भारत को गुलामी की जंज़ीरों से मुक्त कराने के लिए फांसी के फंदे को चूमा था भगत सिंह ने

Bhagat Singh
सुखी भारती । Mar 23, 2021 12:31PM
शहीद भगत सिंह जी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिनकी दो−दो पीडि़यां स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना खून बहा चुकी थीं। जो टूट तो गए लेकिन फिरंगियों की गुलामी के आगे झुके नहीं। दूसरा अभी वे 12 वर्ष की आयु में ही थे, जब जलियांवाला बाग का हृदय विदारक कत्लेआम हुआ।

शहीद−ए−आज़म भगत सिंह एक बेखौफ, जांबाज नवयुवक जो आज़ादी रूपी दुल्हनियां का वरण करने हेतु फांसी के तख्त पर झूल गया। एवं जालिम अंग्रेज हकूमत की गुलामी की जंज़ीरों से भारत वासियों को सदा के लिए आज़ाद करवा गया। शहीद भगत सिंह एक क्रांति का नाम है, एक जज्बे का नाम है और ऐसे नायाब रत्न देश की अमूल्य धरोहर हुआ करते हैं। देश की भावी पीढि़यां सदैव ऐसे सपूतों के चरणों में नतमस्तक हुआ करती हैं। जैसे मार्च 1931 के आखिरी सप्ताह, दिल्ली में दिए अपने एक व्याख्यान में शहीद भगत सिंह जी को, श्रद्धांजली अर्पित करते हुए सुभाष चंन्द्र बोस जी ने कहा था कि 'भगत सिंह एक व्यक्ति नहीं अपितु वह एक निशान हैं, इन्कलाबी भावना का निशान हैं जो आज पूरे देश में फैल गई है। और इन निशानों से देश सदा ही मार्गदर्शन प्राप्त करता रहेगा।' सचमुच! उन्होंने अपने देश की आन, बान व शान के लिए अपने प्राणों की आहुति यह कहते हुए दी−

तेगों के साए में हम पल कर जवां हुए हैं।

बस एक खेल जानते हैं फांसी पर झूल जाना।।

कहावत है कि पूत के पैर पालने में ही पहचाने जाते हैं। और भगत सिंह जी इस बात की बिल्कुल सटीक उदाहरण हैं। एक बार सरदार किशन सिंह जी बालक भगत सिंह जी को लेकर अपने परम मित्रा श्री नंद किशोर मेहता जी के पास उनके खेतों में गए। दोनों मित्र आपस में बातचीत करने में मसरूफ हो गए एवं बालक भगत सिंह अपनी खेल में मस्त हो गए। अचानक नंद किशोर मेहता का ध्यान पास ही मिट्टी में खेल रहे बालक पर गया, वह मिट्टी में छोटे−छोटे तिनके गाड़ रहे थे। उन्हें इस प्रकार करते देखकर नंद किशोर जी की जिज्ञासा बढ़ गई कि आखिर भगत सिंह कर क्या रहा है। क्योंकि उन्हें पता था कि छोटी सी आयु में भी वे देश व देशभक्ति की बातें करते हैं। इसका मुख्य कारण उनके घर का माहौल था। खैर! उन्होंने भगत सिंह जी से पूछा कि वे खेत में तिनके क्यों गाड़ रहे हैं? 

उन्होंने इस प्रश्न का जो जवाब दिया इसकी कल्पना न तो नंद किशोर जी ने की थी और शायद हम सब भी नहीं कर पाते। भगत सिंह उनकी बात सुनकर कहने लगे कि मैं खेतों में दमूकें (बंदूकें) बीज रहा हूँ ताकि इनके द्वारा मैं फिरंगियों को अपने देश से बाहर निकाल सकूँ। और अपने देश को आज़ाद करवा सकूँ।

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उस समय भगत सिंह जी के मुखारबिंद से यह बात सुनकर काल भी मंद−मंद मुस्कुरा रहा होगा कि जिसने जन्म लेते ही अपने पिता व चाचा जी को कारागार से मुक्त करवा दिया, लगता है कि यह बालक देश को आज़ाद करवाने का संकल्प लेकर ही पैदा हुआ है। सचमुच! क्रांति की अदभुत मशाल महान देश भक्त शहीद भगत सिंह जी द्वारा दिया गया बलिदान अद्वितीय है। या यों कहें कि उनके द्वारा देश की स्वतंत्रता के लिए दी गई कुर्बानी क्रांति का अमर प्रतीक है जो अनंत काल तक इस देश की मिट्टी से जुड़े सपूतों को नई दिशा एवं प्रेरणा प्रदान करता रहेगा। उन्होंने अपने खून से स्वतंत्रता के वृक्ष को सींचकर देश को जो मजबूती व ताज़गी प्रदान की है उसे युगों−युगांतरों तक याद रखा जाएगा। उनके द्वारा अपनी यौवन अवस्था में दिए गए अदभुत बलिदान भारत देश के इतिहास की अमोलक सम्पत्ति है। 

