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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Sita Navami 2026: क्यों मनाई जाती है जानकी जयंती? जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और इसका महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-is-janaki-jayanti-celebrated-learn-about-the-auspicious-puja-timings-and-its-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सीता नवमी को देवी सीता के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। विवाहित स्त्रियाँ सीता नवमी के दिन व्रत रखती हैं तथा अपने पतियों की दीर्घायु की कामना करती हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, सीता जयन्ती वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनायी जाती है। मान्यता है कि देवी सीता का जन्म मंगलवार के दिन पुष्य नक्षत्र में हुआ था। देवी सीता का विवाह भगवान राम से हुआ था, जिनका जन्म भी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था।</div><div><br></div><div>भगवान श्रीराम की पत्नी सीताजी राजा जनक की पुत्री हैं इसलिए उन्हें जानकी नाम से भी पुकारा जाता है। रामायण ग्रंथ के अनुसार सीताजी ने उच्च मर्यादित जीवन जिया और सारा जीवन अपने पति भगवान श्रीराम के प्रति समर्पित रहीं। भारतीय देवियों में भगवती श्रीसीताजी का स्थान सर्वोत्तम है। रामायण ग्रंथ के मुताबिक प्राचीन काल में मिथिलापुरी में सीरध्वज जनक नाम के प्रसिद्ध धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे शास्त्रों के ज्ञाता, परम वैराग्यवान तथा ब्रह्मज्ञानी थे। एक बार राजा जनक यज्ञ के लिए भूमि जोत रहे थे। भूमि जोतते समय हल का फाल एक घड़े से टकरा गया। राजा ने वह घड़ा बाहर निकलवाया। उससे राजा को अत्यन्त ही रूपवती कन्या की प्राप्ति हुई। राजा ने उस कन्या को भगवान का दिया हुआ प्रसाद माना और उसे पुत्री के रूप में बड़े लाड़ प्यार से पाला। उस कन्या का नाम सीता रखा गया। जनक की पुत्री होने के कारण वह जानकी भी कहलाने लगीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/sita-navami-symbolizes-sacrifice-feminine-power-devotion-and-unwavering-virtue" target="_blank">Sita Navami 2026: सीता नवमी त्योहार त्याग, स्त्री शक्ति, समर्पण एवं अटूट मर्यादा का है प्रतीक</a></h3><div>धीरे धीरे जानकीजी विवाह योग्य हो गयीं। महाराज जनक ने धनुष यज्ञ के माध्यम से उनके स्वयंवर का आयोजन किया। निमंत्रण पाकर देश विदेश के राजा मिथिला में आये। महर्षि विश्वामित्र भी श्रीराम और लक्ष्मण के साथ यज्ञोत्सव देखने के लिए मिथिला में पधारे। राजा जनक को जब उनके आने का समाचार मिला तब वे श्रेष्ठ पुरुषों और ब्राह्मणों को लेकर उसने मिलने के लिए गये। श्रीराम की मनोहारिणी मूर्ति देखकर राजा विशेष रूप से विदेह हो गये। विश्वामित्र जी ने श्रीराम के शौर्य की प्रशंसा करते हुए महाराज जनक से अयोध्या के दशरथनंदन के रूप में उनका परिचय कराया। परिचय पाकर महाराजा जनक को विशेष प्रसन्नता हुई।</div><div><br></div><div>पुष्पवाटिका में श्रीराम−सीता का प्रथम परिचय हुआ। दोनों चिरप्रेमी एक दूसरे की मनोहर मूर्ति को अपने हृदय में रखकर वापस लौटे। सीताजी का स्वयंवर आरंभ हुआ। देश विदेश के राजा, ऋषि मुनि, नगरवासी सभी अपने अपने नियत स्थान पर आसीन हुए। श्रीराम और लक्ष्मण भी विश्वामित्र जी के साथ एक ऊंचे आसन पर विराजमान हुए। भाटों ने महाराज जनक के प्रण की घोषणा की। शिवजी के कठोर धनुष ने वहां उपस्थित सभी राजाओं के दर्प को चूर चूर कर दिया। अंत में श्रीरामजी विश्वामित्र की आज्ञा से धनुष के समीप गये। उन्होंने मन ही मन गुरु को प्रणाम करके बड़े ही आराम से धनुष को उठा लिया। एक बिजली सी कौंधी और धनुष दो टुकड़े होकर पृथ्वी पर आ गया। प्रसन्नता के आवेग और सखियों के मंगल गान के साथ सीताजी ने श्रीराम के गले में जयमाला डाली। महाराज दशरथ को जनक का आमंत्रण प्राप्त हुआ। श्रीराम के साथ उनके शेष तीनों भाई भी जनकपुर में विवाहित हुए। बारात विदा हुई तथा पुत्रों और पुत्रवधुओं के साथ महाराजा दशरथ अयोध्या पहुंचे।</div><div><br></div><div>श्रीराम को राज्याभिषेक के बदले अचानक चौदह वर्ष का वनवास हुआ। सीताजी ने तत्काल अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिया। श्रीराम के द्वारा अयोध्या में रहने के आग्रह के बाद भी सीताजी ने सभी सुखों का त्याग कर दिया और वे श्रीराम के साथ वन को चली गयीं। सीताजी वन में हर समय श्रीराम को स्नेह और शक्ति प्रदान करती रहती थीं। वन में रावण के द्वारा सीता हरण करके उन्हें समुद्र के पार लंका ले जाना रामायण में नया मोड़ लाता है। रावण ने सीताजी को विवाह का प्रस्ताव दिया जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। हनुमानजी जब सीताजी को खोजते खोजते लंका पहुंचे तो वह उन्हें अशोक वाटिका में कैद मिलीं। उन्होंने सीताजी को प्रणाम कर भगवान श्रीराम का संदेश दिया। इसके बाद सीता माता की कुशलता की जानकारी उन्होंने भगवान तक पहुंचायी जिसके बाद भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई कर रावण और अन्य दुष्टों का वध किया और सीताजी को पुनः प्राप्त किया। लंका प्रवास भगवती सीता के धैर्य की पराकाष्ठा है। भगवती सीताजी के कारण ही जनकपुर वासियों को श्रीराम का दर्शन और लंकावासियों को मोक्ष प्राप्त हुआ।</div><div><br></div><div>शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 11:34:57 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sita Navami 2026: सीता नवमी त्योहार त्याग, स्त्री शक्ति, समर्पण एवं अटूट मर्यादा का है प्रतीक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sita-navami-symbolizes-sacrifice-feminine-power-devotion-and-unwavering-virtue]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज सीता नवमी है, यह दिन मां सीता के प्राकट्य दिवस का पर्व है, जिसे जानकी नवमी भी कहते हैं। यह दिन स्त्री शक्ति एवं अटूट मर्यादा का प्रतीक है। सीता का चरित्र हमें आत्मबल, कर्तव्यनिष्ठा और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है तो आइए हम आपको सीता नवमी का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें सीता नवमी के बारे में&nbsp;</h2><div>सनातन धर्म में सीता नवमी के त्योहार का विशेष महत्व माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन माता सीता का प्राकट्य हुआ था। वैष्णव संप्रदाय में आज माता सीता के निमित्त व्रत रखने की परंपरा भी है। व्रत रखकर श्री राम सहित माता सीता का पूरे विधि-विधान से पूजन किया जाता है और उनकी स्तुति की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो कोई भी व्रत करता है, उसे सोलह महा दानों और सभी तीर्थों के दर्शन का फल मिलता है। सीता नवमी को जानकी नवमी के नाम से भी जाना जाता है, हर साल यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और माता सीता की पूजा-अर्चना करते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से घर-परिवार में खुशहाली बनी रहती है, इस शुभ दिन पर कुछ विशेष चीजें घर लाई जाएं, तो न केवल नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, बल्कि माता लक्ष्मी की कृपा भी घर पर बनी रहती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/powerful-recitation-of-vishnu-chalisa-bring-success-every-problem-of-life-solved" target="_blank">Vishnu Chalisa Path: Vishnu Chalisa का Powerful पाठ देगा Success, Life की हर Problem होगी दूर</a></h3><h2>जानें सीता नवमी 2026 शुभ मुहूर्त</h2><div>हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन सीता नवमी मनाई जाती है और इस बार ये त्योहार 25 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन माता जानकी की पूजा का मुहूर्त सुबह 11:20 से दोपहर 01:55 बजे तक रहेगा।&nbsp; 25 अप्रैल, शनिवार को सीता नवमी पूजन का सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 01 मिनिट से दोपहर 01 बजकर 38 मिनिट तक रहेगा। यानी भक्तों को पूजा के लिए पूरे 02 घण्टे 37 मिनट का समय मिलेगा। मुहूर्त से पहले पूजा की पूर तैयारी कर लें।</div><div><br></div><h2>सीता नवमी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व&nbsp;</h2><div>माता सीता को आदर्श स्त्री और नारी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन धैर्य, समर्पण, सत्य और धर्म के पालन का संदेश देता है। मान्यतानुसार जिस दिन सीता माता प्रकट हुई, उसे जानकी जयंती या सीता नवमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग विशेष पूजा-अर्चना, हवन, कथा वाचन और भजन-कीर्तन का आयोजन करते हैं। यह दिन नारी शक्ति, मर्यादा और धार्मिक आस्था का प्रतीक भी है। माता सीता को धैर्य, शांति और धर्म की प्रतीक माना जाता है, और उनके जीवन से हम सभी को सत्संग, त्याग और भक्ति की प्रेरणा मिलती है।</div><div><br></div><h2>सीता नवमी पर इन मंत्रों का करें जाप, होगा लाभ&nbsp;&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार सीता नवमी के दिन माता सीता और श्री राम के इस मंत्र का 11 बार जप अवश्य करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है-</div><div>1. श्री सीतायै नमः।</div><div>2. श्री रामाय नमः।</div><div><br></div><div>इस मंत्र का जप करके माता सीता और श्री राम, दोनों को पुष्पांजलि चढ़ाकर उनका आशीर्वाद लें। इससे आपके सारे मनोरथ सिद्ध होंगे।</div><div><br></div><h2>इसलिए मनाई जाती है सीता नवमी&nbsp;</h2><div>सीता जी को जानकी भी कहा जाता है, क्योंकि उनका जन्म जनकपुरी (जनक राजा के राज्य) में हुआ था। उन्हें धरती से उत्पन्न देवी माना जाता है। जानकी जयंती का पर्व न केवल माता सीता के जन्मदिन के रूप में, बल्कि स्त्री सम्मान और धार्मिक आदर्शों के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है।</div><div><br></div><h2>मर्यादा और चरित्र की अटूट शक्ति हैं मां सीता&nbsp;</h2><div>देवी सीता को मर्यादा और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। लंका में रावण की कैद में रहने के दौरान भी उन्होंने अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को कभी आंच नहीं आने दी। उनका चरित्र यह सिखाता है कि असली शक्ति बाहरी शस्त्रों में नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और इरादों की मजबूती में होती है। सीता नवमी का यह दिन हमें अपने भीतर के आत्मसम्मान को जगाने और मर्यादा की सीमाओं का सम्मान करने की प्रेरणा देता है। समाज में रहकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना और किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से समझौता न करना ही मां सीता की सच्ची सेवा है। उनके जीवन का हर अध्याय हमें यह अहसास कराता है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी हारता नहीं है, बल्कि वह सब के लिए प्रेरणा बन जाता है।</div><div><br></div><h2>सीता नवमी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>कथा यह है कि मां लक्ष्मी जी का अवतार सीता माता अपने पिछले जन्म में मुनि कुषध्वजा की बहुत ही सुंदर पुत्री वेदावती थी। वे भगवान विष्णु की भक्त थी वे हर समय केवल उनकी पूजा में ही लीन रहती थी, उनका प्रण था कि वे भगवान विष्णु के अतिरिक्त किसी और से विवाह नही करेंगी। उनके पिता एक ऋषि थे, वे अपनी बेटी के इस प्रण को अच्छी तरह से जानते थे, उन्होनें कभी अपनी पुत्री को अपना मन बदलने के लिए विवष नही किया। पुत्री की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होनें पुत्री के लिए आए अनेकों षक्तिषाली राजाओं और देवताओं के रिष्तों को मना कर दिया। मना किए गए रिष्तों में से एक रिष्ता दैत्यों के षक्तिषाली राजा षंभु का भी था। रिष्ते के लिए न मिलने पर दानव षंभु ने इसे अपना अपमान समझा और अपने अपमान का बदला लेने के उद्देष्य से मौका देखकर वेदावती के माता पिता का वध कर दिया।</div><div>&nbsp;</div><div>अपने माता पिता की मृत्यु के बाद वेदावती संसार में बिलकुल अकेली और अनाथ हो गई वे अपने पिता के आश्रम में ही रहने लगी और सारा समय भगवान विष्णु का ध्यान करने लगी। वेदावती बहुत ही खुबसूरत थी और उनकी तपस्या ने उन्हें पहले से भी अधिक सुंदर बना दिया था। एक बार लंका के राजा रावण ने उसे जंगल में भगवान विष्णु के लिए तपस्या करते हुए देखा वो वेदावती की सुंदरता पर मोहित हो गया उसने वेदावती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा परन्तु उसे भी न में ही जवाब मिला। न में जवाब मिलने पर रावण ने वेदावती की तपस्या भंग कर दी और उनके बालों को पकड़़कर उन्हें घसीटने लगा। ंरावण के इस कुकृत्य से क्रोधित वेदावती ने अपने बाल काट दिए और कहा कि वो वहीं उसकी आखों के सामने ही अग्नि में कूदकर अपने प्राणों का त्याग करेगीं। अग्नि में प्रवेष करते समय वेदावती ने कहा कि रावण ने इस जंगल में उन्हें अपमानित किया है वो दोबारा से जन्म लेकर उसके विनाष का कारण बनेगीं। वो वेदावती ही थीं जो सीता के रुप में जन्मीं और राम जी के माध्यम से रावण के विनाष का कारण बनी। जब वेदावती का जन्म सीता जी के रुप में हुआ तो वे मिथिला नरेष राजा जनक को उनकें खेतों में जुताई करते समय भूमि पर लेटी हुई मिली। उनकी दैविक सुंदरता से प्रभावित होकर राजा जनक ने उन्हें अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। देवी सीता को जानकी, वैदही, मैथली तथा और अन्य नामों से भी जाना जाता है। वे राजा जनक को भूमि पर पड़ी हुई मिली थी इसलिए उन्हें भूदेवी की संतान भी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>अशोक वाटिका और अटूट मर्यादा का प्रतीक</h2><div>रावण की अशोक वाटिका में बंदी होने के बाद भी मां सीता के मन में जरा भी डर नहीं था। जब रावण अपने वैभव का प्रदर्शन कर उन्हें डराने का प्रयास करता, तब वह कभी उसकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखती थीं। उन्होंने अपने और रावण के बीच केवल एक ‘तिनके’ यानी घास के छोटे से टुकड़े को ओट की तरह रखा था। यह मामूली सा तिनका असल में उनकी अटूट मर्यादा और चारित्रिक बल का सबसे बड़ा प्रतीक था। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब इंसान अपने धर्म और सच्चाई पर अडिग रहता है, तो दुनिया की कोई भी बड़ी ताकत उसे विचलित नहीं कर सकती। मां सीता की यह दृढ़ता आज भी हमें अपने मूल्यों पर टिके रहने की प्रेरणा देती है।</div><div><br></div><h2>सीता नवमी पर ऐसे करें पूजा, होंगे लाभान्वित&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धालु माता सीता की मूर्ति या चित्र की तथा राम-सीता की पूजा करते हैं। व्रत, कथा पाठ और हवन का आयोजन भी किया जाता है। कई जगहों पर रामायण का पाठ और भजन कीर्तन होते हैं। पंडितों&nbsp; शनिवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और इसके बाद व्रत-पूजा का संकल्प लें। शुभ मुहूर्त से पहले पूजा की पूर तैयारी कर लें। शुभ मुहूर्त शुरू होने पर भगवान श्रीराम के साथ देवी सीता का चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें। सबसे पहले चित्र पर कुमकुम से तिलक लगाएं। चित्र पर फूलों की माला पहनाएं और शुद्ध घी का दीपक लगाएं। अबीर, गुलाल, चावल, फूल, रोली, फल आदि चीजें भगवान को एक-एक करके चढ़ाएं। भगवान श्रीराम को सफेद और देवी सीता को लाल वस्त्र अर्पित करें। बिंदी, काजल, चूड़ी, मेहंदी आदि चीजें भी देवी सीता को अर्पित करें। पूजा के बाद फल व अन्य चीजों का भोग भगवान को लगाएं और आरती करें। संभव हो तो कुछ देर देवी सीता के मंत्रों का जाप भी करें। सीता नवमी पर इस तरह पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। इस दिन गरीबों को दान देने का भी विशेष महत्व है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 11:14:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sita-navami-symbolizes-sacrifice-feminine-power-devotion-and-unwavering-virtue</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sita Navami 2026: घर पर कैसे करें मां सीता की पूजा? जानें Step-by-Step Puja Vidhi और शुभ मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/how-to-worship-goddess-sita-at-home-learn-step-by-step-puja-method-and-auspicious-time]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल वैशाख माह की नवमी तिथि को सीता नवमी का पर्व मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 25 अप्रैल 2026 को सीता नवमी का पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व आस्था और श्रद्धा का विशेष प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन मां सीता प्राकट्य हुआ था। इस दिन व्रत किया जाता है और श्रीराम व मां सीता की विधिविधान से पूजा की जाती है। विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन की खुशहाली के लिए व्रत और पूजा करती हैं। तो आइए जानते हैं सीता नवमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की शुरुआत 24 अप्रैल 2026 की शाम 07:21 मिनट से होगी। वहीं इस तिथि की समाप्त आज यानी की 25 अप्रैल 2026 की शाम 06:27 मिनट पर होगी। मान्यता के मुताबिक मां सीता का जन्म दोपहर के समय हुआ था। इस वजह से सीता नवमी 25 अप्रैल 2026 को मनाया जा रहा है। वहीं आज पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:01 मिनट से दोपहर 01:38 मिनट तक रहेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-ganges-holds-special-significance-on-ganga-saptami" target="_blank">Ganga Saptami 2026: गंगा सप्तमी पर गंगा स्नान का है विशेष महत्व</a></h3><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर पूरे श्रद्धाभाव से पूजा का संकल्प लें। पूजा के लिए साफ चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। इस चौकी पर श्रीराम और मां सीता की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर कलश स्थापना करें और इसमें सिंदूर और अक्षत आदि डालकर विधिपूर्वक पूजा करें।</div><div><br></div><div>अब मां सीता की पूजा करें, मां सीता को चावल, पुष्प, सिंदूर, माला, वस्त्र और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें और भोग लगाएं। फिर श्रीराम की पूजा करें और उनको फूल, चंदन, अक्षत, माला और प्रसाद आदि अर्पित करें। पूजा के समय घी का दीपक जलाएं और धूप अर्पित करें। जिससे वातावरण सकारात्मक और पवित्र बना रहे।</div><div><br></div><div>इसके बाद सीता चालीसा, मंत्रों और व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। इससे व्यक्ति को पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। वहीं पूजा के अंत में भगवान श्रीराम और मां सीता की आरती करें। वहीं पूजा के अंत में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और व्रत का समापन करें।</div><div><br></div><h2>आरती&nbsp;</h2><div>आरती श्री जनक दुलारी की ।</div><div>सीता जी रघुवर प्यारी की ॥</div><div><br></div><div>जगत जननी जग की विस्तारिणी,</div><div>नित्य सत्य साकेत विहारिणी,</div><div>परम दयामयी दिनोधारिणी,</div><div>सीता मैया भक्तन हितकारी की ॥</div><div><br></div><div>आरती श्री जनक दुलारी की ।</div><div>सीता जी रघुवर प्यारी की ॥</div><div><br></div><div>सती श्रोमणि पति हित कारिणी,</div><div>पति सेवा वित्त वन वन चारिणी,</div><div>पति हित पति वियोग स्वीकारिणी,</div><div>त्याग धर्म मूर्ति धरी की ॥</div><div><br></div><div>आरती श्री जनक दुलारी की ।</div><div>सीता जी रघुवर प्यारी की ॥</div><div><br></div><div>विमल कीर्ति सब लोकन छाई,</div><div>नाम लेत पवन मति आई,</div><div>सुमीरात काटत कष्ट दुख दाई,</div><div>शरणागत जन भय हरी की ॥</div><div><br></div><div>आरती श्री जनक दुलारी की ।