भारत की इस 166KM जमीन ने हिलाई दुनिया, 92000 करोड़ लगा कर सरकार क्या करने जा रही है?

By अभिनय आकाश | Feb 18, 2026

100 बरसों से एक कहावत चली आ रही है। हु रूल्स द सी रूल्स द वर्ल्ड। मतलब जो लहरों पर राज करेगा दुनिया उसकी मुट्ठी में होगी। इतिहास के पन्नों से गुलाम हिंदुस्तान की यादों तक कई उदाहरण मिल जाएंगे। हजारों साल पहले हड़प्पा सभ्यता में लोथल के रास्ते दुनिया के नक्शे पर अपनी छाप छोड़ना हो या फिर 1971 में कराची पर ताबड़तोड़ बमबारी से पाकिस्तानी सेना की रीड तोड़ना। इन सब में समंदर ने अहम भूमिका निभाई। अब समुंदर से जुड़ी ऐसी ही खबर सामने आ रही है।  92,000 करोड़ की लागत से एक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट आ रहा है जो इंडिया के लिए इंडोपेसिफिक में जियोपॉलिटिक्स का खेल बदलने की कुवत रखता है। 

166 किमी के दायरे में भारत क्या कर रहा है 

भारत की मुख्य भूमि से 1800 किमी दूर भारत के ही एक इलाके ने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है। यह इलाका है तो 900 किमी से बड़ा लेकिन इसमें से 166 किमी के दायरे में भारत एक ऐसा काम कर रहा है जो पूरा हो गया तो कई देशों को घुटनों पर ला सकता है। इस इलाके में भारत जो प्रोजेक्ट बना रहा है, वह हमेशा के लिए चीन के गले में रस्सी डाल सकता है। लेकिन आपके होश तब उड़ जाएंगे जब आपको यह पता चलेगा कि भारत के इस सबसे रणनीतिक और कूटनीतिक प्रोजेक्ट्स को रोकने वालों की लिस्ट में चीन से पहले भारत के ही कई तथाकथित एनजीओ शामिल हैं। भारत के इस मेगा प्रोजेक्ट को बर्बाद करने के लिए कोर्ट में मामले को लटकाने की कोशिश हुई। कहा गया कि इस प्रोजेक्ट की वजह से काफी पेड़ काटे जाएंगे। कुछ लोग विस्थापित हो जाएंगे। 

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ग्रीन ट्रिब्यूनल से मिली हरी झंडी

16 फरवरी 2026 को एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ग्रेट निकोबार द्वीप पर बन रहे इस इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी। एनजीटी देश का स्पेशल कोर्ट है जो पर्यावरण से जुड़े मामलों का जल्द निपटारा करता है। खैर एनजीटी ने पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रोजेक्ट नेशनल सिक्योरिटी और विकास के लिए रणनीतिक रूप से बहुत जरूरी हैं। इसलिए इनमें दखल देना ठीक नहीं होगा। 

ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है क्या? 

दक्षिण पूर्व में चारों ओर बंगाल की खाड़ी से घिरे कुल 836 छोटे-बड़े आइलैंड है। इन्हीं को मिलाकर बनता है अंडमान और निकोबार द्वीप समूह। इसी के सबसे नीचे माने दक्षिण में है ग्रेट निकोबार आइलैंड। हरेभरे पेड़, सैकड़ों प्रजातियां, क्रिस्टल क्लियर पानी इस इलाके की पहचान है। लेकिन भारत सरकार इस इलाके में बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट लाने जा रही है।  भारत के इस मेगा प्रोजेक्ट का नाम ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट है। अब कुछ महीनों में समंदर के बीचों-बीच भारत का यह सबसे रणनीतिक ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पूरा हो जाएगा। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ₹90 हजार करोड़ से ज्यादा की ग्रेट निकोबार परियोजना की रणनीतिक अहमियत को समझते हुए कहा है कि यह प्रोजेक्ट बनना चाहिए। श्रीलंका की राजधानी कोलंबो, मलेशिया के क्लांग बंदरगाह और सिंगापुर से ग्रेट निकोबार की दूरी लगभग बराबर है। लेकिन ग्रेट निकोबार परियोजना की जिस खासियत ने चीन की हवाइयां उड़ा रखी हैं।  खासियत इसकी मलक्का की खाड़ी से नजदीकी है। भारत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट मलक्का की खाड़ी यानी मलक्का स्ट्रेट से महज 160 किमी दूर है। मलक्का स्ट्रीट से दुनिया का 1/3 व्यापार गुजरता है। 

