आर्थिक पैकेज है या कर्ज का जाल ? हर सेक्टर और कामगार बेहाल, मदद करें तत्काल

By कमलेश पांडे | May 18, 2020

कोरोना संकट के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक पैकेज से किसको क्या फायदा मिलेगा और किसके हाथ खाली रह जाएंगे, इसको लेकर पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। एक ओर सत्तापक्ष जहां इसकी खूबियां बताते हुए अघा नहीं रहा है, वहीं विपक्ष पाई पाई का हिसाब गिनाकर इसे एक और जुमलेबाजी करार देने पर तुला हुआ है। मुख्यधारा की प्रिंट, टीवी और वेब मीडिया से इतर सोशल मीडिया पर जो सकारात्मक-नकारात्मक बहस छिड़ी हुई है, उसके दृष्टिगत सबके मन में एक ही सवाल उभर रहा है कि यह पैसा आएगा कहां से, और जाएगा कहां?

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आशय स्पष्ट है कि हमारे द्वारा उपभोग किये जाने वाले वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य हमारे द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य से कहीं अधिक है, और उपभोग-उत्पादन के बीच का यह अंतर ही सबसे बड़ा अवसर है, संभावना है, यहां की अर्थव्यवस्था को बड़ा बनाने का, आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियों के आकार को बड़ा करने का। प्रधानमंत्री मोदी ने गत दिनों देश के नाम अपने संबोधन में इसी अवसर की बात की थी। जाहिर है कि उपभोग-उत्पादन के अंतर को पाटने के लिए वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन बढ़ाने का मतलब ही रोजगार के नए अवसरों सहित अन्य अनेक आर्थिक गतिविधियों का सृजन भी है, जिससे स्वदेशी की अवधारणा भी परिपुष्ट होगी।

देखा जाए तो वैश्विक महामारी करार दिए जाने वाले कोरोना संकट को थामने के उद्देश्य से जारी देशव्यापी लॉकडाउन के कारण गत 50 दिन से ज्यादा समय से देश की आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियां ठप पड़ी हैं। लिहाजा, इस लॉकडाउन और उससे उपजी परिस्थितियों ने हर आम व खास को विभिन्न तरीकों से प्रभावित किया है। वहीं, सबसे बड़ा आसन्न संकट देश के आर्थिक व औद्योगिक केंद्रों पर कार्यरत प्रवासी मज़दूरों व छोटे-मोटे व्यवसाय से आजीविका अर्जित करने वाले करोड़ों लोगों के समक्ष उत्पन्न हुआ है, जिसको समझे बिना व उसके सम्यक निराकरण के बिना कोई भी उपाय सार्थक सिद्ध नहीं हो सकता है।

सच कहूं तो क्रमवार बीत चुके तीन लॉकडाउन और आगामी 31 मई तक जारी इसके चौथे चरण के चलते लगभग थम-सी गयी आर्थिक व औद्योगिक गतिविधियों को गतिशील करने और लगभग दो महीने से अधिक समय से करोड़ों लोगों के समक्ष उत्पन्न आजीविका के संकट से पार पाने के उद्देश्य से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक के आर्थिक पैकेज का ऐलान किया है, जो देश की वर्तमान जीडीपी का तकरीबन 10 प्रतिशत के समतुल्य है। प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के पैकेज में पूर्व में रिज़र्व बैंक व वित्त मंत्रालय द्वारा घोषित लगभग आठ लाख करोड़ रुपये का प्रावधान भी शामिल हैं। इस तरह से यह पैकेज लगभग 12 लाख करोड़ का रह जाएगा। कहना न होगा कि यदि पूर्व में घोषित रियायतें इसमें शामिल नहीं की जाती हैं तो निःसंदेह यह पैकेज महीनों से ठप पड़ी आर्थिक गतिविधियों के लिए संजीवनी साबित होंगी।

