मोदी के जीवन संघर्ष, सफलता और कर्तव्य बोध से बहुत कुछ सीखा जा सकता है

By डॉ. नीलम महेंद्र | Sep 19, 2020

आज भारत विश्व में अपनी नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है। वो भारत जो कल तक गाँधी का भारत था जिसकी पहचान उसकी सहनशीलता थी, आज मोदी का भारत है जो खुद पहल करता नहीं, किसी को छेड़ता नहीं लेकिन अगर कोई उसे छेड़े तो छोड़ता भी नहीं। गाँधी के भारत से शायद ही किसी ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक जैसे प्रतिउत्तर की अपेक्षा की होगी। उसके बाद अब डोकलाम विवाद और फिर गलवान घाटी में चीन को अपने जवाब से भारत ने विश्व में अपनी इस बदली हुई पहचान की मुहर लगा दी है। उससे बड़ी बात यह है भारत की इस नई पहचान को विश्व बिरादरी सहजता के साथ स्वीकार भी कर चुकी है। जोकि वैश्विक राजनीति में भारत की कूटनीतिक एवं रणनीतिक विजय की परिचायक है। भारत की यह नई पहचान इसलिए भी विशेष हो जाती है क्योंकि उसे यह पहचान दी है एक ऐसे नेता ने जिसके जीवन की शुरुआत बेहद साधारण रही। जिसका जन्म किसी राजनैतिक परिवार में नहीं हुआ। जिसका केवल बचपन ही नहीं पूरा राजनैतिक जीवन ही संघर्षपूर्ण रहा।

इसे भी पढ़ें: मुद्दों के अभाव में विपक्ष ने किसानों को अपनी राजनीति का मोहरा बना लिया

कोरोना जैसी महामारी जिसने यूरोप के विकसित देशों से लेकर अमेरिका तक को हिला दिया वहाँ भारत के गांव-गांव तक कोरोना से बचने के लिए मास्क का उपयोग और हाथ धोने को लेकर आमजन की जागरूकता देखते ही बनती है। कोरोना से भारत जैसा गरीब देश इस प्रकार से लड़ लेगा इसकी विश्व में किसी ने अपेक्षा नहीं की थी। ऐसा लगता है कि इतनी सहजता और सरलता से असंभव को संभव बनाने में मोदी को जैसे महारथ हासिल है। तभी तो संविधान से धारा 370 का हटना हो या राम मंदिर का ऐतिहासिक फैसला, सरकार के इन कदमों से नरेंद्र मोदी ने देशवासियों के दिलों में वो जगह बना ली जो कल्पना से परे है। वडनगर के एक साधारण से स्कूल से शिक्षा अर्जित करने वाला विद्यार्थी विदेशों के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों से बड़ी-बड़ी डिग्री धारी नेताओं के लिए इतनी लंबी लकीर खींच देगा, यह किसने सोचा था। राजनैतिक परिवार में पैदा होने वाले एवं राजनैतिक वातावरण में पल कर बड़े होने वाले ऐसे नेता जो राजनीति में टिके रहने के लिए इसे ही अपनी सबसे बड़ी शक्ति मानते थे उनके लिए नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व का प्रधानमंत्री बनना एक सबक है।

खुद मोदी के शब्दों में, मैं मुख्यमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री के दफ्तर नहीं गया। मैं सांसद बनने से पहले संसद भवन नहीं गया। और प्रधानमंत्री बनने से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं गया।

जब ऐसा नेता मुख्यमंत्री बनता है और तमाम राजनैतिक विरोध के बावजूद भारी जनसमर्थन से लगातार तीन चुनाव जीतता है। "चौकीदार चोर है' के नारों के बावजूद पहली बार से भी अधिक बहुमत से प्रधानमंत्री बनता है तो यह यात्रा उसकी सफलता से अधिक उसके संघर्ष को बयान करती है। वो संघर्ष जो उनके व्यक्तित्व को बयान करता है। वो व्यक्तित्व जो इन शब्दों से परिभाषित होता है कि "एक सफल व्यक्ति वह है जो औरों द्वारा अपने ऊपर फेंके गए ईंटों से एक मजबूत नींव डाल ले।''

-डॉ. नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

प्रमुख खबरें

HDFC Bank के नए CEO अनूप बागची को पहले साल 43 करोड़ रुपये का पैकेज मिलेगा

Allahabad High Court ने दुष्कर्म और अपहरण मामले में 38 साल बाद व्यक्ति को किया बरी

UP में विकास और Infrastructure प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे हों, सीएम Yogi Adityanath के कड़े निर्देश

Delhi Police ने Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi पर दर्ज कीं 4 FIR