Akshaya Tritiya 2026: अनंत समृद्धि का दिन है अक्षय तृतीया

By रमेश सर्राफ धमोरा | Apr 18, 2026

हमारे देश में समय-समय पर बहुत से त्यौहार मनाये जाते हैं। इसलिए हमारे देश को त्योहारों का देश भी कहते है। हिन्दू धर्मावलम्बियों के प्रमुख त्योहारों में से एक अक्षय तृतीया है जिसे हम आखा तीज भी कहते हैं। अक्षय तृतीया देश भर में हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले सबसे पवित्र और शुभ दिनों में से एक है। माना जाता है कि इस दिन से जो भी कार्य इस शुरू होता है वो हमेशा पूर्ण होता है। यह त्यौहार हर वर्ष वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष के तृतीया को आता है। इस वर्ष अक्षय तृतीया 22 अप्रैल को है।

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माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में जन्म लिया था। इसीलिये इस दिन को परशुराम जयंती के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि आखा तीज के दिन राजा भागीरथ गंगा नदी को पृथ्वी पर लाये थे। अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु तथा उनकी धर्मपत्नी लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। आखा तीज के दिन ही देवी अन्नपूर्णा का जन्म भी हुआ था। यह वह दिन था जब भगवान कृष्ण ने अपनी सारी संपत्ति और सौभाग्य अपने गरीब मित्र सुदामा को दे दिया था। अक्षय तृतीया के दिन श्रद्धेय ऋषि वेद व्यास ने महाभारत की रचना शुरू की थी। और पुराणों के अनुसार यह दिन त्रेता युग की शुरुआत का प्रतीक है। जो मानव जाति के चार युगों या युगों में से दूसरा है।

अक्षय तृतीया वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। हिंदू शास्त्रों और पुराणों के अनुसार चार युग का चक्र होता है, जिसे सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के नाम से जाना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन सतयुग जिसे इंसान के जीवन का सुनहरा दौर कहा जाता है वो समाप्त हो जाता है और त्रेतायुग शुरू हो जाता है। इसलिए अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। हिंदू परिवारों के लिए यह दिन बहुत ज्यादा महत्व रखता है।

अक्षय शब्द का अर्थ होता है कभी न मिटने या कम होने होने वाला। संस्कृत में अक्षय (अक्षय) शब्द का अर्थ समृद्धि, आशा, खुशी, सफलता होता है। जबकि तृतीया का अर्थ है चंद्रमा का तीसरा चरण। इसका नाम हिंदू कैलेंडर में वैसाख के वसंत महीने के तीसरे चंद्र दिवस के नाम पर रखा गया है। इस त्योहार को हम अपनी भाषा में आखातीज नाम से भी जानते हैं। जिसका अर्थ होता है जो कभी खत्म ना होने वाला। इसलिए माना जाता है की यह दिन हमारे लिए वस्तुओं की खरीदारी का सबसे शुभ दिन माना जाता है। "अक्षय" शब्द का अर्थ होता है जो कभी खत्म न हो। इसी कारण इस दिन किए गए सभी अच्छे कार्यों, जैसे जप, यज्ञ, दान-पुण्य, का पुण्य कभी भी समाप्त नहीं होता। माना जाता है कि अक्षय तृतीया का दिन व्यक्ति को अनंत सुख और समृद्धि की प्राप्ति करता है। इस दिन जितने पुण्य किए जाए उतने हमें हमारे लिए कम है।

जैन धर्म में अक्षय तृतीया एक महत्वपूर्ण तिथि है जिसे दान और पुण्य कार्य करने के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान ऋषभदेव (प्रथम तीर्थंकर) ने एक वर्ष की तपस्या के बाद गन्ने के रस से पारणा किया था इसलिए इस दिन को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता हैं। अक्षय तृतीया के दिन यूं तो आप किसी भी देवी-देवता की पूजा कर सकते हैं। लेकिन विशेष रूप से इस दिन माता लक्ष्मी, भगवान गणेश और धन के देवता कुबेर की पूजा करने का विधान है। अन्य त्योहारों की तरह इस त्यौहार में भी दीपक जलाते हैं। इस दिन किया गया परोपकार हमारे लिए जीवन को सुखी बना देता हैं। इसीलिए इस दिन लोग गरीबों को भोजन कराते हैं तथा उनकी सहायता करते हैं। 

माना जाता है कि इस दिन किए गए पुण्य हमारे लिए स्वर्ग में जगह बनाते हैं। इस दिन कई लोग जागरण रखकर हवन करते हैं तथा गरीबों को दान देते हैं। कई लोग अपने नए घर में  मुहूर्त के हिसाब से प्रवेश करते हैं। अक्षय तृतीया का पौराणिक महत्व भी है। मान्यता है कि इसी दिन सतयुग और त्रेता युग का आरंभ हुआ था। द्वापर युग का समापन और महाभारत युद्ध का समापन भी इसी तिथि को हुआ था। देश के अनेक हिस्सों में इस तिथि का अलग-अलग महत्व है। जैसे उड़ीसा और पंजाब में इस तिथि को किसानों की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। तो बंगाल में इस दिन गणपति और लक्ष्मीजी की पूजा का विधान है।

इतना पवित्र पर्व होने के उपरांत भी इस दिन बड़ी संख्या में होने वाले बाल विवाह इस पर्व के महत्व को कम करते हैं। अबूझ सावा मानकर बड़ी संख्या में लोग अपने नाबालिक बच्चों की इस दिन शादी कर देते हैं। कम उम्र के बच्चों के विवाह रोकने के लिए इस दिन प्रशासन को विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं। राजस्थान सहित कई प्रदेशों में तो अक्षय तृतीया का दिन बाल विवाह के लिए बदनाम हो चुका है। विकास के दौर में बाल विवाह एक नासूर के समान है। देश में हर व्यक्ति को शिक्षित करने की मुहिम चल रही है। हर व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में बाल विवाह होना समाज के माथे पर एक कलंक के समान है। 

देश में अक्षय तृतीया (आखा तीज) पर हर वर्ष हजारों की संख्या में बाल विवाह किए जाते हैं। तमाम प्रयासों के बाबजूद हमारे देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अन्त नही हो पा रहा है। भारत में बेटी-बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान के शुरू होने के बावजूद एक नाबालिग बेटी की जबर्दस्ती शादी करा दी जा रही है। बाल विवाह मनुष्य जाति के लिए एक अभिशाप है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर जगह बेटी बचावो बेटी पढ़ाओ का नारा देते हैं। देश के सभी प्रदेशों में बेटियां शिक्षित हो रही है। ऐसे में समाज को आगे आकर कम उम्र में लड़कियों के होने वाले बाल विवाह रुकवाने के प्रयास करने होंगे। ऐसे पवित्र दिन का महत्व बनाए रखने के लिए समाज को इस दिन होने वाली कुरीतियों पर रोक लगाकर एक सकारात्मक संदेश देना होगा। तभी सार्थकता बनी रह पाएगी।

रमेश सर्राफ धमोरा

(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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