अनकहा लॉकडाउन? कितना बड़ा है आने वाला संकट, इससे निकलने का क्या है फॉर्मूला, आंकड़ों से समझें पूरा जियोपॉलिटिकल अर्थशास्त्र

By अभिनय आकाश | May 12, 2026

देश हमे देता है सबकुछ

बचपन की किताबों में ये कविता हम सबने कभी न कभी पढ़ी ही होगी। लेकिन हम देश को क्या दे सकते हैं। जवाब है-बहुत कुछ। सरकार की हमेशा यही दिली ख्वाहिश रहती है कि जनता छप्पर फाड़कर कमाए और दोनों हाथों से लुटाए, क्योंकि जब पैसा बाज़ार में घूमता है, तभी अर्थव्यवस्था का पहिया तेज़ी से भागता है, नई नौकरियां पैदा होती हैं और जेब में तनख्वाह आने से इंसान को पैसों से खरीदी जाने वाली सारी खुशियां मिल जाती हैं। नतीजा यह होता है कि आम आदमी का मूड एकदम चकाचक रहता है और वह सरकार से फालतू की शिकायतें करना बंद कर देता है। इसीलिए आपके शौक या बेतहाशा खर्चों को देखकर सरकार मन ही मन गदगद होकर सोचती है कि वाह, क्या शानदार आदमी है! मसलन, आपने शौक-शौक में किचन में भी एक टीवी लगवा लिया, तो सरकार खुश हो जाती है कि उसे इस पर टैक्स मिल गया, फिल गुड वाली फीलिंग आएगी। या फिर आप बिना किसी वजह के बस यूं ही गोवा ट्रिप पर निकल गए, गाड़ी में पेट्रोल भरवाया, रास्ते भर टोल टैक्स दिया और सरकार की बैठे-बिठाए कमाई करा दी, तो सरकार मन ही मन आपको सैल्यूट मारते हुए यही कहती है , ओय! तुस्सी कमाल कर दित्ता। अरे, इसने तो बिना बात ही बीवी को इतना महंगा गिफ्ट दे दिया! एनिवर्सरी तो अप्रैल में थी, पर खर्चा मई में ही कर डाला! सरकार फिर गदगद मुझे मेरा टैक्स मिल गया, सब चंगा! पूरी हाइपोथेटिकल थ्योरी का मजमून ये है कि अगर सरकार के सीने में कोई दिल धड़कता होगा, तो उसमें दिन-रात बस यही सब चलता रहता है। लेकिन ज़रा सोचिए, अगर आपके खर्चों पर तालियां पीटने वाली यही सरकार अचानक आपसे कहने लगे कि भाइयों-बहनों पेट्रोल बचाओ, सोना-वोना मत खरीदो, गोवा जाना है तो कारपूल करके जाओ, साल भर विदेश घूमने का प्लान तो भूल ही जाओ और हड़तालें कम करो ताकि तांबे की फैक्ट्री चालू हो सके। तो आपको तुरंत समझ जाना चाहिए कि स्थिति वाकई बेहद गंभीर है। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार को किसी ऐसे भयंकर आर्थिक तूफान की आहट सुनाई दे रही है, जो सीधे आपकी जेब, आपकी नौकरी और देश की पूरी अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख सकता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने यूं ही नहीं, बल्कि किसी खास इशारे के तहत मार्च में संसद में दिए अपने बयान और अब हैदराबाद की रैली में अचानक 'कोविड-19' का ज़िक्र किया है। 

कितना बड़ा है आने वाला संकट? 

