने के बराबर लाभ मिलता है। अपरा एकादशी में भगवान विष्णु की पूजा करने से जो पुण्य कर्म और कर्म होते हैं, वे एक हजार गायों का दान और यज्ञ करने के बराबर होते हैं। लेकिन इस एकादशी का लाभ प्राप्त करने के लिए इसे विधिपूर्वक करना जरूरी है क्योंकि अनुष्ठान और व्रत करना ही सफलता की कुंजी है।</div><div><br></div><div>पंडितों के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत रखने से वही पुण्य मिलता है जो कार्तिक महीने में स्नान करने या गंगा किनारे पिंडदान करने से मिलता है। इसके अलावा, गोमती नदी में स्नान, कुंभ मेले के दौरान केदारनाथ के दर्शन, बद्रीनाथ में निवास और सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करने जितना फल भी इस व्रत से प्राप्त होता है।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ</h2><div>पंडितों के अनुसार अपरा एकादशी के दिन उपवास रखने से शरीर को अपने पापों से छुटकारा मिल जाएगा और वह खुद को ब्रह्मांडीय महासागरों के सामने आत्मसमर्पण कर देगा यानि उसे मत्यु और जीवन के चक्र के जीवन से छुटकारा मिल जाएगा। सभी एकादशी को करने की मूल बातें कुछ हद तक समान हैं। अपरा एकादशी करने वाले भक्त को सुबह जल्दी उठना होता है और पूजा के लिए कोई भी अनुष्ठान शुरू करने से पहले स्नान करना होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भगवान विष्णु की पूजा और पूजा के लिए पूर्व दिशा में पीले रंग का कपड़ा या लकड़ी का स्टूल भी रखा जाता है। भगवान विष्णु की तस्वीर में एक मूर्ति को कपड़े या लकड़ी के स्टूल पर बैठाया जाता है, उसके बाद दीया और अगरबत्ती जलाई जाती है। यह पूजा की शुरुआत का प्रतीक है, और अत्यंत भक्ति के साथ भगवान विष्णु से प्रार्थना करनी चाहिए। चंदन, पान, सुपारी, लौंग, फल और गंगाजल के साथ तुलसी के पत्ते डाले बिना भगवान विष्णु की गई पूजा अधूरी है। पूजा के बाद भक्त को कोई भोजन नहीं करना चाहिए और अपरा एकादशी व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। प्रसाद तैयार कर भगवान विष्णु को चढ़ाया जाता है और फिर भक्तों में वितरित किया जाता है। कुछ पर्यवेक्षक भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए विष्णु मंदिरों में भी जाते हैं।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी व्रत में करें इन नियमों का पालन, मिलेगा पुण्य&nbsp;</h2><div>पुराणों के अनुसार अपरा एकादशी का पालन करने वाले व्यक्ति को एकादशी के एक दिन पहले से ही विधि शुरू कर देनी चाहिए। एकादशी 11वें दिन पड़ती है, इसलिए दशमी को सूर्यास्त के बाद भक्त को कुछ भी नहीं खाना चाहिए। सोने से पहले भगवान की पूजा करनी चाहिए। एकादशी के दिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। उन्हें हाथ में पानी और फूल लेकर व्रत शुरू करने और पूरा करने का संकल्प लेना होता है।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी के दिन ये करें, होंगे समृद्ध</h2><div>पंडितों के अनुसार एकादशी व्रत को विधिपूर्वक करें। सुबह भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें। विष्णु जी को पीला चंदन, पीले फूल अर्पित करें। व्रत कथा का पाठ करें। भोग में तुलसी के पत्ते जरूर शामिल करें। विष्णु चालीसा का पाठ और मंत्रों का जप करें। सात्विक भोजन का सेवन करें। द्वादशी तिथि पर दान करें। दिन में भजन-कीर्तन करें और पीले कपड़े धारण करें। इस दिन जल का दान जरूर करें और घर और मंदिर में गंगाजल का छिड़काव कर शुद्ध करें।</div><div><br></div><h2>अपरा एकादशी के दिन ये न करें&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन चावल का सेवन भूलकर भी न करें। किसी से बातचीत के दौरान अभद्र भाषा का प्रयोग न करें। किसी के बारे में गलत न सोचें। वाद- विवाद न करें। एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें। तामसिक चीजों के सेवन से दूर रहें। इसके अलावा बड़े बुर्जुगों और महिलाओं का अपमान न करें। सुबह की पूजा के बाद दिन में सोना वर्जित है। घर और मंदिर में गंदगी न होने दें। एकादशी के दिन बाल कटवाना, शेविंग करना या नाखून काटना वर्जित है। झूठ न बोलें और चुगली करने से बचें।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 18:42:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/all-wishes-are-fulfilled-through-the-observance-of-the-apara-ekadashi-fast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Ekdant Sankashti Chaturthi 2026: इस खास विधि से करें Puja, Lord Ganesha हर लेंगे आपके सारे संकट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-lord-ganesha-with-this-special-method-and-he-take-away-all-troubles]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत करने से पहले भगवान गणेश की पूजा-आराधना की जाती है। वहीं ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को एकदंत संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भगवान गणेश को समर्पित है और उनकी पूजा-अर्चना करने का विधान है। इस बार आज यानी की 05 मई 2026 को एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं एकदंत संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और मंत्र आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 05 मई की सुबह 05:24 मिनट पर हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 06 मई 2026 की सुबह 07:51 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 05 मई को एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजा विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें और व्रत का संकल्प लें। अब एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर गंगाजल से अभिषेक कराएं और फूल, अक्षत, धूप-दीप और दूर्वा आदि अर्पित करें। इसके बाद सिंदूर का तिलक करें। भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और 'ऊँ गं गणपतये नम:' मंत्र का जाप करते रहें। फिर संकष्टी चतुर्थी की कथा का पाठ करें। वहीं पूरा दिन श्रद्धा और नियम के साथ व्रत करें। वहीं रात में चंद्र देव को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>गणेश मंत्र</h2><div>ॐ गं गणपतये नमः</div><div>वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥</div><div>ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात्॥</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 05 May 2026 09:21:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-lord-ganesha-with-this-special-method-and-he-take-away-all-troubles</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Narada Jayanti 2026: ज्ञान-बुद्धि का मिलेगा वरदान, इस Special Puja विधि से करें देवर्षि को प्रसन्न]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/get-blessing-of-knowledge-and-wisdom-please-devarshi-with-this-special-puja-method]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि पर नारद जयंती मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवर्षि नारद प्रकट हुए थे। पौराणिक कथाओं के मुताबिक देवर्षि नारद ब्रह्माजी के मानस पुत्रों में से एक हैं। वहीं भगवान श्रीहरि विष्णु के जिन 24 अवतारों के बारे में बताया गया है, उनमें से एक देवर्षि नारद हैं। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु और नारद जी की पूजा करना शुभ माना जाता है। इससे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। तो आइए जानते हैं नारद जयंती की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>द्रिक पंचांग के मुताबिक ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि की शुरूआत 02 की रात 12:51 मिनट पर होगा। वहीं अगले दिन यानी की 03 मई की रात 03:02 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं उदयातिथि के मुताबिक 02 मई 2026 को नारद जयंती मनाई जा रही है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद पूजा घर की साफ-सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव करें। फिर पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की पूजा करें और भगवान श्रीहरि को फल, ताजे फूल, चंदन और कुमकुम आदि अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप आदि के साथ विधिविधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करें। फिर नारद जी की पूजा-अर्चना करें। पूजा के दौरान श्रीहरि को पंचामृत का भोग जरूर लगाएं और उसमें तुलसी दल शामिल करें।</div><div><br></div><div>भगवान विष्णु और नारद जी की पूजा करें। इससे शुभ फल की प्राप्ति होती है। वहीं जातक पर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक नारद जयंती पर पूजा करने से बल, बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति होती है। वहीं इस दिन भगवान विष्णु के मंदिर जाकर बांसुरी अर्पित करनी चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 02 May 2026 10:08:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/get-blessing-of-knowledge-and-wisdom-please-devarshi-with-this-special-puja-method</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Kurma Jayanti 2026: आज शाम करें कच्छप अवतार की पूजा, जानें Perfect Puja Vidhi और मंत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-tortoise-incarnation-this-evening-learn-perfect-puja-method-and-mantra]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में जगत के पालनहार भगवान विष्णु की पूजा सभी दुखों को दूर करने और कामनाओं को पूरा करने वाली मानी जाती है। आज यानी की 01 मई को कूर्म जयंती मनाई जा रही है। वैशाख मास की पूर्णिमा को भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लिया था। इस दिन भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की पूजा और व्रत करने से अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं कूर्म जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>द्रिक पंचांग के मुताबिक हर साल बैशाख माह की पूर्णिमा तिथि को कूर्म जयंती मनाई जाती है। 30 अप्रैल की रात 09:12 मिनट से पूर्णिमा तिथि की शुरूआत हुई है। जोकि आज यानी की 01 मई 2026 की रात 10:52 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर आज 01 मई को कूर्म जयंती मनाई जा रही है। पूजा का उत्तम मुहूर्त शाम को 04:17 मिनट से 06:56 मिनट तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजा विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर एक चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें। प्रतिमा पर गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। फिर भगवान विष्णु को पीले चंदन, केसर, हल्दी आदि से तिलक करें। अब पीले रंग के पुष्प, पीले वस्त्र, पीले फल, पीले रंग की मिठाई अर्पित करें। भगवान विष्णु के कच्छप अवतार की कथा का पाठ करें। अंत में पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और आरती करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>जो भी जातक पूरे विधि विधान से इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत आदि करता है। श्रीहरि उसकी सभी बाधाओं को हर लेते हैं। कूर्म जयंती की पूजा के पुण्यफल से जातक के पाप नष्ट होते हैं और चिंताएं दूर होती हैं। व्यक्ति को जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 01 May 2026 14:03:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-tortoise-incarnation-this-evening-learn-perfect-puja-method-and-mantra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vaishakha Purnima 2026: वैशाख पूर्णिमा पर करें ये खास काम, जानें स्नान-दान की Full Details]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/do-this-special-work-on-vaishakh-purnima-know-full-details-of-bathing-and-donation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 01 अप्रैल 2026 को सिद्धि योग में वैशाख पूर्णिमा मनाई जा रही है। आज के दिन स्नान-दान और व्रत करने का महत्व होता है। इस दिन पूजा और व्रत किया जाता है। स्नान के बाद दान करने के बाद अपनी क्षमता के मुताबिक दान करने से पाप मिटते हैं और पुण्य मिलता है। इस दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा सुनने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। वहीं प्रदोष काल में मां लक्ष्मी और रात में चंद्र देव की पूजा करके अर्घ्य देते हैं। आइए जानते हैं वैशाख पूर्णिमा के स्नान, दान, पूजा विधि और मुहूर्त और मंत्र आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैशाख पूर्णिमा तिथि की शुरूआत - 30 अप्रैल 2026 की रात 9:12 मिनट से</div><div>वैशाख पूर्णिमा तिथि का समापन - 1 मई 2026 की रात 10:52 मिनट पर</div><div>वैशाख पूर्णिमा स्नान का मुहूर्त - सुबह 04:15 से 04:58 मिनट तक, सूर्योदय बाद भी कर सकते हैं।</div><div>सत्यनारायण भगवान की पूजा का शुभ मुहूर्त - सुबह 07:20 से लेकर 10:39 मिनट तक</div><div>वैशाख पूर्णिमा पर लक्ष्मी पूजन का समय - शाम 06:56 के बाद</div><div><br></div><h2>चंद्रोदय का समय</h2><div>आज यानी की वैशाख पूर्णिमा का 06:52 मिनट पर चंद्रोदय होना है। वहीं रात में जब पूर्ण चंद्रमा निकला हो, तो अर्घ्य देकर पूजा करें। अर्घ्य देने के बाद वैशाख पूर्णिमा का व्रत और पूजा संपन्न मानी जाती है। वहीं व्रत का पारण 02 मई 2026 की सुबह 05:40 मिनट के बाद होगा।</div><div><br></div><h2>स्नान और दान की विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर गंगा स्नान करें। गंगा स्नान संभव न हो तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। फिर साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद वैशाख पूर्णिमा के व्रत और पूजा का संकल्प लें। इस दिन आप चीनी, खीर, चावल, दूध, सफेद रंग के वस्त्र, मखाना, मिश्री, चांदी आदि का दान कर सकते हैं। इसके अलावा आप जल का भी दान कर सकते हैं, इससे पुण्य लाभ होगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 01 May 2026 10:23:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/do-this-special-work-on-vaishakh-purnima-know-full-details-of-bathing-and-donation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Buddh Purnima 2026: Lord Vishnu के 9वें अवतार Gautam Buddha का महासंयोग, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/coincidence-of-gautam-buddha-9th-incarnation-of-lord-vishnu-know-method-of-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल बैसाख माह की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा मनाई जाती है। इस दिन को बैसाख पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह दिन हिंदू और बौद्ध धर्म दोनों के लिए बेहद अहम है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु के 9वें अवतार महात्मा बुद्ध का इसी दिन अवतार हुआ था। वहीं बैसाख पूर्णिमा को गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और महापरिनिर्वाण भी हुआ था। इस दिन स्नान और दान करने का विशेष महत्व माना जाता है। तो आइए जानते हैं बुद्ध पूर्णिमा की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक हर साल बैसाख माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। 30 अप्रैल 2026 की रात 09:13 मिनट से बैसाख पूर्णिमा तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 01 मई की रात 10:53 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 01 मई 2026 को बुद्ध पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>क्यों मनातें हैं बुद्ध पूर्णिमा</h2><div>गौतम बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाएं बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही घटित हुई थी। भगवान विष्णु के 9वें अवतार महात्मा बुद्ध का जन्म बैसाख पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। इसी दिन महात्मा बुद्ध को बोध गया में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। वहीं इसी दिन कुशीनगर में महात्मा बुद्ध ने सांसारिक बंधनों से पूर्ण मुक्ति प्राप्त की थी। इस दिन बौद्ध धर्म के लोग घरों में पवित्र ग्रंथ त्रिपिटक और धम्मपद का पाठ करते हैं।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। बैसाख पूर्णिमा पर सूर्य उच्च राशि मेष में और तुला राशि में चंद्रमा विराजमान होते हैं। इस दिन स्नान-दान का विशेष महत्व माना जाता है। वहीं इस दिन दान-पुण्य करने से जातक को पुण्य फल की प्राप्ति होती है। बैसाख पूर्णिमा के दिन मिट्टी के घड़े का दान करना गौ दान के समान फल प्रदान करने वाला माना जाता है। वहीं बैसाख पूर्णिमा पर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना शुभ माना जाता है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 01 May 2026 09:53:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/coincidence-of-gautam-buddha-9th-incarnation-of-lord-vishnu-know-method-of-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bodh Gaya से Sri Lanka तक 'Vesak' की धूम, जानें दुनिया कैसे मना रही है भगवान बुद्ध का पर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/find-out-how-the-world-is-celebrating-the-festival-of-lord-buddha]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैशाखी पूर्णिमा बड़ी ही पवित्र तिथि है। दान पुण्य और धर्म कर्म के अनेक कार्य इस दिन किये जाते हैं। वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध पूर्णिमा भी मनायी जाती है। