By संतोष उत्सुक | Oct 29, 2020
विश्वगुरुओं के देश में कुछ भी सीखना मुश्किल नहीं। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक हिसाब किताब करने में हम जगत प्रसिद्द हैं। इन व्यवसायों से सम्बंधित आंकड़े बोने, उगाने, काटने, पकाने और सजाने में हम माहिर हो चुके हैं। दुनिया को हमने ही शून्य दिया, अब सबसे चर्चित आंकड़े दे रहे हैं। मसाला उगाने और पीसने के साथ विभिन्न तरह का खाना बनाने का लम्बा अनुभव बहुत काम आ रहा है।
अच्छी तरह से पकाए आंकड़ों को सुन्दर प्लेट में स्वादिष्ट डिश की तरह पेश किया जाए तो देखने वाले का नजरिया अविलम्ब सकारात्मक हो उठता है। जिस तरह चेतावनी देने की चीज़ है लेने की नहीं, आंकड़े मानने की नहीं, दिखाने और बताने की चीज़ है। आंकड़े हमेशा परिवर्तनशील रहने चाहिए, जो आंकड़े सहन न हो रहे हों, कुछ समय बाद बुरे लगने लगें उन्हें हटा देना चाहिए और नए आकर्षक खुशबूदार आंकडें पेश कर देने चाहिएं। कुछ सच्चे आंकडें सालों टिके रहते हैं जैसे वीआईपी की गाड़ियों से ही बत्ती उतरी, उनके दिमाग से नहीं। इतने दशक से निरंतर बहती वीआईपी संस्कृति का आंकड़ा यूं बदल नहीं सकता। वीआईपी अपने महत्त्व का आंकड़ा कम क्यूं करना चाहेंगे। फिर कोई सत्य आंकड़ा अपना उंचा स्थान क्यूँ छोड़ेगा।
गरीबी बहुत प्रसिद्द आंकड़ा है जब राजनीति इसकी मदद करती है तो यह आंकड़ा महत्वपूर्ण ढंग से निखरकर नया चोला पहन लेता है। चैनल अपना सहयोग देते हुए नए आंकड़े गढ़ते, बिगाड़ते, मरम्मत करते हुए इतिहास रचते हैं। अगर हम बीमारी के बारे में संजीदा शैली में कह देते हैं कि यह गंभीर प्रवृति की नहीं है तो चाहे आंकड़ा ज़्यादा भी हो उसका असर विश्वस्तर पर कम हो जाता है। इस आंकड़े को वहां पड़े पीले आंकड़े से भाग देकर जो अंक आए उसे ऊपर रखे तिकोने लाल आंकड़े से गुणा कर, तीन फुट नीचे दबाए तेलीय आंकड़ों में पंद्रह मिनट तक, सौ प्रतिशत डुबोकर रखें। अब उन्हें विचार और संकल्प की कढ़ाही में अच्छे से पका दें और योजनाओं का स्वादिष्ट सूखा मसाला लगा दें।
भविष्यवक्ता से सही मुहर्त निकलवाकर यह सुनिश्चित कर लें कि कितने प्रतिशत आंकडें दिखने और सुनने में बेहतर लगेंगे और अधिकांश लोगों को पसंद भी आएंगें। आकर्षक आंकडें स्वादिष्ट पकौड़ों से कम नहीं होते। इन्हें बारह महीने पसंद किया जाता है क्यूंकि हमारे यहां राजनीति की तीखी मीठी चटनी हमेशा उपलब्ध होती है।
- संतोष उत्सुक