</div><div>सीता जी रघुवर प्यारी की ॥</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 10:19:41 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ganga Saptami 2026: गंगा सप्तमी पर गंगा स्नान का है विशेष महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-ganges-holds-special-significance-on-ganga-saptami]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज गंगा सप्तमी है, हिन्दू धर्म में गंगा सप्तमी बहुत पवित्र एवं खास मानी जाती है। वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है, गंगा सप्तमी को गंगा जयंती या गंगा पूजन के नाम से भी जाना जाता है तो आइए हम आपको गंगा सप्तमी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें गंगा सप्तमी के बारे में&nbsp;</h2><div>सनातन धर्म में वैशाख माह का खास महत्व है। गंगा सप्तमी का त्यौहार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन मनाया जाता है. विशेष रूप से गंगा सप्तमी का पर्व उत्तर भारत में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को जानहु ऋषि के कान में प्रवाहित होने की वजह से इसे जानहु सप्तमी भी कहा जाता है। मां गंगा जानहु ऋषि की पुत्री थी इसलिए इन्हें जान्हवी भी कहते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ही मां गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में समाई थीं। इसलिए इस दिन को गंगा जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। गंगा और शिव का संबंध अटूट है, इसीलिए गंगा सप्तमी पर शिवलिंग का विशेष अभिषेक करने से साधक को न केवल शिव जी की, बल्कि मां गंगा की भी कृपा मिलती है। इस दिन पूजा के दौरान गंगा चालीसा का पाठ जरूर करें। इस बार 23 अप्रैल को गंगा सप्तमी मनाई जाएगी।</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास&nbsp;</h2><div>हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, देवी गंगा पहली बार गंगा दशहरा के दिन धरती पर उतरी थीं, लेकिन ऋषि जह्नु ने सारा गंगा जल पी लिया। तब सभी देवताओं और भागीरथ ने ऋषि जह्नु से गंगा को छोड़ने का अनुरोध किया। इसके बाद गंगा सप्तमी के दिन देवी गंगा फिर से धरती पर आईं और इसीलिए इस दिन को जह्नु सप्तमी भी कहा जाता है।</div><div><br></div><div>पुराणों में गंगा सप्तमी से जुड़ी एक अन्य कथा भी प्रचलित है, इस कथा के अनुसार एक बार, कोसल के राजा भागीरथ परेशान थे क्योंकि उनके पूर्वज बुरे कर्मों के पापों से पीड़ित थे। भागीरथ चाहते थे कि वे इससे मुक्त हों, इसलिए उन्होंने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और भगवान ब्रह्मा ने उन्हें आश्वासन दिया कि गंगा पृथ्वी पर आएंगी, उनके पूर्वजों की आत्मा को शुद्ध करेंगी। लेकिन वह जानते थे कि देवी गंगा का प्रवाह सब कुछ नष्ट कर सकता है, तब ब्रह्मा जी ने भागीरथ को भगवान शिव की पूजा करने के लिए कहा क्योंकि वे ही गंगा के प्रवाह को नियंत्रित कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया। इस शुभ दिन देवी गंगा पृथ्वी पर उतरीं, इसलिए गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी पर शिवलिंग पर जरूर चढ़ाएं ये चीजें, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन चांदी या तांबे के लोटे में गंगाजल भरकर शिवलिंग पर अर्पित करें। ऐसा करने से साधक को मोक्ष और मानसिक शांति मिलती है। शिवलिंग पर गंगाजल में थोड़े काले तिल मिलाकर चढ़ाने से पितृ दोष शांत होता है और पुराने रोगों से मुक्ति मिलती है। इस दिन शिवलिंग पर 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते हुए तीन दल वाला चिकना बिल्व पत्र चढ़ाएं। इससे कार्यक्षेत्र में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। महादेव को शमी बहुत प्रिय है। ऐसे में गंगा सप्तमी पर शमी चढ़ाने से शनि दोष के बुरे प्रभाव कम होते हैं। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर सफेद चंदन का लेप लगाएं। इससे आर्थिक तंगी दूर होती है और घर में समृद्धि आती है।</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी पर ऐसे करें पूजा&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार गंगा सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करें। अगर गंगा स्नान न हो पाएं तो घर में नहाने के पानी में गंगाजल में मिलाकर स्नान करें। इसके बाद मां गंगा की तस्वीर पर या गंगा नदी में फूल, सिंदूर, अक्षत, गुलाल,लाल फूल, लाल चंदन अर्पित कर दें। इसके बाद घी का दीपक जलाकर आरती करें और जीवन में सुख और शांति के लिए मां गंगा से प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगा सप्तमी के दिन गंगा स्नान करने से इंसान को सभी पापों से मटकी मुक्ति हैं। पापों से मुक्ति मिलने के साथ रोगों से छुटकारा मिलता है और दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। सुबह स्नानादि के बाद साफ वस्त्र धारण करें। मंदिर या घर के शिवलिंग के सामने उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। सबसे पहले जल से, फिर पंचामृत से और अंत में शुद्ध गंगाजल की धार बनाते हुए महादेव का अभिषेक करें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/maa-ganga-came-to-earth-on-this-day-know-auspicious-time-for-holy-dip-and-pitru-shanti" target="_blank">Ganga Saptami 2026: इस दिन धरती पर आईं थीं मां गंगा, जानें Holy Dip और पितृ शांति का मुहूर्त</a></h3><h2>गंगा सप्तमी पर इन मंत्रों का करें जाप&nbsp;</h2><div>-&nbsp; ॐ नमः शिवाय॥</div><div>- गंगाधरय नमः तुभ्यं, संस्थितोऽसि जटाधरे। अर्घ्यं गृहाण देवेश, गंगापुत्र नमोऽस्तु ते॥</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी पर दान का है खास महत्व</h2><div>पंडितों के अनुसार गंगा सप्तमी पर पूजा के बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को जल, सत्तू और फल का दान करें। ऐसा करने से पूजा का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। साथ ही शिव कृपा हमेशा के लिए प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा सप्तमी के दिन गंगा चालीसा का पाठ करने से जातक के जाने-अनजाने में हुए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही मां गंगा प्रसन्न होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। आइए पढ़ते हैं गंगा चालीसा।</div><div><br></div><h2>जानें गंगा दशहरा का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>हिन्दू पंचांग के अनुसार गंगा सप्तमी तिथि का आरंभ 22 अप्रैल को रात में 10 बजकर 50 मिनट पर होगा और 23 अप्रैल को रात में 8 बजकर 50 मिनट पर तिथि समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, सपत्मी तिथि 23 अप्रैल को रहने के कारण इसी दिन गंगा सपत्मी का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन कई लोग व्रत और पूजा भी करते हैं।</div><div><br></div><h2>जानें गंगा सप्तमी का महत्व के बारे में&nbsp;</h2><div>पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। लेकिन, मां गंगा का वेग इतना तेज था कि अगर वह सीधे पृथ्वी पर आती तो काफी परेशानी हो सकती थी। तब मां गंगा के वेग को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में समाहित कर लिया था। मान्यता है कि गंगा सप्तमी के दिन गंगा में स्नान करने से अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही पितरों की शांति और तर्पण के लिए भी यह दिन अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।</div><div><br></div><h2>गंगा सप्तमी के दिन ये करें, होंगे लाभान्वित&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन सुबह जल्दी उठे इसके बाद गंगा में स्नान करें। अगर गंगा में स्नान नहीं कर पा रहें हैं तो घर में ही पानी में थोड़ी गंगाजल मिलाकर आप स्नान कर सकते हैं। इसके बाद एक तांबे के लौचे में पानी लें और उसमें थोड़ा गंगा जल मिलाकर अर्घ्य दें। इसके बाद मंदिर में बैठकर मां गंगा के मंत्र ओम नमो गंगायै विश्वरुपिणी नारायणी नमो नम:का जप करें। इसके अलावा इस दिन जरुरतमंद लोगों को मौसमी फल या बाकी चीजों का दान जरुर करें। इस दिन दान करने से दोगुना फल प्राप्त होता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 10:21:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-ganges-holds-special-significance-on-ganga-saptami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ganga Saptami 2026: सिर्फ कुछ घंटे का Auspicious मुहूर्त, जानें स्नान-पूजन का Perfect Time और विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/auspicious-time-of-just-few-hours-know-perfect-time-and-method-of-bathing-and-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में गंगा सप्तमी पर्व का विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन धरती पर मां गंगा प्रकट हुई थीं। इस बार 23 अप्रैल 2026 को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस तिथि पर गंगा की पूजा-अर्चना करने और स्नान आदि करने से जातक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। वहीं पितरों को शांति मिलती है और जीवन में सुख-शांति आती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको गंगा सप्तमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक वैखाश माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि की शुरूआत 22 अप्रैल की रात 10:48 मिनट पर शुरू हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 23 अप्रैल की रात 08:00 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं उदयातिथि के हिसाब से 23 अप्रैल 2026 को गंगा सप्तमी का पर्व मनाया जा रहा है।</div><div><br></div><div>आज गंगा सप्तमी का शुभ मुहूर्त सुबह 04:20 मिनट से लेकर सुबह 05:04 मिनट तक रहेगा। इस दौरान गंगा में स्नान करना शुभ होता है। वहीं अगर आप गंगा स्नान के लिए नहीं जा सकते हैं। तो आप घर पर नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। इससे मां गंगा की कृपा प्राप्त होगी। वहीं गंगा पूजन का शुभ मुहू्र्त सुबह 11:01 मिनट से लेकर दोपहर 01:38 मिनट तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर तांबे के लोटे में जल लेकर इसमें गंगाजल मिलाएं और सूर्यदेव को अर्घ्य दें। अब मंदिर में बैठकर मन ही मन मां गंगा का ध्यान करें। वहीं 'ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिणी नारायणी नमो नम:' मंत्र का 108 बार जाप करें। वहीं इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान जरूर दें।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 09:40:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/auspicious-time-of-just-few-hours-know-perfect-time-and-method-of-bathing-and-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Akshaya Tritiya 2026: Akshaya Tritiya पर Gold खरीदने का महामुहूर्त, जानें मां लक्ष्मी की Puja का Best Time]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/great-time-to-buy-gold-on-akshaya-tritiya-know-best-time-to-worship-goddess-lakshmi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धार्मिक दृष्टि से आज यानी की 19 अप्रैल 2026 का दिन बेहद खास है। आज यानी की 19 अप्रैल 2026 को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जा रहा है। इस तिथि पर किया गया कोई भी शुभ कार्य दान, पूजा या व्रत आदि कभी व्यर्थ नहीं जाता है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यानी इसका फल अक्षय यानी की अनंत काल तक मिलता रहता है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 19 अप्रैल की सुबह 10:49 मिनट से हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 20 अप्रैल 2026 की सुबह 07:27 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया मनाई जा रही है।</div><div><br></div><h2>शुभ ऊर्जा का प्रभाव</h2><div>बता दें कि 19 अप्रैल का दिन धार्मिक दृष्टि से इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन उस तिथि का प्रवेश हो रहा है, जिसको सनातन धर्म में सबसे शुभ दिनों में गिना जाता है। आज के दिन सोना खरीदना शुभ माना जाता है। वहीं अक्षय तृतीया पर दान-पुण्य करने का भी विशेष महत्व होता है। क्षय तृतीया से जुड़ी तिथि के प्रवेश के साथ ही शुभ ऊर्जा का प्रभाव बढ़ता है। यह दिन संकल्प, आध्यात्मिक तैयारी और सकारात्मक शुरूआत के लिए उत्तम माना जाता है।</div><div><br></div><h2>धार्मिक महत्व</h2><div>हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया का पर्व पवित्र और शुभ माना जाता है। 'अक्षय' शब्द का अर्थ है, 'जो कभी समाप्त न हो।' इस दिन किए गए दान-पुण्य, जप, तप, पूजा और शुभ कार्यों का फल जीवनभर बढ़ता रहता है और वह कभी नष्ट नहीं होता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 10:20:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/great-time-to-buy-gold-on-akshaya-tritiya-know-best-time-to-worship-goddess-lakshmi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Parshuram Jayanti 2026: 19 अप्रैल को परशुराम जयंती, जानें Puja का शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/parshuram-jayanti-on-april-19-know-auspicious-time-and-complete-puja-method]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। लेकिन भगवान परशुराम का जन्म संध्या काल यानी की प्रदोष काल में हुआ था। परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। इस बार आज यानी की 19 अप्रैल को परशुराम जयंती मनाई जा रही है। भगवान परशुराम ने अधर्म और बुराई को खत्म करने के लिए धरती पर जन्म लिया था। उन्होंने अत्याचारी और अधर्मी राजाओं का नाश किया था और पृथ्वी पर फिर से सत्य और धर्म का मार्ग स्थापित किया था।</div><div><br></div><h2><span style="font-size: 1rem;">तिथि और मुहूर्त</span></h2><div><span style="font-size: 1rem;">हिंदू पंचांग के मुताबिक वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को परशुराम जयंती मनाई जाती है। इस बार यह पर्व 19 अप्रैल 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन जो भी जातक व्रत करता है और पूजा-पाठ करते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह दिन भगवान परशुराम के दिव्य कार्यों को याद करने का होता है। इस दिन तृतीया तिथि की शुरूआत 19 अप्रैल की सुबह 10:49 मिनट से हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 20 अप्रैल की सुबह 07:27 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी।</span></div><div><br></div><h2>पूजा विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। अब भगवान परशुराम की प्रतिमा या तस्वीर को स्थापित करें। इसके बाद भगवान परशुराम को चंदन का तिलक करें। इसके बाद पुष्प, अक्षत, धूप-दीप और तुलसी दल अर्पित करें। फिर फल या मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद परशुराम स्तुति या मंत्रों का पाठ करें और पूजा के अंत में आरती करें। वहीं इस दिन दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। वह अन्याय के नाश के लिए आए थे। मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से साहस, आत्मविश्वास और पराक्रम में वृद्धि होती है। अक्षय तृतीया पर होने की वजह से इस दिन की पूजा का फल कभी नष्ट नहीं होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 10:05:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/parshuram-jayanti-on-april-19-know-auspicious-time-and-complete-puja-method</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया पर किए गए दान का मिलता है अधिक फल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/donations-made-on-akshaya-tritiya-yield-greater-rewards]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्षय तृतीया को आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। भारतवर्ष में अक्षय तृतीया सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र, शुभ और पुण्यदायी पर्व है और इस दिन को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है तो आइए हम आपको अक्षय तृतीया का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें अक्षय तृतीया के बारे में&nbsp;</h2><div>सनातन परंपरा में अक्षय तृतीया उन पर्वों में से एक है जो जीवन-दर्शन का जीवंत संदेश देती हैं। अक्षय तृतीया को आखा तीज या अक्ती तीज के नाम से जाना जाता है। इस पर्व में अक्षय शब्द का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, अर्थात् जो सदा बना रहे, जो अनंत हो। इसलिए इस दिन किया गया जप, तप, दान, सेवा, हवन या कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल प्रदान करने वाला माना गया है। अक्षय तृतीया को हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और मंगलकारी पर्व माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन किया गया दान, जप, तप और खरीदारी कभी व्यर्थ नहीं जाती बल्कि उसका फल कई गुना बढ़कर मिलता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। इस दिन किए गए शुभ कार्यों का फल कभी समाप्त नहीं होता। यही कारण है कि इसे चिरंजीवी और सर्वसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया खासतौर पर सोना खरीदने की परंपरा इसलिए प्रचलित है क्योंकि सोना धन-समृद्धि और स्थायी संपत्ति का प्रतीक माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन खरीदा गया सोना परिवार में सुख-समृद्धि और आर्थिक मजबूती लेकर आता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-is-a-day-of-infinite-prosperity" target="_blank">Akshaya Tritiya 2026: अनंत समृद्धि का दिन है अक्षय तृतीया</a></h3><h2>अक्षय तृतीया का पौराणिक महत्व भी है खास&nbsp;</h2><div>पौराणिक कथाओं के अनुसार अक्षय तृतीया का दिन कई दिव्य घटनाओं से जुड़ा हुआ है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने परशुराम अवतार लिया था, इसलिए इसे परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। त्रेतायुग का आरंभ भी इसी तिथि से माना जाता है, जिससे इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। इस दिन चारधाम में से एक धाम श्रीबदरीनाथ के कपाट भी खुलते हैं। अक्षय शब्द का अर्थ होता है- जो कभी समाप्त न हो। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए दान, जप, तप और पुण्य कर्मों का फल कभी खत्म नहीं&nbsp; होता, बल्कि लगातार बढ़ता रहता है। इस दिन स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व होता है। खासकर जल, सत्तू, वस्त्र और अन्न का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। पितरों के लिए किए गए कर्म भी इस दिन अक्षय फल प्रदान करते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>अक्षय तृतीया पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ</h2><div>पंडितों के अनुसार अक्षय तृतीया का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन पुण्य के कार्य करें। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर समुद्र, गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि नदी में स्नान करना संभव न हो तो घर में ही स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की शांत मन से पूजा करनी चाहिए। इस दिन लक्ष्मी-नारायण की पूजा सफेद या पीले कमल अथवा गुलाब के पुष्पों से करना शुभ माना गया है। नैवेद्य में गेहूं, जौ, चने का सत्तू, मिश्री, नीम की कोपल, ककड़ी और भीगी हुई चने की दाल अर्पित की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सत्तू का सेवन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह शरीर को शीतलता प्रदान करता है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है।