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। इसलिए हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है। यह 'सत्य विनायक पूर्णिमा' भी मानी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र दरिद्र ब्राह्मण सुदामा जब द्वारिका उनके पास मिलने पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने उनको सत्यविनायक व्रत का विधान बताया था। इसी व्रत के प्रभाव से सुदामा की सारी दरिद्रता जाती रही तथा वह सर्वसुख सम्पन्न और ऐश्वर्यशाली हो गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस दिन कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। हर देश में स्थानीय परंपराओं के हिसाब से इसे मनाया जाता है, जैसे कि श्रीलंका में इसे वेसाक कहा जाता है। इस दिन अहिंसा और सदाचार अपनाने का प्रण लिया जाता है। इस दिन मांसाहार भी नहीं किया जाता, क्योंकि महात्मा बुद्ध किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ थे। चीन, तिब्बत और विश्व के अनेक कोनों में फैले बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे अपने अपने ढंग से मनाते हैं। बिहार स्थित बोधगया नामक स्थान हिन्दू व बौद्ध धर्मावलंबियों के पवित्र तीर्थ स्थान है। गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सात वर्षों तक वन में भटकते रहे। यहां पर उन्होंने कठोर तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/buddha-purnima-will-be-celebrated-on-may-1st" target="_blank">Buddha Purnima 2026: 1 मई को मनाई जाएगी बुद्ध पूर्णिमा, इस दिन करें जरूरतमंदों को वस्त्रों का दान</a></h3><div>इस दिन बौद्ध घरों में दीपक जलाए जाते हैं और फूलों से घरों को सजाया जाता है। इस पर्व पर दुनियाभर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थना करते हैं। इस दिन बोधिवृक्ष की पूजा की जाती है। उसकी शाखाओं पर हार व रंगीन पताकाएं सजाई जाती हैं। जड़ों में दूध व सुगंधित पानी डाला जाता है और वृक्ष के आसपास दीपक जलाए जाते हैं। इस दिन पक्षियों को पिंजरे से मुक्त कर खुले आकाश में छोड़ा जाता है और गरीबों को भोजन व वस्त्र दान दिए जाते हैं। दिल्ली संग्रहालय इस दिन बुद्ध की अस्थियों को बाहर निकालता है जिससे कि बौद्ध धर्मावलंबी वहां आकर प्रार्थना कर सकें।</div><div><br></div><div>इस दिन अलग अलग पुण्य कर्म करने से अलग अलग फलों की प्राप्ति होती है। धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन धर्मराज के निमित्त जलपूर्ण कलश और पकवान दान करने से गौ दान के समान फल प्राप्त होता है। साथ ही पांच या सात ब्राह्मणों को शर्करा सहित तिल दान देने से सब पापों का क्षय हो जाता है। इस दिन यदि तिलों के जल से स्नान करके घी, चीनी और तिलों से भरा हुआ पात्र भगवान विष्णु को निवेदन करें और उन्हीं से अग्नि में आहुति दें अथवा तिल और शहद का दान करें, तिल के तेल के दीपक जलाएं, जल और तिलों का तर्पण करें अथवा गंगा आदि में स्नान करें तो व्यक्ति सब पापों से मुक्त हो जाता है। यदि इस दिन एक समय भोजन करके पूर्णिमा, चंद्रमा अथवा सत्यनारायण भगवान का व्रत करें तो सब प्रकार के सुख, संपदा और श्रेय की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><div>-शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:42:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/find-out-how-the-world-is-celebrating-the-festival-of-lord-buddha</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Buddha Purnima 2026: 1 मई को मनाई जाएगी बुद्ध पूर्णिमा, इस दिन करें जरूरतमंदों को वस्त्रों का दान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/buddha-purnima-will-be-celebrated-on-may-1st]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि बहुत पुण्यदायी मानी गई है। वैशाख महीने की पूर्णिमा तिथि को बुद्ध पूर्णिमा और बुद्ध जयंती के नाम से जाना जाता है। इस बार बुद्ध पूर्णिमा का पर्व 1 मई को मनाई जाएगा। यह पर्व हिंदू और बौद्ध दोनों ही धर्मों के अनुयायी मनाते हैं। बुद्ध पूर्णिमा को बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति के दिन के रूप में देखा जाता है और और इसी दिन उनका महानिर्वाण भी हुआ था। वहीं हिंदू मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने अपना 9 वां अवतार बुद्ध के रूप में लिया था। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के अगले दिन पूर्णिमा मनाई जाती है। इस प्रकार 1 मई को वैशाख पूर्णिमा है। इसे बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है। शास्त्रों में निहित है कि वैशाख पूर्णिमा तिथि पर भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। अतः हर वर्ष वैशाख पूर्णिमा तिथि पर बुद्ध जयंती मनाई जाती है। इस दिन भगवान बुद्ध की पूजा-उपासना की जाती है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन रवि योग है।</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैशाख पूर्णिमा का हिंदुओं में बेहद महत्व है। वैशाख पूर्णिमा 1 मई 2026 को मनाई जाएगी। इस दिन लोग सत्यनारायण कथा चंद्रमा को अर्घ्य और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है जो लोग इस पवित्र दिन का उपवास रखते हैं उन्हें दिव्य शक्तियां प्राप्त होती हैं साथ ही उनके घर पर माता लक्ष्मी का वास सदैव के लिए हो जाता है। शास्त्रों में निहित है कि वैशाख पूर्णिमा तिथि पर भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। इसी दिन ज्ञान की प्राप्ति और परिनिर्वाण हुआ था। अतः हर वर्ष वैशाख पूर्णिमा तिथि पर बुद्ध जयंती मनाई जाती है। इस दिन भगवान बुद्ध की पूजा-उपासना की जाती है। इस अवसर पर लोग गंगा समेत पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। साथ ही पूजा-पाठ कर दान-पुण्य करते हैं। बुद्ध पूर्णिमा को गौतम बुद्ध की जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार बौद्ध धर्म के लोगों के लिए खास माना जाता है। इस दिन गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का पालन किया जाता है और उनकी विशेष पूजा की जाती है। बुद्ध पूर्णिमा का त्योहार मुख्य रूप से पूर्वी एशिया और दक्षिण एशिया में मनाया जाता है। इसी शुभ तिथि पर गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी में हुआ था। गौतम बुद्ध ने 35 वर्ष की आयु में निर्वाण प्राप्त कर लिया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gautam-buddha-is-the-beacon-of-compassion-peace-and-enlightenment" target="_blank">करुणा, शांति और आत्मजागरण के प्रकाशस्तंभ हैं गौतम बुद्ध</a></h3><h2>भगवान के तीन अवतार&nbsp;</h2><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि ग्रंथो के अनुसार इन तीन दिनों में भगवान विष्णु के तीन अवतार अवतरित हुए हैं। त्रयोदशी को नृसिंह जयंती, चतुर्दशी को कूर्म जयंती तथा पूर्णिमा को बुद्ध जयंती (बुद्ध पूर्णिमा)। इसलिए वैशाख के अंतिम दिनों में स्नान, दान, पूजन जरूर करना चाहिए। देवताओं ने कहा कि वैशाख की ये तीन शुभ तिथियां इंसानों के पाप का नाश करने वाली रहेंगी। इनके शुभ प्रभाव से ही उन्हें पुत्र-पौत्र और परिवार का सुख मिलेगा। इन्हीं के प्रभाव से समृद्धि बढ़ेगी। स्कंद पुराण में कहा गया है कि जो पूरे वैशाख में सुबह जल्दी तीर्थ स्नान न कर सका हो, वो सिर्फ इन तिथियों में सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र नदियों के जल से नहा ले तो उसे पूरे महीने का पुण्य फल मिल जाता है।</div><div><br></div><h2>क्या करें&nbsp;</h2><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैशाख मास की आखिरी तीन तिथियों में गीता पाठ करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। इन तीनों दिनों में श्रीविष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से कभी न खत्म होने वाला अनंत गुना पुण्य फल मिलता है। वैशाख पूर्णिमा को हजार नामों से भगवान विष्णु का दूध और जल से अभिषेक करता है उसे बैकुण्ठ धाम मिलता है। वैशाख के आखिरी तीन दिनों में श्रीमद् भागवत सुनने से जाने-अनजाने में हुए हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं।</div><div><br></div><h2>चंद्रमा को अर्घ्य देने की है परंपरा</h2><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि बुद्ध पूर्णिमा के दिन बोधगया में दुनियाभर से बौद्ध धर्म मानने वाले आते हैं और बोधि वृक्ष की पूजा करते हैं।&nbsp; वैशाख पूर्णिमा पर पवित्र नदी के जल से स्नान के बाद घर में भगवान सत्यनारायण की पूजा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। माना जाता है कि चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक शांति मिलती है और सुख-समृद्धि का वास होता है</div><div><br></div><h2>वैशाख पूर्णिमा&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैशाख शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। इस बाद पूर्णिमा तिथि 30 अप्रैल 2026 को रात 9:13 मिनट से शुरु होगी। वहीं इसकी समाप्ति 1 मई को रात 10:53 मिनट पर हो जाएगी। ऐसे में उदया तिथि के प्रभाव के कारण वैशाख पूर्णिमा शुक्रवार 1 मई 2026 को मनाई जाएगी।</div><div><br></div><h2>बुद्ध पूर्णिमा का महत्व</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैशाख मास की पूर्णिमा को वैशाखी पूर्णिमा,पीपल पूर्णिमा या बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार वैशाख पूर्णिमा सभी में श्रेष्ठ मानी गई है। प्रत्येक माह की पूर्णिमा जगत के पालनकर्ता श्री हरि विष्णु भगवान को समर्पित होती है। भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार माना गया है। जिन्हें इसी पावन तिथि के दिन बिहार के पवित्र तीर्थ स्थान बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। वैशाख माह को पवित्र माह माना गया है। इसके चलते हज़ारों श्रद्धालु पवित्र तीर्थ स्थलों में स्नान, दान कर पुण्य अर्जित करते हैं। पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्त्व माना गया है।</div><div><br></div><h2>वैशाख पूर्णिमा पूजा अनुष्ठान</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि सुबह जल्दी उठकर गंगा नदी में पवित्र स्नान करें। जो लोग गंगा नदी स्नान के लिए नहीं जा सकते हैं, वे घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाएं। कुछ लोग इस दिन गंगा नदी में पवित्र स्नान के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश और अन्य प्रमुख स्थानों पर भी जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि गंगा जल शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करता है। इस दिन लोग भगवान चंद्र को अर्घ्य देते हैं और उनके वैदिक मंत्रों का जाप करते हैं। यह खास दिन दान-पुण्य के लिए भी फलदायी माना जाता है। पूर्णिमा के दिन ब्राह्मणों को भोजन और वस्त्रों का दान करना चाहिए। इस दिन भक्त सत्यनारायण व्रत रखते हैं, और उनकी पूजा करते हैं। पूर्णिमा का दिन बेहद खास माना जाता है, क्योंकि चंद्रमा की रोशनी सीधे पृथ्वी पर आती है, जिससे घर में समृद्धि और खुशी का वास होता है। इस दिन जरूरतमंदों को भोजन खिलाना चाहिए और वस्त्रों का दान करना चाहिए।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:07:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/buddha-purnima-will-be-celebrated-on-may-1st</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Buddha Purnima 2026: वैशाख पूर्णिमा पर इस मुहूर्त में स्नान-दान से मिलेगी मानसिक शांति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/buddha-purnima-or-vaishakh-purnima-2026-date-puja-muhurat-and-rituals-guide]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में वैशाख पूर्णिमा का पर्व 1 मई को मनाया जाएगा। वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा भी कहते हैं। पूर्णिमा तिथि 30 अप्रैल की रात 9:12 बजे से शुरू होगी और 1 मई की रात 10:52 बजे तक रहेगी। पूजा-पाठ, व्रत और दान के लिए 1 मई का दिन ही सबसे उत्तम रहेगा।</div><div><br></div><h2><b>स्नान और दान का समय</b></h2><div>इस दिन सुबह जल्दी पवित्र नदी में स्नान करने और गरीबों को दान देने का बहुत महत्व है। स्नान और दान के लिए सबसे शुभ समय (मुहूर्त) सुबह 4:15 बजे से 4:58 बजे तक रहेगा। जो लोग चंद्रमा की पूजा करना चाहते हैं, उन्हें शाम को लगभग 6:52 बजे चांद के दर्शन होंगे।</div><div><br></div><h2><b>इस दिन का खास महत्व</b></h2><div>ज्योतिष के अनुसार, इस दिन चंद्रमा अपनी पूरी शक्ति में होता है। चूंकि चंद्रमा हमारे मन और भावनाओं को संभालता है, इसलिए इस दिन पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने 'कूर्म' (कछुआ) अवतार लिया था, इसलिए इसे कूर्म जयंती भी कहा जाता है।</div><div><br></div><h2><b>चंद्रमा की पूजा कैसे करें?</b></h2><div>पूर्णिमा की शाम को जब चंद्रमा निकल आए, तब उन्हें जल अर्पित करें। जल में सफेद फूल, चावल और कुमकुम जरूर डालें। अगर किसी की कुंडली में चंद्रमा कमजोर है, तो उसे इस दिन पूजा करने से बहुत लाभ मिलता है। पूजा के समय अपनी इच्छा मन में बोलकर प्रार्थना करें।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/buddha-purnima-2026-5-vastu-items-for-prosperity" target="_blank">Buddha Purnima 2026: ये 5 चीजें घर लाने से चमक जाएगी आपकी किस्मत, खूब बरसेगा पैसा</a></h3><div><br></div><h2><b>सुख-समृद्धि के आसान उपाय</b></h2><div><b>कथा और दान:</b> इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना बहुत शुभ होता है। अपनी शक्ति के अनुसार गरीबों को खाना या कपड़े दान करें।</div><div><b>पारिवारिक सुख: </b>भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से घर और वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है।</div><div><b>मानसिक शांति: </b>रात के समय चांद की रोशनी में बैठकर 'ऊं सोमाय नमः' मंत्र का जाप करें। इससे तनाव कम होता है और सकारात्मकता बढ़ती है।</div><div><br></div><h2><b>इन बातों का रखें विशेष ध्यान</b></h2><div>पूजा में कभी भी बासी फूल या टूटे हुए चावलों का इस्तेमाल न करें। इस पवित्र दिन पर गुस्सा करने या गलत सोचने से बचना चाहिए। साथ ही, भोजन सादा रखें और मांस-मदिरा जैसी चीजों से दूर रहें।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 15:50:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/buddha-purnima-or-vaishakh-purnima-2026-date-puja-muhurat-and-rituals-guide</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Narasimha Jayanti 2026: नरसिंह जयंती व्रत से मिलती है शत्रुओं पर विजय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-narsingh-jayanti-fast-grants-victory-over-enemies]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज नरसिंह जयंती है, नरसिंह जयंती हिंदू धर्म का एक पवित्र पर्व है और नरसिंह जयंती का विशेष महत्व है। यह त्यौहार भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार की स्मृति में मनाया जाता है तो आइए हम आपको नरसिंह जयंती व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें नरसिंह जयंती व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार भगवान नरसिंह को श्री विष्णु के 10 अवतारों में से एक हैं, उन्हें चौथे अवतार के रूप में पूजा जाता है। उनकी पूजा विष्णु जी के रौद्र अवतार के रूप में होती है। भगवान नरसिंह का आधा शरीर मनुष्य और आधा शेर का है इसी वजह से उनकी पूजा इसी स्वरुप में होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब विष्णु जी के भक्त प्रह्लाद पर विपदा आई थी तब श्री हरि ने नरसिंह रूप धारण करके भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु नरसिंह अवतार धारण किया था, तभी से इस दिन को नरसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग भगवान के नरसिंह अवतार की पूजा करते हैं और घर की समृद्धि और रक्षा की कामना करते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-took-this-incarnation-for-devotee-prahlad-know-method-of-worship-and-importance" target="_blank">Narsimha Jayanti 2026: भक्त प्रह्लाद के लिए Lord Vishnu ने लिया था यह अवतार, जानें पूजा विधि और महत्व</a></h3><h2>नरसिंह जयंती का शुभ मुहूर्त</h2><div>पंडितों के अनुसार पूजा का सबसे शुभ समय मध्याह्न संकल्प और पूजा मुहूर्त माना जाता है, जो सुबह 10.59 बजे से दोपहर 01.38 बजे तक रहेगा। इसके अलावा सायंकाल पूजा का समय शाम 04.17 बजे से 06.56 बजे तक शुभ माना गया है. भक्त इस अवधि में पूजा और व्रत का पालन करते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>नरसिंह जयंती का महत्व</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नरसिंह जयंती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक है। भगवान अपने सच्चे भक्तों की हमेशा रक्षा कर करते हैं। प्रह्लाद की भक्ति और भगवान नरसिंह का प्रकट होना इस बात का प्रतीक है कि सच्ची आस्था कभी व्यर्थ नहीं जाती। इस दिन व्रत रखने से भय, संकट और और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलने की मान्यता है। भगवान नरसिंह की कृपा से जीवन में आने वाले संकटों का नाश होता है। वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। उनकी पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में आने वाले कष्टों से छुटकारा मिलता है। इसके अलावा नरसिंह जयंती के दिन व्रत रखने और भगवान नरसिंह की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और साथ ही ग्रह-दोष से भी मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><h2>नरसिंह जयंती पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार नरसिंह जयंती का व्रत बहुत खास होता है इसलिए इस दिन सुबह उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करें और गंगाजल से पवित्र करें। एक वेदी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान नरसिंह की प्रतिमा स्थापित करें। अगर नरसिंह जी की प्रतिमा न हो तो भगवान विष्णु की तस्वीर भी स्थापित कर सकते हैं। पूजा शुरू करने से पहले व्रत और पूजा का संकल्प लें। भगवान नरसिंह की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। चंदन, कुमकुम, हल्दी और गुलाल आदि चीजें अर्पित करें और उन्हें पीले या लाल रंग के वस्त्र पहनाएं और पीले फूलों की माला चढ़ाएं। भगवान नरसिंह को फल, मिठाई, विशेष रूप से गुड़ और चना अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल जरूर शामिल करें और घी का दीपक जलाएं। भगवान नरसिंह के मंत्रों का जाप करें, अंत में भगवान नरसिंह की आरती करें। पूजा के दौरान हुई गलतियों के लिए माफी मांगे और अपनी क्षमतानुसार गरीबों और जरूरतमंदों को दान करें।