Kashmir की राजनीति के दो चेहरे- Omar Abdullah कब्रों पर सियासत कर रहे हैं, उधर LG Manoj Sinha पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगा रहे हैं

By नीरज कुमार दुबे | Jul 14, 2025

जम्मू-कश्मीर में 13 जुलाई 1931 को मारे गये 22 लोगों को शहीद बताते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देकर जो राजनीति की जाती है, वह इस साल भी हुई। हालांकि 13 जुलाई को पाबंदियों के चलते मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कांफ्रेंस के अन्य नेता तथा अलगाववादी सोच रखने वाले लोग कब्रिस्तान नहीं पहुँच सके लेकिन एक दिन बाद यानि सोमवार 14 जुलाई को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला प्रशासन की रोक के बावजूद कब्रिस्तान पहुंचे। रिपोर्टों के मुताबिक इस दौरान उन्होंने पुलिस के साथ नोकझोंक की और इसके बाद इसे ‘लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला’ बताया।

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मनोज सिन्हा के नेतृत्व में प्रशासन यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि अब जम्मू-कश्मीर सिर्फ राजनीति और प्रतीकों की भूमि नहीं रहेगा, बल्कि यहां पीड़ितों के दर्द को समझा जाएगा और उनके जीवन को दोबारा पटरी पर लाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। नौकरियों का यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए आशा का नया द्वार खोलता है, जिन्होंने आतंकवाद के कारण अपनों को खोया। यह राजनीति नहीं, मानवता और सुशासन का उदाहरण है।

उधर उमर अब्दुल्ला जिस तरह ‘हम गुलाम नहीं’ जैसे बयान देकर खुद को जनता का असली प्रतिनिधि दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, वह एक पुरानी राजनीतिक शैली है, जिसे आज के कश्मीर में लोग अब कम महत्व देते हैं। कश्मीर के लोग अब रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य की बात करना चाहते हैं, न कि बीते हुए इतिहास के जख्म कुरेदकर सियासत चमकाने वाले नेताओं की बात सुनते हैं। आज जम्मू-कश्मीर के सामने असली सवाल यह नहीं है कि कौन कब्रिस्तान गया और किसे रोका गया, असली सवाल यह है कि कौन उस युवा पीढ़ी के लिए अवसर पैदा कर रहा है, जिसने बंदूक और हिंसा के साये में अपना बचपन खोया। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का प्रशासन उसी भविष्य को बनाने की दिशा में व्यावहारिक कदम उठा रहा है। उपराज्यपाल का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि वे दिन अब चले गए जब आतंकवादियों के परिजनों को नौकरी मिलती थी। हम आपको यह भी बता दें कि मनोज सिन्हा ने आतंकवाद के पीड़ित परिवारों के सदस्यों को नियुक्ति पत्र सौंपकर अपना वादा 15 दिन में पूरा कर दिया। उपराज्यपाल ने 29 जून को अनंतनाग में आतंकवाद पीड़ित परिवारों से मुलाकात की थी और उन्हें आश्वासन दिया था कि पीड़ितों के पात्र परिजनों को 30 दिन के भीतर नौकरी दी जाएगी। उपराज्यपाल ने कहा कि प्रशासन अब उन सभी परिवारों के दरवाजे तक पहुंचेगा जो दशकों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं और उनके लिए नौकरियां, पुनर्वास एवं आजीविका की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा मारे गए कश्मीरी पंडितों के मामलों की गहन जांच का भी आश्वासन दिया।

जम्मू-कश्मीर में साफ दिखाई दे रहा है कि एक ओर बीते दौर की राजनीति में उलझे नेता हैं, जो इतिहास के नाम पर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र के प्रतिनिधि उपराज्यपाल हैं, जो वर्तमान के जख्मों को भरने और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए ठोस काम कर रहे हैं। जनता अब यह फर्क अच्छी तरह समझ रही है। कार्यक्रम के दौरान उन लोगों ने अपने अनुभव साझा किए जिनके प्रियजन की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। उन्होंने पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों और उनके समर्थकों की पोल खोली। बाइट।

जहां तक उमर अब्दुल्ला के भड़कने की बात है तो आपको बता दें कि उन्होंने उन्हें और उनके दल को शहीदों के कब्रिस्तान में प्रवेश करने से रोकने पर उपराज्यपाल और पुलिस की कड़ी आलोचना की। साथ ही उमर अब्दुल्ला ने शहीद दिवस से जुड़े घटनाक्रमों की कवरेज को लेकर स्थानीय मीडिया संस्थानों पर भी हमला बोला है। उन्होंने कहा है कि इस कवरेज से यह स्पष्ट हो गया है कि कौन डरपोक है और किसमें साहस है। अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, "जम्मू और श्रीनगर, दोनों के अंग्रेजी और स्थानीय भाषाओं के हमारे स्थानीय समाचार पत्रों को देखिए। आप आसानी से पहचान सकते हैं कि कौन डरपोक है और कौन साहसी।" उन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय मीडिया ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि रविवार को निर्वाचित सरकार और अधिकतर जनप्रतिनिधियों को नजरबंद कर दिया गया था। अब्दुल्ला ने कहा, "डरपोकों ने इस सच्चाई को पूरी तरह दफना दिया कि कल पूरी निर्वाचित सरकार और अधिकांश निर्वाचित प्रतिनिधियों को नजरबंद कर दिया गया था। जिन अखबारों में थोड़ी हिम्मत थी, उन्होंने इसे पहले पन्ने पर छापा है। इस खबर को नजरअंदाज करने वाले बिके हुए लोगों को शर्म आनी चाहिए।"

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