सामरिक स्पर्धा का केंद्र बन रहा है मध्य एशिया, भारत के लिए कई अवसर और चुनौतियां

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मध्य एशिया से नज़दीकी रिश्ते भारत के हित में हैं लेकिन इसमें चुनौतियां भी हैं। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण मध्य एशिया कई देशों की भू-राजनीतिक स्पर्धा का केंद्र रहा है। विशेष तौर पर रूस, तुर्की और चीन के बीच चल रही स्पर्धा में भारत को अपनी स्थिति मज़बूत करनी होगी।

18 और 19 दिसंबर को नई दिल्ली में तीसरी भारत-मध्य एशिया वार्ता संपन्न हुई जिसमें भारत और पांच मध्य एशियाई देशों- कज़ाकस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान - के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया। इस वार्ता के दौरान भी भारत ने कहा की वह मध्य एशिया के साथ अपने संबंधों को अगले स्तर पर ले जाने के लिए तैयार है। 

पिछले कुछ समय से भारत लगातार मध्य एशियाई देशों के साथ अपने संबंध मज़बूत करने पर ध्यान दे रहा है। तीन दशक पहले सोवियत संघ के विघटन के बाद अस्तित्व में आए पांच मध्य एशियाई देशों से भारत के संबधों को गति मिलना हाल की में शुरू हुआ है। इसकी शुरुआत 2015 में हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी पांच मध्य एशियाई देशों का दौरा किया। उसके बाद 2019 में भारत-मध्य एशिया वार्ता के शुरुआत हुई। 2019 से ही भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच सैन्य अभ्यास 'दस्तलीक' का प्रारंभ हुआ। इस अभ्यास के अभी तक दो संस्करण हो चुके हैं।

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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन स्थापित होने बाद से भारत के लिए इस क्षेत्र का महत्त्व और भी बढ़ गया है। इसी वजह से भारत भी मध्य एशियाई देशों से अपने संपर्क को तेज़ी से बढ़ाने के प्रयास कर रहा है। 

अगस्त में काबुल पर तालिबान का कब्ज़ा होने के बाद नवंबर में भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की एक एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में रूस और ईरान के अलावा कज़ाकस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी शामिल हुए। इस महीने में भारत और मध्य एशियाई देशों के विदेश मंत्रियों के बीच वार्ता हुई। अगले महीने गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत ने सभी पांच मध्य एशियाई देशों के शीर्ष नेतृत्त्व को विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया है। इस तरह लगातार तीन महीनों में भारत मध्य एशियाई देशों के साथ तीन अलग अलग स्तर पर संपर्क बनाकर इस क्षेत्र से अपने संबंध मज़बूत करने की ओर बढ़ रहा है। दोनों के लिए आतंकवाद एक प्रमुख चुनौती है। मध्य एशिया प्राकृतिक गैस और खनिज संसाधनों का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है जो भारत की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में मददगार साबित हो सकता है। 

मध्य एशिया से नज़दीकी रिश्ते भारत के हित में हैं लेकिन इसमें चुनौतियां भी हैं। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण मध्य एशिया कई देशों की भू-राजनीतिक स्पर्धा का केंद्र रहा है। विशेष तौर पर रूस, तुर्की और चीन के बीच चल रही स्पर्धा में भारत को अपनी स्थिति मज़बूत करनी होगी।

रूस 

विघटन से पहले सभी मध्य एशियाई देश सोवियत संघ का हिस्सा थे। इस वजह से रूस आज भी इन देशों में अपना प्रभाव कायम रखना चाहता है। सभी पांच मध्य एशियाई देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों के अलावा रूस क्षेत्रीय संगठनों द्वारा भी इन देशों से जुड़ा हुआ है। ये संगठन हैं सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन, शंघाई सहयोग संगठन और यूरेशियन आर्थिक संघ। रूस के मध्य एशियाई देशों के साथ सुरक्षा संबंध बहुत पुराने और गहरे हैं। रूस अफ़ग़ानिस्तान की अस्थिरता का फायदा मध्य एशिया के साथ अपने संबंध और मज़बूत करने के लिए ज़रूर उठाएगा। इसकी तैयारी रूस ने अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा होने से पहले ही शुरू कर दी थी। जुलाई से लेकर अक्तूबर तक रूस ने कई बार ताजीकिस्तान में युद्ध अभ्यास किया। ताजीकिस्तान में रूस का सैन्य अड्डा भी है। मध्य एशिया में रूस की कोशिश यही रहेगी की इन देशों के झुकाव यूरोप या अमेरिका की तरफ ज़्यादा न हो।

