Gyan Ganga: साधक को भगवान की परीक्षा लेने का अधिकार नहीं है

By सुखी भारती | Jun 13, 2024

श्रीसती जी अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती कर बैठी थी। गलती यह, कि उन्होंने उनकी परीक्षा ली, जिन्हें स्वयं भोलेनाथ भी ‘सच्चिदानंद’ कहकर प्रणाम कर रहे थे। गलतियाँ होना बड़ी बात नहीं होती। बड़ी बात होती है, उस गलती को स्वीकार कर लेना एवं पुनः उन गलतयों को स्वपन में भी न दोहराना। लेकिन श्रीसती जी शायद इन सिद्धातों से वास्ता ही नहीं रखना चाह रही थी। क्यों? यह हम आगे जानने वाले हैं।

 

श्रीसती जी भगवान श्रीराम जी की परीक्षा लेकर वापिस भोलेनाथ जी के पास गई, तो भगवान शंकर वटवृक्ष के नीचे ध्यान मग्न बैठे थे। श्रीसती जी को पास पाकर वे मुस्कराकर पूछते हैं, कि ‘हे सती! तुम श्रीराम जी की परीक्षा लेकर आ गई हो? सच-सच बताना, तुमने श्रीराम जी की परीक्षा किस प्रकार से ली?’

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देखा जाये, तो भगवान शंकर अभी भी श्रीसती जी से गुस्सा नहीं हैं। अगर वे गुस्सा होते, तो ऐसे हँस कर श्रीसती जी से बात न करते। क्योंकि उन्हें पता है, कि साधक को भगवान की परीक्षा लेने का अधिकार नहीं है। लेकिन चलो आज अगर इस धरती पर, ऐसा कोई करने का साहस कर पा रहा है, तो वह मेरे ही घर में से है। निश्चित ही उसकी भावना अपावन ना हो, ऐसी मेरी कामना है। भक्त और भगवान के रिश्ते में, कभी-कभी भक्त को भी भगवान की परीक्षा लेने का अधिकार होना चाहिए। प्रभु को भी तो पता चले, कि परीक्षा देने मे कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। श्रीनारद जी ने भी तो भगवान विष्णु को श्राप दे दिया था। आश्चर्य की बात, कि भगवान ने भी उस श्राप को स्वीकार कर लिया था। वे श्रीनारद पर क्रोधित थोड़ा न हुए थे। हो सकता है, कि श्रीराम जी भी अपनी परीक्षा लेने पर बुना न माने हों। लेकिन कुछ भी हो, मुझे वह प्रसंग सुनने की अतिअंत उत्कंठा है, कि कैसे सती ने, श्रीराम जी की परीक्षा ली होगी?


श्रीसती जी ने जब, भगवान शंकर जी के श्रीमुख से यह प्रश्न सुना, तो वे मन ही मन ओर अधिक उलझ गई। वे सोचने लगी, कि भोलनाथ अब निश्चित ही क्रोधित होंगे, क्योंकि मैंने निश्चित ही पून्य का कार्य नहीं किया है। तब श्रीसती जी अपने मन में श्रीराघव के अप्रितम प्रभाव का स्मरण कर भयभीत होकर बोली-‘हे स्वामिन! मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, वहाँ जाकर मैंने श्रीराम जी को ठीक वैसे ही प्रणाम किया, जैसे आपने किया था।’


तब भगवान शंकर ने यहाँ दो प्रकार की क्रियायें की। पहली बोल कर, और दूसरा ध्यान में जाकर। बोल कर तो यह कहा, कि हे सती आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता। ऐसा मेरे मन में दृढ़ विश्वास है-


‘जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई।

मोरें मन प्रतीत अति सोई।।’


भगवान शंकर ने देखा, कि श्रीसती जी मेरे संग दैहिक स्तर पर सत्यवादी होने का प्रयास कर रही है। मुझसे श्रीसती जी झूठ भी भला क्यों बोलेगी? कारण कि पति-पत्नि का तो रिश्ता ही ऐसा है, कि इसकी नींव पूर्णतः विश्वास पर ही टिकी हुई है। विश्वास है, तो रिश्ता है, और अगर विश्वास नहीं, तो इस रिश्ते की कल्पना करना भी व्यर्थ है।


भगवान शंकर ने दैहिक स्तर तो श्रीसती जी के वाक्यों को सम्मान दे दिया, लेकिन आत्मिक स्तर पर, पता नहीं क्यों, श्रीसती जी कसोटी पर खरी उतरती नहीं दिख पा रही थी। तभ भगवान शंकर ने दूसरी क्रिया के रुप में अपनी आँखें बंद करली। उन्होंने ध्यान में देखा, कि कैसे-कैसे श्रीसती जी ने भगवान श्रीराम जी की परीक्षा ली। जिसके दौरान श्रीसती जी एक अक्षम्य अपराध कर रही हैं। वह अपराध था, श्रीसती जी द्वारा जगत जननी श्रीसीता जी का स्परुप धारण करना। यह जानकर भगवान शंकर जी के मन में विषाद छा गया। वे भीतर तक निराश हो गये। उन्हें दूर-दूर तक यह आशा नहीं थी, कि श्रीसती जी ऐसा करेंगी। तब उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया, जो कि श्रीसती जी को किसी श्राप से कम नहीं था-


‘सतीं कीन्ह सीता कर बेषा।

सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।।

जौं अब करउँ सती सन प्रीती।

मिटइ भगति पथु होइ अनीति।।’


जी हाँ! भगवान शंकर श्रीसती जी को त्यागने का निर्णय ले लेते हैं। तब श्रीसती जी की क्या दशा होती है, और भगवान शंकर यह निर्णय क्यों लेते हैं, जानेंगें अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।


- सुखी भारती

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