</div><div><br></div><h2>जानें अक्षय तृतीया का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार तृतीया तिथि 19 अप्रैल को सुबह 10:49 बजे से शुरू होकर 20 अप्रैल सुबह 07:27 बजे तक रहेगी। चूंकि 20 अप्रैल को सूर्योदय के समय तृतीया तिथि विद्यमान है, इसलिए इसी दिन व्रत, दान और पूजा करना अधिक शुभ रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजा और खरीदारी के शुभ समय का भी रखें ध्यान</h2><div>अक्षय तृतीया पर खरीददारी के लिए ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:10 से 04:54 तक एवं पूजा मुहूर्त सुबह 05:25 से 07:27 तक है। सोना खरीदने के लिए सूर्योदय से 07:27 बजे तक का समय विशेष शुभ है, हालांकि अक्षय तृतीया का पूरा दिन मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल रहेगा।</div><div>&nbsp;</div><h2>अक्षय तृतीया पर दान-पुण्य का है विशेष महत्व</h2><div>अक्षय तृतीया के दिन गंगा स्नान, जप, तप, हवन और दान का विशेष महत्व है। बिहार में सत्तू, गुड़, मिट्टी का घड़ा, पंखा और फल दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन किया गया दान जातक के संचित पापों का क्षय करता है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>अक्षय तृतीयायां दानं, पुण्यं च न क्षीयते।</b></div><div>अर्थात् अक्षय तृतीया के दिन किया गया दान और अर्जित किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। सनातन परंपरा में ऐसा माना जाता है कि इस दिन दान करने से धन का ह्रास नहीं होता बल्कि दान से धन-संपदा में वृद्धि होती है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया पर अन्न का दान का विशेष महत्व है। अन्नदानम् परं दानम् अर्थात् अन्न को धार्मिक ग्रंथों में परब्रह्म कहा गया है। अक्षय तृतीया पर किसी भूखे को भोजन कराना साक्षात नारायण की सेवा के समान है। ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होने के कारण इस दिन सत्तू, गुड़ और शीतल जल के दान का विशेष महत्व है। इस दिन जल दान का भी है खास महत्व । प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ी मानवता है। इस दिन मिट्टी के घड़े (कुंभ) में जल भरकर दान करने से पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है।</div><div>&nbsp;</div><h2>दान में अन्य सामग्रियों का भी है खास महत्व&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन निर्धनों को तन ढकने के लिए वस्त्र दान दें। ब्राह्मणों को गौदान करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इस तपती धूप में राहगीरों को जूते या चप्पल दान करना अत्यंत पुण्यकारी होता है।सअक्षय तृतीया पर दान केवल वस्तु का त्याग नहीं है, बल्कि अहंकार का विसर्जन है। यह आत्मा को निर्मल करता है और कर्मों की श्रृंखला में ऐसे बीज बोता है, जिनका फल जन्म-जन्मांतर तक अक्षय रहता है।</div><div><br></div><h2>अक्षय तृतीया का पौराणिक उद्भव भी है रोचक</h2><div>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह तिथि कालचक्र के परिवर्तन की साक्षी है। पौराणिक कथाओं और इतिहास के अनुसार इस दिन ये घटनाएं हुईं हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div><b>युगादि तिथि: </b>हिंदू समय गणना के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन ही सतयुग का समापन हुआ था और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था।</div><div>&nbsp;</div><div><b>परशुराम जयंती: </b>भगवान विष्णु के छठे अवतार, शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम का प्राकट्य इसी तिथि को हुआ था।</div><div>&nbsp;</div><div><b>गंगा अवतरण: </b>भगीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा इसी दिन स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, जिससे समस्त जीवों का उद्धार संभव हुआ।</div><div>&nbsp;</div><div><b>अक्षय पात्र की प्राप्ति:</b> महाभारत काल में पांडवों के वनवास के दौरान, सूर्यदेव ने उन्हें अक्षय पात्र प्रदान किया था, जिससे उन्हें कभी अन्न की कमी नहीं हुई।</div><div>&nbsp;</div><div><b>सुदामा और कृष्ण का मिलन:</b> द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र सुदामा की दरिद्रता का नाश इसी तिथि को किया था।</div><div>&nbsp;</div><h2>अक्षय तृतीया पर करें ये उपाय, होंगे लाभान्वित&nbsp;&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस पावन दिवस पर ये धार्मिक कार्य विशेष रूप से किए जाते हैं, इन कार्यों को करने से भक्तों को बहुत लाभ होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस दिन श्री लक्ष्मीनारायण की विधिपूर्वक पूजा करें।</div><div>धन के देवता कुबेर की पूजा करें।</div><div>गंगा या अन्य पवित्र तीर्थों में स्नान करें।</div><div>हवन एवं वेद-स्वाध्याय करें।</div><div>स्वर्ण, आभूषण या सिक्कों का क्रय करें।</div><div>विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य करें।&nbsp;</div><div>ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को दान करें।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:45:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/donations-made-on-akshaya-tritiya-yield-greater-rewards</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Parashuram Janmotsav 2026: क्यों भगवान विष्णु के Avatar ने 21 बार किया था पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-did-lord-vishnu-avatar-render-the-earth-free-of-kshatriyas-21-times]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान परशुराम का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रदोषकाल के समय हुआ था। पौरागिक ग्रंथों में बताया गया है कि पिता जमदग्नि और माता रेणुका ने तो अपने पांचवें पुत्र का नाम 'राम' ही रखा था, लेकिन तपस्या के बल पर भगवान शिव को प्रसन्न करके उनके दिव्य अस्त्र 'परशु' प्राप्त करने के कारण वे राम से परशुराम हो गए। भगवान परशुराम भगवान विष्णु के अवतार होने के साथ ही ब्राह्मण जाति के कुल गुरु भी हैं इसलिए इनकी जयंती देशभर में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भगवान परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे, पिता की आज्ञा से इन्होंने अपनी माता का सिर काट डाला था, लेकिन पुनः पिता के आशीर्वाद से इनकी माता की स्थिति यथावत हो गई। दरअसल कथाओं के अनुसार हुआ यह था कि एक बार माता रेणुका स्नान के लिए नदी किनारे गईं, संयोग से वहीं पर राजा चित्ररथ भी स्नान करने आया था, राजा चित्ररथ सुंदर और आकर्षक था। राजा को देखकर रेणुका भी आसक्त हो गईं, किंतु ऋषि जमदग्नि ने अपने योगबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया। उन्होंने आवेशित होकर अपने पांचों पुत्रों को अपनी मां का सिर काटने का आदेश दिया। किंतु परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों ने मां के स्नेह के बंधकर वध करने से इंकार कर दिया, लेकिन परशुराम ने पिता के आदेश पर अपनी मां का सिर काटकर अलग कर दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-special-this-is-the-luckiest-day-of-the-year" target="_blank">Akshaya Tritiya Special: यह है साल का सबसे Lucky Day, बिना पंचांग देखे करें विवाह और गृह प्रवेश</a></h3><div>क्रोधित ऋषि जमदग्नि ने आज्ञा का पालन न करने पर परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों को चेतनाशून्य हो जाने का शाप दे दिया, वहीं परशुराम को खुश होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ वर मांगा। जिसमें उन्होंने तीन वरदान मांगे– पहला, अपनी माता को फिर से जीवन देने और माता को मृत्यु की पूरी घटना याद न रहने का वर मांगा। दूसरा, अपने चारों चेतनाशून्य भाइयों की चेतना फिर से लौटाने का वरदान मांगा। तीसरा वरदान स्वयं के लिए मांगा जिसके अनुसार उनकी किसी भी शत्रु से या युद्ध में पराजय न हो और उनको लंबी आयु प्राप्त हो।</div><div><br></div><div>श्रीजमदग्नि जी के आश्रम में एक कामधेनु गौ थी, जिसकी अलौकिक ऐश्वर्य शक्ति को देखकर कार्तवीर्यार्जुन उसे प्राप्त करने के लिए दुराग्रह करने लगा था। अंत में उसने गौ को हासिल करने के लिए बल का प्रयोग किया और उसे माहिष्मती ले आया। किंतु जब परशुराम जी को यह बात विदित हुई तो उन्होंने कार्तवीर्यार्जुन तथा उसकी सारी सेना का विनाश कर डाला। जिस पर पिता ने परशुराम जी के इस चक्रवर्ती सम्राट के वध को ब्रह्म हत्या के समान बताते हुए उन्हें तीर्थ सेवन की आज्ञा दी। वे तीर्थ यात्रा पर चले गये, वापस आने पर माता−पिता ने उन्हें आशीर्वाद दिया।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर सहस्त्रार्जुन के वध से उसके पुत्रों के मन में प्रतिशोध की आग जल रही थी। एक दिन अवसर पाकर उन्होंने छद्म वेष में आश्रम आकर जमदग्नि का सिर काट डाला और उसे लेकर भाग निकले। जब परशुराम जी को यह समाचार ज्ञात हुआ तो वे अत्यन्त क्रोधावेश में आग बबूला हो उठे और पृथ्वी को क्षत्रिय हीन कर देने की प्रतिज्ञा कर ली तथा 21 बार घूम−घूमकर पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया। फिर पिता के सिर को धड़ से जोड़कर कुरुक्षेत्र में अन्त्येष्टि संस्कार किया। पितृगणों ने इन्हें आशीर्वाद दिया और उन्हीं की आज्ञा से इन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी प्रजापति कश्यपजी को दान में दे दी और महेन्द्राचल पर तपस्या करने चले गये।</div><div><br></div><div>सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव−धनुष भंग किये जाने पर वह महेन्द्राचल से शीघ्रतापूर्वक जनकपुर पहुंचे, किंतु इनका तेज श्रीराम में प्रविष्ट हो गया और ये अपना वैष्णव धनु उन्हें देकर पुनः तपस्या के लिए महेन्द्राचल वापस लौट गये। मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम के क्रोध का सामना गणेश जी को भी करना पड़ा था। दरअसल उन्होंने परशुराम जी को शिव दर्शन से रोक दिया था। क्रोधित परशुराम जी ने उन पर परशु से प्रहार किया तो उनका एक दांत नष्ट हो गया। इसी के बाद से गणेश जी एकदंत कहलाये।</div><div><br></div><div>भगवान परशुराम चिरजीवी हैं। ये अपने साधकों−उपासकों तथा अधिकारी महापुरुषों को दर्शन देते हैं। इनकी साधना−उपासना से भक्तों का कल्याण होता है। पौराणिक मान्यता है कि वे आज भी मन्दराचल पर्वत पर तपस्यारत हैं। ऋषि संतान परशुराम ने अपनी प्रभुता व श्रेष्ठवीरता की आर्य संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी। शैव दर्शन में उनका अद्भुत उल्लेख है जो सभी शैव सम्प्रदाय के साधकों में स्तुत्य व परम स्मरणीय है। देश में अनेक स्थानों पर भगवान जमदग्नि जी के तपस्या स्थल एवं आश्रम हैं, माता रेणुका जी के अनेक क्षत्र हैं, प्रायः रेणुका माता के मंदिर में अथवा स्वतंत्र रूप से परशुराम जी के अनेक मंदिर भारत भर में हैं, जहां उनकी शांत, मनोरम तथा उग्र रूप मूर्ति के दर्शन होते हैं।</div><div><br></div><div>परशुराम दरअसल 'राम' के रूप में सत्य के संस्करण हैं, इसलिए नैतिक-युक्ति का अवतरण हैं। भगवान परशुराम को उनके हठी स्वभाव, क्रोध और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए याद किया जाता है। उन्होंने अपने जीवन के लिए अपने ही नियम बना रखे थे। परशुराम जयंती के शुभ दिन उनके चरित्र का स्मरण और अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। भगवान शिव, परशुराम जी के गुरु हैं। वह तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरुष हैं। न्याय के पक्षधर होने के कारण भगवान परशुराम जी बाल अवस्था से ही अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे। उन्होंने दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की निरंतर सहायता एवं रक्षा की है।</div><div><br></div><div>शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:42:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-did-lord-vishnu-avatar-render-the-earth-free-of-kshatriyas-21-times</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Akshaya Tritiya Special: यह है साल का सबसे Lucky Day, बिना पंचांग देखे करें विवाह और गृह प्रवेश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-special-this-is-the-luckiest-day-of-the-year]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है। कहा जाता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी आदि कार्य किए जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>इस दिन पितरों को किया गया तर्पण या किसी भी प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करने वाला है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। मान्यता है कि यदि इस दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों के लिए सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सद्गुण प्रदान करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-is-a-day-of-infinite-prosperity" target="_blank">Akshaya Tritiya 2026: अनंत समृद्धि का दिन है अक्षय तृतीया</a></h3><div>अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित की जाती है। इसके बाद फल, फूल, बरतन तथा वस्त्र आदि ब्राह्मणों को दान के रूप में दिये जाते हैं। इस दिन ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।</div><div><br></div><div>यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, पंखे, खडाऊं, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस तिथि का कितना महत्व है यह इस बात से भी पता चलता है कि सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।</div><div><br></div><div>यह माना जाता है कि इस दिन ख़रीदा गया सोना कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार यह दिन सौभाग्य और सफलता का सूचक है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>अक्षय तृतीया व्रत कथा</h2><div><br></div><div>अक्षय तृतीया का महत्व युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था। तब श्रीकृष्ण बोले, 'राजन! यह तिथि परम पुण्यमयी है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है। इसी दिन से सतयुग का प्रारम्भ होता है। इस पर्व से जुड़ी एक प्रचलित कथा इस प्रकार है−</div><div><br></div><div>प्राचीन काल में सदाचारी तथा देव ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी से व्रत के माहात्म्य को सुना। कालान्तर में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया। विधिपूर्वक देवी देवताओं की पूजा की। गोले के लड्डू, पंखा, जल से भरे घड़े, जौ, गेहूं, नमक, सत्तू, दही, चावल, गुड़, सोना तथा वस्त्र आदि दिव्य वस्तुएं ब्राह्मणों को दान कीं। स्त्री के बार−बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म कर्म और दान पुण्य से विमुख न हुआ। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई। जैसा कि भगवान श्री विष्णु ने कहा था, मथुरा जाकर राजा ने बड़ी ही श्रद्धा के साथ वैसा ही किया और इस व्रत के प्रभाव से वह शीघ्र ही अपने पैरों को प्राप्त कर सका।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:33:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-special-this-is-the-luckiest-day-of-the-year</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Akshaya Tritiya 2026: अनंत समृद्धि का दिन है अक्षय तृतीया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-is-a-day-of-infinite-prosperity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे देश में समय-समय पर बहुत से त्यौहार मनाये जाते हैं। इसलिए हमारे देश को त्योहारों का देश भी कहते है। हिन्दू धर्मावलम्बियों के प्रमुख त्योहारों में से एक अक्षय तृतीया है जिसे हम आखा तीज भी कहते हैं। अक्षय तृतीया देश भर में हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले सबसे पवित्र और शुभ दिनों में से एक है। माना जाता है कि इस दिन से जो भी कार्य इस शुरू होता है वो हमेशा पूर्ण होता है। यह त्यौहार हर वर्ष वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष के तृतीया को आता है। इस वर्ष अक्षय तृतीया 22 अप्रैल को है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया को शादी का अबूझ मुहुर्त माना जाता हैं। क्योंकि इस दिन शुभ कार्य करने के लिए मुहूर्त नहीं देखना पड़ता। इसी कारण अक्षय तृतीया को बहुत अधिक शादियां होती हैं। अक्षय तृतीया का पर्व बसंत और ग्रीष्म के संधिकाल का महोत्सव है। इस तिथि में गंगा स्नान, पितरों का तिल व जल से तर्पण और पिंडदान भी पूर्ण विश्वास से किया जाता है जिसका फल भी अक्षय होता है। इस तिथि की गणना युगादि तिथियों में होती है। क्योंकि सतयुग की समाप्ती पर त्रेतायुग का आरंभ इसी तिथि से हुआ है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mysterious-nirai-mata-temple-in-chhattisgarh-open-for-5-hours-year-burns-its-own-divine-light" target="_blank">Nirai Mata Temple: Chhattisgarh का रहस्यमयी Nirai Mata मंदिर, साल में 5 घंटे खुलता है, खुद जलती है Divine Light</a></h3><div>माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में जन्म लिया था। इसीलिये इस दिन को परशुराम जयंती के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि आखा तीज के दिन राजा भागीरथ गंगा नदी को पृथ्वी पर लाये थे। अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु तथा उनकी धर्मपत्नी लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। आखा तीज के दिन ही देवी अन्नपूर्णा का जन्म भी हुआ था। यह वह दिन था जब भगवान कृष्ण ने अपनी सारी संपत्ति और सौभाग्य अपने गरीब मित्र सुदामा को दे दिया था। अक्षय तृतीया के दिन श्रद्धेय ऋषि वेद व्यास ने महाभारत की रचना शुरू की थी। और पुराणों के अनुसार यह दिन त्रेता युग की शुरुआत का प्रतीक है। जो मानव जाति के चार युगों या युगों में से दूसरा है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। हिंदू शास्त्रों और पुराणों के अनुसार चार युग का चक्र होता है, जिसे सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के नाम से जाना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन सतयुग जिसे इंसान के जीवन का सुनहरा दौर कहा जाता है वो समाप्त हो जाता है और त्रेतायुग शुरू हो जाता है। इसलिए अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। हिंदू परिवारों के लिए यह दिन बहुत ज्यादा महत्व रखता है।</div><div>&nbsp;</div><div>अक्षय शब्द का अर्थ होता है कभी न मिटने या कम होने होने वाला। संस्कृत में अक्षय (अक्षय) शब्द का अर्थ समृद्धि, आशा, खुशी, सफलता होता है। जबकि तृतीया का अर्थ है चंद्रमा का तीसरा चरण। इसका नाम हिंदू कैलेंडर में वैसाख के वसंत महीने के तीसरे चंद्र दिवस के नाम पर रखा गया है। इस त्योहार को हम अपनी भाषा में आखातीज नाम से भी जानते हैं। जिसका अर्थ होता है जो कभी खत्म ना होने वाला। इसलिए माना जाता है की यह दिन हमारे लिए वस्तुओं की खरीदारी का सबसे शुभ दिन माना जाता है। "अक्षय" शब्द का अर्थ होता है जो कभी खत्म न हो। इसी कारण इस दिन किए गए सभी अच्छे कार्यों, जैसे जप, यज्ञ, दान-पुण्य, का पुण्य कभी भी समाप्त नहीं होता। माना जाता है कि अक्षय तृतीया का दिन व्यक्ति को अनंत सुख और समृद्धि की प्राप्ति करता है। इस दिन जितने पुण्य किए जाए उतने हमें हमारे लिए कम है।