प्रशासनिक तंत्र की तय हो जवाबदेही..

By उमेश चतुर्वेदी | Dec 12, 2025

उत्तर भारत की सर्दियां गोवा के लिए वरदान होती हैं। अरब सागर तटीय इस राज्य में सर्दियों में उत्तर भारतीय सैलानियों की आवक बढ़ जाती है। लेकिन हो सकता है कि इस बार यह आवक कम हो। गोवा में साल के आखिरी दिनों और अगले साल की छुट्टियां मनाने का मन बना चुके सैलानियों में इस बार हिचक हो सकती है। वजह है, यहां के मशहूर नाइट क्लब ’बर्क बाय रोमियो लेन’ में लगी आग, जिसमें पांच सैलानी समेत पच्चीस लोगों की दर्दनाक मौत हो गई है।  


दुर्घटनाएं कह कर नहीं आतीं, लेकिन उनकी रोकथाम की मुकम्मल तैयारी से शायद ही किसी को  इनकार हो। लेकिन समंदर के किनारे से छनकर आती रोशनियों के बीच स्थित गोवा के इस नाइट क्लब में लगी आग और उसमें गई निर्दोष जान ने सबसे बड़ा सवाल उस प्रशासनिक तंत्र पर लगाया है, जिस पर इस हादसे की रोकथाम की जिम्मेदारी थी। बताया जा रहा है कि अनधिकृत ढंग से इस नाइट क्लब का निर्माण किया गया था। इस अनधिकृत निर्माण को तोड़ने के लिए गोवा की संबंधित पंचायत ने निर्देश भी दे रखा है। आग लगने की दशा में उसके रोकथाम और बचाव को लेकर इस नाइट क्लब में कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं था। इतना ही नहीं, यह क्लब बेहद संकरी जगह पर है, जहां आसानी से जाना संभव नहीं है। 

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भारत में एक चलन स्वीकार कर लिया गया है। नियमावलियां तो खूब बनाई गई हैं। लेकिन वे सिर्फ दस्तावेजों के लिए हैं। जिन्हें इन नियमावलियों को लागू करने की जिम्मेदारी है,  जिन पर इन नियमावलियों को  तोड़ने वालों को उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत  दंडित करने-कराने की जवाबदेही है, अक्सर वे इससे आंखें मूंद लेते हैं। कई बार नियम तोड़ने वालों से संबंध पलकों को मोड़ने का जरिया बनते हैं तो कई बार रिश्वत की रकम का बोझ पलकों को झुकने के लिए मजूबूर कर देता है। भारत के प्रशासनिक तंत्र का बड़ा हिस्सा इसी तरह की मानसिकता में काम करता है। वह दुर्घटनाओं और हादसों का  इंतजार करता है। वह तभी जागता है, जब हादसे हो जाते हैं, उनमें मासूम जानें चली जाती हैं। तब उन्हें नियमों की तेजी से याद आने लगती है। प्रशासनिक तंत्र की बंद आंखे तब ऐसे खुल जाती हैं, जैसे भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुलता है। तब उसे अनधिकृत निर्माण भी दिखने लगता है, तब उसे कार्रवाई की भी सूझने लगती है। कार्रवाई होती भी है। गोवा के ‘बर्क बाय रोमियो लेन’ क्लब के मालिकों पर भी होगी, लेकिन इसका असर कितनी देर तक रहेगा, कहना मुश्किल है। क्योंकि वक्त बीतते-बीतते कार्रवाई में ढिलाई भी शुरू हो सकती है और अगर किसी सामाजिक संस्था, किसी राजनीतिक व्यवस्था या किसी न्यायिक व्यवस्था की निगाह उस पर नहीं पड़ी तो कार्रवाई धीरे-धीरे टलती चली जाएगी, उसकी तासीर ठंडी होती जाएगी और फिर हो सकता है कि नियमों को तोड़ने वाले किसी और जगह नियम तोड़कर ऐसा ही किसी और नाम से नाइट क्लब चलाने लगें


भारत में अंग्रेजों ने प्रशासनिक ढांचा अपने राजकाज को चलाने के लिए बनाया था। उसे लंबी अवधि तक बनाए रखने के लिए बनाया था। देखते ही देखते यह तंत्र स्टील फ्रेम में तब्दील होता चला गया। वैसे भी जर्मन दार्शनिक मैक्स वेबर इसे स्टील फ्रेम ही बताते हैं। संविधान सभा ने भारत के भावी प्रशासनिक तंत्र की रूपरेखा को लेकर चर्चा की थी। उसने इस पर गंभीर विमर्श किया था। संविधान सभा में प्रशासनिक तंत्र पर व्यापक चर्चा हुई, जिसका उद्देश्य एक ऐसा ढांचा तैयार करना था जो स्वतंत्र भारत के लिए प्रभावी, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति जवाबदेह हो । संविधान सभा के सदस्यों को संदेह था कि भारत की भावी नौकरशाही भारतीय मूल्यों और भारतीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं हो पाएगी। इसी लिए संविधान सभा में तत्कालीन सदस्यों ने नौकरशाही की भूमिका पर ना सिर्फ व्यापक चर्चा की, बल्कि उसकी राजनीतिक तटस्थता, कार्यक्षमता, जवाबदेही और नए स्वतंत्र राष्ट्र के लोकतांत्रिक ढांचे में उसकी स्थिति सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया । इन बहसों का उद्देश्य एक ऐसी सिविल सेवा प्रणाली स्थापित करना रहा, जो संविधान के सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान हो और लोगों की सेवा के लिए प्रतिबद्ध हो। 


