जैसलमेर में मरू उत्सव के साथ पर्यटन का लें मज़ा

Jaisalmer

जैसलमेर के अमरसागर प्रोल के पास मंदिर पैलेस में गगनचुम्बी जहाजनुमा 19 वीं शताब्दी की इमारत बादल विलास कलात्मक सुन्दरता के कारण अनूठी कृति है। पांच मंजिलों वाली यह इमारत बारिक नक्काशी कार्य और कलात्मक सुंदरता के कारण विश्व स्तरीय पहचान बना चुकी है।

उत्सव के साथ रेगिस्तान की स्वर्ण नगरी जैसलमेर दर्शन का बेहतरीन अवसर है जबकि 13 से 16 फ़रवरी 2022 तक विख्यात मरू उत्सव का आयोजन किया जा रहे हैं। कोरोना काल में ठप हो गए पर्यटन व्यवसाय की उम्मीदों को फिर से पंख लगेंगे, इससे जुड़े तमाम लोग में खुशी की लहर हैं। नव नियुक्त जिला कलेक्टर प्रतिभा सिंह उत्सव को यादगार बनाने के लिए जुटी हैं। उत्सव के दौरान कई कल्चरल इवेंट के साथ सेलिब्रिटीज नाइट, पोकरण, खूहड़ी और सम के रेतीले टीलों पर कार्यक्रमों के साथ-साथ मरूश्री, मिस मूमल, मूछ प्रतियोगिता, साफा बांध, मूमल महिन्द्रा, ऊंट श्रृंगार तथा शान ए मरूधरा, पणिहारी मटका रेस आदि प्रतियोगिता एवं एडवेंचर स्पोर्ट्स आदि के रोचक कार्यक्रम पर्यटकों के लिए किए जाएंगे। पर्यटन विभाग ने इस बार उत्सव को "उम्मीदों की नई उड़ान" नाम दिया है। लोक वाद्ययों की ताल पर गायकों की सुरीले स्वर एवं लोक कलाकारों के लुभावने नृत्य वातावरण को रेगिस्तानी अंचल की लोक संस्कृति का प्रतीक बना देते हैं और गीतों और नृत्यों पर विदेशी भी थिरकने को मजबूर हो जाते हैं। इस अवसर सैलानी  पर्यटक स्थलों को देखने का लुत्फ भी ले सकते हैं।

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सोनार किला

रेगिस्तान का अविभूत करने वाला सोनार किले के अन्दर मध्ययुगीन जीवन एवं ऐश्वर्य का जादू दिखाई देता है जो भव्य महलों, हवेलियों, मंदिरों में अनाम शिल्पियों की कारीगरी का जीवन्त उदाहरण है। त्रिकूट पर्वत पर बना सोनार किला जमीन से 250 फीट की ऊँचाई पर स्थित किला सूर्योदय एवं सूर्यास्त में सोने सा दमकता है। किला 1500 फीट लम्बा एवं 700 फीट चौड़ा है तथा किले में 30-30 फीट ऊँचे 99 बुर्ज बने हैं। दोहरी सुरक्षा व्यवस्था के चलते यह किला हमेशा अभेद्य रहा। किले में प्रवेश के लिए अखेपोल, सूरजपोल, गणेशपोल एवं हवापोल चार दरवाजे बने हैं। यहां बना रंग महल, गजनिवास एवं मोती महल स्थापत्य कला के शानदार नमूने हैं। महलों में भित्ती चित्र तथा लकड़ी पर की गई बारिक नक्काशी का कार्य देखने योग्य है। महलों में पत्थर की सुन्दर जालियां एवं झरोखें सुन्दरता प्रदान करते हैं। महलों के सामने आदिनारायण एवं शक्ति के मंदिर बने हैं। दुर्ग में लक्ष्मीनाथ जी का एक मात्र हिन्दू मंदिर सोने व चाँदी के कपाटों के कारण विशेष महत्व रखता है। आस-पास कारीगरी में अनुपम जैन मंदिर 14 वीं एवं 15 वीं शताब्दी की स्थापत्य व मूर्ति कला का सुन्दर नमूने हैं। मंदिरों के तल गृह में जिन भद्र सूरी ज्ञान भण्डार में दुर्लभ एवं प्राचीन पाण्डुलिपियों का संग्रह किया गया है। 

