Ambubachi Mela 2026: क्यों 3 दिन बंद रहते हैं Kamakhya Temple के कपाट? कब से अंबुबाची मेला शुरु होगा? जानें मेले से जुड़ी मान्यता

By दिव्यांशी भदौरिया | Jun 21, 2026

सनातन धर्म में 51 शक्तिपीठ अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय तीर्थस्थल है। असम के गुवाहटी में नीलांचल पर्वत पर कामाख्या देवी मंदिर है। ये मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। धार्मिक व पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहां पर देवी सती का योनि का हिस्सा गिरा था। इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है और मंदिर में योनि आकार की शिला पूजी जाती है, जिसकी स्त्री शक्ति और जीवन के स्त्रोत का प्रतीक माना जाता है। 

इस बार अंबुबाची मेले की शुरुआत 22 जून 2026 से शुरु हो रही है। कामाख्या देवी मंदिर में मेले को लेकर खासी तैयारियां शुरु हो चुकी हैं। मंदिर प्रशासन ने बताया है कि 22 जून को रात 9 बजकर 8 मिनट 42 सेकंड पर 'प्रवृत्ति' अनुष्ठान होगा। इसके साथ ही मेले की शुरुआत हो जाएगी। साथ ही मां कामाख्या के वार्षिक रजस्वला यानी मासिक धर्म काल की शुरुआत मानी जाती है। इस समय मंदिर प्रशासन देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं, साधु-संतों और पर्यटकों के स्वागत की तैयारियां करने में लगा है।

3 दिन तक देवी कामाख्या के कपाट बंद रहेंगे

मंदिर प्रसाशन के अनुसार, अनुष्ठान शुरु होते ही मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाएंगे। यह देवी के रजस्वला काल के दौरान एकांतवास का प्रतीक है। इन 3 दिनों तक कोई पूजा-पाठ नहीं होती। भक्तों को भी कामाख्या देवी के दर्शन नहीं होते हैं। 26 जून की सुबह नियमित रुप पूजा पूर्ण होने के बाद मंदिर के कपाट फिर से खोले दिए जाएंगे। इसके बाद से श्रद्धालुओं को दर्शन और देवी के पूजन की अनुमति दी जाती है। 

अंबुबाची मेला की मान्यता

जब मंदिर के कपाट फिर से खोले जाते है, तो श्रद्धालुओं को पवित्र अंगवस्त्र प्रसाद के रुप में दिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि अंबुबाची मेले का संबंध तंत्र साधना से भी है। इस मेले के दौरान बड़ी संख्या में तांत्रिक, साधक और संत कामाख्या धाम पहुंचकर खासतौर पर तांत्रिक साधना करते हैं और पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में की जाने वाली साधना विशेष तौर पर आध्यात्मिक फल प्रदान करती है। असल में अंबुबाची मेला केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं, बल्कि ये शक्ति, आस्था और प्रकृति की सम्मान का अद्भुत संगम है। हर साल इस मेले में लाखों श्रद्धालु आते हैं और इस दिव्य मेले का हिस्सा जरुर बनते हैं। 

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