मोदी और केजरीवाल की अपीलों का कितना असर है यह पटाखेबाजों ने दिखा दिया

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Nov 09, 2021

दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी दिल्ली को माना जाता है। इस दिवाली के दौरान दिल्ली ने इस कथन पर अपनी मोहर लगा दी है। दिल्ली के प्रदूषण ने भारत के सभी शहरों को मात कर दिया है। वाय प्रदूषण सूची के मुताबिक प्रदूषण का आंकड़ा 50 अच्छा, 100 तक संतोषजनक, 300 तक खतरनाक, 400 तक ज्यादा खतरनाक और 500 तक अत्यंत खतरनाक माना जाता है लेकिन आप अगर इस दिवाली पर दिल्ली के प्रदूषण की हालत जान लेंगे तो आप दंग रह जाएंगे। इस बार दिल्ली के आस-पास और दिल्ली के अंदर कुछ इलाकों में वायु-प्रदूषण 1100 अंकों को भी पार कर गया है।

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लोगों के दैनंदिन आचरण में परिवर्तन ला सकें, ऐसे नेताओं का आज देश में अभाव है। हमारे पास कोई महर्षि दयानंद, गांधी या सुभाष जैसे नेता नहीं हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन इतने साधु-संत, मुल्ला-मौलवी और पादरी-पुरोहित क्या कर रहे हैं? उन्होंने अपने अनुयायियों को क्या कुछ प्रेरित किया? दिवाली के अलावा भी दर्जनों त्यौहार भारतीय लोग मनाते हैं लेकिन क्या उनमें वे पटाखे छुड़ाते हैं? नहीं, तो क्या वे त्यौहार फीके हो जाते हैं? यों भी दिवाली और पटाखेबाजी का कोई अन्योन्याश्रित संबंध नहीं है। दोनों एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं अर्थात ऐसा नहीं है कि यदि एक नहीं होगा तो दूसरा नहीं होगा। पटाखेबाजी तो दो-चार दिन ही चलती है लेकिन प्रदूषण फैलता है, कई अन्य कारणों से। जैसे धूल उड़ना, पराली जलाना, वातानुकूल की बढ़ोतरी, पुराने ट्रकों, कारों और रेल-इंजिनों का दौड़ना, कोयले से कारखाने चलाना। इन सब प्रदूषणकारी कामों पर रोक लगे या इन्हें घटाया जाए, तब जाकर हम उस लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, जिसकी घोषणा ग्लासगो के जलवायु सम्मेलन में करके हमारे प्रधानमंत्री ने सारी दुनिया की वाहवाही लूटी है। सबसे पहले हमें पश्चिम की उपभोक्तावादी जीवन-पद्धति की नकल छोड़नी होगी और अपने रोजमर्रा के जीवन को प्राचीन भारतीय शैली के आधार पर आधुनिक बनाना होगा।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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