</div><div>जैन धर्म में अक्षय तृतीया एक महत्वपूर्ण तिथि है जिसे दान और पुण्य कार्य करने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान ऋषभदेव (प्रथम तीर्थंकर) ने एक वर्ष की तपस्या के बाद गन्ने के रस से पारणा किया था इसलिए इस दिन को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता हैं। अक्षय तृतीया के दिन यूं तो आप किसी भी देवी-देवता की पूजा कर सकते हैं। लेकिन विशेष रूप से इस दिन माता लक्ष्मी, भगवान गणेश और धन के देवता कुबेर की पूजा करने का विधान है। अन्य त्योहारों की तरह इस त्यौहार में भी दीपक जलाते हैं। इस दिन किया गया परोपकार हमारे लिए जीवन को सुखी बना देता हैं। इसीलिए इस दिन लोग गरीबों को भोजन कराते हैं तथा उनकी सहायता करते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>माना जाता है कि इस दिन किए गए पुण्य हमारे लिए स्वर्ग में जगह बनाते हैं। इस दिन कई लोग जागरण रखकर हवन करते हैं तथा गरीबों को दान देते हैं। कई लोग अपने नए घर में&nbsp; मुहूर्त के हिसाब से प्रवेश करते हैं। अक्षय तृतीया का पौराणिक महत्व भी है। मान्यता है कि इसी दिन सतयुग और त्रेता युग का आरंभ हुआ था। द्वापर युग का समापन और महाभारत युद्ध का समापन भी इसी तिथि को हुआ था। देश के अनेक हिस्सों में इस तिथि का अलग-अलग महत्व है। जैसे उड़ीसा और पंजाब में इस तिथि को किसानों की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। तो बंगाल में इस दिन गणपति और लक्ष्मीजी की पूजा का विधान है।</div><div><br></div><div>इतना पवित्र पर्व होने के उपरांत भी इस दिन बड़ी संख्या में होने वाले बाल विवाह इस पर्व के महत्व को कम करते हैं। अबूझ सावा मानकर बड़ी संख्या में लोग अपने नाबालिक बच्चों की इस दिन शादी कर देते हैं। कम उम्र के बच्चों के विवाह रोकने के लिए इस दिन प्रशासन को विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं। राजस्थान सहित कई प्रदेशों में तो अक्षय तृतीया का दिन बाल विवाह के लिए बदनाम हो चुका है। विकास के दौर में बाल विवाह एक नासूर के समान है। देश में हर व्यक्ति को शिक्षित करने की मुहिम चल रही है। हर व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में बाल विवाह होना समाज के माथे पर एक कलंक के समान है।&nbsp;</div><div><br></div><div>देश में अक्षय तृतीया (आखा तीज) पर हर वर्ष हजारों की संख्या में बाल विवाह किए जाते हैं। तमाम प्रयासों के बाबजूद हमारे देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अन्त नही हो पा रहा है। भारत में बेटी-बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान के शुरू होने के बावजूद एक नाबालिग बेटी की जबर्दस्ती शादी करा दी जा रही है। बाल विवाह मनुष्य जाति के लिए एक अभिशाप है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर जगह बेटी बचावो बेटी पढ़ाओ का नारा देते हैं। देश के सभी प्रदेशों में बेटियां शिक्षित हो रही है। ऐसे में समाज को आगे आकर कम उम्र में लड़कियों के होने वाले बाल विवाह रुकवाने के प्रयास करने होंगे। ऐसे पवित्र दिन का महत्व बनाए रखने के लिए समाज को इस दिन होने वाली कुरीतियों पर रोक लगाकर एक सकारात्मक संदेश देना होगा। तभी सार्थकता बनी रह पाएगी।</div><div><br></div><div>रमेश सर्राफ धमोरा</div><div>(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:21:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/akshaya-tritiya-is-a-day-of-infinite-prosperity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vaishakh Amavasya 2026: वैशाख अमावस्या व्रत से जीवन में आती है सुख एवं समृद्धि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-vaishakh-amavasya-fast-brings-happiness-and-prosperity-into-one-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैशाख अमावस्या का शुभ दिन स्नान, पूजा, सूर्य को जल अर्पण और पितरों के लिए तर्पण करने के लिए खास माना जाता है। वैशाख अमावस्या पर दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। इस विशेष दिन पूजा और शांति विशेष लाभकारी होता है तो आइए हम आपको वैशाख अमावस्या का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें वैशाख अमावस्या के बारे में&nbsp;</h2><div>वैशाख मास में पड़ने वाली अमावस्या को वैशाख अमावस्या कहते हैं। वैशाख अमावस्या को हिंदू वर्ष का दूसरा महीना कहा जाता है। शास्त्रों में वैशाख अमावस्या को धर्म-कर्म, स्नान-दान और पितरों के तर्पण के लिए बेहद शुभ माना जाता है। हिंदू धर्म में वैशाख अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है, यह दिन पितरों से जुड़े कर्म, शुद्धि और दान के लिए खास तौर से महत्वपूर्ण माना जाता है। पंडितों के अनुसार यह तिथि पितरों को मोक्ष दिलाने वाली मानी जाती है। इसलिए शास्त्रों में वैशाख अमावस्या को पितरों को मोक्ष दिलाने वाली अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस माह से त्रेता युग की शुरुआत हुई थी इसलिए वैशाख अमावस्या का धार्मिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण होती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/surefire-solution-to-stress-and-anxiety-these-radha-rani-names-give-mental-peace" target="_blank">Radha Rani Naam Jap: Stress और Anxiety का अचूक उपाय, Radha Rani के ये नाम देंगे आपको Mental Peace</a></h3><h2>वैशाख अमावस्या पर इन कार्यों से मिलता है शुभ फल</h2><div>पंडितों के अनुसार वैशाख अमावस्या तिथि पर आप भगवान विष्णु की आराधना कर सकते हैं, जो विशेषफयदायी मानी गई है। इसके अलावा इस दिन पर गीता का पाठ करना और विष्णु सहस्रनाम जप करने से ग्रह दोष के अशुभ प्रभावों से राहत मिलती है।</div><div>&nbsp;</div><h2>वैशाख अमावस्या पर करें इन चीजों का दान</h2><div>वैशाख महीना गर्मी में आने के कारण इस समय बहुत गर्मी पड़ती है, इसलिए वैशाख महीने की अमावस्या पर आप जल, पंखा और घड़े का दान कर सकते हैं। यह दान पुण्यकारी माना जाता है। साथ ही इस दिन सूर्य देव की कृपा के लिए गुड़, गेहूं, तांबा और लाल वस्त्रों का दान कर सकते हैं। वहीं चंद्रमा के लिए सफेद चीजों जैसे दूध, चावल और सफेद वस्त्रों का दान करना उत्तम माना गया है।</div><div><br></div><h2>जानें वैशाख अमावस्या का शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>वैशाख अमावस्या के दिन सुबह का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:25 बजे से 5:09 बजे तक रहेगा, जो स्नान और पूजा के लिए बहुत शुभ होता है। सूर्योदय सुबह 5:54 बजे होगा। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:55 बजे से 12:47 बजे तक रहेगा, जो पूजा और दान के लिए अच्छा समय माना जाता है।</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या पर ये न करें, हो सकता है नुकसान&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार इस दिन कोई नया काम शुरू करने या बड़ी खरीदारी करने से बचें। यह दिन नई शुरुआत के बजाय पूजा, चिंतन और दान के लिए खास माना जाता है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या पर मांस-मदिरा के सेवन से बचना चाहिए। इस दिन बाल और नाखून काटना भी वर्जित है। नए कार्य की शुरुआत और शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश, विवाह आदि भी इस तिथि पर नहीं करना चाहिए। नकारात्मक ऊर्जा की अधिकता के चलते अमावस्या पर रात में सुनसान जगहों पर जाने से बचें। किसी पर गुस्सा करने, धोखा देने, अपमान करने और जानवरों को नुकसान पहुंचाने से आपको पितरों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। अमावस्या तिथि पर इन बातों का खासतौर से ध्यान रखें।</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या पर करें ये काम पितृ होंगे प्रसन्न</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या तिथि पर सुबह उठकर किसी पवित्र नदी विशेषकर गंगा में स्नान करें। अगर ऐसा न कर सकें, तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। इस दिन श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों की कृपा मिलती है। जल में काले तिल मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर अर्घ्य दें। ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और दान-दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा करें। वैशाख अमावस्या पर शनि देव की कृपा पाने के लिए दान जरूर करें, इस दिन काली उड़द, काला छाता, काले वस्त्र, सरसों का तेल और लोहा दान करने से शनि देव बेहद प्रसन्न होकर भक्तों के कष्ट को दूर कर देते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या पर करें पीपल वृक्ष की पूजा, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>शास्त्रों के अनुसार अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसे में इस दिन सुबह पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाएं और शाम के समय इसके नीचे सरसों के तेल का दीया जलाएं और 7 बार परिक्रमा करें। चूंकि,पीपल में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के साथ-साथ शनि देव का वास होता है, इसलिए इसकी पूजा करने से शनि के कष्टों से मुक्ति मिलती है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक&nbsp;</h2><div>पुराणों में वैशाख अमावस्या के विषय में बहुत रोचक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार बहुत समय पहले की बात है। धर्म वर्ण नाम के एक ब्राह्मण थे। वह ब्राह्मण बेहद ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वह हमेशा व्रत-उपवास करते रहते व ऋषि-मुनियों का आदर करते और उनसे ज्ञान ग्रहण करते। एक बार उन्होंने किसी महात्मा के मुख से सुना कि कलयुग में भगवान विष्णु के नाम के स्मरण से ज्यादा पुण्य किसी भी कार्य में नहीं है। अन्य युगों में जो पुण्य यज्ञ करने से प्राप्त होता था उससे कहीं अधिक पुण्य फल इस घोर कलयुग में भगवान का नाम सुमिरन करने से मिल जाता है। धर्म वर्ण ने इस बात को आत्मसात कर लिया और सांसारिक जीवन छोड़कर संन्यास लेकर भ्रमण करने लगे।</div><div><br></div><div>एक दिन घूमते-घूमते वह पितृलोक जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि उनके पितर बहुत कष्ट में हैं। पितरों ने ब्राह्मण को बताया कि उनकी ऐसी हालत तुम्हारे संन्यास के कारण हुई है। क्योंकि अब उनके लिए पिंडदान करने वाला कोई शेष नहीं है। अगर तुम वापस जाकर अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत करो, संतान उत्पन्न करो तो हमें इस कष्ट से राहत प्रदान हो सकती है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि वैशाख अमावस्या के दिन विधि-विधान से पिंडदान करो। पितरों की बात सुनने के बाद धर्मवर्ण ने वचन दिया कि वह उनकी अपेक्षाओं को अवश्य पूर्ण करेंगे। इसके बाद धर्मवर्ण ने अपना संन्यासी जीवन छोड़ दिया और पुनः सांसारिक जीवन को अपना लिया। और फिर वैशाख अमावस्या की तिथि को विधि-विधान से पिंडदान किया और अपने पितरों को मुक्ति दिलाई।</div><div><br></div><h2>वैशाख अमावस्या के दिन ये करें, होंगे लाभान्वित&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार वैशाख अमावस्या पर पितरों की शांति, ग्रहदोष, कालसर्प दोष आदि से मुक्ति के लिए उपाय किए जाते हैं। इस दिन हो सके तो उपवास रखना चाहिए। इस दिन व्यक्ति में नकारात्मक सोच बढ़ जाती है। ऐसे में नकारात्मक शक्तियां उसे अपने प्रभाव में ले लेती है तो ऐसे में हनुमानजी का जप करते रहना चाहिए। अमावस्या के दिन ऐसे लोगों पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है जो लोग अति भावुक होते हैं। अत: ऐसे लोगों को अपने मन पर कंट्रोल रखना चाहिए और पूजा पाठ आदि करना चाहिए। इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 17:47:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/observing-the-vaishakh-amavasya-fast-brings-happiness-and-prosperity-into-one-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Baisakhi 2026: क्यों है Baisakhi सिखों के लिए 'Historic Day'? जानिए Guru Gobind Singh और खालसा पंथ की पूरी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-baisakhi-historic-day-for-sikhs-learn-full-story-of-guru-gobind-singh-and-khalsa-panth]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 14 अप्रैल 2026 को देशभर में बैसाखी का पर्व मनाया जा रहा है। हरियाणा और पंजाब के खेतों में जब फसलें लहलहाने लगती हैं, तो खुशियों के इस पर्व की शुरूआत होती है। लेकिन बैसाखी का पर्व सिर्फ एक फसल का उत्सव नहीं है, बल्कि यह सिख समुदाय के साहस, धार्मिक पहचान और नई शुरूआत का भी प्रतीक है। इस दिन सूर्य देव अपनी राशि बदलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं, जिसको सिख धर्म में नए साल की शुरूआत माना जाता है।</div><div><br></div><h2>कैसे मनाया जाता है ये पर्व</h2><div>इस दिन गुरुद्वारों में सुबह से ही रौनक देखने को मिलती है। लोग नए कपड़े पहनकर विशेष अरदास में शामिल होते हैं। इस दिन जगह-जगह लंगर लगाए जाते हैं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा आदि किया जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि किस तरह से एकजुट होकर हम बुराई का सामना कर सकते हैं और सबसे साथ अपनी खुशियों को बांट सकते हैं।</div><div><br></div><h2>मुहूर्त</h2><div>बैसाखी तिथि की शुरूआत 14 अप्रैल 2026 से शुरू होगी। पुण्यकाल सुबह 06:15 मिनट से शाम 03:55 मिनट तक रहेगा। माना जाता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान आदि करने से पापों से मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><h2>ऐतिहासिक दिन</h2><div>सिख समुदाय के लिए यह दिन सबसे बड़ा माना जाता है। इस दिन सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। उन्होंने इस दिन पंज प्यारों को अमृत चखाया था। साथ ही इस दिन गुरुद्वारों में विशेष अरदास और नगर कीर्तन किया जाता है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>बैसाखी के दिन सुबह किसी पवित्र नदी या सरोवर आदि में स्नान करें। अगर संभव न हो तो घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। क्योंकि यह सौर वर्ष का पहला दिन है। इस दिन गुरुद्वारे में जाकर 'कड़ा प्रसाद' ग्रहण करें। वहीं लंगर सेवा में हिस्सा लें। इस दिन पीले वस्त्र, अनाज और गुड़ आदि का दान करना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Apr 2026 11:07:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/why-baisakhi-historic-day-for-sikhs-learn-full-story-of-guru-gobind-singh-and-khalsa-panth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Baisakhi 2026: 14 अप्रैल को मनाया जाएगा बैसाखी का त्योहार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-baisakhi-will-be-celebrated-on-april-14]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सूर्यदेव के मेष राशि में प्रवेश करने पर बैसाखी मनाई जाती है। इसे मेष संक्रांति और वैशाख संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सूर्य देवता की स्तुति और दान का खास महत्व होता है। वहीं किसान बैसाखी फसलों की कटाई की खुशी में मनाते हैं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि बैसाखी के त्योहार तक रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है। ऐसे में किसान फसलों कि कटाई की खुशी में बैसाखी धूमधाम से मनाते हैं। वहीं, इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं जिसके चलते यह दिन सूर्यदेव की स्तुति करने के लिए बेहद विशेष माना जाता है। बैसाखी को वैशाख संक्रांति और मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। सूर्य देवता को ग्रहों का राजा बताया गया है। ऐसे में जब वो अपनी राशि बदलते हैं, तो इसका प्रभाव हर किसी पर देखने को मिलता है। यही कारण है कि बैसाखी को नया साल भी माना जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इसे फसल का पर्व भी माना जाता है और ऐसा कहा जाता है कि जब फसल पककर तैयार हो जाती है तब ख़ुशी मनाने के रूप में बैसाखी मनाई जाती है। मुख्य रूप से यह पर्व पंजाब और हरियाणा में मनाया जाता है। इस दौरान एक खास रबी की फसल पककर तैयार होती है और उसी की खुशी मनाने के लिए लोग बैसाखी में नाचते, गाते हैं और खुशियां मनाते हैं। अगर हम सूर्य पंचांग की बात करें तो बैसाखी को सिख नववर्ष के रूप में भी मनाया जाता है। बैसाखी सिख समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। इसका धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी बहुत ज्यादा है। यह दिन आने वाले साल के लिए नए मौसम और नई शुरुआत का प्रतीक होता है। इस दिन लोग एक साथ इकठ्ठा होते हैं और अच्छी फसल के साथ अच्छी फसल की कामना करते हुए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/these-temples-of-lord-shiva-spread-from-thailand-to-mauritius" target="_blank">Lord Shiva Temple: Nepal के Pashupatinath जैसा वैभव, Thailand से Mauritius तक फैले हैं Lord Shiva के ये मंदिर</a></h3><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि बैसाखी का पर्व नए सौर वर्ष की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। हर साल 13 या 14 अप्रैल को सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार इस दिन को मेष संक्रांति कहा जाता है। इसी दिन बैसाखी का त्योहार भी मनाया जाता है। इस साल 14 अप्रैल को सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करेंगे और इसी दिन सिखों का पर्व बैसाखी भी मनाया जाएगा।</div><div><br></div><h2>बैसाखी 2026&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार इस साल बैसाखी का त्योहार 14 अप्रैल, मंगलवार के दिन मनाया जाएगा। इस दिन वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि लग रही है। 14 अप्रैल को सुबह 9:31 मिनट पर सूर्यदेव मेष राशि में प्रवेश करेंगे। ऐसे में बैसाखी का त्योहार 14 तारीख को ही मनाया जाएगा। इस दिन पुण्य काल की तिथि सूर्योदय से लेकर शाम को 3 बजकर 55 मिनट तक रहेगी।</div><div><br></div><div>बैसाखी, मेष संक्रांति- मंगलवार 14 अप्रैल&nbsp;</div><div>सूर्य गोचर मेष राशि में- 14 अप्रैल को सुबह 9:31 मिनट पर।</div><div><br></div><h2>मेष संक्रांति का प्रभाव</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि वारानुसार और नक्षत्रानुसार यह महोदरी नामक संक्रांति होगी। ऐसे में सोना और चांदी की कीमतें बढ़ती हुई देखने को मिल सकती हैं। साथ ही, मंगलवारी संक्रांति होने के चलते तेल, घी, वनस्पति और दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी महंगी होने की आशंका है। इसके चलते सामान्य लोगों की परेशानियों में वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा, कुछ राज्यों में राजनीति के क्षेत्र में उठा-पटक देखी जा सकती है।</div><div><br></div><h2>वैशाख संक्रांति का महत्व</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन सूर्य देवता की पूजा की जाती है। साथ ही, किसान फसलों की कटाई की खुशी में बैसाखी का त्योहार मनाते हैं। वैशाख संक्रांति पर स्नान-दान का भी खास महत्व होता है। मान्यता है कि इससे शुभ फल प्राप्त होता है। सूर्य देवता को ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों का राजा माना गया है। ऐसे में सूर्य के राशि परिवर्तन करने से इसका प्रभाव सभी पर देखने को मिलता है। बैसाखी को इसीलिए नए साल के रूप में भी मनाया जाता है। किसान मकर संक्रांति से फसलों की कटाई शुरू कर देते हैं। इस दिन सूर्य देव की पूजा करना बहुत शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन दिवाली के प्रकार ही लोग अपने घर की सफाई करते हैं और आंगन में रंगोली बनाते हैं। बैसाखी के त्योहार पर कई प्रकार के पकवान भी बनाए जाते हैं और सिख समुदाय के लोग सुबह के समय गुरुद्वारे जाते हैं। इस दिन कई स्थानों पर मेला भी लगता है और अपने घरों को लाइटों से सजा दिया जाता है।