ईरान के लिए खड़े हो गए 121 देश! UN में कैसे पिटा अमेरिका?

By अभिनय आकाश | Apr 29, 2026

ईरान से युद्ध के बाद से अमेरिका को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग होने का डर अब साफ तौर पर दिखने लगा है। दुनिया भर के जो देश अमेरिका की दादागिरी के कारण उसके साथ खड़े रहा करते थे, अब वो देश वैश्विक मंच पर उसके खिलाफ वोटिंग तक करने लगे हैं। इसकी सबसे बड़ी तस्वीर संयुक्त राष्ट्र के मंच पर देखने को मिली। जहां एक तरफ समुद्री सुरक्षा और होमू जलडमरू मध्य को लेकर तीखी बहस चल रही थी तो दूसरी तरफ परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी की बैठक में ऐसा फैसला हो गया जिसने वाशिंगटन को झटका दे दिया। न्यूयॉर्क में हुई यूएनएससी बैठक के दौरान अमेरिका के प्रतिनिधि माइकल व्ट्स ने खुले तौर पर सहयोगी देशों से मदद की अपील की। उन्होंने कहा कि समुद्री स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए एक गठबंधन खड़ा होना होगा। जिसमें सैन्य ताकत के साथ-साथ व्यापार, बीमा और मानवीय एजेंसियों को भी शामिल होना चाहिए। साफ था कि अमेरिका अब अकेले इस टकराव को संभालने की स्थिति में नहीं दिख रहा है। खासकर तब जब होरमुज में उसकी रणनीति लगातार चुनौती का सामना कर रही है।  

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अमेरिका ने इस फैसले को एनपीटी की विश्वसनीयता पर सवाल बताते हुए कड़ा विरोध जताया। उसके अधिकारियों ने कहा कि ईरान पर ऐसे आरोप हैं कि वह अप्रसार प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता। इसलिए उसे पद पर चुनना गलत संदेश देता है। लेकिन दूसरी तरफ ईरान ने भी पलटवार करते हुए अमेरिका के नियत पर सवाल खड़े कर दिए और याद दिलाया कि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने वाला दुनिया का एकमात्र देश अमेरिका ही रहा है। दरअसल इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका रही गुटनिरपेक्ष और ग्लोबल साउथ देशों की जिन्होंने बड़ी संख्या में ईरान के पक्ष में वोट कर दिया। चीन और रूस पहले से ही ईरान के साथ खड़े थे। लेकिन इस बार अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों ने भी हॉल का समर्थन दिया। जिससे अमेरिका का विरोध कमजोर पड़ गया। यानी यह सिर्फ एक कूटनीतिक घटना नहीं बल्कि बदलते वैश्विक संतुलन की साफ झलक है। जहां हर मुद्दे पर अमेरिका की बात मान लेना जरूरी नहीं रह गया और कई देश खुलकर अलग रुख अपनाने लगे। अब सवाल यही है क्या यह बदलाव अस्थाई है या फिर एक नए वैश्विक शक्ति संतुलन की शुरुआत। क्योंकि अगर इसी तरीके से अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन कम मिलता गया तो उसका दबदबा धीरे-धीरे चुनौती में तब्दील हो सकता है और ईरान जैसे देश इसी मौके को अपने पक्ष में बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका कमजोर पड़ गया है। यह कहना आसान है, लेकिन हकीकत इससे ज्यादा पेचीदा है। 

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