</div><div><br></div><h2>नरसिंह जयंती से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लिया था, उसमें भगवान नरसिंह का आधा शरीर मनुष्य का और आधा शरीर सिंह का था। वह हिरण्यकश्यप के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए दोपहर के समय खंभा फाड़कर प्रकट हुए थे। उन्होंने घर की दहलीज पर हिरण्यकश्यप को अपने जंघे पर लिटाकर दोनों हाथों के नखों से उसका पेट फाड़ दिया था। हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उसे मनुष्य या जानवर, दिन या रात में, अस्त्र या शस्त्र से नहीं मारा जा सकता था, इस वजह श्रीहरि ने सबसे अनोखा स्वरूप नरसिंह का धारण किया था।</div><div><br></div><h2>नरसिंह जयंती के दिन करें ये उपाय</h2><div>पंडितों के अनुसार नरसिंह जयंती के दिन भगवान नरसिंह का यदि विधि-विधान से किया जाए तो शत्रुओं का नाश होता है और मन के भीतर मौजूद डर खत्म होता है। इस दिन ॐ नृसिंहाय नमः या उग्रं वीरं महाविष्णुं मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए। इससे मन शांत होगा और निगेटिविटी दूर होगी। नरसिंह जयंती के दिन भगवान नरसिंह की पूजा करते समय पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन जरूरतमंद लोगों की मदद अवश्य करनी चाहिए. यदि संभव हो तो अपनी क्षमता के अनुसार अन्न व धन का भी दान करें। नरसिंह जयंती के दिन मन को नकारात्मक विचारों से दूर रखें और क्रोध से बचें। इस दिन शांत मन के साथ धैर्य बनाकर रखें। इससे न केवल मानसिक शांति मिलेगी, बल्कि घर व जीवन में भी सुख-समृद्धि आएगी।</div><div><br></div><h2>नरसिंह जयंती के दिन इन मंत्रों का करें जाप&nbsp;</h2><div>ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्।।</div><div>ॐ नृम नरसिंहाय शत्रुबल विदीर्नाय नमः। ॐ नृम मलोल नरसिंहाय पूरय-पूरय</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 10:13:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-narsingh-jayanti-fast-grants-victory-over-enemies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Narsimha Jayanti 2026: भक्त प्रह्लाद के लिए Lord Vishnu ने लिया था यह अवतार, जानें पूजा विधि और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-took-this-incarnation-for-devotee-prahlad-know-method-of-worship-and-importance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतु्र्दशी तिथि को नृसिंह जयंती मनाई जाती है। यह दिन जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु के उग्र एवं रक्षक स्वरूप भगवान नृसिंह को समर्पित है। इस बार आज यानी की 29 अप्रैल 2026 को नृसिंह जयंती मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन भगवान नृसिंह की पूजा-अर्चना करने से जातक को भय से मुक्ति, नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। वहीं जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का आगमन होता है। तो आइए जानते हैं नृसिंह जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>द्रिक पंचांग के मुताबिक वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 29 अप्रैल 2026 की शाम 07:51 मिनट से शुरू होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 30 अप्रैल 2026 की रात 09:12 मिनट पर होगी। वहीं उदयातिथि के मुताबिक 30 अप्रैल 2026 को नरसिंह जयंती मनाई जाएगी। वहीं इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 30 अप्रैल की शाम 04:17 मिनट से लेकर शाम 06:56 मिनट तक रहेगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर पूजाघर को साफ करें और गंगाजल का छिड़काव करें। फिर एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान नृसिंह की प्रतिमा को स्थापित करें। पूजा की शुरूआत संकल्प लेकर करें। फिर भगवान के सामने घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। अब भगवान नृसिंह को अक्षत, फूल, चंदन और तुलसी आदि अर्पित करें। इसके बाद 'ऊँ नमो भगवते नारसिंहाय' मंत्र का जाप करें।</div><div><br></div><div>भगवान नृसिंह को मिठाई, फल या प्रसाद का भोग लगाएं और नृसिंह स्तोत्र या कथा का पाठ करें। पूजा के बाद आरती करें और सभी लोगों को प्रसाद वितरित करें। वहीं पूजा के अंत में हुई भूलचूक के लिए क्षमायचना करें और पूरा दिन श्रद्धा और संयम के साथ व्रत करें। फिर शाम को पूजा के बाद व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><p>&nbsp;</p><h2>भोग अर्पण करते समय का मंत्र</h2><div>नैवेद्यं शर्करां चापि भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्।</div><div>ददामि ते रमाकांत सर्वपापक्षयं कुरु।।</div><div><br></div><h2>नृसिंह बीज मंत्र</h2><div>ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।</div><div>नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्॥</div><div><br></div><h2>नृसिंह गायत्री मंत्र</h2><div>ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे, वज्रनखाय धीमहि।</div><div>तन्नो नृसिंहः प्रचोदयात्।</div><div><br></div><h2>नृसिंह कवच मंत्र</h2><div>नारायणानन्त हरे नृसिंह प्रह्लादबाधा हरेः कृपालु:</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 09:26:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-took-this-incarnation-for-devotee-prahlad-know-method-of-worship-and-importance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mohini Ekadashi 2026: मोहिनी एकादशी व्रत से मिलता है सांसारिक मोहमाया से छुटकारा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-mohini-ekadashi-fast-grants-liberation-from-worldly-attachments-and-illusions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज मोहिनी एकादशी व्रत है, मोहिनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा होती है।&nbsp; इस दिन श्री हरि की पूजा करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है तो आइए हम आपको मोहिनी एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें मोहिनी एकादशी के बारे में&nbsp;&nbsp;</h2><div>हिन्दू धर्म में मोहिनी एकादशी का दिन सबसे खास होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है। साथ ही कई सारी महिलाएं विधिवत तरीके से व्रत भी रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत से आपका स्वभाव शांत हो जाता है और सांसारिक मोहमाया से छुटकारा मिलता है।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/powerful-recitation-of-vishnu-chalisa-bring-success-every-problem-of-life-solved" target="_blank">Vishnu Chalisa Path: Vishnu Chalisa का Powerful पाठ देगा Success, Life की हर Problem होगी दूर</a></h3><div>वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की यह एकादशी भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से जुड़ी है, जो समुद्र मंथन की पौराणिक कथा का अहम हिस्सा है। पंडितों के अनुसार इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर पापों का नाश होता है और जीवन की परेशानियां दूर होती हैं। साथ ही आर्थिक तंगी, कर्ज और धन से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलने की संभावना बढ़ती है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति की किस्मत बदलती है और सुख-समृद्धि आती है।</div><div><br></div><h2>मोहिनी एकादशी व्रत का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 26 फरवरी को शाम 6 बजकर 6 मिनट पर होगा। एकादशी तिथि का समापन 27 मार्च को शाम 6 बजकर 15 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार, मोहिनी एकादशी का व्रत 27 अप्रैल 2026 को रखा जाएगा। मोहिनी एकादशी की पूजा के लिए&nbsp; ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 43 मिनट से सुबह 5 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। वहीं अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से दोपहर 1 बजकर 2 मिनट तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>मोहिनी एकादशी व्रत के पारण का समय</h2><div>मोहिनी एकादशी का पारण दूसरे दिन 28 अप्रैल 2026 को किया जाएगा। एकादशी पारण के लिए शुभ समय सुबह 6 बजकर 12 मिनट से सुबह 8 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय शाम 6 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। आपको बता दें कि एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि के अंदर करना जरूरी होता है।</div><div><br></div><h2>जानें मोहिनी एकादशी व्रत के महत्व के बारे में&nbsp;</h2><div>मोहिनी एकादशी हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और फलदायी मानी जाती है। यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आती है और भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से जुड़ी है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मन शुद्ध होता है और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। मोहिनी एकादशी के दिन विष्णु जी के साथ ही माता लक्ष्मी की भी उपासना जरूर करें। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती है। वहीं मोहिनी एकादशी के दिन व्रत रखने से व्यक्ति को समस्त मोह बंधनों से मुक्ति मिलती है और वह जीवन में एक के बाद एक तरक्की करता चला जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>मोहिनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी रोचक&nbsp;</h2><div>पौराणिक कथा के अनुसार, भद्रावती नगर में धनपाल नाम का एक धर्मात्मा वैश्य रहता था. उसका सबसे छोटा बेटा धृष्टबुद्धि अत्यंत दुराचारी और बुरे कर्मों में लिप्त था, जिस कारण उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया। भटकते हुए वह कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम पहुंचा और अपने पापों के प्रायश्चित का मार्ग पूछा। ऋषि ने उसे वैशाख शुक्ल पक्ष की 'मोहिनी एकादशी' का व्रत करने की सलाह दी। धृष्टबुद्धि ने पूर्ण निष्ठा से यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और अंततः उसे विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। इसी दिन भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के दौरान असुरों से अमृत बचाने के लिए मोहिनी रूप धारण किया था, इसलिए भी इसका विशेष महत्व है।</div><div><br></div><h2>मोहिनी एकादशी व्रत में तुलसी मंजरी से करें ये उपाय, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार मोहिनी एकादशी की सुबह स्नान के बाद तुलसी की सूखी मंजरी लें। इसे लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी या धन रखने की जगह पर रखें। ऐसा करते समय माता लक्ष्मी का ध्यान करें इससे रुका हुआ धन वापस लाने और आर्थिक स्थिरता बढ़ाने में सहायक होता है।</div><div><br></div><h2>मोहिनी एकादशी पर कर्ज मुक्ति के लिए कराएं विष्णु अभिषेक</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि आप कर्ज या आर्थिक दबाव से परेशान हैं, तो शाम के समय दूध में तुलसी मंजरी डालकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें। इस उपाय से सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और आय के नए मार्ग खुलने की संभावना बनती है।</div><div><br></div><h2>घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करने के लिए करें ये उपाय</h2><div>शास्त्रों के अनुसार एक तांबे के पात्र में गंगाजल लें और उसमें तुलसी मंजरी डालें। कुछ समय बाद इस जल का पूरे घर में छिड़काव करें। इससे वातावरण शुद्ध होता है और घर में शांति व सुख-समृद्धि का संचार होता है।</div><div><br></div><h2>मोहिनी एकादशी पर इन बातों का रखें विशेष ध्यान</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए और न ही पौधे को जल चढ़ाना चाहिए। चावल और तामसिक भोजन से परहेज करें। साथ ही, झूठ बोलने, क्रोध करने और नकारात्मक विचारों से दूर रहना जरूरी है।</div><div><br></div><h2>जानें मोहिनी एकादशी का धार्मिक महत्व</h2><div>मोहिनी एकादशी का महत्व स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। शास्त्रों के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक व्रत करने से व्यक्ति को अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। जीवन के दुख और कष्ट दूर होते हैं। मन की अशुद्धियां समाप्त होती हैं। पापों से मुक्ति मिलती है। परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता यह भी है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत करने से सहस्त्र गौदान के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है।</div><div>&nbsp;</div><h2>मोहिनी एकादशी पर ऐसे करें पूजा&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसारइस दिन भगवान विष्णु की पूजा अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता के साथ करनी चाहिए। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठें। स्नान कर स्वच्छ एवं पीले या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें।</div><div>व्रत का संकल्प लें और लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु या श्रीहरि नारायण का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित करें, पंचामृत से अभिषेक करें। धूप, दीप और कपूर प्रज्वलित करें और भगवान को तुलसी दल अवश्य अर्पित करें। पीले पुष्प, फल और मिठाई का भोग लगाएं और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और अंत में आरती करें और प्रसाद वितरित करें। पूजा के पश्चात भगवान को प्रणाम करें और परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण हेतु प्रार्थना करें।</div><div>&nbsp;</div><h2>मोहिनी एकादशी पर दान का है खास महत्व</h2><div>सनातन धर्म में दान को धर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। विशेष रूप से एकादशी के दिन किया गया दान कई गुना अधिक फलदायी माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि दान से न केवल पापों का नाश होता है, बल्कि व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और दिव्य कृपा का संचार होता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 10:12:25 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sita Navami 2026: क्यों मनाई जाती है जानकी जयंती? जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और इसका महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-is-janaki-jayanti-celebrated-learn-about-the-auspicious-puja-timings-and-its-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सीता नवमी को देवी सीता के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। विवाहित स्त्रियाँ सीता नवमी के दिन व्रत रखती हैं तथा अपने पतियों की दीर्घायु की कामना करती हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, सीता जयन्ती वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनायी जाती है। मान्यता है कि देवी सीता का जन्म मंगलवार के दिन पुष्य नक्षत्र में हुआ था। देवी सीता का विवाह भगवान राम से हुआ था, जिनका जन्म भी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था।</div><div><br></div><div>भगवान श्रीराम की पत्नी सीताजी राजा जनक की पुत्री हैं इसलिए उन्हें जानकी नाम से भी पुकारा जाता है। रामायण ग्रंथ के अनुसार सीताजी ने उच्च मर्यादित जीवन जिया और सारा जीवन अपने पति भगवान श्रीराम के प्रति समर्पित रहीं। भारतीय देवियों में भगवती श्रीसीताजी का स्थान सर्वोत्तम है। रामायण ग्रंथ के मुताबिक प्राचीन काल में मिथिलापुरी में सीरध्वज जनक नाम के प्रसिद्ध धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे शास्त्रों के ज्ञाता, परम वैराग्यवान तथा ब्रह्मज्ञानी थे। एक बार राजा जनक यज्ञ के लिए भूमि जोत रहे थे। भूमि जोतते समय हल का फाल एक घड़े से टकरा गया। राजा ने वह घड़ा बाहर निकलवाया। उससे राजा को अत्यन्त ही रूपवती कन्या की प्राप्ति हुई। राजा ने उस कन्या को भगवान का दिया हुआ प्रसाद माना और उसे पुत्री के रूप में बड़े लाड़ प्यार से पाला। उस कन्या का नाम सीता रखा गया। जनक की पुत्री होने के कारण वह जानकी भी कहलाने लगीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/sita-navami-symbolizes-sacrifice-feminine-power-devotion-and-unwavering-virtue" target="_blank">Sita Navami 2026: सीता नवमी त्योहार त्याग, स्त्री शक्ति, समर्पण एवं अटूट मर्यादा का है प्रतीक</a></h3><div>धीरे धीरे जानकीजी विवाह योग्य हो गयीं। महाराज जनक ने धनुष यज्ञ के माध्यम से उनके स्वयंवर का आयोजन किया। निमंत्रण पाकर देश विदेश के राजा मिथिला में आये। महर्षि विश्वामित्र भी श्रीराम और लक्ष्मण के साथ यज्ञोत्सव देखने के लिए मिथिला में पधारे। राजा जनक को जब उनके आने का समाचार मिला तब वे श्रेष्ठ पुरुषों और ब्राह्मणों को लेकर उसने मिलने के लिए गये। श्रीराम की मनोहारिणी मूर्ति देखकर राजा विशेष रूप से विदेह हो गये। विश्वामित्र जी ने श्रीराम के शौर्य की प्रशंसा करते हुए महाराज जनक से अयोध्या के दशरथनंदन के रूप में उनका परिचय कराया। परिचय पाकर महाराजा जनक को विशेष प्रसन्नता हुई।