By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 29, 2026
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुधवार को कहा कि उत्तर प्रदेश स्पोर्ट्स कॉलेज सोसाइटी द्वारा संचालित खेल कॉलेजों में कार्यरत शिक्षक सरकारी कर्मचारी नहीं हैं और वे वेतन निर्धारण तथा पेंशन से जुड़े विवादों को लेकर उत्तर प्रदेश लोक सेवा अधिकरण अधिनियम, 1976 के तहत राज्य लोक सेवा अधिकरण का रुख नहीं कर सकते। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे शिक्षक अपनी शिकायतों के निवारण के लिए उपयुक्त कानूनी मंच पर जा सकते हैं। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने लखनऊ के गुरु गोबिंद सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज के प्रधानाचार्य की याचिका स्वीकार करते हुए यह व्यवस्था दी।
इसके बाद उनके वेतन निर्धारण में विसंगतियां सामने आईं। इस पर उनका वेतन संशोधित किया गया और कथित तौर पर अधिक भुगतान की गई राशि की वसूली के आदेश जारी किए गए। इन आदेशों से असंतुष्ट होकर सिंह ने राज्य लोक सेवा अधिकरण का रुख किया था और कॉलेज के प्रधानाचार्य ने उच्च न्यायालय में अधिकरण की कार्यवाही को चुनौती दी थी।
खंडपीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश स्पोर्ट्स कॉलेज सोसाइटी, सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था है। इसके कॉलेजों का प्रबंधन सोसाइटी की शासी निकाय करती है, जो निर्धारित प्रक्रिया के तहत शिक्षकों की नियुक्ति भी करती है। अदालत ने कहा कि वेतन और अन्य खर्चों के लिए राज्य सरकार से वित्तीय सहायता मिलने मात्र से इन संस्थानों के शिक्षकों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल जाता।
पीठ ने यह भी कहा कि संबंधित वैधानिक प्रावधानों के तहत सोसाइटी न तो स्थानीय प्राधिकरण है और न ही राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाला निगम है इसलिए इसके शिक्षकों को राज्य लोक सेवा अधिकरण के अधिकार क्षेत्र में आने वाले लोक सेवकों के रूप में नहीं माना जा सकता। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि वेतन निर्धारण और पेंशन से जुड़े विवाद सेवा संबंधी मामलों के दायरे में आते हैं तथा गलत वेतन निर्धारण के परिणाम कर्मचारी को लंबे समय तक प्रभावित कर सकते हैं। पीठ ने सिंह को संशोधित वेतन निर्धारण और वसूली के आदेशों को उचित कानूनी मंच पर चुनौती देने की स्वतंत्रता दी।
साथ ही, संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में राहत मांगने का विकल्प भी खुला रखा।