आखिर अमेरिकी वर्चस्व की कीमत कबतक चुकाएगी शेष दुनिया?

By कमलेश पांडे | Mar 03, 2026

महाकवि तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' में लिखा है कि "समरथ को नहीं दोष गोसाईं।" यानी कि ताकतवर लोगों को कोई भी दैव दोष तक नहीं लगता है! यदि समकालीन लोकतांत्रिक कसौटियों और प्रवृत्तियों में इसे देखें तो देश-दुनिया के सभी वैधानिक नियमन शक्तिशाली देशों और लोगों के ही पक्ष में कार्य करते प्रतीत होते हैं। वाकई उनके किसी भी लोकविरोधी या जनविरोधी कार्य में प्रायः कोई न्यायिक बाधाएं तक नजर नहीं आतीं और न ही उनमें कोई दोष या खामियां तलाशी जाती हैं। 


आलम यह है कि किसी भी संसद, सर्वोत्तम न्यायालय या फिर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तक में ऐसे मामले पर ज्यादा सवाल जवाब नहीं किये जाते और अंततः मामले रफादफा कर, करवा दिए जाते हैं। कबीलाई भाषा में कहें तो जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत न केवल ग्रामीण जगत की मानसिकता बल्कि आधुनिक नृशंस विश्व के मानस पटल तक पर हावी महसूस होता है। बहरहाल इससे बचने का कोई रास्ता भी नजर नहीं आता। सच कहूं तो "वीर भोग्या वसुंधरा" वाली कहावत प्रायः हर जगह चरितार्थ होती आई है।

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देखा जाए तो समकालीन दुनिया भी अमेरिकी वर्चस्व की यही स्थिति है, जिसकी भारी कीमत शेष चुकाती आई है और आगे भी चुकाती रहेगी इन कीमतों में सैन्य हस्तक्षेपों से उत्पन्न युद्ध, तरह तरह से आर्थिक शोषण और डॉलर-प्रधान मौद्रिक व्यवस्था शामिल हैं। वैसे तो अमेरिका का सबसे बड़ा रक्षा बजट और वैश्विक सैन्य अड्डे नेटवर्क अन्य देशों पर हमेशा दबाव बनाए रखते हैं, जबकि डॉलर डिप्लोमेसी और डॉलर की आरक्षित मुद्रा स्थिति विकासशील देशों को आर्थिक निर्भरता में बांधती है।


यही वजह है कि अमेरिकी वर्चस्व की वैश्विक लागत आएदिन बढ़ती जा रही है और उसके नानाविध हथकंडे से दुनियावी देशों को असहमति की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। पहले की बात छोड़ भी दी जाए तो हाल ही में बेनेज़ुएला की सरकार के बाद ईरान की सरकार का जो हश्र अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने कर दिखाया है, वह बिल्कुल ताजा और नया उदाहरण बनकर उभरा है, जहां ईरान को समर्थन देने वाले अंतर्राष्ट्रीय देशों की बेचारगी भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो जाती है। जी हां, रूस-चीन-उत्तरकोरिया गठजोड़ की, जिन्होंने ईरानी तानाशाह खामेनेई को मनबढ़ बनवाकर मरवा दिया और हाथ पर हाथ धरे रहकर तमाशा देखते रहे या विरोध की औपचारिकता भर निभाते रहे।


यदि अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर आपने गौर किया होगा तो स्पष्ट महसूस हुआ होगा कि इराक-अफगानिस्तान जैसे लंबे संघर्षों से अमेरिकी सैन्य अतिभारण बढ़ा, जिससे वैश्विक अस्थिरता और आर्थिक बोझ बढ़ा। वहीं, कोई भी देश डॉलर प्रभुत्व से अमेरिकी ऋण आसानी से ले सकता है, लेकिन अन्य देशों को महंगाई और व्यापार असंतुलन का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, पेट्रोडॉलर सिस्टम तेल व्यापार को डॉलर में बांधता है, जो चीन जैसे आयातकों के लिए नुकसानदेह है।


हालांकि, अमेरिकी वर्चस्व में यदाकदा क्षय के संकेत भी मिलते आए हैं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका का जो रक्तरंजित चेहरा खुलकर सामने आया है वह अमेरिका को चुनौती देने की सोच रखने वाले देशों को किसी खुली नसीहत की तरह है। पहले टैरिफ युद्ध और अब खुली जंग ने यह साफ कर दिया है कि "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन" के मार्ग पुनः प्रशस्त हो चुके हैं। इसमें डीप स्टेट की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। वहीं अपने आक्रामक रुख और शातिर कूटनीति से जिस तरह से उन्होंने ब्रिक्स देशों की बखिया उधेड़नी शुरू की है, ऐसा उदाहरण अतीत में 1944 के बाद कभी नहीं मिला है।