</div><div><br></div><div>पुष्पवाटिका में श्रीराम−सीता का प्रथम परिचय हुआ। दोनों चिरप्रेमी एक दूसरे की मनोहर मूर्ति को अपने हृदय में रखकर वापस लौटे। सीताजी का स्वयंवर आरंभ हुआ। देश विदेश के राजा, ऋषि मुनि, नगरवासी सभी अपने अपने नियत स्थान पर आसीन हुए। श्रीराम और लक्ष्मण भी विश्वामित्र जी के साथ एक ऊंचे आसन पर विराजमान हुए। भाटों ने महाराज जनक के प्रण की घोषणा की। शिवजी के कठोर धनुष ने वहां उपस्थित सभी राजाओं के दर्प को चूर चूर कर दिया। अंत में श्रीरामजी विश्वामित्र की आज्ञा से धनुष के समीप गये। उन्होंने मन ही मन गुरु को प्रणाम करके बड़े ही आराम से धनुष को उठा लिया। एक बिजली सी कौंधी और धनुष दो टुकड़े होकर पृथ्वी पर आ गया। प्रसन्नता के आवेग और सखियों के मंगल गान के साथ सीताजी ने श्रीराम के गले में जयमाला डाली। महाराज दशरथ को जनक का आमंत्रण प्राप्त हुआ। श्रीराम के साथ उनके शेष तीनों भाई भी जनकपुर में विवाहित हुए। बारात विदा हुई तथा पुत्रों और पुत्रवधुओं के साथ महाराजा दशरथ अयोध्या पहुंचे।</div><div><br></div><div>श्रीराम को राज्याभिषेक के बदले अचानक चौदह वर्ष का वनवास हुआ। सीताजी ने तत्काल अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिया। श्रीराम के द्वारा अयोध्या में रहने के आग्रह के बाद भी सीताजी ने सभी सुखों का त्याग कर दिया और वे श्रीराम के साथ वन को चली गयीं। सीताजी वन में हर समय श्रीराम को स्नेह और शक्ति प्रदान करती रहती थीं। वन में रावण के द्वारा सीता हरण करके उन्हें समुद्र के पार लंका ले जाना रामायण में नया मोड़ लाता है। रावण ने सीताजी को विवाह का प्रस्ताव दिया जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। हनुमानजी जब सीताजी को खोजते खोजते लंका पहुंचे तो वह उन्हें अशोक वाटिका में कैद मिलीं। उन्होंने सीताजी को प्रणाम कर भगवान श्रीराम का संदेश दिया। इसके बाद सीता माता की कुशलता की जानकारी उन्होंने भगवान तक पहुंचायी जिसके बाद भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई कर रावण और अन्य दुष्टों का वध किया और सीताजी को पुनः प्राप्त किया। लंका प्रवास भगवती सीता के धैर्य की पराकाष्ठा है। भगवती सीताजी के कारण ही जनकपुर वासियों को श्रीराम का दर्शन और लंकावासियों को मोक्ष प्राप्त हुआ।</div><div><br></div><div>शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 11:34:57 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sita Navami 2026: सीता नवमी त्योहार त्याग, स्त्री शक्ति, समर्पण एवं अटूट मर्यादा का है प्रतीक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sita-navami-symbolizes-sacrifice-feminine-power-devotion-and-unwavering-virtue]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज सीता नवमी है, यह दिन मां सीता के प्राकट्य दिवस का पर्व है, जिसे जानकी नवमी भी कहते हैं। यह दिन स्त्री शक्ति एवं अटूट मर्यादा का प्रतीक है। सीता का चरित्र हमें आत्मबल, कर्तव्यनिष्ठा और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है तो आइए हम आपको सीता नवमी का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें सीता नवमी के बारे में&nbsp;</h2><div>सनातन धर्म में सीता नवमी के त्योहार का विशेष महत्व माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन माता सीता का प्राकट्य हुआ था। वैष्णव संप्रदाय में आज माता सीता के निमित्त व्रत रखने की परंपरा भी है। व्रत रखकर श्री राम सहित माता सीता का पूरे विधि-विधान से पूजन किया जाता है और उनकी स्तुति की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो कोई भी व्रत करता है, उसे सोलह महा दानों और सभी तीर्थों के दर्शन का फल मिलता है। सीता नवमी को जानकी नवमी के नाम से भी जाना जाता है, हर साल यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और माता सीता की पूजा-अर्चना करते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से घर-परिवार में खुशहाली बनी रहती है, इस शुभ दिन पर कुछ विशेष चीजें घर लाई जाएं, तो न केवल नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, बल्कि माता लक्ष्मी की कृपा भी घर पर बनी रहती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/powerful-recitation-of-vishnu-chalisa-bring-success-every-problem-of-life-solved" target="_blank">Vishnu Chalisa Path: Vishnu Chalisa का Powerful पाठ देगा Success, Life की हर Problem होगी दूर</a></h3><h2>जानें सीता नवमी 2026 शुभ मुहूर्त</h2><div>हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन सीता नवमी मनाई जाती है और इस बार ये त्योहार 25 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन माता जानकी की पूजा का मुहूर्त सुबह 11:20 से दोपहर 01:55 बजे तक रहेगा।&nbsp; 25 अप्रैल, शनिवार को सीता नवमी पूजन का सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 01 मिनिट से दोपहर 01 बजकर 38 मिनिट तक रहेगा। यानी भक्तों को पूजा के लिए पूरे 02 घण्टे 37 मिनट का समय मिलेगा। मुहूर्त से पहले पूजा की पूर तैयारी कर लें।</div><div><br></div><h2>सीता नवमी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व&nbsp;</h2><div>माता सीता को आदर्श स्त्री और नारी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन धैर्य, समर्पण, सत्य और धर्म के पालन का संदेश देता है। मान्यतानुसार जिस दिन सीता माता प्रकट हुई, उसे जानकी जयंती या सीता नवमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग विशेष पूजा-अर्चना, हवन, कथा वाचन और भजन-कीर्तन का आयोजन करते हैं। यह दिन नारी शक्ति, मर्यादा और धार्मिक आस्था का प्रतीक भी है। माता सीता को धैर्य, शांति और धर्म की प्रतीक माना जाता है, और उनके जीवन से हम सभी को सत्संग, त्याग और भक्ति की प्रेरणा मिलती है।</div><div><br></div><h2>सीता नवमी पर इन मंत्रों का करें जाप, होगा लाभ&nbsp;&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार सीता नवमी के दिन माता सीता और श्री राम के इस मंत्र का 11 बार जप अवश्य करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है-</div><div>1. श्री सीतायै नमः।</div><div>2. श्री रामाय नमः।</div><div><br></div><div>इस मंत्र का जप करके माता सीता और श्री राम, दोनों को पुष्पांजलि चढ़ाकर उनका आशीर्वाद लें। इससे आपके सारे मनोरथ सिद्ध होंगे।</div><div><br></div><h2>इसलिए मनाई जाती है सीता नवमी&nbsp;</h2><div>सीता जी को जानकी भी कहा जाता है, क्योंकि उनका जन्म जनकपुरी (जनक राजा के राज्य) में हुआ था। उन्हें धरती से उत्पन्न देवी माना जाता है। जानकी जयंती का पर्व न केवल माता सीता के जन्मदिन के रूप में, बल्कि स्त्री सम्मान और धार्मिक आदर्शों के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है।</div><div><br></div><h2>मर्यादा और चरित्र की अटूट शक्ति हैं मां सीता&nbsp;</h2><div>देवी सीता को मर्यादा और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। लंका में रावण की कैद में रहने के दौरान भी उन्होंने अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को कभी आंच नहीं आने दी। उनका चरित्र यह सिखाता है कि असली शक्ति बाहरी शस्त्रों में नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और इरादों की मजबूती में होती है। सीता नवमी का यह दिन हमें अपने भीतर के आत्मसम्मान को जगाने और मर्यादा की सीमाओं का सम्मान करने की प्रेरणा देता है। समाज में रहकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना और किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से समझौता न करना ही मां सीता की सच्ची सेवा है। उनके जीवन का हर अध्याय हमें यह अहसास कराता है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी हारता नहीं है, बल्कि वह सब के लिए प्रेरणा बन जाता है।</div><div><br></div><h2>सीता नवमी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>कथा यह है कि मां लक्ष्मी जी का अवतार सीता माता अपने पिछले जन्म में मुनि कुषध्वजा की बहुत ही सुंदर पुत्री वेदावती थी। वे भगवान विष्णु की भक्त थी वे हर समय केवल उनकी पूजा में ही लीन रहती थी, उनका प्रण था कि वे भगवान विष्णु के अतिरिक्त किसी और से विवाह नही करेंगी। उनके पिता एक ऋषि थे, वे अपनी बेटी के इस प्रण को अच्छी तरह से जानते थे, उन्होनें कभी अपनी पुत्री को अपना मन बदलने के लिए विवष नही किया। पुत्री की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होनें पुत्री के लिए आए अनेकों षक्तिषाली राजाओं और देवताओं के रिष्तों को मना कर दिया। मना किए गए रिष्तों में से एक रिष्ता दैत्यों के षक्तिषाली राजा षंभु का भी था। रिष्ते के लिए न मिलने पर दानव षंभु ने इसे अपना अपमान समझा और अपने अपमान का बदला लेने के उद्देष्य से मौका देखकर वेदावती के माता पिता का वध कर दिया।</div><div>&nbsp;</div><div>अपने माता पिता की मृत्यु के बाद वेदावती संसार में बिलकुल अकेली और अनाथ हो गई वे अपने पिता के आश्रम में ही रहने लगी और सारा समय भगवान विष्णु का ध्यान करने लगी। वेदावती बहुत ही खुबसूरत थी और उनकी तपस्या ने उन्हें पहले से भी अधिक सुंदर बना दिया था। एक बार लंका के राजा रावण ने उसे जंगल में भगवान विष्णु के लिए तपस्या करते हुए देखा वो वेदावती की सुंदरता पर मोहित हो गया उसने वेदावती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा परन्तु उसे भी न में ही जवाब मिला। न में जवाब मिलने पर रावण ने वेदावती की तपस्या भंग कर दी और उनके बालों को पकड़़कर उन्हें घसीटने लगा। ंरावण के इस कुकृत्य से क्रोधित वेदावती ने अपने बाल काट दिए और कहा कि वो वहीं उसकी आखों के सामने ही अग्नि में कूदकर अपने प्राणों का त्याग करेगीं। अग्नि में प्रवेष करते समय वेदावती ने कहा कि रावण ने इस जंगल में उन्हें अपमानित किया है वो दोबारा से जन्म लेकर उसके विनाष का कारण बनेगीं। वो वेदावती ही थीं जो सीता के रुप में जन्मीं और राम जी के माध्यम से रावण के विनाष का कारण बनी। जब वेदावती का जन्म सीता जी के रुप में हुआ तो वे मिथिला नरेष राजा जनक को उनकें खेतों में जुताई करते समय भूमि पर लेटी हुई मिली। उनकी दैविक सुंदरता से प्रभावित होकर राजा जनक ने उन्हें अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। देवी सीता को जानकी, वैदही, मैथली तथा और अन्य नामों से भी जाना जाता है। वे राजा जनक को भूमि पर पड़ी हुई मिली थी इसलिए उन्हें भूदेवी की संतान भी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>अशोक वाटिका और अटूट मर्यादा का प्रतीक</h2><div>रावण की अशोक वाटिका में बंदी होने के बाद भी मां सीता के मन में जरा भी डर नहीं था। जब रावण अपने वैभव का प्रदर्शन कर उन्हें डराने का प्रयास करता, तब वह कभी उसकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखती थीं। उन्होंने अपने और रावण के बीच केवल एक ‘तिनके’ यानी घास के छोटे से टुकड़े को ओट की तरह रखा था। यह मामूली सा तिनका असल में उनकी अटूट मर्यादा और चारित्रिक बल का सबसे बड़ा प्रतीक था। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब इंसान अपने धर्म और सच्चाई पर अडिग रहता है, तो दुनिया की कोई भी बड़ी ताकत उसे विचलित नहीं कर सकती। मां सीता की यह दृढ़ता आज भी हमें अपने मूल्यों पर टिके रहने की प्रेरणा देती है।</div><div><br></div><h2>सीता नवमी पर ऐसे करें पूजा, होंगे लाभान्वित&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धालु माता सीता की मूर्ति या चित्र की तथा राम-सीता की पूजा करते हैं। व्रत, कथा पाठ और हवन का आयोजन भी किया जाता है। कई जगहों पर रामायण का पाठ और भजन कीर्तन होते हैं। पंडितों&nbsp; शनिवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और इसके बाद व्रत-पूजा का संकल्प लें। शुभ मुहूर्त से पहले पूजा की पूर तैयारी कर लें। शुभ मुहूर्त शुरू होने पर भगवान श्रीराम के साथ देवी सीता का चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें। सबसे पहले चित्र पर कुमकुम से तिलक लगाएं। चित्र पर फूलों की माला पहनाएं और शुद्ध घी का दीपक लगाएं। अबीर, गुलाल, चावल, फूल, रोली, फल आदि चीजें भगवान को एक-एक करके चढ़ाएं। भगवान श्रीराम को सफेद और देवी सीता को लाल वस्त्र अर्पित करें। बिंदी, काजल, चूड़ी, मेहंदी आदि चीजें भी देवी सीता को अर्पित करें। पूजा के बाद फल व अन्य चीजों का भोग भगवान को लगाएं और आरती करें। संभव हो तो कुछ देर देवी सीता के मंत्रों का जाप भी करें। सीता नवमी पर इस तरह पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। इस दिन गरीबों को दान देने का भी विशेष महत्व है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 11:14:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sita-navami-symbolizes-sacrifice-feminine-power-devotion-and-unwavering-virtue</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Sita Navami 2026: घर पर कैसे करें मां सीता की पूजा? जानें Step-by-Step Puja Vidhi और शुभ मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/how-to-worship-goddess-sita-at-home-learn-step-by-step-puja-method-and-auspicious-time]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल वैशाख माह की नवमी तिथि को सीता नवमी का पर्व मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 25 अप्रैल 2026 को सीता नवमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व आस्था और श्रद्धा का विशेष प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन मां सीता प्राकट्य हुआ था। इस दिन व्रत किया जाता है और श्रीराम व मां सीता की विधिविधान से पूजा की जाती है। विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन की खुशहाली के लिए व्रत और पूजा करती हैं। तो आइए जानते हैं सीता नवमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की शुरुआत 24 अप्रैल 2026 की शाम 07:21 मिनट से होगी। वहीं इस तिथि की समाप्त आज यानी की 25 अप्रैल 2026 की शाम 06:27 मिनट पर होगी। मान्यता के मुताबिक मां सीता का जन्म दोपहर के समय हुआ था। इस वजह से सीता नवमी 25 अप्रैल 2026 को मनाया जा रहा है। वहीं आज पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:01 मिनट से दोपहर 01:38 मिनट तक रहेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-ganges-holds-special-significance-on-ganga-saptami" target="_blank">Ganga Saptami 2026: गंगा सप्तमी पर गंगा स्नान का है विशेष महत्व</a></h3><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर पूरे श्रद्धाभाव से पूजा का संकल्प लें। पूजा के लिए साफ चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। इस चौकी पर श्रीराम और मां सीता की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर कलश स्थापना करें और इसमें सिंदूर और अक्षत आदि डालकर विधिपूर्वक पूजा करें।</div><div><br></div><div>अब मां सीता की पूजा करें, मां सीता को चावल, पुष्प, सिंदूर, माला, वस्त्र और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें और भोग लगाएं। फिर श्रीराम की पूजा करें और उनको फूल, चंदन, अक्षत, माला और प्रसाद आदि अर्पित करें। पूजा के समय घी का दीपक जलाएं और धूप अर्पित करें। जिससे वातावरण सकारात्मक और पवित्र बना रहे।</div><div><br></div><div>इसके बाद सीता चालीसा, मंत्रों और व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। इससे व्यक्ति को पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। वहीं पूजा के अंत में भगवान श्रीराम और मां सीता की आरती करें। वहीं पूजा के अंत में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और व्रत का समापन करें।</div><div><br></div><h2>आरती&nbsp;</h2><div>आरती श्री जनक दुलारी की ।</div><div>सीता जी रघुवर प्यारी की ॥</div><div><br></div><div>जगत जननी जग की विस्तारिणी,</div><div>नित्य सत्य साकेत विहारिणी,</div><div>परम दयामयी दिनोधारिणी,</div><div>सीता मैया भक्तन हितकारी की ॥</div><div><br></div><div>आरती श्री जनक दुलारी की ।</div><div>सीता जी रघुवर प्यारी की ॥</div><div><br></div><div>सती श्रोमणि पति हित कारिणी,</div><div>पति सेवा वित्त वन वन चारिणी,</div><div>पति हित पति वियोग स्वीकारिणी,</div><div>त्याग धर्म मूर्ति धरी की ॥</div><div><br></div><div>आरती श्री जनक दुलारी की ।</div><div>सीता जी रघुवर प्यारी की ॥</div><div><br></div><div>विमल कीर्ति सब लोकन छाई,</div><div>नाम लेत पवन मति आई,</div><div>सुमीरात काटत कष्ट दुख दाई,</div><div>शरणागत जन भय हरी की ॥</div><div><br></div><div>आरती श्री जनक दुलारी की ।</div><div>सीता जी रघुवर प्यारी की ॥</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 10:19:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/how-to-worship-goddess-sita-at-home-learn-step-by-step-puja-method-and-auspicious-time</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ganga Saptami 2026: गंगा सप्तमी पर गंगा स्नान का है विशेष महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-ganges-holds-special-significance-on-ganga-saptami]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज गंगा सप्तमी है, हिन्दू धर्म में गंगा सप्तमी बहुत पवित्र एवं खास मानी जाती है। वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है, गंगा सप्तमी को गंगा जयंती या गंगा पूजन के नाम से भी जाना जाता है तो आइए हम आपको गंगा सप्तमी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें गंगा सप्तमी के बारे में&nbsp;</h2><div>सनातन धर्म में वैशाख माह का खास महत्व है। गंगा सप्तमी का त्यौहार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन मनाया जाता है. विशेष रूप से गंगा सप्तमी का पर्व उत्तर भारत में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को जानहु ऋषि के कान में प्रवाहित होने की वजह से इसे जानहु सप्तमी भी कहा जाता है। मां गंगा जानहु ऋषि की पुत्री थी इसलिए इन्हें जान्हवी भी कहते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ही मां गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में समाई थीं। इसलिए इस दिन को गंगा जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। गंगा और शिव का संबंध अटूट है, इसीलिए गंगा सप्तमी पर शिवलिंग का विशेष अभिषेक करने से साधक को न केवल शिव जी की, बल्कि मां गंगा की भी कृपा मिलती है। इस दिन पूजा के दौरान गंगा चालीसा का पाठ जरूर करें। इस बार 23 अप्रैल को गंगा सप्तमी मनाई जाएगी।</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, देवी गंगा पहली बार गंगा दशहरा के दिन धरती पर उतरी थीं, लेकिन ऋषि जह्नु ने सारा गंगा जल पी लिया। तब सभी देवताओं और भागीरथ ने ऋषि जह्नु से गंगा को छोड़ने का अनुरोध किया। इसके बाद गंगा सप्तमी के दिन देवी गंगा फिर से धरती पर आईं और इसीलिए इस दिन को जह्नु सप्तमी भी कहा जाता है।</div><div><br></div><div>पुराणों में गंगा सप्तमी से जुड़ी एक अन्य कथा भी प्रचलित है, इस कथा के अनुसार एक बार, कोसल के राजा भागीरथ परेशान थे क्योंकि उनके पूर्वज बुरे कर्मों के पापों से पीड़ित थे। भागीरथ चाहते थे कि वे इससे मुक्त हों, इसलिए उन्होंने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और भगवान ब्रह्मा ने उन्हें आश्वासन दिया कि गंगा पृथ्वी पर आएंगी, उनके पूर्वजों की आत्मा को शुद्ध करेंगी। लेकिन वह जानते थे कि देवी गंगा का प्रवाह सब कुछ नष्ट कर सकता है, तब ब्रह्मा जी ने भागीरथ को भगवान शिव की पूजा करने के लिए कहा क्योंकि वे ही गंगा के प्रवाह को नियंत्रित कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया। इस शुभ दिन देवी गंगा पृथ्वी पर उतरीं, इसलिए गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी पर शिवलिंग पर जरूर चढ़ाएं ये चीजें, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन चांदी या तांबे के लोटे में गंगाजल भरकर शिवलिंग पर अर्पित करें। ऐसा करने से साधक को मोक्ष और मानसिक शांति मिलती है। शिवलिंग पर गंगाजल में थोड़े काले तिल मिलाकर चढ़ाने से पितृ दोष शांत होता है और पुराने रोगों से मुक्ति मिलती है। इस दिन शिवलिंग पर 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते हुए तीन दल वाला चिकना बिल्व पत्र चढ़ाएं। इससे कार्यक्षेत्र में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। महादेव को शमी बहुत प्रिय है। ऐसे में गंगा सप्तमी पर शमी चढ़ाने से शनि दोष के बुरे प्रभाव कम होते हैं। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर सफेद चंदन का लेप लगाएं। इससे आर्थिक तंगी दूर होती है और घर में समृद्धि आती है।</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी पर ऐसे करें पूजा&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार गंगा सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करें। अगर गंगा स्नान न हो पाएं तो घर में नहाने के पानी में गंगाजल में मिलाकर स्नान करें। इसके बाद मां गंगा की तस्वीर पर या गंगा नदी में फूल, सिंदूर, अक्षत, गुलाल,लाल फूल, लाल चंदन अर्पित कर दें। इसके बाद घी का दीपक जलाकर आरती करें और जीवन में सुख और शांति के लिए मां गंगा से प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगा सप्तमी के दिन गंगा स्नान करने से इंसान को सभी पापों से मटकी मुक्ति हैं। पापों से मुक्ति मिलने के साथ रोगों से छुटकारा मिलता है और दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। सुबह स्नानादि के बाद साफ वस्त्र धारण करें। मंदिर या घर के शिवलिंग के सामने उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सबसे पहले जल से, फिर पंचामृत से और अंत में शुद्ध गंगाजल की धार बनाते हुए महादेव का अभिषेक करें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/maa-ganga-came-to-earth-on-this-day-know-auspicious-time-for-holy-dip-and-pitru-shanti" target="_blank">Ganga Saptami 2026: इस दिन धरती पर आईं थीं मां गंगा, जानें Holy Dip और पितृ शांति का मुहूर्त</a></h3><h2>गंगा सप्तमी पर इन मंत्रों का करें जाप&nbsp;</h2><div>-&nbsp; ॐ नमः शिवाय॥</div><div>- गंगाधरय नमः तुभ्यं, संस्थितोऽसि जटाधरे। अर्घ्यं गृहाण देवेश, गंगापुत्र नमोऽस्तु ते॥</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी पर दान का है खास महत्व</h2><div>पंडितों के अनुसार गंगा सप्तमी पर पूजा के बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को जल, सत्तू और फल का दान करें। ऐसा करने से पूजा का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। साथ ही शिव कृपा हमेशा के लिए प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा सप्तमी के दिन गंगा चालीसा का पाठ करने से जातक के जाने-अनजाने में हुए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही मां गंगा प्रसन्न होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। आइए पढ़ते हैं गंगा चालीसा।</div><div><br></div><h2>जानें गंगा दशहरा का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>हिन्दू पंचांग के अनुसार गंगा सप्तमी तिथि का आरंभ 22 अप्रैल को रात में 10 बजकर 50 मिनट पर होगा और 23 अप्रैल को रात में 8 बजकर 50 मिनट पर तिथि समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, सपत्मी तिथि 23 अप्रैल को रहने के कारण इसी दिन गंगा सपत्मी का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन कई लोग व्रत और पूजा भी करते हैं।</div><div><br></div><h2>जानें गंगा सप्तमी का महत्व के बारे में&nbsp;</h2><div>पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। लेकिन, मां गंगा का वेग इतना तेज था कि अगर वह सीधे पृथ्वी पर आती तो काफी परेशानी हो सकती थी। तब मां गंगा के वेग को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में समाहित कर लिया था। मान्यता है कि गंगा सप्तमी के दिन गंगा में स्नान करने से अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही पितरों की शांति और तर्पण के लिए भी यह दिन अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी के दिन ये करें, होंगे लाभान्वित&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन सुबह जल्दी उठे इसके बाद गंगा में स्नान करें। अगर गंगा में स्नान नहीं कर पा रहें हैं तो घर में ही पानी में थोड़ी गंगाजल मिलाकर आप स्नान कर सकते हैं। इसके बाद एक तांबे के लौचे में पानी लें और उसमें थोड़ा गंगा जल मिलाकर अर्घ्य दें। इसके बाद मंदिर में बैठकर मां गंगा के मंत्र ओम नमो गंगायै विश्वरुपिणी नारायणी नमो नम:का जप करें। इसके अलावा इस दिन जरुरतमंद लोगों को मौसमी फल या बाकी चीजों का दान जरुर करें। इस दिन दान करने से दोगुना फल प्राप्त होता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 10:21:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-ganges-holds-special-significance-on-ganga-saptami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ganga Saptami 2026: सिर्फ कुछ घंटे का Auspicious मुहूर्त, जानें स्नान-पूजन का Perfect Time और विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/auspicious-time-of-just-few-hours-know-perfect-time-and-method-of-bathing-and-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में गंगा सप्तमी पर्व का विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन धरती पर मां गंगा प्रकट हुई थीं। इस बार 23 अप्रैल 2026 को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस तिथि पर गंगा की पूजा-अर्चना करने और स्नान आदि करने से जातक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। वहीं पितरों को शांति मिलती है और जीवन में सुख-शांति आती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको गंगा सप्तमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक वैखाश माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि की शुरूआत 22 अप्रैल की रात 10:48 मिनट पर शुरू हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 23 अप्रैल की रात 08:00 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं उदयातिथि के हिसाब से 23 अप्रैल 2026 को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जा रहा है।</div><div><br></div><div>आज गंगा सप्तमी का शुभ मुहूर्त सुबह 04:20 मिनट से लेकर सुबह 05:04 मिनट तक रहेगा। इस दौरान गंगा में स्नान करना शुभ होता है। वहीं अगर आप गंगा स्नान के लिए नहीं जा सकते हैं। तो आप घर पर नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। इससे मां गंगा की कृपा प्राप्त होगी। वहीं गंगा पूजन का शुभ मुहू्र्त सुबह 11:01 मिनट से लेकर दोपहर 01:38 मिनट तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर तांबे के लोटे में जल लेकर इसमें गंगाजल मिलाएं और सूर्यदेव को अर्घ्य दें। अब मंदिर में बैठकर मन ही मन मां गंगा का ध्यान करें। वहीं 'ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिणी नारायणी नमो नम:' मंत्र का 108 बार जाप करें। वहीं इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान जरूर दें।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 09:40:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/auspicious-time-of-just-few-hours-know-perfect-time-and-method-of-bathing-and-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Akshaya Tritiya 2026: Akshaya Tritiya पर Gold खरीदने का महामुहूर्त, जानें मां लक्ष्मी की Puja का Best Time]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/great-time-to-buy-gold-on-akshaya-tritiya-know-best-time-to-worship-goddess-lakshmi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धार्मिक दृष्टि से आज यानी की 19 अप्रैल 2026 का दिन बेहद खास है। आज यानी की 19 अप्रैल 2026 को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जा रहा है। इस तिथि पर किया गया कोई भी शुभ कार्य दान, पूजा या व्रत आदि कभी व्यर्थ नहीं जाता है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यानी इसका फल अक्षय यानी की अनंत काल तक मिलता रहता है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 19 अप्रैल की सुबह 10:49 मिनट से हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 20 अप्रैल 2026 की सुबह 07:27 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया मनाई जा रही है।</div><div><br></div><h2>शुभ ऊर्जा का प्रभाव</h2><div>बता दें कि 19 अप्रैल का दिन धार्मिक दृष्टि से इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन उस तिथि का प्रवेश हो रहा है, जिसको सनातन धर्म में सबसे शुभ दिनों में गिना जाता है। आज के दिन सोना खरीदना शुभ माना जाता है। वहीं अक्षय तृतीया पर दान-पुण्य करने का भी विशेष महत्व होता है। क्षय तृतीया से जुड़ी तिथि के प्रवेश के साथ ही शुभ ऊर्जा का प्रभाव बढ़ता है। यह दिन संकल्प, आध्यात्मिक तैयारी और सकारात्मक शुरूआत के लिए उत्तम माना जाता है।</div><div><br></div><h2>धार्मिक महत्व</h2><div>हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया का पर्व पवित्र और शुभ माना जाता है। 'अक्षय' शब्द का अर्थ है, 'जो कभी समाप्त न हो।' इस दिन किए गए दान-पुण्य, जप, तप, पूजा और शुभ कार्यों का फल जीवनभर बढ़ता रहता है और वह कभी नष्ट नहीं होता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 10:20:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/great-time-to-buy-gold-on-akshaya-tritiya-know-best-time-to-worship-goddess-lakshmi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Parshuram Jayanti 2026: 19 अप्रैल को परशुराम जयंती, जानें Puja का शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/parshuram-jayanti-on-april-19-know-auspicious-time-and-complete-puja-method]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। लेकिन भगवान परशुराम का जन्म संध्या काल यानी की प्रदोष काल में हुआ था। परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। इस बार आज यानी की 19 अप्रैल को परशुराम जयंती मनाई जा रही है। भगवान परशुराम ने अधर्म और बुराई को खत्म करने के लिए धरती पर जन्म लिया था। उन्होंने अत्याचारी और अधर्मी राजाओं का नाश किया था और पृथ्वी पर फिर से सत्य और धर्म का मार्ग स्थापित किया था।</div><div><br></div><h2><span style="font-size: 1rem;">तिथि और मुहूर्त</span></h2><div><span style="font-size: 1rem;">हिंदू पंचांग के मुताबिक वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को परशुराम जयंती मनाई जाती है। इस बार यह पर्व 19 अप्रैल 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन जो भी जातक व्रत करता है और पूजा-पाठ करते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह दिन भगवान परशुराम के दिव्य कार्यों को याद करने का होता है। इस दिन तृतीया तिथि की शुरूआत 19 अप्रैल की सुबह 10:49 मिनट से हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 20 अप्रैल की सुबह 07:27 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी।</span></div><div><br></div><h2>पूजा विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। अब भगवान परशुराम की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित करें। इसके बाद भगवान परशुराम को चंदन का तिलक करें। इसके बाद पुष्प, अक्षत, धूप-दीप और तुलसी दल अर्पित करें। फिर फल या मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद परशुराम स्तुति या मंत्रों का पाठ करें और पूजा के अंत में आरती करें। वहीं इस दिन दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। वह अन्याय के नाश के लिए आए थे। मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से साहस, आत्मविश्वास और पराक्रम में वृद्धि होती है। अक्षय तृतीया पर होने की वजह से इस दिन की पूजा का फल कभी नष्ट नहीं होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 10:05:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/parshuram-jayanti-on-april-19-know-auspicious-time-and-complete-puja-method</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया पर किए गए दान का मिलता है अधिक फल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/donations-made-on-akshaya-tritiya-yield-greater-rewards]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्षय तृतीया को आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। भारतवर्ष में अक्षय तृतीया सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र, शुभ और पुण्यदायी पर्व है और इस दिन को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है तो आइए हम आपको अक्षय तृतीया का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें अक्षय तृतीया के बारे में&nbsp;</h2><div>सनातन परंपरा में अक्षय तृतीया उन पर्वों में से एक है जो जीवन-दर्शन का जीवंत संदेश देती हैं। अक्षय तृतीया को आखा तीज या अक्ती तीज के नाम से जाना जाता है। इस पर्व में अक्षय शब्द का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, अर्थात् जो सदा बना रहे, जो अनंत हो। इसलिए इस दिन किया गया जप, तप, दान, सेवा, हवन या कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल प्रदान करने वाला माना गया है। अक्षय तृतीया को हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और मंगलकारी पर्व माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन किया गया दान, जप, तप और खरीदारी कभी व्यर्थ नहीं जाती बल्कि उसका फल कई गुना बढ़कर मिलता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। इस दिन किए गए शुभ कार्यों का फल कभी समाप्त नहीं होता। यही कारण है कि इसे चिरंजीवी और सर्वसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया खासतौर पर सोना खरीदने की परंपरा इसलिए प्रचलित है क्योंकि सोना धन-समृद्धि और स्थायी संपत्ति का प्रतीक माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन खरीदा गया सोना परिवार में सुख-समृद्धि और आर्थिक मजबूती लेकर आता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-is-a-day-of-infinite-prosperity" target="_blank">Akshaya Tritiya 2026: अनंत समृद्धि का दिन है अक्षय तृतीया</a></h3><h2>अक्षय तृतीया का पौराणिक महत्व भी है खास&nbsp;</h2><div>पौराणिक कथाओं के अनुसार अक्षय तृतीया का दिन कई दिव्य घटनाओं से जुड़ा हुआ है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने परशुराम अवतार लिया था, इसलिए इसे परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। त्रेतायुग का आरंभ भी इसी तिथि से माना जाता है, जिससे इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। इस दिन चारधाम में से एक धाम श्रीबदरीनाथ के कपाट भी खुलते हैं। अक्षय शब्द का अर्थ होता है- जो कभी समाप्त न हो। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए दान, जप, तप और पुण्य कर्मों का फल कभी खत्म नहीं&nbsp; होता, बल्कि लगातार बढ़ता रहता है। इस दिन स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व होता है। खासकर जल, सत्तू, वस्त्र और अन्न का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। पितरों के लिए किए गए कर्म भी इस दिन अक्षय फल प्रदान करते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>अक्षय तृतीया पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ</h2><div>पंडितों के अनुसार अक्षय तृतीया का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन पुण्य के कार्य करें। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर समुद्र, गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि नदी में स्नान करना संभव न हो तो घर में ही स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की शांत मन से पूजा करनी चाहिए। इस दिन लक्ष्मी-नारायण की पूजा सफेद या पीले कमल अथवा गुलाब के पुष्पों से करना शुभ माना गया है। नैवेद्य में गेहूं, जौ, चने का सत्तू, मिश्री, नीम की कोपल, ककड़ी और भीगी हुई चने की दाल अर्पित की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सत्तू का सेवन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह शरीर को शीतलता प्रदान करता है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है।</div><div><br></div><h2>जानें अक्षय तृतीया का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार तृतीया तिथि 19 अप्रैल को सुबह 10:49 बजे से शुरू होकर 20 अप्रैल सुबह 07:27 बजे तक रहेगी। चूंकि 20 अप्रैल को सूर्योदय के समय तृतीया तिथि विद्यमान है, इसलिए इसी दिन व्रत, दान और पूजा करना अधिक शुभ रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजा और खरीदारी के शुभ समय का भी रखें ध्यान</h2><div>अक्षय तृतीया पर खरीददारी के लिए ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:10 से 04:54 तक एवं पूजा मुहूर्त सुबह 05:25 से 07:27 तक है। सोना खरीदने के लिए सूर्योदय से 07:27 बजे तक का समय विशेष शुभ है, हालांकि अक्षय तृतीया का पूरा दिन मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल रहेगा।</div><div>&nbsp;</div><h2>अक्षय तृतीया पर दान-पुण्य का है विशेष महत्व</h2><div>अक्षय तृतीया के दिन गंगा स्नान, जप, तप, हवन और दान का विशेष महत्व है। बिहार में सत्तू, गुड़, मिट्टी का घड़ा, पंखा और फल दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन किया गया दान जातक के संचित पापों का क्षय करता है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>अक्षय तृतीयायां दानं, पुण्यं च न क्षीयते।</b></div><div>अर्थात् अक्षय तृतीया के दिन किया गया दान और अर्जित किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। सनातन परंपरा में ऐसा माना जाता है कि इस दिन दान करने से धन का ह्रास नहीं होता बल्कि दान से धन-संपदा में वृद्धि होती है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया पर अन्न का दान का विशेष महत्व है। अन्नदानम् परं दानम् अर्थात् अन्न को धार्मिक ग्रंथों में परब्रह्म कहा गया है। अक्षय तृतीया पर किसी भूखे को भोजन कराना साक्षात नारायण की सेवा के समान है। ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होने के कारण इस दिन सत्तू, गुड़ और शीतल जल के दान का विशेष महत्व है। इस दिन जल दान का भी है खास महत्व । प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ी मानवता है। इस दिन मिट्टी के घड़े (कुंभ) में जल भरकर दान करने से पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है।</div><div>&nbsp;</div><h2>दान में अन्य सामग्रियों का भी है खास महत्व&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन निर्धनों को तन ढकने के लिए वस्त्र दान दें। ब्राह्मणों को गौदान करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इस तपती धूप में राहगीरों को जूते या चप्पल दान करना अत्यंत पुण्यकारी होता है।सअक्षय तृतीया पर दान केवल वस्तु का त्याग नहीं है, बल्कि अहंकार का विसर्जन है। यह आत्मा को निर्मल करता है और कर्मों की श्रृंखला में ऐसे बीज बोता है, जिनका फल जन्म-जन्मांतर तक अक्षय रहता है।</div><div><br></div><h2>अक्षय तृतीया का पौराणिक उद्भव भी है रोचक</h2><div>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह तिथि कालचक्र के परिवर्तन की साक्षी है। पौराणिक कथाओं और इतिहास के अनुसार इस दिन ये घटनाएं हुईं हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div><b>युगादि तिथि: </b>हिंदू समय गणना के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन ही सतयुग का समापन हुआ था और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था।</div><div>&nbsp;</div><div><b>परशुराम जयंती: </b>भगवान विष्णु के छठे अवतार, शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम का प्राकट्य इसी तिथि को हुआ था।</div><div>&nbsp;</div><div><b>गंगा अवतरण: </b>भगीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा इसी दिन स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, जिससे समस्त जीवों का उद्धार संभव हुआ।</div><div>&nbsp;</div><div><b>अक्षय पात्र की प्राप्ति:</b> महाभारत काल में पांडवों के वनवास के दौरान, सूर्यदेव ने उन्हें अक्षय पात्र प्रदान किया था, जिससे उन्हें कभी अन्न की कमी नहीं हुई।</div><div>&nbsp;</div><div><b>सुदामा और कृष्ण का मिलन:</b> द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र सुदामा की दरिद्रता का नाश इसी तिथि को किया था।</div><div>&nbsp;</div><h2>अक्षय तृतीया पर करें ये उपाय, होंगे लाभान्वित&nbsp;&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस पावन दिवस पर ये धार्मिक कार्य विशेष रूप से किए जाते हैं, इन कार्यों को करने से भक्तों को बहुत लाभ होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस दिन श्री लक्ष्मीनारायण की विधिपूर्वक पूजा करें।</div><div>धन के देवता कुबेर की पूजा करें।</div><div>गंगा या अन्य पवित्र तीर्थों में स्नान करें।</div><div>हवन एवं वेद-स्वाध्याय करें।</div><div>स्वर्ण, आभूषण या सिक्कों का क्रय करें।</div><div>विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य करें।&nbsp;</div><div>ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को दान करें।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:45:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/donations-made-on-akshaya-tritiya-yield-greater-rewards</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Parashuram Janmotsav 2026: क्यों भगवान विष्णु के Avatar ने 21 बार किया था पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-did-lord-vishnu-avatar-render-the-earth-free-of-kshatriyas-21-times]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान परशुराम का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रदोषकाल के समय हुआ था। पौरागिक ग्रंथों में बताया गया है कि पिता जमदग्नि और माता रेणुका ने तो अपने पांचवें पुत्र का नाम 'राम' ही रखा था, लेकिन तपस्या के बल पर भगवान शिव को प्रसन्न करके उनके दिव्य अस्त्र 'परशु' प्राप्त करने के कारण वे राम से परशुराम हो गए। भगवान परशुराम भगवान विष्णु के अवतार होने के साथ ही ब्राह्मण जाति के कुल गुरु भी हैं इसलिए इनकी जयंती देशभर में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भगवान परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे, पिता की आज्ञा से इन्होंने अपनी माता का सिर काट डाला था, लेकिन पुनः पिता के आशीर्वाद से इनकी माता की स्थिति यथावत हो गई। दरअसल कथाओं के अनुसार हुआ यह था कि एक बार माता रेणुका स्नान के लिए नदी किनारे गईं, संयोग से वहीं पर राजा चित्ररथ भी स्नान करने आया था, राजा चित्ररथ सुंदर और आकर्षक था। राजा को देखकर रेणुका भी आसक्त हो गईं, किंतु ऋषि जमदग्नि ने अपने योगबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया। उन्होंने आवेशित होकर अपने पांचों पुत्रों को अपनी मां का सिर काटने का आदेश दिया। किंतु परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों ने मां के स्नेह के बंधकर वध करने से इंकार कर दिया, लेकिन परशुराम ने पिता के आदेश पर अपनी मां का सिर काटकर अलग कर दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-special-this-is-the-luckiest-day-of-the-year" target="_blank">Akshaya Tritiya Special: यह है साल का सबसे Lucky Day, बिना पंचांग देखे करें विवाह और गृह प्रवेश</a></h3><div>क्रोधित ऋषि जमदग्नि ने आज्ञा का पालन न करने पर परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों को चेतनाशून्य हो जाने का शाप दे दिया, वहीं परशुराम को खुश होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ वर मांगा। जिसमें उन्होंने तीन वरदान मांगे– पहला, अपनी माता को फिर से जीवन देने और माता को मृत्यु की पूरी घटना याद न रहने का वर मांगा। दूसरा, अपने चारों चेतनाशून्य भाइयों की चेतना फिर से लौटाने का वरदान मांगा। तीसरा वरदान स्वयं के लिए मांगा जिसके अनुसार उनकी किसी भी शत्रु से या युद्ध में पराजय न हो और उनको लंबी आयु प्राप्त हो।</div><div><br></div><div>श्रीजमदग्नि जी के आश्रम में एक कामधेनु गौ थी, जिसकी अलौकिक ऐश्वर्य शक्ति को देखकर कार्तवीर्यार्जुन उसे प्राप्त करने के लिए दुराग्रह करने लगा था। अंत में उसने गौ को हासिल करने के लिए बल का प्रयोग किया और उसे माहिष्मती ले आया। किंतु जब परशुराम जी को यह बात विदित हुई तो उन्होंने कार्तवीर्यार्जुन तथा उसकी सारी सेना का विनाश कर डाला। जिस पर पिता ने परशुराम जी के इस चक्रवर्ती सम्राट के वध को ब्रह्म हत्या के समान बताते हुए उन्हें तीर्थ सेवन की आज्ञा दी। वे तीर्थ यात्रा पर चले गये, वापस आने पर माता−पिता ने उन्हें आशीर्वाद दिया।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर सहस्त्रार्जुन के वध से उसके पुत्रों के मन में प्रतिशोध की आग जल रही थी। एक दिन अवसर पाकर उन्होंने छद्म वेष में आश्रम आकर जमदग्नि का सिर काट डाला और उसे लेकर भाग निकले। जब परशुराम जी को यह समाचार ज्ञात हुआ तो वे अत्यन्त क्रोधावेश में आग बबूला हो उठे और पृथ्वी को क्षत्रिय हीन कर देने की प्रतिज्ञा कर ली तथा 21 बार घूम−घूमकर पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया। फिर पिता के सिर को धड़ से जोड़कर कुरुक्षेत्र में अन्त्येष्टि संस्कार किया। पितृगणों ने इन्हें आशीर्वाद दिया और उन्हीं की आज्ञा से इन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी प्रजापति कश्यपजी को दान में दे दी और महेन्द्राचल पर तपस्या करने चले गये।</div><div><br></div><div>सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव−धनुष भंग किये जाने पर वह महेन्द्राचल से शीघ्रतापूर्वक जनकपुर पहुंचे, किंतु इनका तेज श्रीराम में प्रविष्ट हो गया और ये अपना वैष्णव धनु उन्हें देकर पुनः तपस्या के लिए महेन्द्राचल वापस लौट गये। मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम के क्रोध का सामना गणेश जी को भी करना पड़ा था। दरअसल उन्होंने परशुराम जी को शिव दर्शन से रोक दिया था। क्रोधित परशुराम जी ने उन पर परशु से प्रहार किया तो उनका एक दांत नष्ट हो गया। इसी के बाद से गणेश जी एकदंत कहलाये।</div><div><br></div><div>भगवान परशुराम चिरजीवी हैं। ये अपने साधकों−उपासकों तथा अधिकारी महापुरुषों को दर्शन देते हैं। इनकी साधना−उपासना से भक्तों का कल्याण होता है। पौराणिक मान्यता है कि वे आज भी मन्दराचल पर्वत पर तपस्यारत हैं। ऋषि संतान परशुराम ने अपनी प्रभुता व श्रेष्ठवीरता की आर्य संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी। शैव दर्शन में उनका अद्भुत उल्लेख है जो सभी शैव सम्प्रदाय के साधकों में स्तुत्य व परम स्मरणीय है। देश में अनेक स्थानों पर भगवान जमदग्नि जी के तपस्या स्थल एवं आश्रम हैं, माता रेणुका जी के अनेक क्षत्र हैं, प्रायः रेणुका माता के मंदिर में अथवा स्वतंत्र रूप से परशुराम जी के अनेक मंदिर भारत भर में हैं, जहां उनकी शांत, मनोरम तथा उग्र रूप मूर्ति के दर्शन होते हैं।</div><div><br></div><div>परशुराम दरअसल 'राम' के रूप में सत्य के संस्करण हैं, इसलिए नैतिक-युक्ति का अवतरण हैं। भगवान परशुराम को उनके हठी स्वभाव, क्रोध और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए याद किया जाता है। उन्होंने अपने जीवन के लिए अपने ही नियम बना रखे थे। परशुराम जयंती के शुभ दिन उनके चरित्र का स्मरण और अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। भगवान शिव, परशुराम जी के गुरु हैं। वह तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरुष हैं। न्याय के पक्षधर होने के कारण भगवान परशुराम जी बाल अवस्था से ही अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे। उन्होंने दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की निरंतर सहायता एवं रक्षा की है।</div><div><br></div><div>शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:42:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-did-lord-vishnu-avatar-render-the-earth-free-of-kshatriyas-21-times</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Akshaya Tritiya Special: यह है साल का सबसे Lucky Day, बिना पंचांग देखे करें विवाह और गृह प्रवेश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-special-this-is-the-luckiest-day-of-the-year]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है। कहा जाता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी आदि कार्य किए जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>इस दिन पितरों को किया गया तर्पण या किसी भी प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करने वाला है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। मान्यता है कि यदि इस दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों के लिए सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सद्गुण प्रदान करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-is-a-day-of-infinite-prosperity" target="_blank">Akshaya Tritiya 2026: अनंत समृद्धि का दिन है अक्षय तृतीया</a></h3><div>अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित की जाती है। इसके बाद फल, फूल, बरतन तथा वस्त्र आदि ब्राह्मणों को दान के रूप में दिये जाते हैं। इस दिन ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।</div><div><br></div><div>यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, पंखे, खडाऊं, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस तिथि का कितना महत्व है यह इस बात से भी पता चलता है कि सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।</div><div><br></div><div>यह माना जाता है कि इस दिन ख़रीदा गया सोना कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार यह दिन सौभाग्य और सफलता का सूचक है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>अक्षय तृतीया व्रत कथा</h2><div><br></div><div>अक्षय तृतीया का महत्व युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था। तब श्रीकृष्ण बोले, 'राजन! यह तिथि परम पुण्यमयी है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है। इसी दिन से सतयुग का प्रारम्भ होता है। इस पर्व से जुड़ी एक प्रचलित कथा इस प्रकार है−</div><div><br></div><div>प्राचीन काल में सदाचारी तथा देव ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी से व्रत के माहात्म्य को सुना। कालान्तर में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया। विधिपूर्वक देवी देवताओं की पूजा की। गोले के लड्डू, पंखा, जल से भरे घड़े, जौ, गेहूं, नमक, सत्तू, दही, चावल, गुड़, सोना तथा वस्त्र आदि दिव्य वस्तुएं ब्राह्मणों को दान कीं। स्त्री के बार−बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म कर्म और दान पुण्य से विमुख न हुआ। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई। जैसा कि भगवान श्री विष्णु ने कहा था, मथुरा जाकर राजा ने बड़ी ही श्रद्धा के साथ वैसा ही किया और इस व्रत के प्रभाव से वह शीघ्र ही अपने पैरों को प्राप्त कर सका।