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास&nbsp;</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 17:52:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-baisakhi-will-be-celebrated-on-april-14</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ganga Saptami पर करें यह महाउपाय, घर में रखें ये शुभ वस्तुएं, कभी नहीं होगी धन की कमी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganga-saptami-4-items-for-luck-and-divine-blessings]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में गंगा सप्तमी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि गंगा जयंती मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन गंगा स्नान और दान करने से व्यक्ति के सात जन्मों के पाप धुल जाते हैं। इस बार गंगा सप्तमी 23 अप्रैल 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी।</div><div><br></div><div>आपको बता दें कि, गंगा सप्तमी के दिन केवल स्नान ही काफी नहीं है, इस दिन कुछ विशेष पवित्र चीजों को अपने घर लेकर आना, बेहद शुभ माना जाता है। इससे मां गंगा प्रसन्न होती है और इसके साथ ही महादेव की कृपा बनीं रहती है। आइए आपको बताते हैं कि वे कौन सी चीजें है, जो घर पर लाने से आपका सोया हुआ भाग्य जाग जाएगा।</div><div><br></div><div><b>चांदी या तांबे के पात्र में गंगाजल</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">गंगा सप्तमी के अवसर पर सबसे शुभ माना जाता है कि आप पवित्र गंगाजल को अपने घर लाएं। यदि यह संभव न हो, तो पहले से उपलब्ध गंगाजल को तांबे या चांदी के स्वच्छ पात्र में भरकर घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में स्थापित करें। ऐसा करने से घर की नकारात्मकता दूर होती है और सुख-शांति व समृद्धि का आगमन होता है।</span></div><div><br></div><div><b>दक्षिणवर्ती शंख</b></div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता के अनुसार, शंख को साक्षात मां लक्ष्मी का भाई माना जाता है। इसलिए गंगा सप्तमी के दिन दक्षिणवर्ती शंख खरीदकर घर लेकर आना और उसे पूजा के स्थान पर स्थापित करना बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिस घर में शंख की ध्वनि होती है और इसकी पूजा होती है, वहां दरिद्रता कभी कदम नहीं रखती है।</div><div><br></div><div><b>कमल या हाथी की प्रतिमा</b></div><div><br></div><div>गंगा सप्तमी के दिन कमल का फूल और चांदी का हाथी पर जरुर लाएं। मां गंगा को कमल का फूल अधिक प्रिय है और हाथी को ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है। ऐसा करने से करियर और व्यापार में सफलता मिलती है। इसके साथ ही सौभाग्य के द्वार भी खुल जाते है। आप चाहे तो किसी और धाकु की प्रतिमा का हाथी ले सकते हैं।</div><div><br></div><div><b>रुद्राक्ष</b></div><div><br></div><div>मान्यता है कि मां गंगा भगवान शिव की जटाओं में निवास करती हैं, इसलिए गंगा सप्तमी के दिन रुद्राक्ष को घर लाना, धारण करना या पूजास्थल में स्थापित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से मन का तनाव घटता है और व्यक्ति को आंतरिक शांति का अनुभव होता है।</div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>गंगा सप्तमी पूजा मंत्र</b></span></div><div><br></div><div>- ॐ गंगे नमः॥</div><div>- गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।</div><div>नर्मदे सिन्धु कावेरी जलस्मिन् सन्निधिं कुरु॥</div><div>- नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः॥</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 17:45:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganga-saptami-4-items-for-luck-and-divine-blessings</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hanuman Janmotsav पर Salasar Dham में आस्था का महासैलाब, जय श्री राम के जयकारों से गूंजा पूरा Rajasthan]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-massive-surge-of-faith-sweeps-through-salasar-dham-on-hanuman-janmotsav]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजस्थान के चुरू जिले में स्थित प्रसिद्ध सालासर धाम में आज हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन हो रहा है। देशभर से लाखों श्रद्धालु बजरंगबली के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। मान्यता है कि सालासर बालाजी के दरबार में जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से आता है, उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं। आज के दिन मंदिर परिसर 'जय श्री राम' और 'सालासर वाले की जय' के जयकारों से गूंज उठा है।</div><div><br></div><h2><b>शुभ योगों का अद्भुत संयोग</b></h2><div>इस बार हनुमान जन्मोत्सव पर ग्रहों की स्थिति बहुत ही शुभ मानी जा रही है। आज के दिन 'सिद्धि योग' और 'गजकेसरी योग' का एक दुर्लभ और मंगलकारी संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इन योगों में की गई पूजा और आराधना का फल कई गुना बढ़ जाता है। यह संयोग भक्तों के लिए सुख, समृद्धि और कार्यों में सफलता लाने वाला माना गया है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/hanuman-jayanti-2026-puja-auspicious-afternoon-and-evening-times" target="_blank">Hanuman Jayanti 2026: सुबह पूजा नहीं कर पाए? शाम के इस शुभ मुहूर्त में पाएं बजरंगबली का आशीर्वाद</a></h3><div><br></div><h2><b>प्रशासन और सुरक्षा के इंतजाम</b></h2><div>भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन और मंदिर कमेटी ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। दर्शन के लिए लंबी कतारों में लगे श्रद्धालुओं के लिए पीने के पानी और छाया की व्यवस्था की गई है। जगह-जगह स्वयंसेवक तैनात हैं ताकि मेले में आने वाले बुजुर्गों और बच्चों को किसी तरह की परेशानी न हो।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-these-special-rituals-on-hanuman-janmotsav" target="_blank">Hanuman Janmotsav पर करें ये खास उपाय, बजरंगबली की कृपा से जीवन की हर बाधा होगी दूर</a></h3><div><br></div><h2><b>भजन के साथ विशेष आरती</b></h2><div>मेले के दौरान मंदिर में सुबह से ही विशेष आरती और अभिषेक का दौर चल रहा है। जगह-जगह भंडारों का आयोजन किया गया है और भजन मंडलियां बालाजी के भजनों से वातावरण को भक्तिमय बना रही हैं। भक्त लंबी यात्रा तय कर पैदल और ध्वज लेकर बालाजी के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंच रहे हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:04:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-massive-surge-of-faith-sweeps-through-salasar-dham-on-hanuman-janmotsav</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hanuman Janmotsav पर करें ये खास उपाय, बजरंगबली की कृपा से जीवन की हर बाधा होगी दूर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-these-special-rituals-on-hanuman-janmotsav]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बजरंग बली हनुमान का जन्म भगवान श्रीराम की सहायता के लिए हुआ। हनुमान जी को भगवान शंकर का अवतार भी माना जाता है। कहा जाता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की सेवा के निमित्त भगवान शिव जी ने एकादश रुद्र को ही हनुमान के रूप में अवतरित किया था। हनुमान जी चूंकि वानर−उपदेवता श्रेणी के तहत आते हैं इसलिए वे मणिकु.डल, लंगोट व यज्ञोपवीत धारण किए और हाथ में गदा लिए ही उत्पन्न हुए थे। पुराणों में कहा गया है कि उपदेवताओं के लिए स्वेच्छानुसार रूप एवं आकार ग्रहण कर लेना सहज सिद्ध है। पुराणों के अनुसार, इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। माता अंजनी एवं पवन देवता के पुत्र हनुमान का जीवनकाल पराक्रम और श्रीराम के प्रति अटूट निष्ठा की असंख्य गाथाओं से भरा पड़ा है। हनुमान जी में किसी भी संकट को हर लेने की क्षमता है और अपने भक्तों की यह सदैव रक्षा करते हैं। हनुमान रक्षा स्त्रोत का पाठ यदि नियमित रूप से किया जाए तो कोई बाधा आपके जीवन में नहीं आ सकती। साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ करने से बड़े से बड़ा भय दूर हो जाता है।</div><div><br></div><div>हनुमान जन्मोत्सव के दिन हनुमान जी के पूजन का विशेष महत्व है। हनुमान जी भक्तों से विशेष प्रेम करते हैं और उनकी हर पुकार को सुनते हैं। श्रीराम की नित उपासना करने वालों पर हनुमान जी खूब प्रसन्न रहते हैं। हनुमान जन्मोत्सव के दिन हनुमानजी की पूजा विधि विधान से करनी चाहिए। इसके लिए पूजा के स्थान पर उनकी मूर्ति स्थापित करके शुद्ध जल, दूध, दही, घी, मधु और चीनी का पंचामृत, तिल के तेल में मिला सिंदूर, लाल पुष्प, जनेऊ, सुपारी, नैवेद्य, नारियल का गोला चढ़ाएं और तिल के तेल का दीपक जलाकर उनकी पूजा करें। इससे हनुमान जी प्रसन्न होकर भक्तों के सारे कष्ट हर लेते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/your-luck-shine-on-hanuman-jayanti-worship-in-this-auspicious-time-know-puja-vidhi" target="_blank">Hanuman Jayanti 2026: हनुमान जन्मोत्सव पर चमकेगी किस्मत, इस Shubh Muhurat में करें पूजा, जानें क्या है Puja Vidhi</a></h3><div>हनुमान जी के बचपन से जुड़ा एक प्रचलित प्रसंग यह है कि एक बार बालक हनुमान ने पूर्व दिशा में सूर्य को उदय होते देखा तो वह तुरंत आकाश में उड़ चले। वायुदेव ने जब यह देखा तो वह शीतल पवन के रूप में उनके साथ चलने लगे ताकि बालक पर सूर्य का ताप नहीं पड़े। अमावस्या का दिन था। राहु सूर्य को ग्रसित करने के लिए बढ़ रहा था तो हनुमानजी ने उसे पकड़ लिया। राहु किसी तरह उनकी पकड़ से छूट कर भागा और देवराज इंद्र के पास पहुंचा। इंद्र अपने प्रिय हाथी ऐरावत पर बैठकर चलने लगे तो हनुमान जी ऐरावत पर भी झपटे। इस पर इंद्र को क्रोध आ गया। उन्होंने बालक पर वज्र से प्रहार किया तो हनुमान जी की ठुड्डी घायल हो गई। वह मूर्छित होकर पर्वत शिखर पर गिर गए। यह सब देखकर वायुदेव को भी क्रोध आ गया। उन्होंने अपनी गति रोक दी और अपने पुत्र को लेकर एक गुफा में चले गए। अब वायु के नहीं चलने से सब लोग घबरा गए। देवतागण सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी के पास पहुंचे। सारी बात सुनकर ब्रह्माजी उस गुफा में पहुंचे और हनुमान जी को आर्शीवाद दिया तो उन्होंने आंखें खोल दीं। पवन देवता का भी क्रोध शांत हो गया। ब्रह्माजी ने कहा कि इस बालक को कभी भी ब्रह्म श्राप नहीं लगेगा। इसके बाद उन्होंने सभी देवताओं से कहा कि आप सब भी इस बालक को वर दें। इस पर देवराज इंद्र बोले कि मेरे वज्र से इस बालक की हनु यानि ठोढ़ी पर चोट लगी है इसलिए इसका नाम हनुमान होगा। सूर्य ने अपना तेज दिया तो वरूण ने कहा कि हनुमान सदा जल से सुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार हर देवता ने हनुमानजी को वर प्रदान किया जिससे वह बलशाली हो गए।</div><div><br></div><div>एक और प्रसंग यह है कि सूर्यदेव के कहने पर हनुमान जी ने उन्हें सुग्रीव की मदद करने का वचन दिया। बाद में हनुमान ने सुग्रीव की भरपूर मदद की और उनके खास मित्र बन गए। सीताजी का हरण करके रावण जब उन्हें लंका ले गया तो सीताजी को खोजते श्रीराम और लक्ष्मण जी से हनुमान जी की भेंट हुई। उनका परिचय जानने के बाद वह उन दोनों को कंधे पर बैठाकर सुग्रीव के पास ले गए। सुग्रीव के बारे में जानकर श्रीराम ने उन्हें मदद का भरोसा दिया और सुग्रीव ने भी सीताजी को ढूंढ़ने में मदद करने का वादा किया। श्रीराम ने अपने वादे के अनुसार एक ही तीर में बाली का अंत कर दिया और सुग्रीव फिर से किष्किन्धा नगरी में लौट आए। उसके बाद सुग्रीव का आदेश पाकर प्रमुख वानर दल सीताजी की खोज में सब दिशाओं में चल दिए। श्रीराम जी ने हनुमान जी से कहा कि मैं आपकी वीरता से परिचित हूं और मुझे विश्वास है कि आप अपने लक्ष्य में कामयाब होंगे। इसके बाद श्रीराम जी ने हनुमानजी को अपनी एक अंगूठी दी जिस पर उनका नाम लिखा हुआ था। सीताजी का पता मिलने के बाद जब हनुमान जी लंका में पहुंचे तो उन्होंने माता सीता से भेंटकर उन्हें श्रीराम का संदेश दिया और लंका की पूरी वाटिका उजाड़ने के बाद लंका में आग भी लगा दी। इसके बाद सीताजी को मुक्त कराने के लिए जो युद्ध हुआ उसमें हनुमान जी ने महती भूमिका निभाई।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 10:45:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-these-special-rituals-on-hanuman-janmotsav</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Hanuman Jayanti 2026: हनुमान जन्मोत्सव पर चमकेगी किस्मत, इस Shubh Muhurat में करें पूजा, जानें क्या है Puja Vidhi]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/your-luck-shine-on-hanuman-jayanti-worship-in-this-auspicious-time-know-puja-vidhi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 02 अप्रैल का दिन धार्मिक दृष्टि से बेहद खास है। चैत्र माह की पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। हिंदू पंचांग के मुताबिक हनुमान जयंती के दिन पूजा-पाठ, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिहाज से बेहद शुभ माना जाता है। इस बार आज यानी की 02 अप्रैल 2026 को हनुमान जयंती मनाई जा रही है। माना जाता है कि चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जी प्राकट्य हुआ था। तो आइए जानते हैं इस हनुमान जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>दैनिक पंचांग के मुताबिक चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का प्रभाव आज सूर्य़ोदय से बना हुआ है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की सुबह 07:00 बजे के आसपास माना जा रहा है। क्योंकि उदयातिथि के मुताबिक 02 अप्रैल को हनुमान जयंती का पर्व मनाया जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2>शुभ संयोग</h2><div>हनुमान जयंती के दिन बड़ा शुभ योग है। इस बार हनुमान जयंती पर मंगल राशि का परिवर्तन होगा। इस दिन मंगल मीन राशि में गोचर करेंगे। जहां पर पिता-पुत्र पहले से विराजमान हैं। हनुमान जयंती के दिन हस्त नक्षत्र और ध्रुव योग भी रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर व्रत का संकल्प लें और पूजा के लिए लकड़ी की चौकी पर लाल या फिर सफेद रंग का कपड़ा बिछाएं। अब चौकी पर हनुमान जी की प्रतिमा को स्थापित करें। अब हनुमान जी के सामने घी का दीपक जलाएं और उनको लाल सिंदूर, चमेली का तेल और चंदन आदि अर्पित करें। फिर बजरंगबली को पंचामृत, बूंदी के लड्डू या फिर रोट का भोग लगाएं।</div><div><br></div><h2>ऐसे चढ़ाएं चोला</h2><div>बता दें कि चमेली के तेल और सिंदूर से तैयार हुए लेप को चोला कहा जाता है। माना जाता है कि हनुमान जी को विशेष दिनों पर चोला चढ़ाने से या प्रतिमा पर लेप लगाने से सोई तकदीर जाग सकती है। हनुमान जी को मंगलवार, शनिवार, बड़ा मंगल और हनुमान जयंती के दिन चोला चढ़ाना उत्तम होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 09:43:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/your-luck-shine-on-hanuman-jayanti-worship-in-this-auspicious-time-know-puja-vidhi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Kamada Ekadashi 2026: 29 मार्च को है कामदा एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त और संपूर्ण Puja Vidhi]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/kamada-ekadashi-on-march-29-know-auspicious-time-and-complete-puja-ritual]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में कामदा एकादशी का खास महत्व है। हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कामदा एकादशी का व्रत किया जाता है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान श्रीविष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। वहीं कामदा एकादशी का व्रत करने से जातक को मनचाहा वरदान मिलता है। इस दिन व्रत करने से जन्म-जन्मांतर में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। इस बार 29 मार्च 2026 को कामदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं कामदा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत 28 मार्च 2026 की सुबह 08:45 मिनट पर होगी। वहीं एकादशी तिथि की समाप्ति 29 मार्च 2026 की सुबह 07:46 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 29 मार्च 2026 को कामदा एकादशी व्रत किया जाएगा। इस दिन श्रीविष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाएगी।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें और भगवान विष्णु की विधिविधान से पूजा-अर्चना करें। भगवान विष्णु की पूजा में फल-फूल, दूध, तिल और पंचामृत आदि अर्पित करें। इस दिन एकादशी व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। वहीं द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन आदि कराएं और यथासंभव दान करने के बाद विदा करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>कामदा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पाप मिटते हैं। इस व्रत के पुण्य से जीवात्मा के कष्टों का निवारण होता है और मनोवांछित फल मिलता है। वहीं फलदा और कामना पूर्ण करने वाली होने से इसको कामदा एकादशी कहा जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 29 Mar 2026 09:36:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/kamada-ekadashi-on-march-29-know-auspicious-time-and-complete-puja-ritual</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kamada Ekadashi 2026: 29 मार्च को रखा जायेगा कामदा एकादशी व्रत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-kamada-ekadashi-fast-will-be-observed-on-march-29]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सनातन धर्म में कामदा एकादशी का खास महत्व है। यह पर्व हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन जग के नाथ भगवान विष्णु और धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। साथ ही एकादशी पर फलाहार व्रत रखा जाता है। इस व्रत को करने से साधक को मनचाहा वरदान मिलता है। साथ ही जन्म-जन्मांतर में किए गए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस बार ये एकादशी व्रत 29 मार्च को पड़ रही है। कामदा एकादशी का व्रत जिस कामना से किया जाता है। वो पूरी होती है। पारिवारिक जीवन की समस्याएं भी खत्म हो जाती हैं। कामदा एकादशी का जिक्र विष्णु पुराण में किया गया है। राम नवमी के बाद ये पहली एकादशी होती है। कामदा एकादशी को सांसारिक कामनाएं पूरी करने वाला व्रत माना गया है। इसलिए इस व्रत को बेहद खास माना गया है। कामदा एकादशी को फलदा एकादशी भी कहते हैं।