Gyan Ganga: आखिर रावण ने लंका में बड़ी संख्या में मंदिर क्यों बना रखे थे ?

By सुखी भारती | Dec 09, 2021

अति लघु रुप धरेउ हनुमाना।

श्रीहनुमान जी ने लंका में प्रवेश करने से पूर्व अतिअंत छोटा रूप धारण कर लिया। कितने आश्चर्य की बात है कि लंका नगरी की धरा पर श्रीहनुमान जी और माता सीता से बढ़कर कोई भी और पूजनीय व सम्मानीय नहीं है। इनसे बढ़कर श्रेष्ठ व महान भला और होगा भी कौन। यही तो सबसे बड़े हैं। लेकिन सबसे बड़ा होने के पश्चात भी लंकेश का प्रभाव ही ऐसा है, कि उसने श्रीहनुमान जी और माता सीता जी के अक्स को सबसे छोटा बनाने पर विवश कर रखा है। ऐसे में ऐसी सोने की लंका का चमकना भला किस भाव का। रावण का पापी मन यह जान ही नहीं पा रहा है, कि मेरे घर पर आज कोई साधारण हस्ती नहीं आई है। अपितु मेरे गुरु ही श्रीहनुमान जी के वेश में साक्षात पधारे हैं। कारण कि श्रीहनुमान जी भगवान शंकर का ही अवतार हैं। और भगवान शंकर लंकापति रावण के गुरु भी हैं। सोचिए! दरवाजे पर गुरु पधारे हों, और उनका स्वागत डंडवत् प्रणाम न करके, उल्टे चोर कहकर किया जाये, तो भला इससे बढ़कर पाप और क्या होगा।

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कहां तो रावण को अपने गुरु के स्वागत के लिए मुख्य द्वार पर स्वयं उपस्थित रहना चाहिए था। कहां रावण ने अपने गुरु का रास्ता रोकने के लिए, एक लंकिनी नामक राक्षसी को खड़ा किया हुआ है। रावण का धर्म बनता था कि वह पूरे मान सम्मान के साथ, गुरु की दिव्य आरतियां उतार, उनके यशगान करता हुआ, हाथी पर पालकी सजा, उन्हें ऊँचे से भी ऊँचे आसन पर बिराजमान करवा कर, लंका नगरी में स्वयं प्रवेश करवाता। लेकिन यह रावण का दुर्भाग्य ही कहें, कि उसके गुरु, श्रीहनुमान को कोई सबसे बड़ा रूप नहीं, अपितु सबसे छोटा रूप धारण करना पड़ रहा है। दूसरे माता सीता भी एक मायने में रावण की गुरु ही थीं। कारण कि माता सीता तो जगत जननी हैं। जिस नाते माता सीता रावण की भी माता हुईं। और जीव की प्रथम गुरु भी, जीव की माता को ही कहा गया है। और रावण का महा दुर्भाग्य, कि उसने अपनी माता रूपी गुरु, माता सीता को भी लंका में सबसे निमन बना कर रखा है। अब आप ही बताईये जिस घर में अपने गुरु का ही सम्मान न हो, भला उस घर का आध्यात्मिक दृष्टि में क्या मूल्य हो सकता है। इससे अच्छी तो भक्तिमति शबरी की कुटिया थी। कम से कम वहाँ प्रभु का आदर तो था। उनके खाने को बेर तो थे। भले ही वह बेर जूठे थे, पर वास्तविक्ता में वे बेर, अमृत से भी मीठे व पावन थे। और उसकी घास फूँस की बनी कुटिया, रावण की सवर्ण की लंका से कहीं अधिक चमकदार व वैभवशाली थी। एक पक्ष और है, जो अतिअंत गहन व संस्कार जनित है। वह यह कि शबरी के द्वार पर तो केवल भगवान ही आये थे। लेकिन रावण के द्वार पर तो उसके गुरु पधारे थे। और गुरु और भगवान में से अगर तुलना करने बैठो, तो गुरु का स्थान अधिक उत्तम व श्रेष्ठ माना जाता है। शास्त्रों में कहा भी गया है, कि भगवान कभी रुठ जाये, तो घबराने की आवश्यक्ता नहीं, आप दौड़ कर गुरु की शरणागत हो जायें। निश्चित है कि भगवान आपका बाल भी बाँका नहीं कर पायेगा। लेकिन अगर कहीं आपसे आपका गुरु रुठ जाये, और आप सोचें कि हम भाग कर भगवान की शरण चले जाते हैं, तो मान लीजिये कि अब आप की रक्षा करने वाला अब तीनों लोकों में भी कोई नहीं। कारण कि गुरु से निष्काशित चेले को तो भगवान भी स्वीकार नहीं करते। कबीर दास जी कहते हैं-

‘कबीर हरि के रुठते गुरु की शरणी जाये।

लेकिन गुरु के रुठते हरि न होत सहाय।।’

और रावण का दुर्भाग्य यह था, कि वह श्रीहनुमान जी का अपमान करके, गुरु और भगवान, दोनों का ही अपमान कर रहा था। कारण कि श्रीहनुमान जी क्योंकि भगवान शंकर का अवतार हैं। और भगवान शंकर स्वयं में साक्षात ईश्वर तो हैं ही, साथ में वे रावण के गुरु भी हैं। और रावण श्रीहनुमान जी का अपमान करके अनजाने में ही, गुरु और भगवान, दोनों का एक साथ अपमान कर रहा है। ऐेसे में उसके पास तो मानो बचने का कोई रास्ता ही उपलब्ध नहीं है। और रावण का दुर्भाग्य तो देखिए, कि वह रावण इतना दरिद्र भाग्य लेकर भी चिंतित नहीं है। और आलम यह है, कि जिस समय श्रीहनुमान जी लंका के कक्ष में प्रवेश करते हैं, तो रावण मानों घोड़े बेच कर सो रहा है-

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‘मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा।

देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।

गयउ दसानान मंदिर माहीं।

अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।

सयन किएँ देखा कपि तेही।

मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।’

वाह! गोस्वामी तुलसीदास जी ने क्या खूब शब्दावली का प्रयोग किया है। गोस्वामी जी कहते हैं, कि श्रीहनुमान जी लंका में प्रवेश कर यही देखते हैं, कि लंका नगरी में तो मंदिरों की भरमार है। जहाँ तहाँ बस मंदिर ही मंदिर हैं। और वे प्रत्येक मंदिर में जा-जा कर देखते हैं। और रावण के मंदिर में जाकर देखा, तो रावण बेसुध सोया हुआ है। वाह कमाल की नगरी है, जहाँ भगवान के मंदिर नहीं, अपितु राक्षसों के मंदिर हैं। रावण की यह क्या परिपाटी व परंपरा थी, कि उसने इतने मंदिर बना कर रखे थे। इसके पीछे क्या रहस्य था। क्या लंका नगरी में सचमुच इतने मंदिरों का अर्थ मंदिर ही है, अथवा इसके कुछ अलग मायने हैं। यह जानने के लिए अगले पावन अंक का इन्तजार करें---। (क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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