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:33:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-special-this-is-the-luckiest-day-of-the-year</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Akshaya Tritiya 2026: अनंत समृद्धि का दिन है अक्षय तृतीया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-is-a-day-of-infinite-prosperity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे देश में समय-समय पर बहुत से त्यौहार मनाये जाते हैं। इसलिए हमारे देश को त्योहारों का देश भी कहते है। हिन्दू धर्मावलम्बियों के प्रमुख त्योहारों में से एक अक्षय तृतीया है जिसे हम आखा तीज भी कहते हैं। अक्षय तृतीया देश भर में हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले सबसे पवित्र और शुभ दिनों में से एक है। माना जाता है कि इस दिन से जो भी कार्य इस शुरू होता है वो हमेशा पूर्ण होता है। यह त्यौहार हर वर्ष वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष के तृतीया को आता है। इस वर्ष अक्षय तृतीया 22 अप्रैल को है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया को शादी का अबूझ मुहुर्त माना जाता हैं। क्योंकि इस दिन शुभ कार्य करने के लिए मुहूर्त नहीं देखना पड़ता। इसी कारण अक्षय तृतीया को बहुत अधिक शादियां होती हैं। अक्षय तृतीया का पर्व बसंत और ग्रीष्म के संधिकाल का महोत्सव है। इस तिथि में गंगा स्नान, पितरों का तिल व जल से तर्पण और पिंडदान भी पूर्ण विश्वास से किया जाता है जिसका फल भी अक्षय होता है। इस तिथि की गणना युगादि तिथियों में होती है। क्योंकि सतयुग की समाप्ती पर त्रेतायुग का आरंभ इसी तिथि से हुआ है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mysterious-nirai-mata-temple-in-chhattisgarh-open-for-5-hours-year-burns-its-own-divine-light" target="_blank">Nirai Mata Temple: Chhattisgarh का रहस्यमयी Nirai Mata मंदिर, साल में 5 घंटे खुलता है, खुद जलती है Divine Light</a></h3><div>माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में जन्म लिया था। इसीलिये इस दिन को परशुराम जयंती के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि आखा तीज के दिन राजा भागीरथ गंगा नदी को पृथ्वी पर लाये थे। अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु तथा उनकी धर्मपत्नी लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। आखा तीज के दिन ही देवी अन्नपूर्णा का जन्म भी हुआ था। यह वह दिन था जब भगवान कृष्ण ने अपनी सारी संपत्ति और सौभाग्य अपने गरीब मित्र सुदामा को दे दिया था। अक्षय तृतीया के दिन श्रद्धेय ऋषि वेद व्यास ने महाभारत की रचना शुरू की थी। और पुराणों के अनुसार यह दिन त्रेता युग की शुरुआत का प्रतीक है। जो मानव जाति के चार युगों या युगों में से दूसरा है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। हिंदू शास्त्रों और पुराणों के अनुसार चार युग का चक्र होता है, जिसे सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के नाम से जाना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन सतयुग जिसे इंसान के जीवन का सुनहरा दौर कहा जाता है वो समाप्त हो जाता है और त्रेतायुग शुरू हो जाता है। इसलिए अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। हिंदू परिवारों के लिए यह दिन बहुत ज्यादा महत्व रखता है।</div><div>&nbsp;</div><div>अक्षय शब्द का अर्थ होता है कभी न मिटने या कम होने होने वाला। संस्कृत में अक्षय (अक्षय) शब्द का अर्थ समृद्धि, आशा, खुशी, सफलता होता है। जबकि तृतीया का अर्थ है चंद्रमा का तीसरा चरण। इसका नाम हिंदू कैलेंडर में वैसाख के वसंत महीने के तीसरे चंद्र दिवस के नाम पर रखा गया है। इस त्योहार को हम अपनी भाषा में आखातीज नाम से भी जानते हैं। जिसका अर्थ होता है जो कभी खत्म ना होने वाला। इसलिए माना जाता है की यह दिन हमारे लिए वस्तुओं की खरीदारी का सबसे शुभ दिन माना जाता है। "अक्षय" शब्द का अर्थ होता है जो कभी खत्म न हो। इसी कारण इस दिन किए गए सभी अच्छे कार्यों, जैसे जप, यज्ञ, दान-पुण्य, का पुण्य कभी भी समाप्त नहीं होता। माना जाता है कि अक्षय तृतीया का दिन व्यक्ति को अनंत सुख और समृद्धि की प्राप्ति करता है। इस दिन जितने पुण्य किए जाए उतने हमें हमारे लिए कम है।</div><div>जैन धर्म में अक्षय तृतीया एक महत्वपूर्ण तिथि है जिसे दान और पुण्य कार्य करने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान ऋषभदेव (प्रथम तीर्थंकर) ने एक वर्ष की तपस्या के बाद गन्ने के रस से पारणा किया था इसलिए इस दिन को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता हैं। अक्षय तृतीया के दिन यूं तो आप किसी भी देवी-देवता की पूजा कर सकते हैं। लेकिन विशेष रूप से इस दिन माता लक्ष्मी, भगवान गणेश और धन के देवता कुबेर की पूजा करने का विधान है। अन्य त्योहारों की तरह इस त्यौहार में भी दीपक जलाते हैं। इस दिन किया गया परोपकार हमारे लिए जीवन को सुखी बना देता हैं। इसीलिए इस दिन लोग गरीबों को भोजन कराते हैं तथा उनकी सहायता करते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>माना जाता है कि इस दिन किए गए पुण्य हमारे लिए स्वर्ग में जगह बनाते हैं। इस दिन कई लोग जागरण रखकर हवन करते हैं तथा गरीबों को दान देते हैं। कई लोग अपने नए घर में&nbsp; मुहूर्त के हिसाब से प्रवेश करते हैं। अक्षय तृतीया का पौराणिक महत्व भी है। मान्यता है कि इसी दिन सतयुग और त्रेता युग का आरंभ हुआ था। द्वापर युग का समापन और महाभारत युद्ध का समापन भी इसी तिथि को हुआ था। देश के अनेक हिस्सों में इस तिथि का अलग-अलग महत्व है। जैसे उड़ीसा और पंजाब में इस तिथि को किसानों की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। तो बंगाल में इस दिन गणपति और लक्ष्मीजी की पूजा का विधान है।</div><div><br></div><div>इतना पवित्र पर्व होने के उपरांत भी इस दिन बड़ी संख्या में होने वाले बाल विवाह इस पर्व के महत्व को कम करते हैं। अबूझ सावा मानकर बड़ी संख्या में लोग अपने नाबालिक बच्चों की इस दिन शादी कर देते हैं। कम उम्र के बच्चों के विवाह रोकने के लिए इस दिन प्रशासन को विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं। राजस्थान सहित कई प्रदेशों में तो अक्षय तृतीया का दिन बाल विवाह के लिए बदनाम हो चुका है। विकास के दौर में बाल विवाह एक नासूर के समान है। देश में हर व्यक्ति को शिक्षित करने की मुहिम चल रही है। हर व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में बाल विवाह होना समाज के माथे पर एक कलंक के समान है।&nbsp;</div><div><br></div><div>देश में अक्षय तृतीया (आखा तीज) पर हर वर्ष हजारों की संख्या में बाल विवाह किए जाते हैं। तमाम प्रयासों के बाबजूद हमारे देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अन्त नही हो पा रहा है। भारत में बेटी-बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान के शुरू होने के बावजूद एक नाबालिग बेटी की जबर्दस्ती शादी करा दी जा रही है। बाल विवाह मनुष्य जाति के लिए एक अभिशाप है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर जगह बेटी बचावो बेटी पढ़ाओ का नारा देते हैं। देश के सभी प्रदेशों में बेटियां शिक्षित हो रही है। ऐसे में समाज को आगे आकर कम उम्र में लड़कियों के होने वाले बाल विवाह रुकवाने के प्रयास करने होंगे। ऐसे पवित्र दिन का महत्व बनाए रखने के लिए समाज को इस दिन होने वाली कुरीतियों पर रोक लगाकर एक सकारात्मक संदेश देना होगा। तभी सार्थकता बनी रह पाएगी।</div><div><br></div><div>रमेश सर्राफ धमोरा</div><div>(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:21:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-is-a-day-of-infinite-prosperity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vaishakh Amavasya 2026: वैशाख अमावस्या व्रत से जीवन में आती है सुख एवं समृद्धि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-vaishakh-amavasya-fast-brings-happiness-and-prosperity-into-one-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैशाख अमावस्या का शुभ दिन स्नान, पूजा, सूर्य को जल अर्पण और पितरों के लिए तर्पण करने के लिए खास माना जाता है। वैशाख अमावस्या पर दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। इस विशेष दिन पूजा और शांति विशेष लाभकारी होता है तो आइए हम आपको वैशाख अमावस्या का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें वैशाख अमावस्या के बारे में&nbsp;</h2><div>वैशाख मास में पड़ने वाली अमावस्या को वैशाख अमावस्या कहते हैं। वैशाख अमावस्या को हिंदू वर्ष का दूसरा महीना कहा जाता है। शास्त्रों में वैशाख अमावस्या को धर्म-कर्म, स्नान-दान और पितरों के तर्पण के लिए बेहद शुभ माना जाता है। हिंदू धर्म में वैशाख अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है, यह दिन पितरों से जुड़े कर्म, शुद्धि और दान के लिए खास तौर से महत्वपूर्ण माना जाता है। पंडितों के अनुसार यह तिथि पितरों को मोक्ष दिलाने वाली मानी जाती है। इसलिए शास्त्रों में वैशाख अमावस्या को पितरों को मोक्ष दिलाने वाली अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस माह से त्रेता युग की शुरुआत हुई थी इसलिए वैशाख अमावस्या का धार्मिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण होती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/surefire-solution-to-stress-and-anxiety-these-radha-rani-names-give-mental-peace" target="_blank">Radha Rani Naam Jap: Stress और Anxiety का अचूक उपाय, Radha Rani के ये नाम देंगे आपको Mental Peace</a></h3><h2>वैशाख अमावस्या पर इन कार्यों से मिलता है शुभ फल</h2><div>पंडितों के अनुसार वैशाख अमावस्या तिथि पर आप भगवान विष्णु की आराधना कर सकते हैं, जो विशेषफयदायी मानी गई है। इसके अलावा इस दिन पर गीता का पाठ करना और विष्णु सहस्रनाम जप करने से ग्रह दोष के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है।</div><div>&nbsp;</div><h2>वैशाख अमावस्या पर करें इन चीजों का दान</h2><div>वैशाख महीना गर्मी में आने के कारण इस समय बहुत गर्मी पड़ती है, इसलिए वैशाख महीने की अमावस्या पर आप जल, पंखा और घड़े का दान कर सकते हैं। यह दान पुण्यकारी माना जाता है। साथ ही इस दिन सूर्य देव की कृपा के लिए गुड़, गेहूं, तांबा और लाल वस्त्रों का दान कर सकते हैं। वहीं चंद्रमा के लिए सफेद चीजों जैसे दूध, चावल और सफेद वस्त्रों का दान करना उत्तम माना गया है।</div><div><br></div><h2>जानें वैशाख अमावस्या का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>वैशाख अमावस्या के दिन सुबह का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:25 बजे से 5:09 बजे तक रहेगा, जो स्नान और पूजा के लिए बहुत शुभ होता है। सूर्योदय सुबह 5:54 बजे होगा। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:55 बजे से 12:47 बजे तक रहेगा, जो पूजा और दान के लिए अच्छा समय माना जाता है।</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या पर ये न करें, हो सकता है नुकसान&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन कोई नया काम शुरू करने या बड़ी खरीदारी करने से बचें। यह दिन नई शुरुआत के बजाय पूजा, चिंतन और दान के लिए खास माना जाता है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या पर मांस-मदिरा के सेवन से बचना चाहिए। इस दिन बाल और नाखून काटना भी वर्जित है। नए कार्य की शुरुआत और शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश, विवाह आदि भी इस तिथि पर नहीं करना चाहिए। नकारात्मक ऊर्जा की अधिकता के चलते अमावस्या पर रात में सुनसान जगहों पर जाने से बचें। किसी पर गुस्सा करने, धोखा देने, अपमान करने और जानवरों को नुकसान पहुंचाने से आपको पितरों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। अमावस्या तिथि पर इन बातों का खासतौर से ध्यान रखें।</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या पर करें ये काम पितृ होंगे प्रसन्न</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या तिथि पर सुबह उठकर किसी पवित्र नदी विशेषकर गंगा में स्नान करें। अगर ऐसा न कर सकें, तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। इस दिन श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों की कृपा मिलती है। जल में काले तिल मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर अर्घ्य दें। ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और दान-दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा करें। वैशाख अमावस्या पर शनि देव की कृपा पाने के लिए दान जरूर करें, इस दिन काली उड़द, काला छाता, काले वस्त्र, सरसों का तेल और लोहा दान करने से शनि देव बेहद प्रसन्न होकर भक्तों के कष्ट को दूर कर देते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या पर करें पीपल वृक्ष की पूजा, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>शास्त्रों के अनुसार अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसे में इस दिन सुबह पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाएं और शाम के समय इसके नीचे सरसों के तेल का दीया जलाएं और 7 बार परिक्रमा करें। चूंकि,पीपल में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के साथ-साथ शनि देव का वास होता है, इसलिए इसकी पूजा करने से शनि के कष्टों से मुक्ति मिलती है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक&nbsp;</h2><div>पुराणों में वैशाख अमावस्या के विषय में बहुत रोचक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार बहुत समय पहले की बात है। धर्म वर्ण नाम के एक ब्राह्मण थे। वह ब्राह्मण बेहद ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वह हमेशा व्रत-उपवास करते रहते व ऋषि-मुनियों का आदर करते और उनसे ज्ञान ग्रहण करते। एक बार उन्होंने किसी महात्मा के मुख से सुना कि कलयुग में भगवान विष्णु के नाम के स्मरण से ज्यादा पुण्य किसी भी कार्य में नहीं है। अन्य युगों में जो पुण्य यज्ञ करने से प्राप्त होता था उससे कहीं अधिक पुण्य फल इस घोर कलयुग में भगवान का नाम सुमिरन करने से मिल जाता है। धर्म वर्ण ने इस बात को आत्मसात कर लिया और सांसारिक जीवन छोड़कर संन्यास लेकर भ्रमण करने लगे।</div><div><br></div><div>एक दिन घूमते-घूमते वह पितृलोक जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि उनके पितर बहुत कष्ट में हैं। पितरों ने ब्राह्मण को बताया कि उनकी ऐसी हालत तुम्हारे संन्यास के कारण हुई है। क्योंकि अब उनके लिए पिंडदान करने वाला कोई शेष नहीं है। अगर तुम वापस जाकर अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत करो, संतान उत्पन्न करो तो हमें इस कष्ट से राहत प्रदान हो सकती है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि वैशाख अमावस्या के दिन विधि-विधान से पिंडदान करो। पितरों की बात सुनने के बाद धर्मवर्ण ने वचन दिया कि वह उनकी अपेक्षाओं को अवश्य पूर्ण करेंगे। इसके बाद धर्मवर्ण ने अपना संन्यासी जीवन छोड़ दिया और पुनः सांसारिक जीवन को अपना लिया। और फिर वैशाख अमावस्या की तिथि को विधि-विधान से पिंडदान किया और अपने पितरों को मुक्ति दिलाई।</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या के दिन ये करें, होंगे लाभान्वित&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार वैशाख अमावस्या पर पितरों की शांति, ग्रहदोष, कालसर्प दोष आदि से मुक्ति के लिए उपाय किए जाते हैं। इस दिन हो सके तो उपवास रखना चाहिए। इस दिन व्यक्ति में नकारात्मक सोच बढ़ जाती है। ऐसे में नकारात्मक शक्तियां उसे अपने प्रभाव में ले लेती है तो ऐसे में हनुमानजी का जप करते रहना चाहिए। अमावस्या के दिन ऐसे लोगों पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है जो लोग अति भावुक होते हैं। अत: ऐसे लोगों को अपने मन पर कंट्रोल रखना चाहिए और पूजा पाठ आदि करना चाहिए। इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 17:47:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-vaishakh-amavasya-fast-brings-happiness-and-prosperity-into-one-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Baisakhi 2026: क्यों है Baisakhi सिखों के लिए 'Historic Day'? जानिए Guru Gobind Singh और खालसा पंथ की पूरी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-baisakhi-historic-day-for-sikhs-learn-full-story-of-guru-gobind-singh-and-khalsa-panth]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 14 अप्रैल 2026 को देशभर में बैसाखी का पर्व मनाया जा रहा है। हरियाणा और पंजाब के खेतों में जब फसलें लहलहाने लगती हैं, तो खुशियों के इस पर्व की शुरूआत होती है। लेकिन बैसाखी का पर्व सिर्फ एक फसल का उत्सव नहीं है, बल्कि यह सिख समुदाय के साहस, धार्मिक पहचान और नई शुरूआत का भी प्रतीक है। इस दिन सूर्य देव अपनी राशि बदलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं, जिसको सिख धर्म में नए साल की शुरूआत माना जाता है।</div><div><br></div><h2>कैसे मनाया जाता है ये पर्व</h2><div>इस दिन गुरुद्वारों में सुबह से ही रौनक देखने को मिलती है। लोग नए कपड़े पहनकर विशेष अरदास में शामिल होते हैं। इस दिन जगह-जगह लंगर लगाए जाते हैं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा आदि किया जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि किस तरह से एकजुट होकर हम बुराई का सामना कर सकते हैं और सबसे साथ अपनी खुशियों को बांट सकते हैं।