</div><div><br></div><h2>कामदा एकादशी&nbsp;</h2><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू पंचांग की गणना अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 28 मार्च को सुबह 08:45 मिनट पर होगी। वहीं, इसका समापन 29 मार्च को सुबह 07:46 मिनट पर होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार,29 मार्च को कामदा एकादशी मनाई जाएगी। इसी दिन इसका व्रत और भगवान विष्णु का पूजन भी किया जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ram-raja-of-orchha-only-temple-in-india-where-lord-receives-guard-of-honour" target="_blank">Ram Raja Mandir Orchha: Orchha के Ram Raja, भारत का एकमात्र मंदिर जहां भगवान को मिलती है Guard of Honour</a></h3><h2>पूजा विधि</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। व्रत के एक दिन पहले एक बार भोजन करके भगवान का स्मरण किया जाता है। कामदा एकादशी व्रत के दिन स्नान के बाद साफ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। व्रत का संकल्प लेने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा में फल, फूल, दूध, तिल और पंचामृत आदि सामग्री का प्रयोग करना चाहिए। एकादशी व्रत की कथा सुनने का भी विशेष महत्व है। द्वादशी के दिन ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>कामदा एकादशी का महत्व</h2><div>भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि धर्म ग्रंथों के अनुसार, कामदा एकादशी व्रत के पुण्य से जीवात्मा को पाप से मुक्ति मिलती है। यह एकादशी कष्टों का निवारण करने वाली और मनोवांछित फल देने वाली होने के कारण फलदा और कामना पूर्ण करने वाली होने से कामदा कही जाती है। इस एकादशी की कथा व महत्व भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डु पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। इससे पूर्व राजा दिलीप को यह महत्व वशिष्ठ मुनि ने बताया था। चैत्र मास में भारतीय नव संवत्सर की शुरुआत होने के कारण यह एकादशी अन्य महीनों की अपेक्षा और अधिक खास महत्व रखती है। शास्त्रों के अनुसार जो मनुष्य कामदा एकादशी का व्रत करता है वह प्रेत योनि से मुक्ति पाता है।</div><div><br></div><h2>दशमी से ही शुरू हो जाती है तैयारी</h2><div>कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि कामदा एकादशी व्रत के एक दिन पहले से ही यानी दशमी की दोपहर में जौ, गेहूं और मूंग आदि का एक बार भोजन करके भगवान की पूजा की जाती है। दूसरे दिन यानी एकादशी को सुबह जल्दी उठकर नहाने के बाद व्रत और दान का संकल्प लिया जाता है। पूजा करने के बाद कथा सुनकर श्रद्धा अनुसार दान किया जाता है। इस व्रत में नमक नहीं खाया जाता है। सात्विक दिनचर्या के साथ नियमों का पालन कर के व्रत पूरा किया जाता है। इसके बाद रात में भजन कीर्तन के साथ जागरण किया जाता है।</div><div><br></div><h2>क्या करें</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। तुलसी, फल-फूल, धूप, दीप और प्रसाद चढ़ाकर भगवान विष्णु की आराधना करें। इस दिन निराहार (बिना खाए) या फलाहार व्रत रखने की परंपरा है। भगवद्गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें , क्योंकि इस दिन श्रीहरि की भक्ति में लीन रहना शुभ माना जाता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और धन दान करना बहुत पुण्यदायी होता है। इस दिन भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन के साथ जागरण करने से विशेष लाभ मिलता है. द्वादशी के दिन ब्राह्मण भोजन कराने के बाद खुद सात्त्विक भोजन करें।</div><div>क्या नहीं करें</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन चावल, गेहूं, मसूर दाल, प्याज-लहसुन और मांसाहार से परहेज करें। व्रत के दौरान मन और वाणी की शुद्धता बनाए रखें। इस दिन सत्य बोलना और अच्छे आचरण का पालन करना जरूरी होता है। वाणी पर संयम रखना एकादशी व्रत का मुख्य नियम है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शरीर के किसी भी अंग को काटना वर्जित है। खाने की बर्बादी न करें और भोजन को आदरपूर्वक ग्रहण करें।&nbsp;</div><div><br></div><h2>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास&nbsp; से जानते हैं राशि अनुसार कामदा एकादशी पर करें इन चीजों का दान</h2><div>मेष राशि- कामदा एकादशी के दिन लाल रंग की मिठाई और लाल रंग के मौसमी फलों मसूर दाल का दान करें।</div><div>वृषभ राशि- चावल, गेहूं, चीनी, दूध आदि चीजों का दान करें।</div><div>मिथुन राशि- गाय को चारा खिलाएं और सेवा करें. साथ ही जरूरतमंद लोगों को हरी सब्जियों का दान करें।</div><div>कर्क राशि- माखन, मिश्री, लस्सी, छाछ आदि चीजों का दान करें।</div><div>सिंह राशि- कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद राह चलते लोगों में लाल रंग के फल और शरबत बाटें।</div><div>कन्या राशि- विवाहित महिलाओं को हरे रंग की चूड़ियां दान में दें।</div><div>तुला राशि- भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद जरूरतमंदों के मध्य सफेद वस्त्रों का दान करें।</div><div>वृश्चिक राशि- मसूर दाल, लाल मिर्च, लाल रंग के फल आदि चीजों का दान करें।</div><div>धनु राशि- केसर मिश्रित दूध राहगीरों में बाटें। साथ ही पीले रंग के फल और खाने पीने की अन्य चीजों का भी दान कर सकते हैं।</div><div>मकर राशि- भगवान विष्णु की पूजा करने के साथ गरीबों के मध्य धन का दान करें।</div><div>कुंभ राशि- कामदा एकादशी पर चमड़े के जूते-चप्पल, छतरी और काले वस्त्र का दान करें।</div><div>मीन राशि- केला, चने की दाल, बेसन, पीले रंग के वस्त्र का दान करें।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 12:54:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-kamada-ekadashi-fast-will-be-observed-on-march-29</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ramanavami 2026: Ram Navami 2026 की Date पर बड़ा कन्फ्यूजन, 26 या 27 मार्च? जानें Ayodhya में कब मनेगा रामजन्मोत्सव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/confusion-regarding-date-of-ram-navami-2026-march-26-or-27-find-out-when-ram-janmotsav-celebrated]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चैत्र नवरात्रि के आखिरी दिन यानी की नवमी तिथि को राम नवमी मनाई जाती है। इस दिन श्रीविष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अवतार लिया था। वह अयोध्या के महाराज दशरथ के घर में जन्मे थे। इस बार 19 मार्च 2026 को चैत्र नवरात्रि की शुरूआत हुई। इस बार नवरात्रि पूरे 9 दिन की नहीं बल्कि आठ दिन की है। यानी की अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन है। ऐसे में लोगों के मन में कंफ्यूजन है कि राम नवमी 26 मार्च को मनाई जा रही है या फिर 27 मार्च को।&nbsp;</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>बता दें कि राम नवमी का पर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आता है, जोकि नवरात्रि का अंतिम दिन होता है। इस बार 26 और 27 मार्च 2026 दोनों दिन रामनवमी का पर्व मनाया जाएगा। राम नवमी का पर्व भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारत में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। 26 मार्च की सुबह 11:48 मिनट पर नवमी तिथि की शुरूआत होगी और अगले दिन यानी की 27 मार्च 2026 की सुबह 10:06 मिनट तक मान्य रहेगी।</div><div><br></div><h2>पूजा विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर के साफ करके भगवान श्रीराम की प्रतिमा को स्थापित करें और गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। इसके बाद भगवान श्रीराम को फल-फूल और तुलसी आदि अर्पित करें। फिर रामचरितमानस का पाठ करें और दोपहर 12 बजे राम जन्म के समय आरती करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>भगवान राम के जन्मोत्सव के प्रतीक के रूप में मनाई जाने वाली रामनवमी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। भगवान श्रीराम धर्म, सत्य और मर्यादा के प्रतीक हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 11:10:13 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/confusion-regarding-date-of-ram-navami-2026-march-26-or-27-find-out-when-ram-janmotsav-celebrated</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ram Navami 2026: सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग में 26 मार्च को मनाई जाएगी रामनवमी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/ram-navami-will-be-celebrated-on-march-26th-coinciding-with-sarvartha-siddhi-yoga-and-ravi-yoga]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इस साल राम नवमी का पावन त्यौहार 26 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। भगवान श्रीराम का जन्म कर्क लग्न और अभिजीत मुहूर्त में मध्यान्ह 12 बजे हुआ था। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान के निदेशक भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि राम नवमी इस साल 26 मार्च को मनाई जाएगी। वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का आरंभ 26 मार्च को सुबह 11:48 मिनट पर होगा। नवमी तिथि का समापन 27 मार्च 2026 को सुबह 10:06 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार भगवान राम का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को दोपहर में हुआ था। 26 मार्च को नवमी तिथि प्रातः 11:48 मिनट से शुरू हो रही है। इसीलिए राम नवमी का पर्व 26 मार्च को मनाया जाएगा । रामनवमी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। जिससे इस दिन किए जाने वाले सभी शुभ कार्य सिद्ध होंगे। इसके अलावा, इस दिन रवि योग का निर्माण हो रहा है।</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हिंदू कैलेंडर के मुताबिक चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमीं तिथि 26 मार्च को रामनवमी मनाई जाएगी।&nbsp; इस दिन पूरे देश में धूमधाम से राम जन्मोत्सव मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जन्म राजा दशरथ के घर पर हुआ था। इस दिन प्रभु श्रीराम की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/ram-navami-special-why-is-the-worship-prescribed-for-the-afternoon" target="_blank">Ram Navami Special: क्यों है दोपहर में पूजा का विधान? जानें Lord Ram के जन्म का शुभ मुहूर्त</a></h3><h2>श्री राम नवमी: 26 मार्च 2026&nbsp;</h2><div>ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि श्रीराम का जन्म मध्याह्न व्यापिनी चैत्रशुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था, अतः मध्याह्न व्यापिनी चैत्र शुक्ल नवमी को ही यह पर्व मनाया जाता है। पुनर्वसु युक्त मध्याह्न व्यापिनी नवमी में यह व्रत किया जाता है, परन्तु पुनर्वसु नक्षत्र इसमें निर्णायक नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>चैत्रशुक्ल नवमी रामनवमी। अस्यां मध्याह्रव्यापिन्यामुपोषणं कार्यम् ।।&nbsp; पूर्वेद्युरेव मध्याह्ने सत्त्वे सैव ग्राह्या।। शुद्धाया नवम्यां अलाभे मुहूर्त्तत्रयन्यूनत्वे वा सर्वैरप्यष्टमी विद्धैवोपोष्येत्याहुः ।। इदं व्रतं नित्यं काम्यं च ।। - धर्मसिन्धु</b></div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि 26 मार्च 2026 को मध्याह्न के समय नवमी आर्द्रा नक्षत्र से युक्त है। अतः यह व्रत इसी दिन किया जायेगा, इसमें पुनर्वसु नक्षत्र को निर्णायक नहीं माना गया है। 27 मार्च 2026 को नवमी मध्याह्नकाल को स्पर्श भी नहीं कर रही है। मध्याह्न काल 26 मार्च को लगभग 11:21 से दोपहर 01:46 तक रहेगा। अतः 26 मार्च 2026 को ही श्रीराम नवमी का व्रत किया जायेगा।</div><div><br></div><h2>राम नवमी शुभ मुहूर्त&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का आरंभ 26 मार्च को सुबह 11:48 मिनट पर होगा। नवमी तिथि का समापन 27 मार्च 2026 को सुबह 10:06 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार भगवान राम का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को दोपहर में हुआ था। इसीलिए राम नवमी का पर्व 26 मार्च को मनाया जाएगा ।&nbsp;</div><div><br></div><h2>राम नवमी पूजा समय&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि&nbsp; मध्याह्न काल 26 मार्च को लगभग 11:21 से दोपहर 01:46 तक रहेगा।&nbsp; मध्याह्न समय में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की पूजा कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2>शुभ योग</h2><div>कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि रामनवमी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। जिससे इस दिन किए जाने वाले सभी शुभ कार्य सिद्ध होंगे। इसके अलावा, इस दिन रवि योग का निर्माण हो रहा है। जिसके अनुसार पूजा-अर्चना से आरोग्यता, स्वास्थ्य और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होगी। इस अवसर पर शिववास योग का भी संयोग बन रहा है। जिससे साधकों पर भगवान श्रीराम और शिव की विशेष कृपा बरसेगी। रवि योग में सभी प्रकार के दोषों से मुक्ति मिलती है।</div><div><br></div><h2>अनुष्ठान&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि सर्वार्थ सिद्धि योग में कोई भी जाप, अनुष्ठान कई गुना अधिक फल प्रदान करता है। विशेष मनोकामना पूर्ति के लिए यह अहम है। मकान, वाहन, सोने चांदी के जेवरात की खरीदारी, मुंडन, गृहप्रवेश आदि विशेष मांगलिक कार्य किए जाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पूजा विधि</h2><div>भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि इस पावन दिन शुभ जल्दी उठ कर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहन लें। अपने घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। घर के मंदिर में देवी- देवताओं को स्नान कराने के बाद साफ स्वच्छ वस्त्र पहनाएं। भगवान राम की प्रतिमा या तस्वीर पर तुलसी का पत्ता और फूल अर्पित करें। भगवान को फल भी अर्पित करें। अगर आप व्रत कर सकते हैं, तो इस दिन व्रत भी रखें। भगवान को अपनी इच्छानुसार सात्विक चीजों का भोग लगाएं। इस पावन दिन भगवान राम की आरती भी अवश्य करें। आप रामचरितमानस, रामायण, श्री राम स्तुति और रामरक्षास्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं। भगवान के नाम का जप करने का बहुत अधिक महत्व होता है। आप श्री राम जय राम जय जय राम या सिया राम जय राम जय जय राम का जप भी कर सकते हैं। राम नाम के जप में कोई विशेष नियम नहीं होता है, आप कहीं भी कभी भी राम नाम का जप कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2>हवन सामग्री</h2><div>कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि आम की लकड़ी, आम के पत्ते, पीपल का तना, छाल, बेल, नीम, गूलर की छाल, चंदन की लकड़ी, अश्वगंधा, मुलैठी की जड़, कपूर, तिल, चावल, लौंग, गाय की घी, इलायची, शक्कर, नवग्रह की लकड़ी, पंचमेवा, जटाधारी नारियल, गोला और जौ आदि हवन में प्रयोग होने वाली सभी सामग्री जुटाएं।</div><div><br></div><h2>हवन विधि</h2><div>भविष्यवक्ता डॉ अनीष व्यास ने बताया कि हवन पर बैठने वाले व्यक्ति को रामनवमी के दिन प्रातः जल्दी उठना चाहिए। शौच आदि से निवृत्त होकर स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े धारण करने चाहिए। वैदिक शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि यदि हवन पति-पत्नी साथ में करें तो उसका विशेष फल प्राप्त होता है। सबसे पहले किसी स्वच्छ स्थान पर हवन कुंड का निर्माण करें। हवन कुंड में आम लकड़ी और कपूर से अग्नि प्रज्जवलित करें। इसके बाद हवन कुंड में ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चै नमः का जाप करते हुए घी से माता के नाम की आहुति दें। इसी के साथ अन्य देवी-देवताओं के नाम की आहुति दें। इसके बाद संपूर्ण हवन सामग्री से 108 बार हवन सामग्री को आहुति दें।</div><div><br></div><h2>हवन के बाद करें यह कार्य</h2><div>हवन के बाद माता जी की आरती करें। इसके बाद माता को खीर, हलवा, पूड़ी और चने का भोग लगाएं। कन्याओं को भी भोजन कराएं। प्रसाद बांटें। उन्हें दक्षिणा भी दें।</div><div><br></div><h2>राम नवमी का महत्व</h2><div>कुंडली विश्लेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि राम नवमी का दिन भक्तों के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह दिन भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विष्णु जी के अवतार प्रभु श्री राम की पूजा करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। भक्तों के जीवन से सभी कष्ट कट जाते हैं। इसके अलावा इस दिन नवरात्रि का समापन भी होता है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन को महानवमी कहते हैं। इस दिन पूजा अर्चना करने से राम जी के साथ आदिशक्ति मां जगदम्बा की कृपा भी प्राप्त होती है।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 14:15:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/ram-navami-will-be-celebrated-on-march-26th-coinciding-with-sarvartha-siddhi-yoga-and-ravi-yoga</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Ram Navami Special: क्यों है दोपहर में पूजा का विधान? जानें Lord Ram के जन्म का शुभ मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/ram-navami-special-why-is-the-worship-prescribed-for-the-afternoon]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान श्रीराम के जन्मदिवस चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को रामनवमी के नाम से देशभर में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। देश के मंदिरों में इस दिन श्रीराम जन्मोत्सवों की धूम देखते ही बनती है। इस दिन नवरात्रि का अंतिम दिन होने के कारण मां दुर्गा की भी पूजा की जाती है और जगह जगह हवन, पूजन और कन्या पूजन किये जाते हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था, इसीलिए इस दिन तीसरे प्रहर तक व्रत रखा जाता है और दोपहर में मनाया जाता है राम महोत्सव। इस दिन व्रत रखकर भगवान श्रीराम और रामचरितमानस की पूजा करनी चाहिए।</div><div><br></div><div>इस दिन जो श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर भगवान श्रीराम की पूजा करते हैं तथा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान−पुण्य करते हैं वह अनेक जन्मों के पापों को भस्म करने में समर्थ होते हैं। इस दिन पुण्य सलिला सरयू नदी में स्नान करके लोग पुण्य लाभ कमाते हैं। भगवान श्रीराम के जन्म स्थान अयोध्या में इस त्यौहार की विशेष धूम रहती है। अयोध्या का रामनवमी पर लगने वाला चैत्र रामनवमी मेला काफी प्रसिद्ध है जिसमें देश भर से लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। इस दिन देश भर के मंदिरों से रथ यात्राएं और भगवान श्रीराम, उनकी पत्नी सीता, भाई लक्ष्मण व भक्त हनुमान की झांकियां भी निकाली जाती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/performing-kanya-pujan-during-navratri-brings-liberation-from-troubles" target="_blank">26–27 मार्च को होगा कन्या पूजन, पूजा से मिलती है सुख-समृद्धि और रोग-मुक्ति</a></h3><div>इस दिन व्रत रखने वालों को चाहिए कि वह प्रातः जल्दी उठ कर नित्यकर्म से निवृत्त होकर भगवान श्रीराम की मूर्ति को शुद्ध पवित्र ताजे जल से स्नान कराकर नये वस्त्राभूषणों से सज्जित करें और फिर धूप दीप, आरती, पुष्प, पीला चंदन आदि अर्पित करते हुए भगवान की पूजा करें। रामायण में वर्णित श्रीराम जन्म कथा का श्रद्धा भक्ति पूर्वक पाठ और श्रवण तो इस दिन किया ही जाता है अनेक भक्त रामायण का अखण्ड पाठ भी करते हैं। भगवान श्रीराम को दूध, दही, घी, शहद, चीनी मिलाकर बनाया गया पंचामृत तथा भोग अर्पित किया जाता है। भगवान श्रीराम का भजन, पूजन, कीर्तन आदि करने के बाद प्रसाद को पंचामृत सहित श्रद्धालुओं में वितरित करने के बाद व्रत खोलने का विधान है। रामनवमी के दिन मंदिर में अथवा मकान पर ध्वजा, पताका, तोरण और बंदनवार आदि से सजाने का विशेष विधान है।