By अभिनय आकाश | Jul 17, 2026
क्या भारत के स्पेस ड्रीम्स को अपनों की ही नज़र लग गई है? क्या अंतरिक्ष में तिरंगा लहराने वाला हमारा इसरो, अंदरूनी 'रॉकेट लीक' से जूझ रहा है? जी हां, आंकड़ा बहुत बड़ा है और चिंता उससे भी गहरी! सोचिए, जिस संगठन में 14 हजार लोग काम करते हों, वहां से 100 लोगों का जाना शायद समंदर से एक लोटा पानी निकालने जैसा लगे। लेकिन ठहरिए, गणित इतना सीधा नहीं है। असली झटका तो तब लगता है जब इसरो के सबसे वीआईपी सैटेलाइट सेंटर के 1339 कर्मचारियों में से 80 टॉप के वैज्ञानिक अचानक बाय-बाय कह देते हैं! हद तो तब हो जाती है जब बाहुबली रॉकेट GSLV Mk-III के डायरेक्टर विक्रम जोसेफ और चंद्रयान-3 की कामयाबी के पीछे खड़े प्रोजेक्ट मैनेजर आदित्य रल्लापल्ली जैसे दिग्गज भी अपना केबिन खाली कर देते हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश का सबसे बड़ा स्पेस स्टेशन, वैज्ञानिकों के लिए एक स्टॉप-ओवर बनकर रह गया है? क्यों आज देश के सबसे बड़े दिमाग यानी आईआईटी (IIT) के टॉपर्स इसरो की दहलीज पर कदम रखने से भी कतरा रहे हैं? देरी, खिंचती डेडलाइन्स और सेंट्रलाइज्ड फैसले... क्या इसरो के अंदर कोई अंदरूनी मंदी चल रही है? आज इसी 'स्पेस मिस्ट्री'का एमआरआई स्कैन करेंगे।
इसरो से यह इस्तीफ़े ऐसे समय में भी हो रहे हैं जब संगठन मिशनों को पूरा करने में एक असामान्य मंदी से जूझ रहा है। गगनयान G1 टेस्ट फ्लाइट, SSLV-L1, GSLV-F17 और निजी क्षेत्र (इंडस्ट्री) द्वारा निर्मित PSLV-N1 जैसे कई बड़े और महत्वपूर्ण मिशन अपनी घोषित समय-सीमा से आगे बढ़ चुके हैं। इस साल की शुरुआत में PSLV को लगे दो झटकों ने लॉन्च गतिविधियों में और अधिक देरी कर दी है, और अंतरिक्ष एजेंसी ने अभी तक विफलता की कोई विस्तृत रिपोर्ट (असेसमेंट) सार्वजनिक नहीं की है। संगठन के कुछ हिस्सों में इस बात पर भी चर्चा बढ़ रही है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया लगातार केंद्रित (सेंट्रलाइज्ड) होती जा रही है। कई मौजूदा और पूर्व अधिकारियों ने निजी बातचीत में कहा है कि तकनीकी और प्रशासनिक स्तर के बड़े फ़ैसले अब चेयरमैन के ऑफ़िस तक ही सीमित हो गए हैं, जिससे मंज़ूरी मिलने में देरी हो रही है।
प्राइवेट सेक्टर से फंडिंग आ गई। प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां आ गई। इनको काम करने वाले वैज्ञानिक कहां से लाओगे? काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए आवश्यकता अचानक आ पड़ी। 5 साल में वैज्ञानिक तैयार नहीं होता। वैज्ञानिक सालों की मेहनत से निकलता है। काफ़ी सारी रिसर्च करता है। बहुत सा समय खपाता है। तब जाकर वैज्ञानिक बनता है। ऐसे में अचानक वैज्ञानिकों के लिए ऑप्शंस ओपन हो गए। 400 कंपनियां सामने। अब तक जॉब देने के लिए इसरो खड़ा था। अब 400 कंपनियां एक साथ सामने आई। क्या ऑप्शंस हुए? इन्होंने कहा छोड़ो इसरो इन्हें ज्वाइन करते हैं। अचानक ब्रेन ड्रेन होना शुरू हुआ। 100 से अधिक वैज्ञानिक अचानक छोड़ निकल गए इन दिनों इनमें से अधिकांश ने जाकर इन प्राइवेट कंपनीज को ज्वाइन कर लिया। इतना तेजी से निकले कि इन वैज्ञानिकों ने कईयों ने तो कई अहम प्रोजेक्ट छोड़ दिए। यानी कि चंद्रयान 3 तक का जो लीडरशिप था वो तक छोड़ दिया।