जहां तक सवाल उठ रहा है कि कोरोना संकट से उत्पन्न परिस्थितियों से निपटने के लिए यह 20 लाख करोड़ आएगा कहां से और इससे लाभ किसे मिलेगा? तो उसके सापेक्ष यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि 20 लाख करोड़ रुपये का यह पैकेज भौतिक रूप में किसी को दिया ही नहीं जाना है। लिहाजा, वह आएगा कहां से, यह प्रश्न ही बेमानी हो जाता है। वस्तुतः यह पैकेज करों में लंबे समय के लिए छूट, ब्याज देनदारियों में छूट, ऋण माफी यथा- कृषकों तथा कुटीर उद्योगों, स्वयंसेवा समूहों, सूक्ष्म व लघु उद्यमियों का तथा नई आर्थिक-औद्योगिक गतिविधियों को शुरू करने के किये वित्तीय सहायता के रूप में है।

निःसन्देह, मोदी सरकार द्वारा घोषित कोविड राहत पैकेज से देश के 135 करोड़ लोगों को क्या मिला, क्या नहीं, इसका वाजिब फलितार्थ जानने-समझने के लिए हमें पीएम मोदी की गत 12 मई की घोषणा के साथ साथ उसपर केंद्रित केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की पंचदिवसीय व्याख्या को समझना होगा, जिसमें उन्होंने परिश्रम पूर्वक बहुत सारी बातें स्पष्ट करने की सार्थक कोशिशें की हैं। उनकी प्रेस कांफ्रेंस के अंतिम दिन गत 17 मई को पता चला कि इसका सेंसेक्स 20 लाख करोड़ से उछलकर 20.97 लाख करोड़ रुपये पर रविवार को बंद हुआ है।

इस प्रकार देखा जाए तो जहां कोविड लॉकडाउन के दौरान बहुत सारे उद्योग-व्यापार संघ बजट से सीधे अर्थव्यवस्था में दस लाख करोड़ रुपये बतौर राहत पैकेज डालने की मांग कर रहे थे, वहीं सरकार ने बीस लाख करोड़ से अधिक की घोषणा की और हिसाब दे दिया 20.97,053 लाख करोड़ का। भला और क्या चाहिए किसी को? अब तो कोई भी दुकान, प्रतिष्ठान न तो बंद होना चाहिए, न ही बैंकों के समक्ष आर्थिक धर्मसंकट उत्पन्न होना चाहिए, और न ही हम भारत के लोगों को हैरान-परेशान होना चाहिए, बशर्ते कि यदि सबकी नीयत साफ हो, स्वदेशी हो और राष्ट्रवादी भी। लेकिन कर्ज लेकर गटक जाने और खुद को नंगा घोषित कर कारोबार बदलकर उसे गुप्त निवेश से व्यक्तिगत व गुटगत गुलछर्रे उड़ाने वाली आर्थिक संस्कृति में जो पले बढ़े हैं, उनके गले यो पीएम मोदी के प्रयास कभी नहीं उतरेंगे और शायद ऐसे ही लोगों को नंगा करना उनका सियासी मकसद भी हो सकता है।

बेशक, हमारे देश में लोकतंत्र है, इसलिए यह सवाल तो उठाया ही जाना चाहिए कि क्या ऐसा ही होगा? शुभेच्छा व्यक्त भी की जानी चाहिए कि ऐसा ही हो। लेकिन इस बहुप्रचारित राहत पैकेज के ढांचे की परतें उधेड़ने पर प्रथमदृष्टया ऐसा कतई नहीं लगता, उनकी नजरों से, जिनकी फितरतों को समझाने के लिए कुछ बातें यहां कुरेदता हूँ। मसलन, पहले यह समझ लेना होगा कि राहत पैकेज की प्रधानमंत्री द्वारा 12 मई को की गई घोषणा के पहले एक लाख 92 हजार 800 करोड़ रुपये की घोषणाओं को, और फिर 22 मार्च से दी गई टैक्स रियायत की वजह से हुए 7,800 करोड़ रुपये के राजस्व क्षति की प्रतिपूर्ति तथा रिजर्व बैंक द्वारा की गई अलग-अलग घोषणाओं के आठ लाख करोड़ रुपये भी इसी में शामिल हैं। 

