उपहार तो लेने की चीज़ है (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 09, 2024

मानवीय व्यवहार में देने की संस्कृति को सराहा जाता है। माना जाता है कि दूसरों को देने से जो खुशी, संतुष्टि मिलती है उसका कोई विकल्प नहीं। लेकिन अब तो लेने की संस्कृति भी काफी विकसित होती जा रही है। हम इस बात की परवाह नहीं करते कि क्या दे रहे हैं, इस बात का ध्यान रखते हैं कि क्या ले रहे हैं और क्या मिल सकता है। 

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हमारे यहां अधिकांश मामलों में रिटर्न गिफ्ट की कीमत बारे कोई विचार नहीं, न ही संदेश ज़रूरी है। यहां नेताओं और अधिकारियों द्वारा बड़े बड़े उपहार प्राप्त करना उनका अधिकार है। वहां कोई अपने कर्मचारी को रिटर्न गिफ्ट देगा तो उसकी कीमत उपहार से दोगुना होनी चाहिए। दिलचस्प यह है कि पारम्परिक रूप से वहां वेलइटाइम डे पर महिलाएं ही पुरुषों को उपहार दे सकती हैं फिर अगले दिन पुरुष मिले उपहारों के बदले महिलाओं को रिटर्न गिफ्ट देते हैं। हमारे यहां लड़की चाहती है कि उपहार तो लड़का ही दे । शादी जैसे अवसरों पर रिटर्न गिफ्ट तय करना मुश्किल हो जाता है इसलिए वहां कैटलाग बनाए जाते हैं जिससे रिटर्न गिफ्ट लेने वाला अपनी पसंद का रिटर्न गिफ्ट चुन सकता है।  हमारी तरह नहीं कि पसंद आए न आए, चिपका दिए जाते हैं ताकि घर के स्टोर की शोभा में बढ़ोतरी हो। 

हमारे यहां दिवाली पर पतीसे का एक ही मीठा उपहार कई घरों में घूमने की सांस्कृतिक परम्परा है। वहां लगभग हर अवसर पर उपहार देने की प्रथा है। स्कूल में प्रवेश, प्रवेश परीक्षा, स्नातक, नौकरी, शादी, माता पिता बनना और  सठियाने पर भी उपहार दिया जाता है। मरने पर अंत्येष्टि धन दिया जाता है। हमारे यहां उपहार लेना ज़्यादा पसंद किया जाता है, उपहार तो हम देने के लिए देते हैं फिर गणना शुरू हो जाती है कि हमें क्या मिलेगा। 

हम छोटे से देश जापान जैसे थोडा हो सकते हैं।

- संतोष उत्सुक

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