By अशोक भाटिया | Oct 17, 2026
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 12 अक्टूबर 2026 की तारीख एक ऐसी असाधारण और चिंताजनक घटना के रूप में दर्ज हो चुकी है, जिसने संवैधानिक संस्थाओं के बीच पारस्परिक सम्मान की सीमाओं को पूरी तरह से धुंधला कर दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे 'स्पेशल इनटेंसिव रिवीजन' की प्रक्रिया के खिलाफ विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के तमाम शीर्ष नेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट परिसर तक निकाला गया विरोध मार्च सिर्फ एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह न्याय की सर्वोच्च देहरी पर जन-दबाव बनाने का एक ऐसा अभूतपूर्व प्रयास था, जिसकी अनुमति हमारा संवैधानिक ढांचा कभी नहीं देता। 15 अक्टूबर 2026 को इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने जो बेहद सख्त रुख अपनाया, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र की आत्मा उसकी संस्थाओं की गरिमा और उनकी स्वतंत्रता में बसती है, न कि सड़कों पर उमड़ने वाली राजनीतिक भीड़ के कोलाहल में।
अदालत का सुनवाई के दौरान यह कहना कि "हम आइवरी टावर (हाथीदांत के मीनारों) में नहीं बैठे हैं, हमें सब पता है कि बाहर क्या बयान दिए जा रहे हैं और कोर्ट के भीतर क्या कहा जा रहा है", देश के पूरे राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक गंभीर और ऐतिहासिक चेतावनी है। जब देश का विपक्ष का नेता, जिसके पास कैबिनेट मंत्री का दर्जा होता है और जो संसद के भीतर देश की जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है, स्वयं समर्थकों की भारी भीड़, नारेबाजी और हंगामे के बीच देश की सर्वोच्च अदालत की रजिस्ट्री में याचिका दाखिल करने पहुंचता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब न्यायिक प्रक्रियाओं का फैसला भी सड़कों के संख्याबल से तय होगा? यह संपादकीय इसी गहरे और गंभीर संवैधानिक संकट का निष्पक्ष विश्लेषण करने का प्रयास है कि आखिर विपक्ष के इस कदम के पीछे की राजनीति क्या है, न्यायपालिका की चिंताएं कितनी जायज हैं और भारतीय लोकतंत्र को इस अभूतपूर्व संस्थागत टकराव से बचाने के लिए किस तरह के संतुलन की आवश्यकता है।
जब यह पूरा मामला 15 अक्टूबर को सुनवाई के लिए आया, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ का रुख बेहद कड़ा और मुखर था। कोर्ट ने दो अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की—पहली याचिका विपक्ष की वह मूल याचिका थी जिसमें चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी; और दूसरी याचिका उन वकीलों की थी जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट परिसर के भीतर राजनीतिक रैलियों, नारेबाजी, और राजनीतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।अदालत ने दोनों मामलों को बेहद संतुलित लेकिन सख्त तरीके से संभाला। CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "कोई भी बाहरी दबाव या भीड़ लाकर हमारी न्यायपालिका को डरा-धमका नहीं सकता।" कोर्ट ने सीधे तौर पर याचिकाकर्ता राहुल गांधी के आचरण और उनके इरादों पर सवाल उठाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विपक्ष की मुख्य याचिका पर विचार करना पूरी तरह से 'अनंतिम' है, और राहुल गांधी को सबसे पहले 12 अक्टूबर को कोर्ट परिसर के भीतर और आसपास पैदा हुई अराजकता, भीड़ के प्रवेश और अव्यवस्था पर अपने आचरण की लिखित सफाई देनी होगी। इसके अलावा, कोर्ट ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों को आदेश दिया कि वे उस दिन की सभी सीसीटीवी और डिजिटल फुटेज को सुरक्षित रखें, ताकि यह जांचा जा सके कि इस राजनीतिक जुलूस के दौरान कोर्ट की सुरक्षा से क्या खिलवाड़ हुआ था
यह कानूनी टकराव अब एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है जहां अदालत ने चुनाव आयोग , मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी) को नोटिस जारी कर जवाब तो मांग लिया है—जो कि विपक्ष के लिए एक बड़ी वैधानिक राहत हो सकती थी—लेकिन जजों ने तुरंत स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अदालत ने नेताओं के इस आचरण या व्यवहार को स्वीकार या नजरअंदाज कर दिया है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक और दूरगामी पहलू यह है कि यह हमारे संविधान के बुनियादी सिद्धांत 'शक्तियों के पृथक्करण' पर सीधा प्रहार करता है। हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका (जिसमें चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाएं शामिल हैं) उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका इस बात की समीक्षा करती है कि क्या वे कानून और प्रशासनिक कदम संविधान के अनुरूप हैं या नहीं। इन तीनों अंगों के बीच एक बेहद महीन और अदृश्य मर्यादा रेखा होती है। जब विधायिका या विपक्ष के नेता न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए 'अदालती घेराव' जैसी शैली अपनाते हैं, तो वह मर्यादा रेखा पूरी तरह टूट जाती है।सुप्रीम कोर्ट कोई राजनीतिक मंच या दिल्ली का जंतर-मंतर नहीं है, जहां धरने, प्रदर्शन या संख्याबल के जरिए अपनी मांगों को मनवाया जा सके। अदालतें केवल और केवल तथ्यों, साक्ष्यों, नजीरों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर चलती हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो अदालत में राहुल गांधी का पक्ष रख रहे हैं—और जो स्वयं देश के जाने-माने कानूनविद और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री रह चुके हैं—वे भली-भांति जानते हैं कि अदालत के भीतर पेश किए जाने वाले तर्कों का वजन इस बात से तय नहीं होता कि कोर्ट रूम के बाहर कितने हजार लोग नारे लगा रहे हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कोर्ट में जो चिंताएं उठाईं कि "अदालत को राजनीतिक जुलूसों से घेरना पूरी तरह से अस्वीकार्य है", वह किसी एक राजनीतिक दल की चिंता नहीं, बल्कि देश के पूरे कानूनी तंत्र की सामूहिक चिंता होनी चाहिए।
- अशोक भाटिया
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार