Allahabad High Court ने UP Cooperative Bank के 48 सहायक प्रबंधकों की बर्खास्तगी रद्द की

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 25, 2026

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश सहकारी बैंक में 2016 में नियुक्त 48 सहायक प्रबंधकों की सेवाओं की समाप्ति को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि सक्षम प्राधिकारी स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल किए बिना केवल प्रमुख सचिव के निर्देश पर उनकी सेवाओं को समाप्त नहीं कर सकता है। न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने मनीष कुमार और 47 अन्य द्वारा दायर अलग-अलग रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने सात जून, 2019 के आदेश सहित बर्खास्तगी से संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को अपने संबंधित पदों पर कर्तव्यों को फिर से शुरू करने की अनुमति दी जाए।

इसके बाद, सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के साथ, पात्रता मानदंड को न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक के साथ किसी भी विषय में स्नातक करने के लिए संशोधित किया गया। 22 जुलाई, 2015 को एक संशोधित विज्ञापन जारी किया गया। उसके बाद याचिकाकर्ताओं का चयन लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर किया गया।

एक असफल अभ्यर्थी ने चयन प्रक्रिया को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। एक अंतरिम आदेश के बाद, चयनित उम्मीदवारों की नियुक्तियां मामले के अंतिम परिणाम के अधीन की गईं। याचिका अंततः एक मार्च, 2023 को खारिज कर दी गई।

इस बीच, भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों की जांच करायी गयी। 27 अप्रैल, 2019 के सरकारी पत्र के आधार पर सहायक प्रबंधकों की नियुक्ति रद्द करने के निर्देश जारी किये गये थे। बैंक की प्रबंधन समिति ने 30 मई, 2019 को उनकी नियुक्तियां समाप्त करने का निर्णय लिया और सात जून, 2019 को समाप्ति आदेश जारी किए गए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने तर्क दिया कि बर्खास्तगी आदेशों में याचिकाकर्ताओं को किसी भी व्यक्तिगत अवैध कार्य या कदाचार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। उन्होंने कहा कि उनकी नियुक्तियों को सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किया गया था और उसके बाद चयन प्रक्रिया विधिवत पूरी की गई थी। उनके अनुसार, बर्खास्तगी का वास्तविक आधार प्रमुख सचिव, सहकारिता विभाग द्वारा जारी किया गया निर्देश था, जो नियुक्ति प्राधिकारी के लिए आवश्यक स्वतंत्र निर्णय लेने का स्थान नहीं ले सकता था।

याचिकाओं को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी की सेवाएं केवल किसी अन्य प्राधिकारी की सिफारिश या निर्देश पर समाप्त नहीं की जा सकतीं। नियुक्ति प्राधिकारी को मामले की स्वतंत्र रूप से जांच करनी होगी और अपना निर्णय लेना होगा। अदालत ने पाया कि प्रबंधन समिति और प्रबंध निदेशक याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को समाप्त करने से पहले स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल करने में विफल रहे।

इस आधार पर, अदालत ने संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया और अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं को सेवा में वापस लेने का निर्देश दिया।

प्रमुख खबरें

Donald Trump का बड़ा दावा: Iran में Humanitarian Crisis, सेना को वेतन देने के भी पैसे नहीं

NBFC Revolving Credit पर रोक से MSME को नुकसान होगा, FISME ने RBI से की अपील

1984 Riots Justice: PM Modi ने दिलाया न्याय, HS Phoolka का वार- Congress ने Sajjan Kumar को सालों तक दिया संरक्षण

Voter List Crisis: DK Shivakumar ने CEC को लिखा पत्र, समय सीमा बढ़ाने की अपील