गड़सीसर झील

गड़सीसर झील जैसलमेर के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है जिसे राजा रावल जैसल द्वारा बनाया गया था। कुछ वर्षों बाद इसका पुननिर्माण महाराजा गरीसिसार सिंह द्वारा किया था और झील को पुनरूजीवित किया। झील का प्रवेश द्वार तिलोन-की-पोल के जरिए है, इसके महराबो को शानदार और कलात्मक ढंग से पीले बलुआ पत्थर से बनाया गया है। तिलोंन की पोल को हिंदू देवता विष्णु की मूर्ति से सजाया गया है जो 1908 में स्थापित की गयी थी। झील के किनारे कलात्मक रूप से नक्काशीदार छत्तीस मंदिर, देवगृह और घाटों से घिरा हुआ है। यह सुबह-सुबह जैसलमेर किले की फोटो लेने के लिए सबसे अच्छी जगह है जब सूरज की पहली किरणों से किला सुनहरे रंग का दिखता है। यह कई पक्षीयों को देखने वाला स्थल भी है जो जैसलमेर शहर का एक बड़ा आकर्षण है। यहीं पर एक संग्रहालय भी दर्शनीय है।

बादल विलास

जैसलमेर के अमरसागर प्रोल के पास मंदिर पैलेस में गगनचुम्बी जहाजनुमा 19 वीं शताब्दी की इमारत बादल विलास कलात्मक सुन्दरता के कारण अनूठी कृति है। पांच मंजिलों वाली यह इमारत बारिक नक्काशी कार्य और कलात्मक सुंदरता के कारण विश्व स्तरीय पहचान बना चुकी है। इसे महारावलों के निवास हेतु बनाया गया था। सैलानी इसको जब निहारते है तो इस इमारत से उनकी नजरें ही नहीं हटती, वे इसके नजारे को कैमरे में बंद कर ले जाते हैं। यह इमारत स्वर्णनगरी भ्रमण करने वाले सैलानियों को दूर से ही अपनी ओर आकर्षित करती है।

पटुओं की हवेली

पटवों की हवेलियाँ अट्ठारवीं शताब्दी से सेठ पटवों द्वारा बनवाई गई थीं। अनेक सुन्दर झरोखों से युक्त ये हवेलियाँ निसंदेह कला का सर्वोत्तम उदाहरण है। ये कुल मिलाकर पाँच हवेलियां हैं, जो कि एक-दूसरे से सटी हुई हैं। ये हवेलियाँ भूमि से करीब 10 फीट ऊँचे चबूतरे पर बनी हुई है व जमीन से ऊपर छः मंजिल हैं एवम भूमि के अंदर एक मंजिल होने से कुल 7 मंजिली हैं। पाँचों हवेलियों के आगे के बाहर की ओर बारीक नक्काशी व विविध प्रकार की कलाकृतियाँ युक्त खिड़कियों, छज्जों व रेलिंग से अलंकृत किया गया है जिससे हवेलियाँ अत्यंत भव्य व कलात्मक दृष्टि से अत्यंत सुंदर व आकर्षक लगती हैं।

