AMU ने अपने पाठ्यक्रम से क्यों हटाये अबुल आला मौदूदी और सैयद कुतुब के विचार?

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हम आपको बता दें कि अबुल आला मौदूदी (1903-1979) एक भारतीय इस्लामी विद्वान थे जो हिंदुस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे। वह जमात-ए-इस्लामी नामक एक प्रमुख मुस्लिम धार्मिक संगठन के संस्थापक भी थे।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने दो प्रमुख इस्लामिक प्रचारकों के विचारों को अपने पाठ्यक्रम से हटा दिया है। बीसवीं सदी के दो प्रमुख इस्लामी प्रचारकों अबुल आला मौदूदी और सैयद कुतुब के विचारों को पाठ्यक्रम से इसलिए हटाया गया है क्योंकि यह कट्टरवाद के विचार वाले थे। इनके विचारों को पढ़ाये जाने से जिहादी विचारधारा को बढ़ावा मिल रहा था। इन दोनों इस्लामी प्रचारकों के विचारों को पढ़ाये जाने का विरोध करते हुए कई प्रमुख बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि अबुल आला मौदूदी दुनिया में हर जगह गैर मुसलमानों के नरसंहार का आह्वान करते हैं और उनकी शिक्षाएं गैर मुस्लिम विरोधी हैं। अबुल आला मौदूदी की विचारधारा से प्रभावित होकर ही इंडियन मुजाहिदीन, जेकेएलएफ, हुर्रियत, रजा अकादमी, सिमी और द पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया आदि जैसे संगठन भी बने।

हम आपको बता दें कि अबुल आला मौदूदी (1903-1979) एक भारतीय इस्लामी विद्वान थे जो हिंदुस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे। वह जमात-ए-इस्लामी नामक एक प्रमुख मुस्लिम धार्मिक संगठन के संस्थापक भी थे। उनकी कृतियों में "तफहीम उल कुरान" भी शामिल है। अबुल आला मौदूदी ने वर्ष 1926 में दारुल उलूम देवबंद से स्नातक की डिग्री हासिल की थी। वह धार्मिक बहुलतावाद के पैरोकार थे।

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एक अन्य इस्लामी विद्वान सैयद कुतुब जिनके विचारों को एएमयू के पाठ्यक्रम से हटाया गया है, वह मिस्र के रहने वाले थे और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के पैरोकार थे। वह इस्लामिक ब्रदरहुड नामक संगठन के प्रमुख सदस्य भी रहे। उन्हें मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति गमल अब्दुल नासिर का विरोध करने पर जेल भी भेजा गया था। सैयद कुतुब ने एक दर्जन से ज्यादा रचनाएं लिखी थीं। उनकी सबसे मशहूर कृति 'फी जिलाल अल कुरान' थी जोकि कुरान पर आधारित है।

हाल ही में 20 से ज्यादा विद्वानों ने इस्लामी विद्वानों अबुल आला मौदूदी और सैयद कुतुब के विचारों को आपत्तिजनक करार देते हुए इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था। इस पत्र में कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और हमदर्द विश्वविद्यालय सहित सरकार की ओर वित्त पोषित इस्लामी विश्वविद्यालय में अपनाए जा रहे जिहादी इस्लामी पाठ्यक्रम पर रोक लगायी जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि मौलाना मौदूदी की लिखित किताबों को एएमयू के ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, एमफिल और पीएचडी की क्लासों में पढ़ाये जाने की बात सामने आई है। यही नहीं यह पुस्तकें इस्लामिक स्टडीज विभाग की लाइब्रेरी में भी उपलब्ध हैं। 

बहरहाल, जब इस मुद्दे पर जब हंगामा बढ़ा तो अब विश्वविद्यालय ने सफाई पेश की है। इन दोनों के विचारों को पाठ्यक्रम से हटाने पर एएमयू के प्रवक्ता उम्र पीरजादा ने कहा कि इन दोनों इस्लामी विद्वानों की कृतियां विश्वविद्यालय के वैकल्पिक पाठ्यक्रमों का हिस्सा थीं, इस वजह से उन्हें हटाने से पहले एकेडमिक काउंसिल में इस पर विचार विमर्श करने की प्रक्रिया अपनाने की 'कोई जरूरत नहीं' थी। एएमयू ने कहा है कि "हमने इस मामले पर उठे विवाद को और आगे बढ़ने से रोकने के लिए यह कदम उठाया है। इसे शैक्षणिक स्वतंत्रता के अतिक्रमण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।"

- नीरज कुमार दुबे

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