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हालांकि, सरकार ने 56 दिनों में 20.97 लाख करोड़ रुपये के केंद्रीय राहत पैकेज की जो घोषणा की है, उनमें से विगत पांच दिनों में 11 लाख करोड़ रुपये का ही एलान हुआ है। मतलब उन पांच दिनों में की गई पांच प्रेस कांफ्रेंसों में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने जो अपने साढ़े सात घंटे लगाए और 51 घोषणाएं कीं, उसके गहरे निहितार्थ हैं। अंतिम दिन की 8 घोषणाओं ने तो सबके मन को छू लिया। क्योंकि ये सभी घोषणाएं मनरेगा, स्वास्थ्य, कारोबार, कंपनी एक्ट, ईज आफ डूइंग बिजनेस, पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज और राज्य सरकारों को लेकर थीं। 

मसलन, इसमें सबसे बड़ी बात यही कही गई कि स्ट्रैटजिक सेक्टर को छोड़कर बाकी पब्लिक सेक्टर अब प्राइवेट सेक्टर के लिए भी खोल दिए जाएंगे और यदि कोरोना लॉकडाउन की वजह से किसी कंपनी को नुकसान हुआ है तो एक साल तक उस पर दिवालिया की कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसके पूर्व गत शनिवार को ही उन्होंने कोयला क्षेत्र पर सरकार के एकाधिकार को खत्म करने की घोषणा करते हुए माइनिंग ब्लॉक्स की साझा नीलामी करने, कोल माइनिंग इंफ्रा पर 50 हजार करोड़ खर्च करने की मंशा के अलावा केंद्र शासित राज्यों में बिजली कंपनियों का निजीकरण करने, आयुध फैक्ट्री बोर्ड का निगमीकरण करने, अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी की सुविधा देने, छह हवाई अड्डों की नीलामी करने, पीपीपी मोड पर रेडिएशन तकनीक सेंटर बनवाने तथा अस्पताल एवं स्कूल जैसे सामाजिक बुनियादी ढांचे में निजी निवेश के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग बदलाव की बात कही थी। 

इस प्रकार गुजरे महज दो दिनों में ही उन्होंने 48,100 करोड़ रुपये के जिस राहत पैकेज का एलान किया है, उसमें गौर करने वाली बात यह है कि रविवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंदाज में चार एल लैंड, लेबर, लिक्विडिटी और ला की भी बात कीं। बहरहाल, केंद्रीय राहत पैकेज में एक साथ बीस लाख करोड़ से अधिक की 51 घोषणाएं, और वह भी बतौर राहत, सुनकर कोई भी सम्मोहित हो सकता है, जबकि इस ढोल की पोल यह बताई जा रही है कि केंद्र सरकार का वार्षिक बजट ही तकरीबन तीस लाख करोड़ रुपये का हुआ करता है और आरबीआइ साल भर में करीब पांच लाख करोड़ रुपये जारी करता है। इसलिए, मानकर यही चलिए कि इन्हीं 35 लाख करोड़ रुपयों की बदौलत देश का जीडीपी 6-7 प्रतिशत रहता है। अब जबकि जीडीपी शून्य पर है और निगेटिव की ओर उसके प्रस्थान करने का खतरा उत्पन्न हो गया है, तब 20 लाख करोड़ रुपये हमें कहां खड़ा कर पाएंगे, यह सोचने की बात है। क्योंकि लॉकडाउन के कारण दो महीने से देश की सारी गतिविधियां बंद हैं।

जिस तरह से आयात-निर्यात, टैक्स रियलाइजेशन, आवागमन, बाजार-व्यापार, होटल-रेस्तरां, पर्यटन-देशाटन-तीर्थाटन, धार्मिक-सामाजिक व्यवहार सब बंद है। उसके दृष्टिगत ही जीडीपी के शून्य पर पहुंचने का सबब है। जानकारों के मुताबिक, जब सामान्य परिस्थितियों में 6-7 प्रतिशत जीडीपी पर 35 लाख करोड़ रुपये से देश चलता-फिरता नजर आता है तो शून्य जीडीपी पर 20 लाख करोड़ रुपये से क्या-क्या हो सकता है? दो टूक कहा जाए तो मंदी के दिनों में देश को चलाना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन अभी तो सीधे-सीधे ब्रेकडाउन की स्थिति है। इसलिये वर्तमान और भविष्य दोनों के प्रति आशंकाओं के माहौल में शून्य से प्रारंभ करने की नौबत आन पड़ी है, आप मानें या न मानें।