दीवान नाथमल की हवेली

पाँच मंजिली पीले पत्थर से निर्मित दीवान मेहता नाथमल की हवेली का कोई जबाव नहीं है। सन 1884-85 ई. में बनी हवेली में सुक्ष्म खुदाई मेहराबों से युक्त खिड़कियों, घुमावदार खिड़कियों तथा हवेली के अग्रभाग में की गई पत्थर की नक्काशी पत्थर के काम की दृष्टि से अनुपम है। इन अनुपम कृतियों का निर्माण प्रसिद्ध शिल्पी हाथी व लालू उपनाम के दो मुस्लिम कारीगरों ने किया था। हवेली में पत्थर की खुदाई के छज्जे, छावणे, स्तंभों, मौकियों, चापों, झरोखों, कंवलों, तिबरियों पर फूल, पत्तियां, पशु-पक्षियों की बडी ही मनमोहक आकृतियां बनी हैं। कुछ नई आकृतियां जैसे स्टीम इंजन, सैनिक, साईकल, उत्कृष्ट नक्काशी युक्त घोडे, हाथी आदि उत्कीर्ण हैं।

सालिम सिंह की हवेली

सालिम सिंह की हवेली छह मंजिली इमारत है, जो नीचे से संकरी और ऊपर से निकलती-सी स्थात्य कला का प्रतीक है। जहाजनुमा इस विशाल भवन आकर्षक खिड़कियां, झरोखे तथा द्वार हैं। नक्काशी यहाँ के शिल्पियों की कलाप्रियता का प्रमाण है। इस हवेली का निर्माण दीवान सालिम सिंह द्वारा करवाया था। हवेली की सर्वोच्च मंजिल जो भूमि से लगभग 80 फीट की उँचाई पर है, मोती महल कहलाता है। कहा जाता है कि मोतीमहल के ऊपर लकडी की दो मंजिल और भी थी, जिनमें कांच व चित्रकला का काम किया गया था। जिस कारण वे कांचमहल व रंगमहल कहलाते थे, उन्हें सालिम सिंह की मृत्यु के बाद राजकोप के कारण उतरवा दिया गया। इसके चारों ओर उनतालीस झरोखे व खिड़कियां हैं। इन झरोखों तथा खिड़कियों पर अलग-अलग कलाकृति उत्कीर्ण हैं। इनपर बनी हुई जालियाँ पारदर्शी हैं। इन जालियों में फूल-पत्तियाँ, बेलबूटे तथा नाचते हुए मोर की आकृति उत्कीर्ण हैं।

राष्ट्रीय मरू उद्यान अभयारण्य  

इस उद्यान में करीब 700 प्रजातियों की वनस्पति पाई जाती है। जिसमें से केवल घास ही 107 प्रजातियां हैं। रेतीले क्षेत्रे में सबसे अधिक जो पौधा पाया जाता है वह है सेवन घास। अन्य प्रमुख प्रजातियां हैं- सीनिया, खींप, फोग, बोंवली, भुई, मूरठ, लाना आदि। केर, लांप, मूरठ, बेर आदि प्रजातियां पशुओं के चारे के लिए काम में ली जाती हैं। खेजड़ी मरूस्थल का सबसे महत्वपूर्ण पौधा है। यहाँ के भू-दृश्य को रंग रूप प्रदान करने वाला पौधा रोहिड़ा भी है। अन्य वृक्षों में बेर, बोरडी, कुमठ जाल, आक, थोर, गगूल, टांटियां और गांठिया आदि हैं।

आकल वुड फॉसिल पार्क

यह जैसलमर से मात्र 15 किलोमीटर दूर जैसलर-बाड़मेर रोड पर स्थित है और 21 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। लाखों वर्ष पूर्व यहाँ पाए जाने वाले सागरीय जीवों के जीवाश्मों के लिए यह प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में फैले हुए 25 वुड फॉसिल विद्यमान हैं, जिसमें से 10 फॉसिल का काफी भाग पृथ्वी की सतह से ऊपर अनावृत है। सबसे बड़े फॉसिल की लम्बाई 7 मीटर एवं परिधि डेढ़ मीटर है। पर्यटन की दृष्टि से राष्ट्रीय मरू उद्यान का अत्यन्त महत्व है।

