Acharya Vinoba Bhave Death Anniversary: आचार्य विनोबा भावे ने लाखों गरीब किसानों को दिया था जीने का सहारा

By अनन्या मिश्रा | Nov 15, 2023

आचार्य विनोबा भावे की गिनती देश के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में की जाती है। स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ ही वह समाज सेवक भी थे। समाज के हित के लिए आचार्य विनोबा भावे ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। बता दें कि आचार्य विनोबा भावे महात्मा गांधी के अनुयायी थे। इसलिए उन्होंने अपना पूरा जीवन सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए बिताया। इसके अलावा विनोबा भावे गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए लड़ते रहे। आज ही के दिन यानी की 15 नवंबर को आचार्य विनोबा भावे की मृत्यु हो गई थी। आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर आचार्य विनोबा भावे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...


जन्म और शिक्षा

बता दें कि विनोबा भावे का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था। बॉम्बे प्रेसीडेंसी (अब महाराष्ट्र) के गागोडे में एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में 11 सितंबर 1895 को नाथूराम गोडसे का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम नरहरि शंभू राव और मां का नाम रुक्मिणी देवी था। बताया जाता है कि साल 1916 में विनोबा भावे महात्मा गांधी के कोचरब आश्रम गए। जो कि अहमदाबाद में हैं। इसके बाद विनोबा भावे ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिया था। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी, उन्होंने रामायण, गीता, कुरान और बाइबल जैसे कई धार्मिक ग्रंथों के साथ ही अर्थशास्त्र और राजनीति जैसे कई आधुनिक सिद्धांतों का अध्ययन किया। इस दौरान विनोबा भावे की उम्र 21 साल थी। 

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आजादी की लड़ाई

महात्मा गांधी के विचारों से विनोबा भावे काफी ज्यादा प्रभावित रहते थे। विनोबा भावे, महात्मा गांधी को अपना राजनैतिक व आध्यात्मिक गुरु बना लिया था। समय बीतने के साथ ही महात्मा गांधी और विनोबा की जोड़ी मजबूत होती चली गई। दोनों ने साथ मिलकर कई आंदोलन को अंजाम दिया। साल 1920 में महात्मा गांधी की अगुवाई में शुरू हुए असहयोग आंदोलन में विनोबा भावे ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। वहीं देशवासियों से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल करने की अपील की। 


हांलाकि आजादी की लड़ाई में विनोबा भावे के बढ़ते कद को देख हुकूमत परेशान हो गई। वहीं शासन के विरोध में भावे को गिरफ्तार कर लिया गया था। इस दौरान उनको 6 महीने की सजा हुई। हांलाकि बाद के कई वर्षों में भी आचार्य विनोबा भावे को जेल जाना पड़ा था। वह धुनिया जेल में सजा काटते हुए अन्य कैदियों को श्रीमद्भागवत गीता का पाठ पढ़ाया करते थे। 


भूदान आंदोलन

साल 1947 को देश की आजादी के बाद देश भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। जिसके कारण पूरे देश में अशांति का महौल था। वहीं तेलंगाना (तब आंध्र प्रदेश) में वामपंथियों की अगुवाई में एक हिंसक संघर्ष चल रहा था। यह संघर्ष भूमिहीन किसानों का आंदोलन था। जबकि इस दौरान कुछ लोगों की मंशा यह दिखाना था कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था कभी सफल नहीं हो सकती है।


जिसके बाद विनोबा भावे किसानों से मिलने के लिए 18 अप्रैल 1951 को नलगोंडा के पोचमपल्ली गांव पहुंचे। आंदोलन कर रहे हरिजन किसानों ने विनोबा भावे से अपनी आजीविका के लिए 80 एकड़ जमीन की मांग की। विनोबा भावे से किसानों ने कहा कि अगर उनके समुदाय के 40 परिवारों को खेती बाड़ी के लिए 80 एकड़ जमीन मिल जाए, तो वह सभी किसान परिवार आसानी से गुजारा कर सकते हैं। किसानों की बात सुन विनोबा भावे ने जमीदारों से बात की। उनकी बातों से एक जमींदार इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपनी सौ एकड़ जमीन दान करने का फैसला कर लिया। 


जमींदार के इस फैसले से विनोबा भावे काफी ज्यादा प्रभावित हुए और उन्होंने इस घटना को आंदोलन का रुप देने का फैसला किया। विनोबा भावे की अगुवाई में करीब 13 सालों तक भूदान आंदोलन चलता रहा। उस दौरान भावे ने देश के हर कोने का दौरा किया और तकरीबन 58,741 किलोमीटर का सफर तय किया। इस तरह से विनोबा भावे ने 13 लाख गरीब किसानों के लिए 44 लाख एकड़ जमीन हासिल की। इस दौरान उनकी काफी ज्यादा प्रशंसा की। य़ूपी और बिहार में सरकार ने भूदान एक्ट भी पास कर दिया। जिससे कि किसानों के बीच जमीन का बंटवारा व्यवस्थिति तरीके से किया जा सके। 


मौत

बता दें कि लंबी बीमारी के बाद 15 नवंबर, 1982 को वर्धा में आचार्य विनोबा भावे ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कर दिया। विनोबा भावे एक ऐसी शख्सियत थे, जिनमें लोग महात्मा गांधी को देखते थे। मरणोपरांत विनोबा भावे को साल 1983 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

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