ईरान पर ट्रंप और नेतन्याहू की चढ़ाई से पूरी दुनिया परेशान है। भारत जैसे देश जो तमाम दावों के बावजूद आज भी आयात पर निर्भर हैं क्रिटिकल सेक्टर्स में उनके लिए परेशानी बड़ी तो है लेकिन कितनी बड़ी अब मालूम चल रहा है। इस तरह की अपील जैसी प्रधानमंत्री मोदी ने की है इतिहास में और भी मौकों पर की गई। जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और अमेरिका में लोगों को राशन कार्ड दिए गए थे। पेट्रोल, चीनी, रबर जैसी चीजों पर कंट्रोल था। उन्हें न खरीदने की ताकीद की गई थी। कार फैक्ट्री स्टैंक बनाती थी।  1973 में फिर ऑयल क्राइसिस आया। उस समय कई देशों ने कार फ्री डे तक लागू किया क्योंकि तेल बहुत महंगा हो गया था। भारत में भी 1991 के आर्थिक संकट के दौरान सरकार का पूरा फोकस डॉलर बचाने और जरूरी आयात ही करने पर आ गया था। दुनिया के अधिकतर देश ईरान पर हुए हमले के नतीजे भुगत रहे हैं। कई जगह फाइव डे व्हीकल रोटेशन आया है। ऑड इवन लागू हुआ है। 10 मई को प्रधानमंत्री ने भाषण दिया है और एक ही दिन में इसका असर दिख गया। 11 मई को स्टॉक मार्केट धड़ाम हो गया क्योंकि आशंका दोहरी है। महंगाई बढ़ने का डर भी है और साथ में मंदी का भी। जिस संकट में हम प्रवेश करने वाले हैं बाकी की दुनिया तो प्रवेश कर चुकी है। हमारा देश जिस संकट में प्रवेश करने वाला है उससे निकलने के दो फार्मूले हैं। एक ऊर्जा को बचाइए यानी आपके सामने जो भी एनर्जी है। ऊर्जा मतलब आपका आपकी बिजली को आपको बचानी है। आपको पेट्रोल बचाना है। डीजल बचाना है। यह ऊर्जा आपको बचानी है। दूसरा अपने देश की विदेशी मुद्रा को आपको बचाना है। विदेशी मुद्रा कम से कम खर्च करनी है।

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किन-किन चीजों की खरीद पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च होता है

इसमें सबसे ऊपर नाम है कच्चे तेल का। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है। 90% वर्ष 2024 में तेल के इंपोर्ट पर लगभग 12 लाख करोड़ खर्च हुए थे। ईरान युद्ध के बाद जिस तरह से कच्चे तेल के दाम बढ़े हैं, उससे आने वाले दिनों में तेल के इंपोर्ट पर भारत का खर्च और भी ज्यादा बढ़ सकता है। हमारे ऊपर बहुत बड़ा बोझ यह पड़ने वाला है। कच्चे तेल के बाद भारत को विदेशों से सोना खरीदने पर भी ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। वर्ष 2024 में हमने विदेशों से 5.5 लाख करोड़ का सोना खरीदा जिसकी पेमेंट डॉलर्स में की थी और जैसे-जैसे डॉलर की कीमत बढ़ रही है सोना खरीदना और महंगा हो रहा है। जबकि पिछले साल यह जो खर्च है जो हमने सोना खरीदने पर किया था यह बढ़कर हो गया था 6.8 लाख करोड़ हमारे देश ने खरीदा। 

विदेशों से सोना खरीदने के मामले में भारत दुनिया में पांचवें नंबर पर

भारत विदेशों से हर रोज यानी एक दिन में सोना खरीदने पर ₹1800 करोड़ खर्च करता है। एक दिन में हर दिन ₹1860 करोड़ का सोना खरीद लेते हैं और हर घंटे ₹78 करोड़ का सोना भारत खरीदता है। विदेशों से सोना खरीदने के मामले में भारत पूरी दुनिया में पांचवें नंबर पर है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि एक साल तक आप बिल्कुल सोना मत खरीदिए। सोना हमें बाहर विदेशों से खरीदना पड़ता है। पेमेंट डॉलर में देनी पड़ती है। और इस समय हम ऐसी स्थिति में नहीं है। हर वर्ष बड़ी संख्या में हमारे देश के लोग छुट्टियों में विदेश घूमने जाते हैं। विदेशी सामान की खरीददारी करते हैं और उस पर बहुत पैसा खर्च करते हैं। लेकिन यह सारा पैसा असल में विदेशी कंपनियों की जेब में जाता है। दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था में जाता है। वर्ष 2023 में भारत के लोगों ने ₹7,20,000 करोड़ रुपया विदेशों में जाकर खर्च किया। पिछले साल लगभग 3.5 करोड़ भारत के लोग विदेश यात्रा पर गए। अगर आप मेड इन इंडिया सामान खरीदेंगे वह अपने देश में ही रहेगा। केमिकल फर्टिलाइज़र्स के मामले में भी भारत इंपोर्ट पर निर्भर है। पिछले वर्ष भारत ने ₹1.5 लाख करोड़ के केमिकल फर्टिलाइजर विदेशों से खरीदे।  

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पीएम मोदी की अपील से कैसे विदशी मुद्रा बचेगी और महंगी घटेगी

भारत को तेल और सोना चाहिए और ये दोनों चीजें हमें विदेशों से खरीदना होगा।

तेल और सोना खरीदने के लिए डॉलर में पेमेंट करना होगा और डॉलर जितना महंगा होगा, उतना ही हमारा नुकसान होगा।

इससे रुपए में गिरावट आएगी क्योंकि जो भी डॉलर हम खरीदते हैं वो रुपया देकर खरीदते हैं।

रुपया कमजोर होगा तो तेल और दूसरे सामानों को विदेशों से खरीदना और महंगा होगा।

महंगाई बढ़ेगी और भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा व हमारी अर्थव्यवस्था पर दबाव आएगा। 

भारत ने कच्चा तेल और सोना खरीदना कम किया तो क्या होगा?

