मध्य प्रदेश सरकार में एक अक्षर से हो गया 110 करोड़ का घोटाला

By दिनेश शुक्ल | Oct 05, 2020

भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष भूपेंद्र गुप्ता ने आज एक प्रेस कान्फ्रेंस में शिवराज सरकार पर किसानों के कल्याण की योजनाओं में प्रशासकीय स्तर पर हुई खुली लूट का खुलासा किया। गुप्ता ने बताया कि किस तरह योजना की गाइड लाइन में मात्र एक शब्द बदल कर ही 100 करोड़ से ज्यादा का घोटाला कर लिया। केंद्र सरकार ने जैविक खेती को प्रोत्साहन देने के लिए वर्ष 15-16 में 110 करोड़ से अधिक की राशि मध्य प्रदेश सरकार को दी थी जिसमें 'सेस्बेनिया' नामक बीज जिसे भारतीय संदर्भ में ढेंचा कहते हैं, को खरीदने के लिए निर्देशित किया गया था। किंतु सेस्बेनिया में रोस्ट्रेटा शब्द जोड़कर गाइडलाइंस में फेरबदल कर कृषि विभाग के तत्कालीन पीएस और चंद अधिकारियों ने मिलकर एक ही कंपनी को सारा काम दे दिया। 

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यहां यह जानना जरूरी है कि यह योजना आदिवासी किसानों को उन्नत बनाने की दृष्टि से बनाई गई थी लेकिन स्वेच्छाचारिता से आदिवासियों के कल्याण की इस योजना को लूटा गया जिसका कोई लाभ ना तो आदिवासी समाज को मिला ना ही कोई प्रगति हुई। योजना में 1 वर्ष तक अधिकारी बैंक डेट में आपूर्ति करवाते रहे यह आदिवासियों के नाम पर मामा सरकार के अनंत छलावों में से एक है। घोटाले पर विधानसभा सचिवालय द्वारा स्थापित जांच समिति जांच समिति के जांच के बिंदु हैं इस पूरे घोटाले पर रोशनी डालने के लिए काफी सबसे दुर्भाग्य जनक यह है की एसटीएफ से लेकर सारी जांच एजेंसियां इस कांड की जांच करने से बच रही है एसटीएफ ने तो लिखकर ही जांच करने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी अन्य जांच एजेंसियां भी जांच में शिथिलता बरत रही है।

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विधानसभा के द्वारा स्थापित जांच समिति के निष्कर्ष ही इस महा घोटाले को बेनकाब करेंगे ऐसी आशा की जा सकती है। जब देश लाकडाउन की पीड़ा से गुजर रहा था तब संदेहास्पद सप्लाई का करोड़ों का भुगतान किया गया ? इस पर कृषि मंत्री कमल पटेल सफाई दें, गुप्ता ने मांग की। आज मध्य प्रदेश में यह बड़ा प्रश्न हो गया है कि अनुसूचित जनजाति के लोगों के कल्याण के लिए बनाई गई योजनाओं की नंगी लूट क्या जांच एजेंसियों की जांच मुंहताज रहेंगी ? सभी जानते हैं कि किस तरह आदिवासी समाज को जानवरों को खिलाया जाने वाला चावल सप्लाई किया गया उस जांच को भी दबाने की चेष्टा चल रही है। आज भी जानवरों के खाने योग्य चावल सरकारी गोदामों में भौतिक रूप से मौजूद है। इसी तरह जैविक खेती के नाम पर आदिवासी कल्याण के पैसों की लूट मामा सरकार के काले कारनामों को उजागर करती है।

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