फिलवक्त, यह बात भी बहुत सारे लोग भूले नहीं होंगे कि कोविड संक्रमण काल के पूर्व साल भर के अंदर भी सरकार ने मंदी के दौर में इंफ्रा डेवलपमेंट के लिए सौ करोड़ और रीयल इस्टेट सेक्टर के लिए 25 हजार करोड़ के केंद्रीय राहत पैकेज की अलग-अलग घोषणा की थी। जबकि इनके भुगतान का दारोमदार बैंकों पर था, जिसका उन्होंने जोखिम भी नहीं उठाया। हालांकि, इस बार के भारी-भरकम राहत पैकेज का अधिकांश हिस्सा उन्हीं बैंकों के सिर पर डाला गया है। लिहाजा, यह कुल मिलाजुलाकर फाइनांसियल राहत पैकेज है, जिसके तहत बैंकों को बड़ा हिस्सा बतौर कर्ज देने को कहा गया है, जबकि पावर सेक्टर सहित कुछ अन्य मदों में सरकार की गांरटी की बात कही गई है। सरकार की गारंटी वाले हिस्से का बैंक यदि रियलाइजेशन कर भी दें तो और वह खरा न उतरे तो सरकारी बजट पर बोझ बढ़ना तय है। ऐसे भी सरकारी गारंटी वाले कर्जों पर औसतन 15 फीसद के लेनदार कर्ज वापसी से हाथ खड़े ही कर देते हैं। बाकी मसलों पर यह बताने की जरूरत नहीं कि कर्ज का व्यवसाय देनदार और लेनदार के आपसी व्यवहार पर निर्भर करता है।

वास्तव में, कोई भी अर्थव्यवस्था भविष्य के अनुमानों पर ही आश्रित होती है, इसलिए आर्थिक फैसलों को वर्तमान के संदर्भ में देखना अक्सर भुलावा साबित होता आया है, जबकि पैकेज में कर्ज, कर्ज और कर्ज की बातें अधिक हैं। यह कड़वा सच है कि लगभग 93.8 लाख करोड़ रुपये बतौर कर्ज बाजार में फेंककर और तकरीबन दस लाख करोड़ रुपये के एनपीए पर बैठे बैंक पहले से ही हांफ रहे हैं। वहीं, कर्ज के भरोसे चल रहे छोटे-बड़े उद्योग भी हैरान-परेशान हैं। इसके बावजूद, राहत के नाम सरकार उन एनबीएफसी और रीयल इस्टेट्स को भी कर्ज देने की बात कह रही है, जिनको बैंक कर्ज देने लायक भी नहीं मानते। क्योंकि वे पहले ही बहुत कुछ डुबा चुके हैं या फिर किसी सोची समझी चाल के तहत गटक चुके हैं। ऐसे में कौन सी फर्म एक बार पुनः कर्ज लेना चाहेगी और बैंक उनको किस हौसले से कर्ज देंगे, यह सोचने-विचारने वाली बात है। वो भी तब जबकि समस्त कारोबार ही चुनौतीपूर्ण भविष्य की ओर इशारा कर रहा है। कोरोना क्राइसिस से निपटने में असमर्थ पाकर सरकार ने राहत की अधिकतर जवाबदेही बैंकों की ओर मोड़ रही है, जबकि कर्ज बाजार से त्रस्त बैंक हाल-हाल तक लोन राइट ऑफ के कर्मकांड में जुटे हुए थे ताकि उनका बैलेंस शीट साफ-सुथरा हो सके। यही वह कर्ज बाजार और विशाल एनपीए का जमाना है, जिसके कारण बैंक विलयीकरण का विराट निर्णय लेना पड़ा था।