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40% तेल टैंकर इस रास्ते होकर गुजरते हैं 

दुनिया के 40% तेल टैंकर ग्रेट निकोबार के हिंद महासागर क्षेत्र से ही होकर गुजरते हैं। आपको बता दें कि चीन की मलक्का स्टेट पर बहुत निर्भरता है। चीन की 80% ऊर्जा जरूरतें मलक्का स्टेट से ही पूरी होती हैं। यानी चीन अपनी जरूरत का जितना तेल आयात करता है उसका 80% मलक्का स्ट्रेट से ही होकर गुजरता है और यहीं पर भारत आकर बैठ गया है। मलक्का स्ट्रीट के पास मौजूद भारत ग्रेट निकोबार से चीन के हर जहाज पर नजर रख सकता है। फिर चाहे वो चीन का तेल टैंकर हो, जासूसी जहाज हो या फिर मिलिट्री जहाज हो। अभी तक चीन भारत की जासूसी करता था। किन अब भारत चीन की गर्दन पर जाकर बैठ गया है। आपको बता दें कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के तहत भारत इस इलाके में ड्यूल पर्पस एयरपोर्ट बना रहा है।  यानी इस एयरपोर्ट का इस्तेमाल सिविल पर्पस के साथ-साथ मिलिट्री पर्पस के लिए भी होगा। 

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आपको बता दें कि अंडमान निकोबार में पहले से ही भारत की ट्राई सर्विस कमांड है। इसका मतलब यह है कि यहां पर पहले से ही एयरफोर्स, आर्मी और नेवी तीनों मौजूद हैं और अब इन तीनों को ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से और भी ज्यादा मजबूती मिलेगी। इकोनॉमिक दृष्टि से भी ग्रेट निकोबार भारत के लिए बड़ा खजाना साबित होने वाला है। इस प्रोजेक्ट से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी। 

इस प्रोजेक्ट को लेकर  क्यों हो रहा इतना हंगामा? 

कहा जा रहा है कि करीब 130 वर्ग किमी से ज्यादा का ट्रॉपिकल रेनफोर्स का एरिया नष्ट होगा। नंबर्स में बात करें तो 10 लाख से ज्यादा पेड़ काटे जाएंगे। ऐसा अनुमान है। बड़ी बात यह है कि यहां काटे गए पेड़ों के ऐवज में सरकार हजारों किलोमीटर दूर हरियाणा में पेड़ लगाएगी। ऐसा उन्होंने अदालत के समक्ष एनजीटी के समक्ष कहा है। जंगल जानवरों का घर है। इसके काटे जाने से लाखों जीव-जंतुओं को खतरा होगा। जैसे दुनिया की सबसे बड़ी लेदर बैंक कछुए के घोंसले की जगह नष्ट होगी। इसके अलावा निकोबार मेगापॉड पक्षी जो सिर्फ यहीं पर पाया जाता है इनका भी घर छिन जाएगा। इसलिए इन सब के संरक्षण के लिए जरूरी व्यवस्थाएं हो। इसे लेकर तमाम चिंताएं हैं। 20,000 से ज्यादा कोरल रीफ की कॉलोनी भी इससे प्रभावित होंगी। कोरल रीफ समुद्र का वर्ष वन होता है। यहां समुद्र की 1/4 प्रजातियां पाई जाती हैं। मतलब नुकसान बहुत बड़ा होगा।  इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात यह कि इस प्रोजेक्ट से आदिवासियों के जीवन पर भी गंभीर असर पड़ेगा। यह इलाका शोमपेन और निकोबारी आदिवासियों का घर है। एक तरफ सरकार कह रही है कि शोमपेन जनजाति की बस्तियों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।  

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