Chai Par Sameeksha: Bengal, Assam Elections में सभी दल लगा रहे पूरा जोर, मगर जमीन पर क्या हालात हैं

By अंकित सिंह | Mar 23, 2026

प्रभासाक्षी के साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह असम और पश्चिम बंगाल में चुनावी हलचल को लेकर हमने चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे। नीरज कुमार दुबे ने साफ तौर पर कहा कि असम में कांग्रेस के लिए स्थितियां प्रतिकूल नजर आ रही है। कांग्रेस अपनी कमजोरी से एक बार फिर से चुनाव में पीछे होती दिखाई दे रही है। वहीं, पश्चिम बंगाल में इंडिया गठबंधन का नामोनिशान नहीं है। वहां ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच मुख्य मुकाबला है। दोनों दलों में वार-पटवार का दौर लगातार जारी है और ऐसे में इस बार भाजपा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही है क्योंकि पश्चिम बंगाल में इस बार भाजपा के लिए करो या मरो की स्थिति है।

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भाजपा इस चुनावी दौर में असम में सबसे अधिक आत्मविश्वास के साथ उतर रही है। 2016 से राज्य की सत्ता में मौजूद भाजपा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में खुद को मजबूत स्थिति में मान रही है। पार्टी ने बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ और स्थानीय पहचान के मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया है, जिससे चुनावी वातावरण और अधिक तीखा हो गया है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा अब तक सत्ता से दूर रही है, लेकिन इस बार वह पूरी ताकत के साथ अपनी राजनीतिक उपस्थिति को विस्तार देने की कोशिश कर रही है। इन राज्यों में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय दल हैं। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन भाजपा के सबसे मुखर विरोधियों में शामिल हैं और दोनों ही नेता इस चुनावी मुकाबले में सीधे भाजपा के निशाने पर हैं।

उन्होंने कहा कि भाजपा का दावा है कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठ और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों ने व्यापक राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। पार्टी का मानना है कि इन मुद्दों ने राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण को मजबूत किया है और इससे उसे चुनाव में फायदा मिल सकता है। ममता बनर्जी 2011 से लगातार सत्ता में हैं और उन्होंने कई बार भाजपा की चुनौती को रोकने में सफलता हासिल की है। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था। इसके बाद हुए चुनावों में भाजपा का मत प्रतिशत लगभग 38 से 39 प्रतिशत के बीच स्थिर रहा है, जिससे पार्टी को उम्मीद है कि इस बार वह ममता बनर्जी के किले में बड़ी सेंध लगा सकती है।

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