चीन 

पिछले कुछ वर्षों में चीन का प्रमुख आर्थिक भागीदार बन कर उभरा है। लगभग दो दशक से चीन के मध्य एशिया के साथ आर्थिक रिश्ते काफी मज़बूत हुए हैं। इनमें व्यापार, बुनियादी सुविधाएं और गैस पाइपलाइन शामिल हैं। 2005 और 2020 के बीच चीन ने मध्य एशियाई देशों में 55 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया है। चीन की कनेक्टिविटी परियोजनाओं में चीन-मध्य एशिया-पश्चिम एशिया आर्थिक गलियारा शामिल है जो की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा है। 2013 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कज़ाकस्तान यात्रा के दौरान ही बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की घोषणा की थी। सोवियत विघटन के समय चीन का कज़ाकस्तान, किर्गिज़स्तान और ताजीकिस्तान सीमा विवाद था जो विघटन के बाद चीन ने सुलझा लिया। चीन के शिंजियांग प्रांत में तुर्की मूल के लोग बहुसंख्या में होने के कारण भी मध्य एशिया में स्थिरता चीन के हित में है।  

तुर्की

तुर्की भी मध्य एशिया में एक महत्त्वपूर्ण ताक़त बनकर उभरा है। सोवियत संघ के विघटन के बाद सभी पांच मध्य एशियाई देशों को सबसे पहले मान्यता देनेवाले देशों में तुर्की था। इसके बाद १९९० के दशक में तुर्की मध्य एशियाई देशों में एक बड़ा निवेशक भी रहा है। मध्य एशिया के चार देशों - कज़ाकस्तान, किर्ग़िज़स्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान - में तुर्की जाती के लोग बड़ी संख्या में होने के कारण भी तुर्की के मध्य एशिया के साथ सांस्कृतिक रिश्ते हैं। हाल ही में अर्मेनिआ-अज़रबैजान के बीच हुई जंग में अज़रबैजान का साथ देकर तुर्की एक बार फिर मध्य एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। तुर्की से साथ सहयोग करने से मध्य एशियाई देशों को समुद्री मार्ग से जुड़ने का एक पर्याय मिलता है। नवंबर में हुई आर्गेनाइजेशन ऑफ़ तुर्किक स्टेट्स की बैठक में भी तुर्की ने मध्य एशियाई देशों से अपनी कनेक्टिविटी बढ़ाने पर ज़ोर दिया। पूर्वी भूमध्य सागर और पश्चिम एशिया के बाद तुर्की मध्य एशियाई देशों में की भू-राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है

सामरिक स्पर्धा के अलावा भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है मध्य एशियाई देशों से उसका सीधा संपर्क नहीं है। पाकिस्तान के ज़रिये ज़मीनी रास्ते से संपर्क बनाना करना लगभग असंभव है। इसीलिए भारत ईरान में चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रहा है जिससे भारत ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई देशों तक पहुंच सके। लेकिन सुरक्षा कारणों से अफ़ग़ानिस्तान का रास्ता भी ख़तरे से खाली नहीं है।

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मध्य एशियाई देशों में से उज़्बेकिस्तान ने चाबहार परियोजना में रुचि दिखाई है। 15 दिसंबर को भारत, ईरान और उज़्बेकिस्तान के बीच चाबहार बंदरगाह को लेकर बैठक हुई। हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा संकट का इस परियोजना पर भी असर हुआ है। ऐसे में भारत और ईरान पर्यायी मार्ग विकसित करने पर विचार कर सकते हैं जो अफ़ग़ानिस्तान की बजाय तुर्कमेनिस्तान के ज़रिये मध्य एशिया तक पहुंचे।

भारत-मध्य एशिया में सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। लेकिन पहले भारत को कनेक्टिविटी और सामरिक स्पर्धा का समाधान ढूंढ़ना होगा।

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