सवाल यह है कि क्या संविधान सभा की बहसों के अनुरूप आज की नौकरशाही बन पाई है। उसके ज्यादातर हिस्सों को देखिए तो लगता है कि बिल्कुल नहीं। आज भी उसमें अंग्रेजी राज जैसी अकड़ है, उसका ध्यान ज्यादातर अपनी ताकत को बचाए रखने और उसके जरिए आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने पर है। भारत का शायद ही कोई राज्य हो, जहां की नौकरशाही में अकूत संपत्ति के मालिक, भ्रष्टाचारी और कर्त्तव्यहीन अफसर ना होंगे। मध्य प्रदेश जैसे जिन राज्यों में लोकपाल व्यवस्था कायम है, वहां आए दिन ऐसे अफसरों पर छापे पड़ते हैं, उनके घर मिले नोटों को गिनने के लिए मशीनें लानी पड़ती हैं। कई बार तो नोट गिनने में ही दो-दो तीन-तीन दिन लग जाते हैं। सवाल यह है कि क्या अफसरों के पास अकूत धन उनके सत्कर्मों और कर्त्तव्यपरायाणता के चलते आता है? निश्चित रूप से इस सवाल का जवाब ना में हैं। पैसे आते हैं, अवैध निर्माण को बढ़ावा देने से, नियमों की अवहेलना करने वालों से मिलने वाली रकम से, लोक के लिए आए फंड की बंदरबांट से। बिना प्रशासनिक मिलीभगत के यह कल्पना बेकार है कि किसी नाइट क्लब में अवैध निर्माण होगा, वह संकरी गलियों में चलेगा और उसमें सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी होंगे। 


हाल के दिनों में सड़कों पर बसों के आग का गोला बनने की घटनाएं भी बढ़ी हैं, अवैध निर्माण के खिलाफ बुलडोजर भी चले हैं या चल रहे हैं, सवाल यह है कि क्या खटारा बसें बिना प्रशासनिक मिलीभगत और लापरवाही से सड़कों पर चल सकती हैं, क्या अवैध निर्माण बिना प्रशासनिक सहयोग के हो सकता है, निश्चित तौर पर ऐसे सवालों का जवाब ना में है। जब भी हादसे होते हैं, जब कोई बस आग का गोला बनती है, जब अवैध निर्माण सामने आता है, संबंधित बस मालिक के खिलाफ कार्रवाई हो जाती है, अवैध निर्माण गिरा दिया जाता है। लेकिन इन सबके लिए प्रशासनिक रूप से जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती। वे साफ बच जाते हैं। सवाल यह है कि जब भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र के बिना कोई नाइट क्लब नियमों को तोड़ते हुए निर्माण नहीं करा सकता, रोकथाम के उपायों की अनदेखी कर सकता है, बिना तंत्र के सहयोग के कोई अवैध निर्माण नहीं कर सकता, बिना तंत्र की आंखें मूंदने के कोई टूर ऑपरेटर खटारा बसों को सड़कों पर उतार नहीं सकता तो उस तंत्र पर सवाल क्यों ना उठे, उस भ्रष्ट प्रशासनिक ढांचे पर प्रहार क्यों न हो, अनधिकृत निर्माण जिस दौर में हुआ, उस वक्त उस इलाका विशेष में तैनात रहे अफसरों, कर्मचारियों और पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों न हो, उन्हें क्यों न जवाबदेह ठहराया जाए। 


आज जरूरत इस बात की है कि अब हर गलत कार्य के लिए, गलत कार्य करने वाले, नियम तोड़ने वाले, कानून का उल्लंघन करने वाले को दोषी ठहराने की न्यायिक प्रक्रिया तो चले ही, साथ ही उसके लिए परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार रहे अधिकारियों को भी जवाबदेह बनाया जाए, उन्हें खोजकर उचित प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया के जरिए दंडित किया जाए। जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक देश में ऐसी निर्दोष  जानें जाती रहेंगी, सड़कों पर अव्यवस्था फैली रहेगी, नियमों की अनदेखी से अराजकता बनी रहेगी। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या इस तरीके से सोचने को हमारा राजनीतिक ढांचा तैयार है?


-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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