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सम के धोरे

रेगिस्तान में पहुँचकर रेत के धोरें नहीं देखें यह कैसे हो सकता है। जैसलमेर से 42 कि.मी. दूर सम एवं 45 कि.मी. दूर खुहड़ी के रेतीले धोरों का आकर्षण सैलानियों के लिए किसी भी प्रकार कम नहीं है। बालू के लहरदार धोरों पर जब संध्याकाल में सूर्य की किरणें अपनी आभा फैलाती हैं तो इनका रंग सुनहरा हो जाता है जो देखने वालों के दिल को छू लेता है। बालू के टीलों पर ऊँट की सवारी करना तथा स्थानीय कलाकारों के लोक संगीत का आनन्द लेने का अपना अलग ही मजा हैं। रात्रि में इन धोरों के समीप स्थित खुले मंच पर लोक कलाकारों के गीत-संगीत, नृत्य आदि का आनन्द भी सैलानी उठाते हैं। 

लौद्रवा  

जैसलमेर से 13 किमी. दूरी पर लौद्रवा का जैन मंदिर 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। गर्भगृह में सहसत्रफणी पार्श्वनाथ की साढ़े तीन फीट ऊंची श्याम वर्णीय कसौटी पत्थर की भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसकी प्रतिष्ठा आचार्य श्री जिनपति सूरी द्वारा संवत् 1263 में कराई गई थी। इस मूर्ति के ऊपर हीरा जड़ा हुआ है जो मूर्ति के अनेक रूपों का दर्शन कराता है। मंदिर का तोरण द्वार, प्रत्येक स्तम्भ, प्रवेश द्वार एवं शिखर पर शिल्पकारों की कल्पना अद्वितीय रूप में दिखाई देती है। चीनी शैली में निर्मित मंदिर का शिखर, भगवान की प्राचीन प्रतिमा तथा प्रवेश द्वार का ऊपरी भाग देखकर ही देलवाड़ा, रणकपुर और खजुराहो मंदिरों की याद ताजा हो उठती है। मंदिर के चारों कोनों पर एक-एक मंदिर बनाया गया है। मंदिर जैसलमेर के पीले पत्थर से निर्मित है। स्तम्भों पर फूल-पत्तियों की बारीक खुदाई, मंदिर के पास निर्मित समोशरण के ऊपर अष्टापद गिरी तथा मंदिर परिसर में कलात्मक तोरण द्वार एवं कल्पवृक्ष की कोरणी अत्यन्त मनोहारी है।

तनोटराय माता मंदिर

भारत और पाकिस्तान सीमा पर जैसलमेर से 120 किलोमीटर दूर स्थित तनोटराय मातेश्वरी के मंदिर की बात ही निराली है। कहा जाता है कि 1965 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना द्वारा इस मंदिर पर भारी बमबारी की गई परन्तु मंदिर को जरा भी क्षति नहीं हुई। रेगिस्तान के धोरों के बीच भारत-पाक सीमा पर तनोट माता के दर्शन करना अपने आप में रोमांच उत्पन्न करता है।

जैसलमेर में ठहरने के लिए बजट होटल से लेकर पांच सितारा होटल हैं और भोजन राजस्थानी सहित सभी प्रकार के भोजन की अच्छी सुविधा है। भ्रमण के लिए जीप, टैक्सी कार, ऑटो साधन स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हैं। जैसलमेर राज्य की राजधानी जयपुर के 575 कि.मी दूर है। राजस्थान के सभी शहरो से सड़क मार्ग से जुड़ा है। तथा रेल द्वारा जयपुर से जुड़ा है। जो दिल्ली देश की राजधानी से जोड़ता है। हवाई अड्डा भी है जो स्पाइस गैट द्वारा दिल्ली एवं मुंबई से जुड़ा है। जैसलमेर से 285 किमी. दूर जोधपुर मे एयरपोर्ट सेवा उपलब्ध हैं। 

- डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

पूर्व संयुक्त निदेशक, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, राजस्थान

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