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जहां तक बैंकों के समीकरण का सवाल है तो वह कुछ इस प्रकार है। दरअसल, कोविड 19 संकट के प्रवेश के पहले ही रिजर्व बैंक की सख्ती, घाटा और घोटालों के कारण बैंक किसी अन्य जरूरतमंद को भी कर्ज देने में आनाकानी करने लगे थे। लेकिन, ठीक ऐसे ही माहौल में जब कोविड महामारी नामक विश्वव्यापी हलचल का प्रवेश भारत में हुआ तो उसी रिजर्व बैंक ने एनबीएफसी, म्युचुअल फंड आदि के लिए चार लाख करोड़ रुपये जारी कर सस्ते कर्ज का फरमान लाया, लाभांश देने से मना किया, फिर भी कर्ज बाजार परवान न चढ़ा तो बैंकों ने रिवर्स रैपो के बतौर भारी रकम आरबीआई को लौटा दी। कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में अचानक राहत पैकेज उभरा। बदहाली के कारण जो सरकार महीना भर पहले तीन महीने तक उद्योगों से कर्ज वसूली न करने का बैंकों पर दबाव बना रही थी, वही सरकार अब उद्योगों को कर्ज लेने को उकसा रही है। कर्ज, कर्ज और कर्ज का आलम यह कि कोविड संक्रमण के पहले सरकार बैंकों को कर्ज के बोझ से उबारने का उपक्रम कर रही थी, वही सरकार बीच में कर्ज सस्ता कर बैंकों को पुश करने में जुट गई और अब कह रही है नया कर्ज दो। 

सवाल है कि जो उद्योग दो वर्षों से अपने कर्ज की रिस्ट्रस्कचरिंग की गुहार लगा रहे थे, वे ही अब किस हौसले से कर्ज लेंगे, यह देखने वाली बात होगी। अमूमन जो सामान्य परिस्थिति में कर्ज लेने का हौसला नहीं दिखा रहे थे, वे अत्यंत ही विषम हालात में कर्ज की ओर रूख करेंगे तो उनकी हालत कैसी होगी, समीचीन प्रसंग है? यह एक खुली सच्चाई है कि कर्ज के भंवरजाल के कारण एसबीआई को चार महीने में अपनी एफडी की रेट तीन बार घटानी पड़ी और सेविंग्स अकाउंट का रेट गिराते-गिराते तीन फीसद की हद तक ले आना पड़ा। 

वास्तव में, इन सम-विषम हालातों से गुजर रहे बैंक एक बार फिर कर्ज बाजार में किस प्रकार उतरते हैं, कितनी तैयारी से उतरते हैं, या फिर पिछली लापरवाही से सबक लिए बिना ही उतरते हैं, यह सब देखना-जानना-सुनना और भी दिलचस्प होगा। वजह यह भी कि जो बैंक जमाकर्ताओं के भरोसे ही चलते हैं, उनके हालात आज ऐसे बन गए हैं कि उनकी गर्दन पर ही दुधारी छुरी चल रही है। 

आलम यह है कि महंगाई दर छह प्रतिशत के सापेक्ष बचत खाता (सेविंग्स अकाउंट) पर तीन प्रतिशत रिटर्न जमाकर्ताओं की आशाओं पर कितना भारी तुषारापात है, यह तो नहीं चाहते हुए भी समझना ही होगा, और अन्य लोगों को यह समझाना भी पड़ेगा कि इन विपरीत परिस्थितियों में जमाकर्ता (डिपॉजिटर) कहां, कब और कितना रोयें। और, पहले से ही बदहाल बैंक भी आखिरकार करें तो क्या करें, ताकि आम लोगों से लेकर खास लोगों की जिंदगी पुनः पटरी पर लौटे और सम्पूर्ण बैंकिंग व वित्तीय व्यवस्था से उनकी आस्था डिगे नहीं, मतलब कि भरोसा कायम रहे।

-कमलेश पांडेय

(वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार)

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