By नीरज कुमार दुबे | Sep 23, 2026
मुस्लिम पर्सनल लॉ और समान नागरिक संहिता की बहस एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। दरअसल, 92 मुस्लिम कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार समर्थकों ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के राष्ट्रव्यापी ‘सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे निजी कानूनों और व्याख्याओं का बचाव नहीं किया जा सकता जो समानता और महिलाओं के अधिकारों के प्रश्न से टकराते हों। उनका आरोप है कि सेव इंडिया, सेव शरीयत अभियान पुरुष-प्रधान व्यक्तिगत कानूनों और उनकी रूढ़िवादी व्याख्याओं को बचाने की कोशिश करता है, जबकि मुस्लिम महिलाओं के समान नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत कानून में सुधार की जरूरत को पीछे धकेलता है। बयान पर नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक, अमोल पालेकर, तुषार गांधी, मल्लिका साराभाई, जीनत शौकत अली, तिस्ता सीतलवाड़, राम पुनियानी सहित 92 लोगों के हस्ताक्षर बताए गए हैं।
हम आपको बता दें कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कोई नया संगठन नहीं है। इसकी औपचारिक स्थापना अप्रैल 1973 में हुई थी। बोर्ड स्वयं अपने गठन का उद्देश्य मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की रक्षा और ऐसे कानूनों या न्यायिक फैसलों का विरोध बताता है, जो उसके अनुसार मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अनुप्रयोग में हस्तक्षेप करते हैं। उसके घोषित उद्देश्यों में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की निरंतरता सुनिश्चित करना और ऐसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कानूनों अथवा न्यायिक फैसलों से उसे बचाना शामिल है।
इसे भी पढ़ें: Mayawati ने SP के PDA रथ पर साधा निशाना, कहा- Muslim वोटर्स BSP की तरफ बढ़ रहे
यानी आज का ‘सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान अचानक पैदा हुई सोच नहीं है। व्यक्तिगत कानून को बाहरी कानूनी हस्तक्षेप से बचाना बोर्ड की स्थापना के समय से ही उसकी केंद्रीय भूमिका का हिस्सा रहा है। बोर्ड के अपने अभिलेख बताते हैं कि 1970 और 1980 के दशक से उसके प्रस्तावों में समान नागरिक संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125-127, पारिवारिक कानून, सामाजिक सुधार और शरीयत के संरक्षण जैसे मुद्दे लगातार मौजूद रहे हैं।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पुराने रुख को समझना हो तो शाह बानो प्रकरण से लेकर तीन तलाक तक की पूरी यात्रा को एक साथ देखना होगा। 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो मामले में स्पष्ट किया कि स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ तलाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांग सकती है और यह अधिकार केवल इद्दत की अवधि तक सीमित नहीं है। बाद में संसद ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिकार संरक्षण कानून बनाया। वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून की व्याख्या करते हुए भी कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला के लिए उचित और न्यायसंगत प्रावधान तथा भरण-पोषण की व्यवस्था केवल इद्दत की अवधि तक सीमित समझना उचित नहीं है।
शाह बानो विवाद में मुस्लिम रूढ़िवादी नेतृत्व की ओर से न्यायालय के हस्तक्षेप का विरोध हुआ और व्यक्तिगत कानून की रक्षा को धार्मिक अधिकार का प्रश्न बनाया गया। 1986 का कानून उसी राजनीतिक दबाव के वातावरण में आया। उस समय मुस्लिम महिलाओं के संगठनों और सुधारवादी समूहों ने भी कानून के खिलाफ आवाज उठाई थी। यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी व्यक्तिगत कानून के प्रश्न पर कभी एकमत नहीं रहा।
इसके बाद तीन तलाक का मामला सामने आया। शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में तत्काल तीन तलाक की संवैधानिकता पर सवाल उठा। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हलफनामा भी दाखिल किया था। न्यायालय के रिकॉर्ड में दर्ज है कि बोर्ड ने निकाह के समय दूल्हे को तीन तलाक न देने की सलाह देने जैसी व्यवस्था का प्रस्ताव रखा था। 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक को अमान्य कर दिया।
देखा जाये तो यहीं से आज की बहस को सबसे गंभीरता से देखने की जरूरत है। किसी व्यक्ति को अपने धर्म में विश्वास रखने, उसका पालन करने और धार्मिक आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता संविधान देता है। लेकिन अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है। दूसरी तरफ संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के सामने समानता की गारंटी देता है और अनुच्छेद 15 धर्म तथा लिंग सहित निर्धारित आधारों पर भेदभाव से सुरक्षा देता है।
इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि धर्म के नाम पर चलने वाली प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था स्वतः कानून की समीक्षा से बाहर हो जाएगी। विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, अभिभावकत्व और बच्चों की देखभाल जैसे विषय सीधे नागरिक अधिकारों से जुड़े हैं।
इसीलिए 92 हस्ताक्षरकर्ताओं ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के संहिताकरण और सुधार की मांग करते हुए न्यूनतम विवाह आयु, बहुविवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बच्चों की अभिरक्षा और गोद लेने जैसे विषयों में समान अधिकार की बात की है। उन्होंने हलाला और महिला जननांग विकृति जैसी प्रथाओं के खिलाफ भी आवाज उठाई है। उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश, ट्यूनीशिया और मोरक्को जैसे मुस्लिम-बहुल देशों में व्यक्तिगत कानूनों में हुए सुधारों का उदाहरण देते हुए भारत में भी सुधार की मांग की है।
संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है, लेकिन यह नीति-निर्देशक तत्व है, मूल अधिकार नहीं। इसलिए असली संवैधानिक सवाल यह होगा कि जो भी कानून बनाया जाए, उसकी वास्तविक धाराएं समानता, स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों के साथ किस तरह संतुलन बनाती हैं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी धार्मिक संस्था को यह दावा करने का संवैधानिक विशेषाधिकार नहीं है कि उसके द्वारा संरक्षित हर व्यक्तिगत कानून न्यायिक समीक्षा या सामाजिक सुधार से ऊपर है। धार्मिक संस्था नागरिकों का प्रतिनिधित्व कर सकती है, अपनी राय रख सकती है, अभियान चला सकती है, लेकिन अंतिम कानूनी अधिकार संविधान, संसद और न्यायपालिका की संवैधानिक व्यवस्था में ही निहित है।
इसके साथ ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से सबसे बुनियादी प्रश्न यही पूछा जा सकता है कि क्या वह पूरे मुस्लिम समाज की आवाज है या धार्मिक नेतृत्व के एक प्रभावशाली हिस्से की? क्योंकि 92 हस्ताक्षरकर्ताओं का बयान खुद इस धारणा को चुनौती देता है कि मुस्लिम समाज व्यक्तिगत कानून के प्रश्न पर एक ही राय रखता है। मुस्लिम महिलाओं के संगठन, सुधारवादी मुस्लिम बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता लंबे समय से व्यक्तिगत कानून में बदलाव की मांग करते रहे हैं। इसलिए किसी एक संस्था की व्याख्या को पूरे समुदाय की अंतिम इच्छा मान लेना अपने आप में बहस को सीमित कर देता है। इसलिए ‘सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान पूरी तरह गलत है और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इतिहास को देखते हुए उक्त समाज को बेहद सतर्क रहना चाहिए।