</div><div><br></div><h2>मुहूर्त</h2><div>बैसाखी तिथि की शुरूआत 14 अप्रैल 2026 से शुरू होगी। पुण्यकाल सुबह 06:15 मिनट से शाम 03:55 मिनट तक रहेगा। माना जाता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान आदि करने से पापों से मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><h2>ऐतिहासिक दिन</h2><div>सिख समुदाय के लिए यह दिन सबसे बड़ा माना जाता है। इस दिन सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। उन्होंने इस दिन पंज प्यारों को अमृत चखाया था। साथ ही इस दिन गुरुद्वारों में विशेष अरदास और नगर कीर्तन किया जाता है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>बैसाखी के दिन सुबह किसी पवित्र नदी या सरोवर आदि में स्नान करें। अगर संभव न हो तो घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। क्योंकि यह सौर वर्ष का पहला दिन है। इस दिन गुरुद्वारे में जाकर 'कड़ा प्रसाद' ग्रहण करें। वहीं लंगर सेवा में हिस्सा लें। इस दिन पीले वस्त्र, अनाज और गुड़ आदि का दान करना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Apr 2026 11:07:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-baisakhi-historic-day-for-sikhs-learn-full-story-of-guru-gobind-singh-and-khalsa-panth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Baisakhi 2026: 14 अप्रैल को मनाया जाएगा बैसाखी का त्योहार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-baisakhi-will-be-celebrated-on-april-14]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सूर्यदेव के मेष राशि में प्रवेश करने पर बैसाखी मनाई जाती है। इसे मेष संक्रांति और वैशाख संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सूर्य देवता की स्तुति और दान का खास महत्व होता है। वहीं किसान बैसाखी फसलों की कटाई की खुशी में मनाते हैं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि बैसाखी के त्योहार तक रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है। ऐसे में किसान फसलों कि कटाई की खुशी में बैसाखी धूमधाम से मनाते हैं। वहीं, इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं जिसके चलते यह दिन सूर्यदेव की स्तुति करने के लिए बेहद विशेष माना जाता है। बैसाखी को वैशाख संक्रांति और मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य देवता को ग्रहों का राजा बताया गया है। ऐसे में जब वो अपनी राशि बदलते हैं, तो इसका प्रभाव हर किसी पर देखने को मिलता है। यही कारण है कि बैसाखी को नया साल भी माना जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इसे फसल का पर्व भी माना जाता है और ऐसा कहा जाता है कि जब फसल पककर तैयार हो जाती है तब ख़ुशी मनाने के रूप में बैसाखी मनाई जाती है। मुख्य रूप से यह पर्व पंजाब और हरियाणा में मनाया जाता है। इस दौरान एक खास रबी की फसल पककर तैयार होती है और उसी की खुशी मनाने के लिए लोग बैसाखी में नाचते, गाते हैं और खुशियां मनाते हैं। अगर हम सूर्य पंचांग की बात करें तो बैसाखी को सिख नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है। बैसाखी सिख समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। इसका धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी बहुत ज्यादा है। यह दिन आने वाले साल के लिए नए मौसम और नई शुरुआत का प्रतीक होता है। इस दिन लोग एक साथ इकठ्ठा होते हैं और अच्छी फसल के साथ अच्छी फसल की कामना करते हुए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/these-temples-of-lord-shiva-spread-from-thailand-to-mauritius" target="_blank">Lord Shiva Temple: Nepal के Pashupatinath जैसा वैभव, Thailand से Mauritius तक फैले हैं Lord Shiva के ये मंदिर</a></h3><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि बैसाखी का पर्व नए सौर वर्ष की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। हर साल 13 या 14 अप्रैल को सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार इस दिन को मेष संक्रांति कहा जाता है। इसी दिन बैसाखी का त्योहार भी मनाया जाता है। इस साल 14 अप्रैल को सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करेंगे और इसी दिन सिखों का पर्व बैसाखी भी मनाया जाएगा।</div><div><br></div><h2>बैसाखी 2026&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार इस साल बैसाखी का त्योहार 14 अप्रैल, मंगलवार के दिन मनाया जाएगा। इस दिन वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि लग रही है। 14 अप्रैल को सुबह 9:31 मिनट पर सूर्यदेव मेष राशि में प्रवेश करेंगे। ऐसे में बैसाखी का त्योहार 14 तारीख को ही मनाया जाएगा। इस दिन पुण्य काल की तिथि सूर्योदय से लेकर शाम को 3 बजकर 55 मिनट तक रहेगी।</div><div><br></div><div>बैसाखी, मेष संक्रांति- मंगलवार 14 अप्रैल&nbsp;</div><div>सूर्य गोचर मेष राशि में- 14 अप्रैल को सुबह 9:31 मिनट पर।</div><div><br></div><h2>मेष संक्रांति का प्रभाव</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि वारानुसार और नक्षत्रानुसार यह महोदरी नामक संक्रांति होगी। ऐसे में सोना और चांदी की कीमतें बढ़ती हुई देखने को मिल सकती हैं। साथ ही, मंगलवारी संक्रांति होने के चलते तेल, घी, वनस्पति और दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी महंगी होने की आशंका है। इसके चलते सामान्य लोगों की परेशानियों में वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा, कुछ राज्यों में राजनीति के क्षेत्र में उठा-पटक देखी जा सकती है।</div><div><br></div><h2>वैशाख संक्रांति का महत्व</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन सूर्य देवता की पूजा की जाती है। साथ ही, किसान फसलों की कटाई की खुशी में बैसाखी का त्योहार मनाते हैं। वैशाख संक्रांति पर स्नान-दान का भी खास महत्व होता है। मान्यता है कि इससे शुभ फल प्राप्त होता है। सूर्य देवता को ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों का राजा माना गया है। ऐसे में सूर्य के राशि परिवर्तन करने से इसका प्रभाव सभी पर देखने को मिलता है। बैसाखी को इसीलिए नए साल के रूप में भी मनाया जाता है। किसान मकर संक्रांति से फसलों की कटाई शुरू कर देते हैं। इस दिन सूर्य देव की पूजा करना बहुत शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन दिवाली के प्रकार ही लोग अपने घर की सफाई करते हैं और आंगन में रंगोली बनाते हैं। बैसाखी के त्योहार पर कई प्रकार के पकवान भी बनाए जाते हैं और सिख समुदाय के लोग सुबह के समय गुरुद्वारे जाते हैं। इस दिन कई स्थानों पर मेला भी लगता है और अपने घरों को लाइटों से सजा दिया जाता है।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास&nbsp;</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 17:52:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-baisakhi-will-be-celebrated-on-april-14</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Ganga Saptami पर करें यह महाउपाय, घर में रखें ये शुभ वस्तुएं, कभी नहीं होगी धन की कमी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganga-saptami-4-items-for-luck-and-divine-blessings]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में गंगा सप्तमी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि गंगा जयंती मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन गंगा स्नान और दान करने से व्यक्ति के सात जन्मों के पाप धुल जाते हैं। इस बार गंगा सप्तमी 23 अप्रैल 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी।</div><div><br></div><div>आपको बता दें कि, गंगा सप्तमी के दिन केवल स्नान ही काफी नहीं है, इस दिन कुछ विशेष पवित्र चीजों को अपने घर लेकर आना, बेहद शुभ माना जाता है। इससे मां गंगा प्रसन्न होती है और इसके साथ ही महादेव की कृपा बनीं रहती है। आइए आपको बताते हैं कि वे कौन सी चीजें है, जो घर पर लाने से आपका सोया हुआ भाग्य जाग जाएगा।</div><div><br></div><div><b>चांदी या तांबे के पात्र में गंगाजल</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">गंगा सप्तमी के अवसर पर सबसे शुभ माना जाता है कि आप पवित्र गंगाजल को अपने घर लाएं। यदि यह संभव न हो, तो पहले से उपलब्ध गंगाजल को तांबे या चांदी के स्वच्छ पात्र में भरकर घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में स्थापित करें। ऐसा करने से घर की नकारात्मकता दूर होती है और सुख-शांति व समृद्धि का आगमन होता है।</span></div><div><br></div><div><b>दक्षिणवर्ती शंख</b></div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता के अनुसार, शंख को साक्षात मां लक्ष्मी का भाई माना जाता है। इसलिए गंगा सप्तमी के दिन दक्षिणवर्ती शंख खरीदकर घर लेकर आना और उसे पूजा के स्थान पर स्थापित करना बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिस घर में शंख की ध्वनि होती है और इसकी पूजा होती है, वहां दरिद्रता कभी कदम नहीं रखती है।</div><div><br></div><div><b>कमल या हाथी की प्रतिमा</b></div><div><br></div><div>गंगा सप्तमी के दिन कमल का फूल और चांदी का हाथी पर जरुर लाएं। मां गंगा को कमल का फूल अधिक प्रिय है और हाथी को ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है। ऐसा करने से करियर और व्यापार में सफलता मिलती है। इसके साथ ही सौभाग्य के द्वार भी खुल जाते है। आप चाहे तो किसी और धाकु की प्रतिमा का हाथी ले सकते हैं।</div><div><br></div><div><b>रुद्राक्ष</b></div><div><br></div><div>मान्यता है कि मां गंगा भगवान शिव की जटाओं में निवास करती हैं, इसलिए गंगा सप्तमी के दिन रुद्राक्ष को घर लाना, धारण करना या पूजास्थल में स्थापित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से मन का तनाव घटता है और व्यक्ति को आंतरिक शांति का अनुभव होता है।</div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>गंगा सप्तमी पूजा मंत्र</b></span></div><div><br></div><div>- ॐ गंगे नमः॥</div><div>- गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।</div><div>नर्मदे सिन्धु कावेरी जलस्मिन् सन्निधिं कुरु॥</div><div>- नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः॥</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 17:45:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganga-saptami-4-items-for-luck-and-divine-blessings</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hanuman Janmotsav पर Salasar Dham में आस्था का महासैलाब, जय श्री राम के जयकारों से गूंजा पूरा Rajasthan]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-massive-surge-of-faith-sweeps-through-salasar-dham-on-hanuman-janmotsav]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजस्थान के चुरू जिले में स्थित प्रसिद्ध सालासर धाम में आज हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन हो रहा है। देशभर से लाखों श्रद्धालु बजरंगबली के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। मान्यता है कि सालासर बालाजी के दरबार में जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से आता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। आज के दिन मंदिर परिसर 'जय श्री राम' और 'सालासर वाले की जय' के जयकारों से गूंज उठा है।</div><div><br></div><h2><b>शुभ योगों का अद्भुत संयोग</b></h2><div>इस बार हनुमान जन्मोत्सव पर ग्रहों की स्थिति बहुत ही शुभ मानी जा रही है। आज के दिन 'सिद्धि योग' और 'गजकेसरी योग' का एक दुर्लभ और मंगलकारी संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इन योगों में की गई पूजा और आराधना का फल कई गुना बढ़ जाता है। यह संयोग भक्तों के लिए सुख, समृद्धि और कार्यों में सफलता लाने वाला माना गया है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/hanuman-jayanti-2026-puja-auspicious-afternoon-and-evening-times" target="_blank">Hanuman Jayanti 2026: सुबह पूजा नहीं कर पाए? शाम के इस शुभ मुहूर्त में पाएं बजरंगबली का आशीर्वाद</a></h3><div><br></div><h2><b>प्रशासन और सुरक्षा के इंतजाम</b></h2><div>भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन और मंदिर कमेटी ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। दर्शन के लिए लंबी कतारों में लगे श्रद्धालुओं के लिए पीने के पानी और छाया की व्यवस्था की गई है। जगह-जगह स्वयंसेवक तैनात हैं ताकि मेले में आने वाले बुजुर्गों और बच्चों को किसी तरह की परेशानी न हो।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-these-special-rituals-on-hanuman-janmotsav" target="_blank">Hanuman Janmotsav पर करें ये खास उपाय, बजरंगबली की कृपा से जीवन की हर बाधा होगी दूर</a></h3><div><br></div><h2><b>भजन के साथ विशेष आरती</b></h2><div>मेले के दौरान मंदिर में सुबह से ही विशेष आरती और अभिषेक का दौर चल रहा है। जगह-जगह भंडारों का आयोजन किया गया है और भजन मंडलियां बालाजी के भजनों से वातावरण को भक्तिमय बना रही हैं। भक्त लंबी यात्रा तय कर पैदल और ध्वज लेकर बालाजी के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंच रहे हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:04:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-massive-surge-of-faith-sweeps-through-salasar-dham-on-hanuman-janmotsav</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Hanuman Janmotsav पर करें ये खास उपाय, बजरंगबली की कृपा से जीवन की हर बाधा होगी दूर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-these-special-rituals-on-hanuman-janmotsav]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बजरंग बली हनुमान का जन्म भगवान श्रीराम की सहायता के लिए हुआ। हनुमान जी को भगवान शंकर का अवतार भी माना जाता है। कहा जाता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की सेवा के निमित्त भगवान शिव जी ने एकादश रुद्र को ही हनुमान के रूप में अवतरित किया था। हनुमान जी चूंकि वानर−उपदेवता श्रेणी के तहत आते हैं इसलिए वे मणिकु.डल, लंगोट व यज्ञोपवीत धारण किए और हाथ में गदा लिए ही उत्पन्न हुए थे। पुराणों में कहा गया है कि उपदेवताओं के लिए स्वेच्छानुसार रूप एवं आकार ग्रहण कर लेना सहज सिद्ध है। पुराणों के अनुसार, इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। माता अंजनी एवं पवन देवता के पुत्र हनुमान का जीवनकाल पराक्रम और श्रीराम के प्रति अटूट निष्ठा की असंख्य गाथाओं से भरा पड़ा है। हनुमान जी में किसी भी संकट को हर लेने की क्षमता है और अपने भक्तों की यह सदैव रक्षा करते हैं। हनुमान रक्षा स्त्रोत का पाठ यदि नियमित रूप से किया जाए तो कोई बाधा आपके जीवन में नहीं आ सकती। साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ करने से बड़े से बड़ा भय दूर हो जाता है।</div><div><br></div><div>हनुमान जन्मोत्सव के दिन हनुमान जी के पूजन का विशेष महत्व है। हनुमान जी भक्तों से विशेष प्रेम करते हैं और उनकी हर पुकार को सुनते हैं। श्रीराम की नित उपासना करने वालों पर हनुमान जी खूब प्रसन्न रहते हैं। हनुमान जन्मोत्सव के दिन हनुमानजी की पूजा विधि विधान से करनी चाहिए। इसके लिए पूजा के स्थान पर उनकी मूर्ति स्थापित करके शुद्ध जल, दूध, दही, घी, मधु और चीनी का पंचामृत, तिल के तेल में मिला सिंदूर, लाल पुष्प, जनेऊ, सुपारी, नैवेद्य, नारियल का गोला चढ़ाएं और तिल के तेल का दीपक जलाकर उनकी पूजा करें। इससे हनुमान जी प्रसन्न होकर भक्तों के सारे कष्ट हर लेते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/your-luck-shine-on-hanuman-jayanti-worship-in-this-auspicious-time-know-puja-vidhi" target="_blank">Hanuman Jayanti 2026: हनुमान जन्मोत्सव पर चमकेगी किस्मत, इस Shubh Muhurat में करें पूजा, जानें क्या है Puja Vidhi</a></h3><div>हनुमान जी के बचपन से जुड़ा एक प्रचलित प्रसंग यह है कि एक बार बालक हनुमान ने पूर्व दिशा में सूर्य को उदय होते देखा तो वह तुरंत आकाश में उड़ चले। वायुदेव ने जब यह देखा तो वह शीतल पवन के रूप में उनके साथ चलने लगे ताकि बालक पर सूर्य का ताप नहीं पड़े। अमावस्या का दिन था। राहु सूर्य को ग्रसित करने के लिए बढ़ रहा था तो हनुमानजी ने उसे पकड़ लिया। राहु किसी तरह उनकी पकड़ से छूट कर भागा और देवराज इंद्र के पास पहुंचा। इंद्र अपने प्रिय हाथी ऐरावत पर बैठकर चलने लगे तो हनुमान जी ऐरावत पर भी झपटे। इस पर इंद्र को क्रोध आ गया। उन्होंने बालक पर वज्र से प्रहार किया तो हनुमान जी की ठुड्डी घायल हो गई। वह मूर्छित होकर पर्वत शिखर पर गिर गए। यह सब देखकर वायुदेव को भी क्रोध आ गया। उन्होंने अपनी गति रोक दी और अपने पुत्र को लेकर एक गुफा में चले गए। अब वायु के नहीं चलने से सब लोग घबरा गए। देवतागण सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी के पास पहुंचे। सारी बात सुनकर ब्रह्माजी उस गुफा में पहुंचे और हनुमान जी को आर्शीवाद दिया तो उन्होंने आंखें खोल दीं। पवन देवता का भी क्रोध शांत हो गया। ब्रह्माजी ने कहा कि इस बालक को कभी भी ब्रह्म श्राप नहीं लगेगा। इसके बाद उन्होंने सभी देवताओं से कहा कि आप सब भी इस बालक को वर दें। इस पर देवराज इंद्र बोले कि मेरे वज्र से इस बालक की हनु यानि ठोढ़ी पर चोट लगी है इसलिए इसका नाम हनुमान होगा। सूर्य ने अपना तेज दिया तो वरूण ने कहा कि हनुमान सदा जल से सुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार हर देवता ने हनुमानजी को वर प्रदान किया जिससे वह बलशाली हो गए।</div><div><br></div><div>एक और प्रसंग यह है कि सूर्यदेव के कहने पर हनुमान जी ने उन्हें सुग्रीव की मदद करने का वचन दिया। बाद में हनुमान ने सुग्रीव की भरपूर मदद की और उनके खास मित्र बन गए। सीताजी का हरण करके रावण जब उन्हें लंका ले गया तो सीताजी को खोजते श्रीराम और लक्ष्मण जी से हनुमान जी की भेंट हुई। उनका परिचय जानने के बाद वह उन दोनों को कंधे पर बैठाकर सुग्रीव के पास ले गए। सुग्रीव के बारे में जानकर श्रीराम ने उन्हें मदद का भरोसा दिया और सुग्रीव ने भी सीताजी को ढूंढ़ने में मदद करने का वादा किया। श्रीराम ने अपने वादे के अनुसार एक ही तीर में बाली का अंत कर दिया और सुग्रीव फिर से किष्किन्धा नगरी में लौट आए। उसके बाद सुग्रीव का आदेश पाकर प्रमुख वानर दल सीताजी की खोज में सब दिशाओं में चल दिए। श्रीराम जी ने हनुमान जी से कहा कि मैं आपकी वीरता से परिचित हूं और मुझे विश्वास है कि आप अपने लक्ष्य में कामयाब होंगे। इसके बाद श्रीराम जी ने हनुमानजी को अपनी एक अंगूठी दी जिस पर उनका नाम लिखा हुआ था। सीताजी का पता मिलने के बाद जब हनुमान जी लंका में पहुंचे तो उन्होंने माता सीता से भेंटकर उन्हें श्रीराम का संदेश दिया और लंका की पूरी वाटिका उजाड़ने के बाद लंका में आग भी लगा दी। इसके बाद सीताजी को मुक्त कराने के लिए जो युद्ध हुआ उसमें हनुमान जी ने महती भूमिका निभाई।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 10:45:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-these-special-rituals-on-hanuman-janmotsav</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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