कमजोर मानसून तो महंगाई का लगेगा तड़का, अर्थव्यवस्था होगी प्रभावित

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Jun 01, 2026

मौसम विभाग द्वारा 29 मई को जून से सितंबर मानसून के दौरान 10 प्रतिशत कम बरसात का पूर्वानुमान बेहद चिंताजनक का कारण बन गया है। इससे पहले जारी पूर्वानुमान में 8 प्रतिशत कम बरसात की संभावना व्यक्त की गई थी। लगभग दस साल बाद देश में कमजोर मानसून के हालात रहने की संभावना है। अर्थव्यवस्था के लिए यह इसलिए और भी अधिक चिंतनीय हो जाता है कि एक और अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच सीजफायर के आसार नहीं दिख रहे हैं और इसके कारण भारत सहित दुनिया के अधिकांश देश कच्चे तेल और गैस की समस्या से दो चार हो रहे हैं और इसका सीधा असर महंगाई बढ़ना हो रहा है। दूसरी और अब अलनीनों के प्रभाव से इस साल कमजोर मानसून के कारण 10 प्रतिशत कम बरसात होने से हालात और भी गंभीर होने की संभावना बनती जा रही है। करीब दस साल बाद ऐसे हालात बनने जा रहे हैं। खास बात यह है कि उत्तर पूर्व को छोड़कर समूचे देश में कम बरसात की संभावना व्यक्त की गई है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान को इसलिए भी नहीं नकारा जा सकता है कि पिछले सालों में भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान लगभग सटीक रहने लगे हैं। मजे की बात यह है कि इस साल गर्मी भी भीषण पड़ रही है और पिछले एक माह में ही जलाशयों में उपलब्ध पानी में तेजी से कमी आई है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश के प्रमुख 166 जलाशयों में कुल भराव क्षमता का 24 प्रतिशत के आसपास ही पानी रह गया है और तेजी से पानी कम होता जा रहा है। दक्षिण भारत के हालात अधिक गंभीर है और वहां लगभग 17 प्रतिशत ही पानी रह गया है। उत्तरी भारत के जलाशयों में 26 तो पश्चिमी भारत के जलाशयों में 28 प्रतिशत के आसपास ही पानी रह गया है। मानसून भी तय समय से बिलंबित हो रहा है। 

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दरअसल देश में एक समय था जब सूखा आम होता था और व्यापक स्तर पर अकाल राहत कार्य संचालित होते थे। हांलाकि देश के हालातों में काफी सुधार हुआ है और अकाल को तो लगभग भूल ही चुके हैं। पर सवाल वहीं का वहीं है कि जल संचयन के जो प्रयास होने चाहिए थे और उनका जिस तरह का प्रभाव पड़ना चाहिए था वह अभी तक सामने नहीं आया है। सरकार के सामने कमजोर मानसून के हालात से निपटने की बड़ी चुनौती आने वाली है। सबसे अधिक तो जल संग्रहण की चुनौती होगी क्योंकि प्राकृतिक जल संग्रहण के रास्ते शहरीकरण की भेंट चढ़ चुके हैं। दीर्घकालीन सोच के साथ ठोस प्रयास नहीं होने से बरसात के पानी का सही तरीके से संग्रहण भी नहीं हो पा रहा है। जितने पानी की साल भर आवश्यकता होती है उससे अधिक बरसाती पानी तो बह जाता है। इसके अलावा पानी का उपयोग और दुरुपयोग दोनों ही बढ़ गए हैं। कम पानी से तैयार होने वाली फसलों की किस्में विकसित करने में हम अभी पूरी तरह से सफल नहीं हो पायें हैं। पांच नदियों के प्रदेश पंजाब तक में पानी का संकट होने लगा है। खेती ही नहीं घरेलू जरुरतों में भी पानी का उपयोग बहुत अधिक बढ़ गया है। टायलेट और कूलरों में पानी की खपत बहुत अधिक बढ़ गई है। जल बचाओ मात्र स्लोगन ही रह गया है और इसका असर दिखाई नहीं देता। इसी तरह से वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम तैयार तो बहुत किये गये हैं पर उनके निर्माण में जिस तरह की लापरवाही बरती गई है वह किसी से छिपी नहीं हैं। क्योंकि वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम कितना सफल रहा है वह सामने हैं। बाहरमासी नदी नालें तो अब कल्पना की बात हो गए हैं बल्कि बरसाती नदियां भी बरसात में एकाध बार ही पूरे वेग से बहती दिखती है। ऐसे में गंभीरता को तो समझा ही जा सकता है। 

एक बात साफ हो जानी चाहिए कि मानसून हमेशा सामान्य ही रहेगा यह सोचना अपने आप में गलत होगा। जिस तरह से वातावरण प्रदूषित हो रहा है, जंगल घटते जा रहे हैं, पेड़ पौधे कम हो रहे हैं वह किसी और की देन नहीं हमारे कारण ही हो रहा है। हालात यह हो गए हैं कि सर्दी में सर्दी नहीं और गर्मी में गर्मी को तरसने लगे हैं। यहां तक कि इस बार तो बसंत की प्रतीक्षा ही करते रह गए हैं। जनवरी फरवरी में सर्दी तो फिर मार्च अप्रेल में गर्मी का असर देखा गया। बसंत कब आया और कब गया पता ही नहीं चला। कहने का अर्थ है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम सामने हैं। प्राकृतिक विपदाएं अधिक होने लगी है। ग्लेसियरों में तेजी से बर्फ पिघल रही है, समयपर बर्फवारी कम होने लगी है। बेमौसम आंधी ओलावृष्टि आम होती जा रही है। खैर यह विषयांतर होगा पर कहीं ना कहीं मानसून को लेकर दीर्घकालीन रणनीति बनानी ही होगी ताकि कमजोर मानसून का जनजीवन और अर्थ व्यवस्था पर व्यापक असर नहीं पड़े। सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर इस दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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