नाम न बताने की शर्त पर वरिष्ठ अधिकारियों ने यह भी कहा कि स्पेस एजेंसी को नासा (NASA) और यूरोपियन स्पेस एजेंसी जैसी पश्चिमी स्पेस एजेंसियों के रोज़गार मॉडल पर गौर करना चाहिए, जो ज़्यादातर प्रोजेक्ट-आधारित होते हैं। नासा के वर्कफ़ोर्स स्ट्रक्चर में स्थायी सरकारी कर्मचारी, कॉन्ट्रैक्टर और खास प्रोजेक्ट के लिए रखे गए लोग शामिल होते हैं। इससे एजेंसी को ज़रूरी संस्थागत विशेषज्ञता बनाए रखते हुए लचीलापन मिलता है। कई स्पेस पॉलिसी एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसरो (ISRO) को इस हाइब्रिड मॉडल को अपनाकर फ़ायदा हो सकता है।
मिशन डिज़ाइन और सिस्टम इंजीनियरिंग।
इंसानों को अंतरिक्ष में भेजना और डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन।
एडवांस्ड R&D, जैसे कि दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट और न्यूक्लियर प्रोपल्शन।
अंतरिक्ष विभाग के 14 जुलाई के ज्ञापन में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई है कि इन इस्तीफों से राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों पर असर पड़ रहा है। गगनयान और अन्य प्रमुख मिशनों से जुड़े वैज्ञानिकों को अब सामान्य मंजूरी के जरिए इस्तीफा देने की अनुमति नहीं होगी; इसके बजाय, प्रत्येक इस्तीफे को अब अंतरिक्ष विभाग से मंजूरी लेनी होगी। हालांकि इस्तीफों की संख्या इसरो के 14,600 से अधिक कर्मचारियों में से एक छोटा सा हिस्सा है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं अधिक है क्योंकि जाने वाले कई लोगों के पास चंद्रयान-3, स्पैडेक्स और गगनयान जैसे मिशनों के माध्यम से अर्जित वर्षों का विशेष अनुभव है। इस तरह के ज्ञान की भरपाई केवल नए स्नातकों की भर्ती से नहीं की जा सकती। टैलेंट का यह बदलाव भारत के स्पेस सेक्टर में हो रहे बड़े बदलाव को भी दिखाता है। दशकों तक, महत्वाकांक्षी एयरोस्पेस इंजीनियरों के लिए ISRO ही लगभग एकमात्र ठिकाना था। आज, यह एक बहुत बड़े इकोसिस्टम का मुख्य केंद्र बन गया है, जहाँ प्राइवेट कंपनियाँ अच्छे वेतन, तेज़ी से तरक्की और स्पेस टेक्नोलॉजी की अगली पीढ़ी को आकार देने के मौके के साथ करियर के दूसरे विकल्प भी देती हैं। इसरो के लिए चुनौती अब सिर्फ़ देश के सबसे होनहार लोगों को आकर्षित करना ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने साथ बनाए रखना भी है।
फर्ज कीजिए कि अगर दुश्मन देश किसी भारत की प्राइवेट कंपनी में फंडिंग करवा दे और उनसे कहे कि सारे के सारे वैज्ञानिकों को तोड़ के इधर ले आओ। मुंह मांगा पैसा दे दो। आपका तो पूरा अंतरिक्ष प्रोग्राम रखा रह जाएगा। आज 400 कंपनी हैं और उनको फंडिंग के दम पर सारा काम हो रहा है। फंडिंग के नाम पर वो तमाम प्रकार के लोगों को तोड़ रही हैं।आज इसरो में एक आम वैज्ञानिक की तनख्वाह ₹5 लाख एक बार बड़ी चर्चा बनी थी। देश के जो मतलब इसरो के चीफ साइंटिस्ट हैं उनकी तनख्खा ढाई लाख थी और हमारे देश के अंदर हम जैसी जो छोटी कंपनियां काम कर रही हैं उनके पास ही लाख लाख रुपए के कई कर्मचारी होते हैं।
14 जुलाई को निकाले गए ऑर्डर में कहा गया कि गगनयान जैसे मिशन पर काम कर रहे ग्रुप ए के साइंटिस्ट के इस्तीफे अब आसानी से मंजूर नहीं होंगे ऐसे मामलों में अब फैसला डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस ही करेगा।