यूं तो 2010 की भविष्यवाणी के अनुसार, अमेरिकी प्रभुत्व 2025 तक कमजोर हो सकता था, जो आंतरिक विभाजन और प्रतिद्वंद्वियों के उदय से सत्य सिद्ध हो रही है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक प्रशासन ने अब स्थिति को अपने पक्ष में बदलने में कामयाबी हासिल कर ली है। इसके लिए अमेरिकियों को ट्रंप  को बधाई देनी चाहिए। भले ही 2026 में डॉलर 10% गिरा, ब्याज दर अंतर कम होने से दबाव बढ़ा, लेकिन अब वह मुनाफे में रहेंगे, क्योंकि  दुनिया को पुनः अस्थिर करने में उन्होंने कामयाबी हासिल कर ली है। वहीं BRICS (40% वैश्विक GDP) अब SWIFT विकल्प और राष्ट्रीय मुद्राओं पर जोर दे रहा है। लेकिन अमेरिकी आक्रामकता जल्द ही सबकुछ अपने हित के अनुकूल कर लेगी।


इस बात में कोई दो राय नहीं कि बहुध्रुवीय विश्व उभर रहा है, जहां चीन, रूस, भारत और यूरोपीय संघ जैसे देश शक्ति बांट रहे हैं। इसके बावजूद, इनके आंतरिक और नीतिगत अंतर्विरोधों से अब यह साफ हो चुका है कि अमेरिकी प्रभुत्व तत्काल समाप्त नहीं होगा, बल्कि ट्रंप प्रशासन की नीतियां (जैसे UNO, WHO से अलग राह) इसे और तेज कर सकती हैं। लिहाजा शेष दुनिया अमेरिकी हौसलों और दूरदर्शिता भरे लोकतांत्रिक षड्यंत्रों की कीमत चुकाना जारी रखेगी जब तक BRICS जैसी पहलें मजबूत न हों।


भले ही चीन अमेरिकी वर्चस्व को आर्थिक, सैन्य, कूटनीतिक और तकनीकी मोर्चों पर बहुआयामी चुनौती दे रहा है। जिससे यह चुनौती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर इशारा करती है, जहां चीन वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत कर रहा है। जहां आर्थिक मोर्चा पर चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए 140+ देशों में निवेश बढ़ाया, जो अमेरिकी प्रभाव वाले क्षेत्रों में कर्ज जाल और बंदरगाह नियंत्रण बनाता है। वहीं डॉलर प्रभुत्व को चुनौती देते हुए, चीन BRICS के माध्यम से डी-डॉलरीकरण को बढ़ावा दे रहा है, जिसमें राष्ट्रीय मुद्राओं का उपयोग और नई भुगतान प्रणाली शामिल है। यही वजह है कि 2026 तक चीन की GDP अमेरिका के करीब पहुंच चुकी है, EV और AI जैसे क्षेत्रों में चीन, अमेरिका से आगे निकल चुका है।


जहां तक सैन्य विस्तार की बात है तो दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप और नौसैनिक अड्डे बनाकर चीन अमेरिकी नौसेना को चुनौती दे रहा है, साथ ही हाइपरसोनिक मिसाइलों और J-20 लड़ाकों से वायु श्रेष्ठता हासिल की।वहीं रूस और उत्तर कोरिया जैसे अमेरिका-विरोधी देशों को SCO और संयुक्त अभ्यासों से एकजुट कर रहा है। जहां तक कूटनीतिक प्रयास की बात है तो चीन ग्लोबल साउथ में अमेरिकी प्रतिबंधों का विकल्प बन रहा है, अफ्रीका-लैटिन अमेरिका में निवेश से प्रभाव बढ़ा।


हालांकि, एशियाई देशों (श्रीलंका, फिलीपींस) को आर्थिक प्रलोभनों से अपनी ओर खींचा, जबकि ट्रंप की नीतियों ने इनकी दुविधा बढ़ाई। सच कहूं तो तकनीकी व प्रौद्योगिकी यानी AI (डीपसीक जैसे टूल्स), 5G (हुआवे) और क्वांटम कंप्यूटिंग में नेतृत्व से चीन, अमेरिकी डिजिटल वर्चस्व को कमजोर कर रहा है। यह सब 2026 के वैश्विक जोखिमों (जैसे ताइवान संकट) के बीच तेज हो रहा है। इसलिए अमेरिका भी जवाबी कार्रवाई तेज करता जा रहा है और उसके बदले हुए अंदाज से उसके समर्थक से ज्यादा विरोधी हतप्रभ हैं।


- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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