</div><div><br></div><h2>राम नवमी व्रत कथा</h2><div><br></div><div>राम, सीता और लक्ष्मण वन में जा रहे थे। सीता जी और लक्ष्मण को थका हुआ देखकर राम जी ने थोड़ा रुककर आराम करने का विचार किया और एक बुढ़िया के घर गए। बुढ़िया सूत कात रही थी। बुढ़िया ने उनकी आवभगत की और बैठाया, स्नान-ध्यान करवाकर भोजन करवाया। राम जी ने कहा- बुढ़िया माई, "पहले मेरा हंस मोती चुगाओ, तो मैं भी करूं।" बुढ़िया बेचारी के पास मोती कहां से आतो जोकि सूत कात कर गुजारा करती थी। अतिथि को ना कहना भी वह ठीक नहीं समझती थीं। दुविधा में पड़ गईं। अत: दिल को मजबूत कर राजा के पास पहुंच गईं और अंजली मोती देने के लिये विनती करने लगीं। राजा अचम्भे में पड़ा कि इसके पास खाने को दाने नहीं हैं और मोती उधार मांग रही है। इस स्थिति में बुढ़िया से मोती वापस प्राप्त होने का तो सवाल ही नहीं उठता। आखिर राजा ने अपने नौकरों से कहकर बुढ़िया को मोती दिला दिये।</div><div><br></div><div>बुढ़िया मोती लेकर घर आई, हंस को मोती चुगाए और मेहमानों की आवभगत की। रात को आराम कर सवेरे राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी जाने लगे। राम जी ने जाते हुए उसके पानी रखने की जगह पर मोतियों का एक पेड़ लगा दिया। दिन बीतते गये और पेड़ बड़ा हुआ, पेड़ बढ़ने लगा, पर बुढ़िया को कु़छ पता नहीं चला। मोती के पेड़ से पास-पड़ोस के लोग चुग-चुगकर मोती ले जाने लगे। एक दिन जब बुढ़िया उसके नीचे बैठी सूत कात रही थी। तो उसकी गोद में एक मोती आकर गिरा। बुढ़िया को तब ज्ञात हुआ। उसने जल्दी से मोती बांधे और अपने कपड़े में बांधकर वह किले की ओर ले चली़। उसने मोती की पोटली राजा के सामने रख दी। इतने सारे मोती देख राजा अचम्भे में पड़ गया। उसके पूछने पर बुढ़िया ने राजा को सारी बात बता दी। राजा के मन में लालच आ गया। वह बुढ़िया से मोती का पेड़ मांगने लगा। बुढ़िया ने कहा कि आस-पास के सभी लोग ले जाते हैं। आप भी चाहे तो ले लें। मुझे क्या करना है। राजा ने तुरन्त पेड़ मंगवाया और अपने दरबार में लगवा दिया। पर रामजी की मर्जी, मोतियों की जगह कांटे हो गये और लोगों के कपड़े उन कांटों से खराब होने लगे। एक दिन रानी की ऐड़ी में एक कांटा चुभ गया और पीड़ा करने लगा। राजा ने पेड़ उठवाकर बुढ़िया के घर वापस भिजवा दिया। पेड़ पर पहले की तरह से मोती लगने लगे। बुढ़िया आराम से रहती और खूब मोती बांटती।</div><div><br></div><h2>भगवान श्रीराम</h2><div><br></div><div>भगवान श्रीराम की मातृ−पितृ भक्ति भी बड़ी महान थी वो अपने पिता राजा दशरथ के एक वचन का पालन करने 14 वर्ष तक वनवास काटने चले गए और माता कैकयी का भी उतना ही सम्मान किया। भातृ प्रेम के लिए तो श्रीराम का नाम सबसे पहले लिया जाता है उन्होंने अपने भाइयों को अपने बेटों से बढ़ कर प्यार दिया इनके इसी भातृ प्रेम की वजह से उनके भाई उन पर मर मिटने को तैयार रहते थे। श्रीराम ने रावण का और अन्य असुरों का संहार कर धरती पर शांति भी कायम की। भगवान श्रीराम महान पत्नी व्रता भी थे उन्होंने वनवास से लौटने के बाद माता सीता के साथ न रह कर भी कभी राजसी ठाठ में जीवन नहीं बिताया तथा न ही कभी उनके सिवा किसी अन्य की कल्पना की। भगवान श्रीराम ने अपने सेवकों तथा अनुयायियों का भी सदैव ध्यान रखते हैं। वह अपने सेवक हनुमानजी एवं अंगद के लिए हमेशा प्रस्तुत रहते थे। भगवान श्रीराम में सभी गुण विद्यमान थे।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 14:11:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/ram-navami-special-why-is-the-worship-prescribed-for-the-afternoon</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[26–27 मार्च को होगा कन्या पूजन, पूजा से मिलती है सुख-समृद्धि और रोग-मुक्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/performing-kanya-pujan-during-navratri-brings-liberation-from-troubles]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होता है। इस साल इस बार चैत्र नवरात्रि 19 मार्च 2026 से प्रारंभ हो रहे हैं, जिसका समापन 27 मार्च होगा। चैत्र नवरात्रि की धूम पूरे देश में है। माता की भक्ति में लीन भक्तों को अब अष्टमी और नवमी का इंतजार है। चैत्र नवरात्रि की अष्टमी और रामनवमी 26 मार्च को मनाई जाएगी। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि चैत्र नवरात्र 19 मार्च से शुरू हो गई है। वहीं इसका समापन 27 मार्च&nbsp; को होगा। चैत्र नवरात्रि की अष्टमी और रामनवमी 26 मार्च को मनाई जाएगी और चैत्र नवरात्रि की नवमी 27 मार्च को मनाई जाएगी। अष्टमी और नवमी पर कन्याओं को भोजन कराया जाता है। नवरात्र के दौरान अलग-अलग दिनों में देवी दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों में अष्टमी और नवमी तिथि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। नवरात्रि के अष्टमी और नवमी तिथि कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। व्रत रखने वाले भक्त कन्याओं को भोजन कराने के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं। कन्याओं को देवी मां का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन कन्याओं को भोजन कराने से घर में सुख, शांति एवं सम्पन्नता आती है। कन्या भोज के दौरान नौ कन्याओं का होना आवश्यक होता है। इस बीच यदि कन्याएं 10 वर्ष से कम आयु की हो तो जातक को कभी धन की कमी नही होती और उसका जीवन उन्नतशील रहता है।</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि नवरात्रि में कन्या पूजन का बहुत महत्व है। आमतौर पर नवमी को कन्याओं का पूजन करके उन्हें भोजन कराया जाता है। लेकिन कुछ श्रद्धालु अष्टमी को भी कन्या पूजन करते हैं। नवरात्रि&nbsp; में अष्टमी और नवमी के दिन कन्या भोजन का विधान ग्रंथों में बताया गया है। इसके पीछे भी शास्त्रों में वर्णित तथ्य यही हैं कि 2 से 10 साल तक उम्र की नौ कन्याओं को भोजन कराने से हर तरह के दोष खत्म होते हैं। कन्याओं को भोजन करवाने से पहले देवी को नैवेद्य लगाएं और भेंट करने वाली चीजें भी पहले देवी को चढ़ाएं। इसके बाद कन्या भोज और पूजन करें। कन्या भोजन न करवा पाएं तो भोजन बनाने का कच्चा सामान जैसे चावल, आटा, सब्जी और फल कन्या के घर जाकर उन्हें भेंट कर सकते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-yamuna-river-on-the-day-of-yamuna-chhath-vrat-grants-salvation" target="_blank">Yamuna Chhath 2026: यमुना छठ व्रत पर यमुना नदी में स्नान से मिलता है मोक्ष</a></h3><h2>कन्या पूजन महाष्टमी और रामनवमी&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि नवरात्रि में कन्या पूजन या कुमारी पूजा, महाष्टमी और रामनवमी दोनों ही तिथियों को किया जाएगा। महाष्टमी को मां महागौरी और रामनवमी को मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। जिन घरों में महाष्टमी और महानवमी की पूजा होती है, वहां इस दिन कन्याओं को भोजन करवाया जाता है और उन्हें गिप्ट बांटे जाते हैं।</div><div><br></div><h2>पुराणों में है कन्या भोज का महत्व</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पौराणिक धर्म ग्रंथों एवं पुराणों के अनुसार नवरात्री के अंतिम दिन कौमारी पूजन आवश्यक होता है। क्योंकि कन्या पूजन के बिना भक्त के नवरात्र व्रत अधूरे माने जाते हैं। कन्या पूजन के लिए अष्टमी और नवमी तिथि को उपयुक्त माना जाता है। कन्या भोज के लिए दस वर्ष तक की कन्याएं उपयुक्त होती हैं।</div><div><br></div><h2>कन्या और देवी के शस्त्रों की पूजा</h2><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि अष्टमी को विविध प्रकार से मां शक्ति की पूजा करें। इस दिन देवी के शस्त्रों की पूजा करनी चाहिए। इस तिथि पर विविध प्रकार से पूजा करनी चाहिए और विशेष आहुतियों के साथ देवी की प्रसन्नता के लिए हवन करवाना चाहिए। इसके साथ ही 9 कन्याओं को देवी का स्वरूप मानते हुए भोजन करवाना चाहिए। दुर्गाष्टमी पर मां दुर्गा को विशेष प्रसाद चढ़ाना चाहिए। पूजा के बाद रात्रि को जागरण करते हुए भजन, कीर्तन, नृत्यादि उत्सव मनाना चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><h2>हर आयु की कन्या का होता है अलग महत्व</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि 2 साल की कन्या को कौमारी कहा जाता है। इनकी पूजा से दुख और दरिद्रता खत्म होती है। 3 साल की कन्या त्रिमूर्ति मानी जाती है। त्रिमूर्ति के पूजन से धन-धान्य का आगमन और परिवार का कल्याण होता है। 4 साल की कन्या कल्याणी मानी जाती है। इनकी पूजा से सुख-समृद्धि मिलती है। 5 साल की कन्या रोहिणी माना गया है। इनकी पूजन से रोग-मुक्ति मिलती है। 6 साल की कन्या कालिका होती है। इनकी पूजा से विद्या और राजयोग की प्राप्ति होती है। 7 साल की कन्या को चंडिका माना जाता है। इनकी पूजा से ऐश्वर्य मिलता है। 8 साल की कन्या शांभवी होती है। इनकी पूजा से लोकप्रियता प्राप्त होती है। 9 साल की कन्या दुर्गा को दुर्गा कहा गया है। इनकी पूजा से शत्रु विजय और असाध्य कार्य सिद्ध होते हैं। 10 साल की कन्या सुभद्रा होती है। सुभद्रा के पूजन से मनोरथ पूर्ण होते हैं और सुख मिलता है।</div><div><br></div><h2>अष्टमी तिथि 26 मार्च</h2><div>भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि चैत्र नवरात्रि की अष्टमी तिथि 25 मार्च 2026 को दोपहर 1:50 बजे से शुरू होकर 26 मार्च 2026 को सुबह 11:48 बजे तक रहेगी। ऐसे में नवरात्र की अष्टमी तिथि का व्रत 26 मार्च को रखा जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2>नवमी तिथि 27 मार्च</h2><div>कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का आरंभ 26 मार्च 2026 को सुबह 11:46 मिनट पर होगा। वहीं इस तिथि का अंत 27 मार्च 2026 को सुबह 10:07 मिनट पर होगा। ऐसे में नवरात्र की नवमी तिथि का व्रत 27 मार्च को रखा जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2>इस तरह करें पूजन</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि कन्या पूजन के दिन घर आईं कन्याओं का सच्चे मन से स्वागत करना चाहिए। इससे देवी मां प्रसन्न होती हैं। इसके बाद स्वच्छ जल से उनके पैरों को धोना चाहिए। इससे भक्त के पापों का नाश होता है। इसके बाद सभी नौ कन्याओं के पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए। इससे भक्त की तरक्की होती है। पैर धोने के बाद कन्याओं को साफ आसन पर बैठाना चाहिए। अब सारी कन्याओं के माथे पर कुमकुम का टीका लगाना चाहिए और कलावा बांधना चाहिए। कन्याओं को भोजन कराने से पहले अन्य का पहला हिस्सा देवी मां को भेंट करें, िफर सारी कन्याओं को भोजन परोसे। वैसे तो मां दुर्गा को हलवा, चना और पूरी का भोग लगाया जाता है। लेकिन अगर आपका सामाथ्र्य नहीं है तो आप अपनी इच्छानुसार कन्याओं को भोजन कराएं। भोजन समाप्त होने पर कन्याओं को अपने सामथ्र्य अनुसार दक्षिणा अवश्य दें। क्योंकि दक्षिणा के बिना दान अधूरा रहता है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><h2>विवाह में देरी</h2><div>यदि शादी में देरी हो रही है तो पांच साल की कन्या को खाना खिलाकर। श्रृंगार का सामान भेंट करें।</div><div>&nbsp;</div><h2>धन संबंधी समस्या</h2><div>पैसों की कमी से परेशान हैं तो चार साल की कन्या को खीर खिलाएं। इसके बाद पीले कपड़े और दक्षिणा दें।</div><div>&nbsp;</div><h2>शत्रु बाधा और काम में रुकावटें</h2><div>नौ साल की तीन कन्याओं को भोजन सामग्री और कपड़ें दें।</div><div>&nbsp;</div><h2>पारिवारिक क्लेश</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि तीन और दस साल की कन्याओं को मिठाई दें।</div><div>&nbsp;</div><h2>बेरोजगारी</h2><div>छह साल की कन्या को छाता और कपड़ें भेंट करें।</div><div>&nbsp;</div><h2>सभी समस्याओं का निवारण</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पांच से 10 साल की कन्याओं को भोजन सामग्री देकर दूध, पानी या फलों का रस भेंट करें। सौन्दर्य सामग्री भी दें।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 17:59:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/performing-kanya-pujan-during-navratri-brings-liberation-from-troubles</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Yamuna Chhath 2026: यमुना छठ व्रत पर यमुना नदी में स्नान से मिलता है मोक्ष]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-yamuna-river-on-the-day-of-yamuna-chhath-vrat-grants-salvation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यमुना छठ है, इस दिन को मां यमुना के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। साथ ही इस देश के विभिन्न इलाकों में चैती छठ भी किया जाता है तो आइए हम आपको यमुना छठका महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;&nbsp;</div><h2><br>जानें यमुना छठ के बारे में&nbsp;</h2><div>हिन्दू धर्म में चैत्र नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा के साथ-साथ यमुना छठ या यमुना जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। इस दिन यमुना जी का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, इसलिए इसे यमुना जयंती भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चैत्र शुक्ल षष्ठी के पावन दिन ही मां यमुना का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था। इसलिए इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। भक्तगण इस दिन विशेष पूजा-पाठ करते हैं और यमुना जी में स्नान करके पुण्य कमाते हैं। लेकिन, कई बार अनजाने में हम कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिनसे पूजा का पूरा फल हमें नहीं मिल पाता। इसके अलावा इस दिन छठ पर्व भी मनाया जाता है। छठ पर्व कार्तिक मास औरचैत्र मास में मनाया जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-vishnu-1000-life-changing-names-reciting-them-on-thursday-change-your-luck" target="_blank">Lord Vishnu Mantra: Lord Vishnu के 1000 नाम हैं Life Changing, Thursday को पाठ से बदल जाएगी आपकी किस्मत</a></h3><h2>यमुना छठ पर भूलकर भी न करें ये गलतियां</h2><div>यमुना छठ के दौरान लोग पूजा के उत्साह में पूजन सामग्री, प्लास्टिक या कूड़ा-कचरा सीधे नदी में डाल देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, ऐसा करना बहुत ही अशुभ और पाप माना जाता है। इसके अलावा, व्यावहारिक और पर्यावरणीय नजरिए से भी यह हमारी प्रकृति के लिए बेहद खतरनाक है। हमारे शास्त्रों में शुद्धता और साफ-सफाई को सर्वोपरि रखा गया है। अगर आप यमुना जयंती के दिन बिना शुद्ध हुए या बिना स्नान किए पूजा-अर्चना करने बैठ जाते हैं, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उस पूजा का फल आपको कभी नहीं मिलता। मन और शरीर, दोनों की शुद्धि के बाद ही ईश्वर के सामने जाना चाहिए। त्योहारों का उद्देश्य मन की शांति है। इस पवित्र दिन पर किसी से झगड़ा न करें और न ही बुरा सोचें। सच्चे और निर्मल मन से की गई प्रार्थना ही भगवान तक पहुंचती है।</div><div><br></div><h2>यमुना जी का कृष्ण कन्हैया से खास नाता</h2><div>श्रीमद्भागवत में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि यमुना जी सूर्य देव की पुत्री और मृत्यु के देवता यमराज की बहन हैं। इसके साथ ही, भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का मुख्य केंद्र भी यमुना का किनारा ही रहा है। कई कथाओं में तो यमुना जी (कालिंदी) को भगवान कृष्ण की पत्नी भी बताया गया है। इसी वजह से ब्रजवासियों के लिए इस दिन का महत्व और भी खास हो जाता है।</div><div><br></div><h2>यमुना स्नान से भक्तों को मिलता है पुण्य&nbsp;</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्यक्ति यमुना छठ के मौके पर यमुना नदी में आस्था की डुबकी लगाता है, उसके जीवन के सारे अनजाने पाप धुल जाते हैं और उसे अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>यमुना छठ का है खास धार्मिक महत्व</h2><div>यमुना छठ जिसे यमुना जन्मोत्सव भी कहा जाता है हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी यमुना भगवान सूर्य की पुत्री और यमराज की बहन हैं। यमुना जी को भगवान श्री कृष्ण की सबसे प्रिय पटरानी मानी जाती हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन यमुना में स्नान करने से व्यक्ति के अनजाने में किसी गए सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>यमुना छठ पूजा के नियम है विशेष&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार छठ पूजा के दौरान साफ-सफाई का खास ध्यान रखना होता है। वहीं शुद्ध आचार-विचार के साथ सात्विक भोजन ही करना चाहिए। छठ पूजा में जो भी प्रसाद लोगों में बांटने के लिए तैयार किया जाता है। उसे सिर्फ व्रत करने वाले को ही बनाना चाहिए। इसके अलावा छठ पर्व के किसी भी भोजन में लहसुन-प्याज का प्रयोग करना वर्जित होता है।</div><div><br></div><h2>यमुना छठ से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक&nbsp;</h2><div>पुराणों के अनुसार यमुना नदी के जन्म की कथा के अनुसार, यमुना यमराज की बहन हैं और सूर्य देव तथा उनकी पत्नी संज्ञा (या छाया) की पुत्री हैं। यमुना के रोने से उनके आँसुओं का प्रवाह तेज हो गया और उन्होंने एक नदी का रूप धारण कर लिया, जो यमुना नदी के नाम से प्रसिद्ध हुई। यमुना को सूर्यतनया, सूर्यजा और रविनंदिनी भी कहा जाता है। यमुना नदी को भी धरती की नदी नहीं मानते हैं। यह नदी भी आकाश मार्ग से धरती पर उतरी थीं। भगवान सूर्य देव की पत्नी संज्ञा जब सूर्य देव के साथ रहते हुए उनकी गर्मी नहीं बर्दाश्त कर सकीं तो उन्होंने अपनी ही तरह की एक छाया के रूप में एक औरत का निर्माण किया तथा उसे भगवान सूर्य के पास छोड़ कर अपने मायके चली गई। सूर्य देव छाया को ही अपनी पत्नी मानकर एवं जानकर उसके साथ रहने लगे। संज्ञा के गर्भ से दो जुड़वा बच्चों ने जन्म लिया। उसमें लड़के का नाम यम तथा लड़की का नाम यमी पड़ा। यम तो यमराज हुए तथा यमी यमुना हुई। सूर्य की दूसरी पत्नी छाया से शनि का जन्म हुआ। जब यमुना भी अपनी किसी भूल के परिणाम स्वरुप धरती पर आने लगी तों उसने अपने उद्धार का मार्ग भगवान से पूछा। भगवान ने बताया कि धरती पर देव नदी गंगा में मिलते ही तुम पतित पावनी बन जाओगी।</div><div><br></div><h2>जानें यमुना छठ का शुभ मुहूर्त</h2><div>पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 23 मार्च 2026 को शाम 6 बजकर 38 मिनट पर शुरू होगी और 24 मार्च 2026 को शाम 4 बजकर 7 मिनट पर बजे समाप्त होगी। उदया तिथि को मानते हुए यमुना जयंती 24 मार्च को धूमधाम से मनाई जाएगी।