इससे विदेशों को हमें कम पेमेंट करनी पड़ेगी। इससे डॉलर की मांग कम हो जाएगी। यानी डॉलर खरीदने के लिए हमें कम रुपया खर्च करना पड़ेगा। इससे रुपए में मजबूती आएगी। रुपया मजबूत होने के पांच फायदे आपको होंगे। पहला विदेशों से सामान खरीदने का हमारा बिल कम हो जाएगा। तेल खरीदने पर हमारा खर्चा कम हो जाएगा। हमारे अपने देश में महंगाई इसकी वजह से कम होगी।  विदेशी मुद्रा की हमारी बचत होगी और हमारे देश का व्यापार घाटा भी कम होगा। ईरान युद्ध के बाद से पूरी दुनिया के बड़े-बड़े विकसित देशों में तेल के दाम बढ़ चुके हैं। बस अभी हमारे देश में ही नहीं बढ़े। भारत अकेला ऐसा देश है जहां तेल संकट के बावजूद अभी तक तेल के दाम नहीं बढ़े।

आत्मनिर्भर भारत का मंत्र संकट टलने के बाद भी जारी रहे

अगर होर्मुज में रुकावट है तो जापान की अर्थव्यवस्था पर भी सीधा असर है। जापान भी कई महीनों का तेल पहले से जमा रखता है ताकि अचानक आपूर्ति रुकने पर देश ठप ना हो जाए। उसने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे मित्र देशों से अतिरिक्त गैस और ईंधन खरीदने की कोशिश की ताकि पश्चिम एशिया पर निर्भरता थोड़ी कम की जा सके। लेकिन इसमें सबसे गौर करने वाली बात यह थी कि जापान की अर्थव्यवस्था पहले ही ऑयल और गैस की निर्भरता से अपने को आगे ले जा चुकी है। वहां लोग पहले से ही मेट्रो का खूब इस्तेमाल करते हैं। स्पेशली अर्बन एरियाज में बिजली का उपयोग ज्यादा होता है। साउथ कोरिया और जापान दोनों देश बिजली से चलने वाले उपकरण जो इलेक्ट्रॉनिक्स हैं उस गेम में बहुत आगे हैं। दूसरे देशों को सेमीकंडक्टर के उपकरण देते हैं। इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे देते हैं। मशीनें देते हैं। चिप बनाने वाली मशीनें देते हैं। सेंसर बैटरीज बेचते हैं। टोयटो जैसी गाड़ियां जापान में बन रही हैं। सैमसंग जैसा फोन साउथ कोरिया में बन रहा है। अरबों डॉलर का यह सालाना एक्सपोर्ट करते हैं। एक्चुअल एक्सपोर्ट इसलिए इनका फॉरेन रिजर्व भी लबा-लब भरा रहता है। इसलिए उनके देश में लोगों को खामियाजा उस तरह से नहीं भुगतना पड़ता। भारत को अगर ऐसी समस्याओं से बचना है। बेहतर तैयार होना है तो सफलता के दावों से पहले सफल होना होगा। संप्रभु होना होगा और ताकत सिर्फ गोली बंदूक वाली नहीं होती है। जब आप खुद आत्मनिर्भर और मजबूत होते हैं तब आपकी इज्जत होती है और तब आपको खुद कुछ नहीं कहना पड़ता। जैसे अमेरिका के राष्ट्रपति अगर आप ट्रंप को छोड़ दें तो कभी वह खुद नहीं कहते कि दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क है अमेरिका। क्योंकि कहने की बात नहीं है। यह वो बात है जो दुनिया जानती है। शी जिनपिंग को एक कहना नहीं पड़ता है कि चीन दुनिया की फैक्ट्री। लोग जानते हैं, मानते हैं, थर-थर कांपते हैं कि कहीं रेयर अर्थ मेटल्स की सप्लाई ना रुक जाए। जरूरी है कि सरकार जिस आग्रह के साथ अभी आत्मनिर्भर भारत की बात कर रही है, यह संकट टलने के बाद भी करती रहे।

 

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