शहीद भगत सिंह जी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिनकी दो−दो पीडि़यां स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना खून बहा चुकी थीं। जो टूट तो गए लेकिन फिरंगियों की गुलामी के आगे झुके नहीं। दूसरा अभी वे 12 वर्ष की आयु में ही थे, जब जलियांवाला बाग का हृदय विदारक कत्लेआम हुआ। और उनका बाल मन इस घटना से अंदर तक हिल गया। यही कुछ कारण थे कि गुलामी की मजबूत व क्रूर जंज़ीरे तोड़ने का महासंकल्प उनके प्रत्येक श्वाँस में भर गया। 

अपनी शहीदी से एक दिन पहले उन्होंने एक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने देश के लोगों को आज़ादी के प्रति जागृत करते हुआ कहा−'अब सिर्फ अपने बारे में सोचना छोड़ दें, व्यक्तिगत सुख−सुविधायों के सपने छोड़कर हमें आगे बढ़ना पड़ेगा। इसके लिए फौलादी हौंसला, दृढता एवं मजबूत संकल्प चाहिए। आप को कोई भी मुश्किल आपके पथ से विचलित न कर पाए। किसी के द्वारा किए गए विश्वासघात से आपका दिल न टूटे। पीड़ा व बलिदान से गुज़रकर आपको पहले खुद पर विजय प्राप्त करनी पड़ेगी। क्योंकि खुद पर प्राप्त की गई जीत ही देश में क्रांति की मशाल बनेगी।' 

अपने आखिरी पत्र में भगत सिंह ने इस बात का भी जिक्र किया था−'मेरे साथियों आपका सोचना स्वाभाविक है कि मेरे अंदर जीने की इच्छा होनी चाहिए। परंतु मैं सिर्फ एक ही शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ कि कैद होकर या पाबंद होकर जिंदा न रहूँ। मेरा नाम हिंदुस्तान की क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है। इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में, अब मैं इतना ऊँचा नहीं हो सकता था। मेरे हँसते−हँसते फांसी पर चढ़ने से देश की माताएँ अपने बच्चों को भगत सिंह बनाने की उम्मीद करेंगी। इसके द्वारा आज़ादी के लिए कुर्बानी देने वालों की गिनती इतनी बढ़ जाएगी कि आज़ादी की क्रांति को रोकना मुश्किल हो जाएगा। आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व महसूस हो रहा है। अब बस मुझे अंतिम परीक्षा का इंतजार है। मेरी महती इच्छा है कि यह पल और नजदीक हो जाएँ।'

जिस समय शहीद भगत सिंह जी को फांसी दी गई उस समय वहाँ पर यूरोप के डिप्टी कमिश्नर भी मौजूद थे। जतिंदर संनियाल जी द्वारा लिखी गई किताब 'भगत सिंह' के अनुसार फांसी चढ़ने से ठीक पहले भगत सिंह ने उन्हें कहा था−मिस्टर! मजिस्ट्रेट आप बेहद भाग्यशाली हैं, जो आपको यह विलक्षण दृश्य देखने को मिल रहा है कि भारत के क्रांतिकारी किस प्रकार देश को आज़ाद करवाने के लिए, अपने संकल्पों व आदर्शों की पूर्ति हेतु हँसते−हँसते फांसी के फंदे पर झूल जाया करते हैं। 

अपनी भारत माता को गुलामी की जंज़ीरों से मुक्त करने के लिए शहीद−ए−आज़म भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव हँसते मुस्कुराते फांसी के फंदे को चूम लिया। फांसी दिए जाने से पहले इन देश भक्तों ने एक दूसरे के गले मिलकर परमात्मा के चरणों में विनती की थी कि उन्हें फिर से भारत देश में पैदा करें ताकि वे दुबारा जन्म लेकर फिर से इस मिट्टी की सेवा हित अपना−आप कुर्बान कर सकें। फांसी देने से पहले जब राजगुरू, सुखदेव व भगत सिंह जी से उनकी आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि हम सब आपस में गले मिलना चाहते हैं। इजाजत मिलते ही वे सब आपस में लिपट गए। सच तो यह था कि भारत माता के ये सच्चे सपूत  23 मार्च 1931 की उस शाम के लिए लंबे समय से बेचैन थे। हालांकि इनकी फांसी का समय 23 मार्च शाम 7 बजे का था। लेकिन ज़ालिमों ने फांसी का समय बदलकर उन्हें 23 मार्च को ब्रह्म महूर्त में ही फांसी दे दी। अंत में गद्दार सरकार ने इन शूरबीरों की अधजली लाशों के टुकड़े−टुकड़े कर दरिया में बहा दिए। आज़ादी के एक महान स्वर्ण अध्याय का अंत हो गया। लेकिन इस बेनज़ीर सूरमाओं की अदभुत कुर्बानी को याद कर जन मानस को प्रेरणा मिलती रहेगी। आम लोगों की जुबान यह गीत सदा गुनगुनाती रहेगी−

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...

- सुखी भारती

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