</div><div><br></div><h2>यमुना छठ पर ऐसे करें पूजा और अनुष्‍ठान&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार घाटों पर विशेष सफाई, आतिशबाजी और 'नैवेद्यम' का भोग लगाया जाता है। पूजा के पश्चात ब्राह्मण भोज और प्रसाद वितरण की परंपरा है। यमुना छठ के शुभ दिन, भक्त भोर से पहले उठते हैं और सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यमुना नदी में आध्यात्मिक स्नान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन यमुना नदी में स्नान करने से भक्त अपनी आत्मा को शुद्ध कर सकते हैं और शाश्वत आनंद और प्रेम भी प्राप्त कर सकते हैं। इस अवसर पर घाटों की सफाई की जाती है और विशिष्ट 'मुहूर्त' पर देवी यमुना की विशेष पूजा की जाती है। चूंकि देवी यमुना को श्री कृष्ण की सखी माना जाता है, इसलिए भक्त इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा भी करते हैं। यमुना छठ के दिन व्रत रखा जाता है। अगले दिन सुबह की पूजा की रस्में पूरी करने के बाद उपवास तोड़ा जाता है। देवी को चढ़ाने के लिए 'नैवेद्यम' नामक विशेष भोजन प्रसाद तैयार किया जाता है। पूजा समाप्त करने के बाद, ब्राह्मणों को भोजन दान किया जाता है और प्रसाद मित्रों और रिश्तेदारों में वितरित किया जाता है। इसके अलावा यमुना छठ के चैती छठ भी किया जाता है तो चार दिवसीय पर्व है, यह त्योहार देश के विभिन्न हिस्सों में किया जाता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 14:49:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/bathing-in-the-yamuna-river-on-the-day-of-yamuna-chhath-vrat-grants-salvation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Yamuna Chhath 2026: इस दिन यमुना में लगाएं एक Holy Dip, हर पाप से मिलेगी मुक्ति, जानें Puja Vidhi]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/take-holy-dip-in-yamuna-on-this-day-freed-from-all-sins-learn-puja-method]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू पंचांग के मुताबिक हर साल चैत्र माह की षष्टी तिथि को यमुना जयंती या यमुना छठ का महापर्व मनाया जाता है। यह हिंदू धर्म का पवित्र पर्व है। जोकि यमुना नदी के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन यमुना जी की पूजा और व्रत करने का विशेष महत्व होता है। इस बार यह पर्व 24 मार्च 2026 को मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता है कि यमुना छठ के दिन यमुना नदी में स्नान करने और श्रद्धालुओं द्वारा पूजा करने से जातक के सभी पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है। तो आइए जानते हैं यमुना छठ की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>पौराणिक कथा</h2><div>हिंदू पौराणिक कथाओं के मुताबिक सूर्य देव और संज्ञा के घर पर यमुना जी का अवतरण हुआ था। वह यमराज की बहन मानी जाती है। माना जाता है कि पृथ्वी पर जीवों के कल्याण और पापों से मुक्ति देने के लिए यमुना जी ने नदी के रूप में अवतार लिया था। यमुना का उद्गम हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं से माना जाता है। यमुना का जल पवित्र और जीवनदायी माना जाता है, जिसमें स्नान करने से जातक को सभी पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें। संभव हो तो यमुना नदी में स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर सूर्य देव को अर्घ्य दें और फिर यमुना माता की पूजा-अर्चना करें। दीपक जलाएं और फल-फूल व अक्षत अर्पित करें। इसके बाद यमुना माता की स्तुति और व्रत कथा का पाठ करें। वहीं इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को यथासंभव दान करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>धार्मिक मान्यता है कि यमुना जयंती पर व्रत करने और विधि-विधान से पूजा-पाठ करने से जातक को पापों से मुक्ति मिलती है। आय में वृद्धि होती है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यमुना छठ का पर्व भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन व्रत और पूजा-पाठ करने से परिवार में खुशहाली आती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 10:00:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/take-holy-dip-in-yamuna-on-this-day-freed-from-all-sins-learn-puja-method</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lakshmi Panchami 2026: Chaitra Navratri में लक्ष्मी पंचमी का महासंयोग, Maa Lakshmi बरसाएंगी कृपा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/great-coincidence-of-lakshmi-panchami-in-chaitra-navratri-maa-lakshmi-shower-her-blessings]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चैत्र नवरात्रि के दौरान आने वाला लक्ष्मी पंचमी पर्व का विशेष महत्व माना जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को लक्ष्मी पंचमी मनाई जाती है। इस बार यह 23 मार्च 2026 को मनाया जा रहा है। नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है और इस बार लक्ष्मी पंचमी पर बेहद शुभ संयोग बन रहा है। माना जाता है कि मां लक्ष्मी इस दिन सबसे प्रसन्न मुद्रा में होती हैं। अगर आप कर्ज से परेशान हैं या खूब मेहनत करने के बाद भी पैसा आपके हाथ में नहीं टिकता है, तो आपको लक्ष्मी पंचमी का व्रत जरूर करना चाहिए। तो आइए जानते हैं लक्ष्मी पंचमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>द्रिक पंचांग के मुताबिक चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी की शुरूआत 22 मार्च की रात 09:16 मिनट पर हुई है। वहीं आज यानी 23 मार्च की शाम को 06:38 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर आज यानी की 23 मार्च 2026 को लक्ष्मी पंचमी का व्रत किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद सफेद या गुलाबी रंग के कपड़े पहनें। फिर पूजा स्थल पर मां लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करें। अगर आपके पास श्रीयंत्र है तो आज इसकी भी विधि-विधान से पूजा करें। मां लक्ष्मी को गंगाजल और दूध से अभिषेक कराएं और उनको गुलाब या कमल का फूल अर्पित करें। अब गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं और इसमें एक लौंग डाल दें। इससे नकारात्मक एनर्जी दूर होती है। पूजा के अंत में आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>हिंदू धर्म में लक्ष्मी पंचमी का अधिक महत्व होता है। लक्ष्मी पंचमी को 'श्री पंचमी' या 'कल्पादि पंचमी' कहा जाता है। इस दिन व्रत करने से जातक के जीवन में सुख-समृद्धि आती है। वहीं घर की दरिद्रता भी दूर होती है।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः॥</div><div>ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥</div><div>ॐ पृथ्वी त्वया घृता लोका देवि त्वं विष्णुना घृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 11:16:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/great-coincidence-of-lakshmi-panchami-in-chaitra-navratri-maa-lakshmi-shower-her-blessings</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gangaur Festival 2026: राजस्थान का लोकोत्सव है गणगौर पर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/gangaur-festival-2026-is-the-folk-festival-of-rajasthan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजस्थानी परम्परा के लोकोत्सव अपने में एक विरासत को संजोए हुए हैं। राजस्थान को देव भूमि कहा जाय तो गलत नहीं होगा। यहां सभी सम्प्रदाय फले फूले हैं। यहाँ के शासकों ने विश्व कल्याण की भवना से अभिभूत होकर लोक मान्यताओं का सम्मान किया है। इसी कारण यहां सभी देवी देवताओं के उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं। गणगौर का उत्सव भी ऐसा ही लोकोत्सव है। जिसकी पृष्ठ भूमि पौराणिक है। समय के प्रभाव से उनमें शास्त्राचार के स्थान पर लोकाचार हावी हो गया है। परन्तु भाव भंगिमा में कोई कमी नहीं आई है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>गणगौर भी राजस्थान का ऐसा ही एक प्रमुख लोक पर्व है। लगातार 17 दिनों तक चलने वाला गणगौर का पर्व मूलतः कुंवारी लड़कियों व महिलाओं का त्यौंहार है। राजस्थान की महिलाएं चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हो गणगौर के पर्व को पूरी उत्साह के साथ मनाती है। विवाहिता एंव कुवारी सभी आयु वर्ग की महिलायें गणगौर की पूजा करती है। होली के दूसरे दिन से सोलह दिनों तक लड़कियां प्रतिदिन प्रातः काल ईसर-गणगौर को पूजती हैं। जिस लड़की की शादी हो जाती है वो शादी के प्रथम वर्ष अपने पीहर जाकर गणगौर की पूजा करती है। इसी कारण इसे सुहागपर्व भी कहा जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/for-unbroken-good-fortune-and-long-life-of-husband-observe-fast-with-this-method-today" target="_blank">Gangaur Vrat Puja: अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र के लिए आज इस विधि से करें व्रत, जानें Muhurat</a></h3><div>गणगौर एक प्रमुख त्योहार है। यह मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में मनाया जाता है। गणगौर दो शब्दों गण और गौर से बना है। इसमें गण का अर्थ भगवान शिव और गौर का अर्थ माता पार्वती से है। इस दिन अविवाहित कन्याएं और विवाहित स्त्रियां भगवान शिव, माता पार्वती की पूजा करती हैं। साथ ही उपवास रखती हैं। कई क्षेत्रों में भगवान शिव को ईसर जी और देवी पार्वती को गौरा माता के रूप में पूजा जाता है। गौरा जी को गवरजा जी के नाम से भी जाना जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार श्रद्धाभाव से इस व्रत का पालन करने से अविवाहित कन्याओं को इच्छित वर की प्राप्ति होती है और विवाहित स्त्रियों के पति को दीर्घायु और आरोग्य की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><div>राजस्थान की राजधानी जयपुर में गणगौर उत्सव दो दिन तक धूमधाम से मनाया जाता है। सरकारी कार्यालयों में आधे दिन का अवकाश रहता है। ईसर और गणगौर की प्रतिमाओं की शोभायात्रा राजमहल से निकलती है। इनको देखने बड़ी संख्या में देशी-विदेशी सैनानी उमड़ते हैं। सभी उत्साह से भाग लेते हैं। इस उत्सव पर एकत्रित भीड़ जिस श्रृद्धा एवं भक्ति के साथ धार्मिक अनुशासन में बंधी गणगौर की जय-जयकार करती हुई भारत की सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह करती है उसे देख कर अन्य धर्मावलम्बी भी इस संस्कृति के प्रति श्रृद्धा भाव से ओतप्रोत हो जाते हैं। ढूंढाड़ की भांति ही मेवाड़, हाड़ौती, शेखावाटी सहित इस मरुधर प्रदेश के विशाल नगरों में ही नहीं बल्कि गांव-गांव में गणगौर पर्व मनाया जाता है एवं ईसर-गणगौर के गीतों से हर घर गुंजायमान रहता है।</div><div><br></div><div>कहा जाता है कि चैत्र शुक्ला तृतीया को राजा हिमाचल की पुत्री गौरी का विवाह शंकर भगवान के साथ हुआ था। उसी की याद में यह त्यौहार मनाया जाता है। गणगौर व्रत गौरी तृतीया चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि को किया जाता है। इस व्रत का राजस्थान में बड़ा महत्व है। कहते हैं इसी व्रत के दिन देवी पार्वती ने अपनी उंगली से रक्त निकालकर महिलाओं को सुहाग बांटा था। इसलिए महिलाएं इस दिन गणगौर की पूजा करती हैं। कामदेव मदन की पत्नी रति ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया तथा उन्हीं के तीसरे नेत्र से भष्म हुए अपने पति को पुनः जीवन देने की प्रार्थना की। रति की प्रार्थना से प्रसन्न हो भगवान शिव ने कामदेव को पुनः जीवित कर दिया तथा विष्णुलोक जाने का वरदान दिया। उसी की स्मृति में प्रतिवर्ष गणगौर का उत्सव मनाया जाता है। गणगौर पर्व पर विवाह के समस्त नेगचार व रस्में की जाती है।</div><div><br></div><div>होलिका दहन के दूसरे दिन गणगौर पूजने वाली लड़कियां होली दहन की राख लाकर उसके आठ पिण्ड बनाती हैं एवं आठ पिण्ड गोबर के बनाती हैं। उन्हें दूब पर रखकर प्रतिदिन पूजा करती हुई दीवार पर एक काजल व एक रोली की टिकी लगाती हैं। शीतलाष्टमी तक इन पिण्डों को पूजा जाता है। फिर मिट्टी से ईसर गणगौर की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजती हैं। लड़कियां प्रातः ब्रह्ममुहुर्त में गणगौर पूजते हुये गीत गाती हैं:-</div><div><br></div><div><b>गौर ये गणगोर माता खोल किवाड़ी, छोरी खड़ी है तन पूजण वाली।</b></div><div><br></div><div>गीत गाने के बाद लड़कियां गणगौर की कहानी सुनती है। दोपहर को गणगौर के भोग लगाया जाता है तथा कुए से लाकर पानी पिलाया जाता है। लड़कियां कुए से ताजा पानी लेकर गीत गाती हुई आती हैं:-</div><div><br></div><div><b>म्हारी गौर तिसाई ओ राज घाट्यारी मुकुट करो,</b></div><div><b>बीरमदासजी रो ईसर ओराज, घाटी री मुकुट करो,</b></div><div><b><br></b></div><div><b>म्हारी गौरल न थोड़ो पानी पावो जी राज घाटीरी मुकुट करो।</b></div><div><br></div><div>लड़कियां गीतों में गणगौर के प्यासी होने पर काफी चिन्तित लगती है एवं गणगौर को जल्दी से पानी पिलाना चाहती है। पानी पिलाने के बाद गणगौर को गेहूं चने से बनी घूघरी का प्रसाद लगाकर सबको बांटा जाता है और लड़कियां गीत गाती हैं:-</div><div><br></div><div><b>म्हारा बाबाजी के माण्डी गणगौर, दादसरा जी के माण्ड्यो रंगरो झूमकड़ो,</b></div><div><b>ल्यायोजी - ल्यायो ननद बाई का बीर, ल्यायो हजारी ढोला झुमकड़ो।</b></div><div><br></div><div>रात को गणगौर की आरती की जाती है तथा लड़कियां नाचती हुई गाती हैं। गणगौर पूजन के मध्य आने वाले एक रविवार को लड़कियां उपवास करती हैं। प्रतिदिन शाम को क्रमवार हर लडकी के घर गणगौर ले जायी जाती है। जहां गणगौर का ’’बिन्दौरा’’ निकाला जाता है तथा घर के पुरुष लड़कियों को भेंट देते हैं। लड़कियां खुशी से झूमती हुई गाती हैं:-</div><div><br></div><div><b>ईसरजी तो पेंचो बांध गोराबाई पेच संवार ओ राज म्हे ईसर थारी सालीछां।</b></div><div><br></div><div>गणगौर विसर्जन के पहले दिन गणगौर का सिंजारा किया जाता है। लड़कियां मेहन्दी रचाती हैं। नये कपड़े पहनती हैं, घर में पकवान बनाये जाते हैं। सत्रहवें दिन लड़कियां नदी, तालाब, कुए, बावड़ी में ईसर गणगौर को विसर्जित कर विदाई देती हुई दुःखी हो गाती हैं:-</div><div>गोरल ये तू आवड़ देख बावड़ देख तन बाई रोवा याद कर।</div><div><br></div><div>गणगौर की विदाई का बाद कई महिनो तक त्यौहार नहीं आते इसलिए कहा गया है-’’तीज त्यौहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर’’। अर्थात् जो त्यौहार तीज (श्रावणमास) से प्रारम्भ होते हैं उन्हें गणगौर ले जाती है। ईसर-गणगौर को शिव पार्वती का रूप मानकर ही बालाऐं उनका पूजन करती हैं। गणगौर के बाद बसन्त ऋतु की विदाई व ग्रीष्म ऋृतु की शुरुआत होती है। दूर प्रान्तों में रहने वाले युवक गणगौर के पर्व पर अपनी नव विवाहित प्रियतमा से मिलने अवश्य आते हैं। जिस गोरी का साजन इस त्यौहार पर भी घर नहीं आता वो सजनी नाराजगी से अपनी सास को उलाहना देती है। ’’सासू भलरक जायो ये निकल गई गणगौर, मोल्यो मोड़ों आयो रे’’।</div><div><br></div><div>गणगौर महिलाओं का त्योहार माना जाता है इसलिए गणगौर पर चढ़ाया हुआ प्रसाद पुरुषों को नहीं दिया जाता है। गणगौर के पूजन में प्रावधान है कि जो सिंदूर माता पार्वती को चढ़ाया जाता है महिलाएं उसे अपनी मांग में सजाती हैं। शाम को शुभ मुहूर्त में गणगौर को पानी पिलाकर किसी पवित्र सरोवर या कुंड आदि में इनका विसर्जन किया जाता है।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता है इस लोकोत्सव को अच्छे वातावरण में मनाये। हमारी प्राचीन परम्परा को अक्षुण बनाये रखे। इसका दायित्व है उन सभी सांस्कृतिक परम्परा के प्रेमियों पर है जिनका इससे लगाव है। जो ऐसे पर्वो को सिर्फ पर्यटक व्यवसाय की दृष्टि से न देखकर भारत के सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से देखने के हिमायती हैं।अब राजस्थान पर्यटन विभाग की वजह से हर साल मनाए जाने वाले इस गणगौर उत्सव में शामिल होने कई देशी-विदेशी पर्यटक भी पहुँचने लगे हैं।</div><div><br></div><div>- रमेश सर्राफ धमोरा</div><div>(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 12:26:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/gangaur-festival-2026-is-the-folk-festival-of-rajasthan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Gangaur Vrat Puja: अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र के लिए आज इस विधि से करें व्रत, जानें Muhurat]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/for-unbroken-good-fortune-and-long-life-of-husband-observe-fast-with-this-method-today]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को गणगौर मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 21 मार्च 2026 को गणगौर व्रत किया जा रहा है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत करती हैं। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा की जाती है। बता दें कि यह सिर्फ एक व्रत नहीं है, बल्कि भोलेनाथ और मां पार्वती के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। तो आइए जानते हैं गणगौर पूजा की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>आज यानी की 21 मार्च की सुबह 02:31 मिनट पर तृतीया तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति रात 11:57 मिनट पर समाप्त होगी। पंचांग के आधार पर 21 मार्च 2026 को गणगौर व्रत किया जा रहा है। वहीं आज रवि योग बन रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि&nbsp;</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर पूजाघर को साफ करके लकड़ी की चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। फिर मिट्टी या लकड़ी से बनी ईसर यानी की भगवा शिव और मां गौरी की मूर्ति को स्थापित करें। एक कलश में गंगाजल भरें और इसके ऊपर गेहूं के ज्वारे रखें। अब मां गौरी को मेहंदी, कुमकुम, चूड़ियां, मंगलसूत्र और नए वस्त्र आदि अर्पित करें। षोडशोपचार विधि से पूजा करें और फल-फूल, जल, धूप, अक्षत, नैवेद्य आदि अर्पित करें। पूजा के अंत में आरती करें और प्रसाद वितरित करें।&nbsp;</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ॐ ह्रीं गौरीपतये स्वाहा&nbsp;</div><div>कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>इस दिन महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। वहीं अविवाहित महिलाएं योग्य जीवनसाथी के लिए प्रार्थना करती हैं। गणगौर का पर्व होली के बाद शुरू होता है। यह 18 दिनों तक चलता है और तृतीया तिथि को समाप्त होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 11:16:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/for-unbroken-good-fortune-and-long-life-of-husband-observe-fast-with-this-method-today</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Matsya Jayanti 2026: जब Pralay से बचाने आए Vishnu के First Avatar, जानें मत्स्य जयंती का पौराणिक महत्व और कथा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/first-incarnation-of-vishnu-came-to-save-us-from-deluge-learn-mythological-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मत्स्य अवतार भगवान श्रीहरि विष्णु के पहले अवतार हैं। सतयुग में मत्स्य अवतार में श्रीहरि एक मछली के रूप में प्रकट हुए थे। उन्होंने जल प्रलय से राजा सत्यव्रत, प्रजापतियों और सप्तऋषियों की रक्षा की थी। मत्स्य जयंती पर भक्त व्रत करते हैं और भगवान विष्णु के मस्त्य अवतार की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्रम् का पाठ करना शुभ माना जाता है। इस बार आज यानी की 21 मार्च 2026 को मत्स्य जयंती मनाई जा रही है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 21 मार्च की रात 02:30 मिनट पर शुरू हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति 21 मार्च की रात 11:56 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 21 मार्च 2026 को मत्स्य जयंती मनाई जा रही है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 01:41 मिनट से शाम 04:07 मिनट तक है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लें। फिर गंगाजल से मंदिर को पवित्र करें और लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। इसके बाद भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का ध्यान करके पीले फूल, तुलसी और प्रसाद अर्पित करें। वहीं 'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:' मंत्र का जाप करें। इस दिन गरीबों को दान दें और जरूरतमंदों की सहायता करें। वहीं संभव हो तो विष्णु सहस्त्रनाम स्त्रोत का पाठ करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>हिंदू मान्यताओं के मुताबिक जब पृथ्वी पर प्रलय आने वाली थी, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य का रूप धारण किया था। इस अवतार के जरिए उन्होंने राजा सत्यव्रत को जीवन और सृष्टि के संरक्षण का मार्ग दिखाया था। इस दिन व्रत, पूजा और दान आदि करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 10:58:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/first-incarnation-of-vishnu-came-to-save-us-from-deluge-learn-mythological-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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