महाभारत काल से शुरू हुई थी अनंत चतुर्दशी की पूजा, जानें इसकी पूजा विधि

By प्रज्ञा पाण्डेय | Sep 18, 2021

19 सितम्बर को अनंत चतुर्दशी है, इसदिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा होती है, इसलिए इसे अंनत व्रत भी कहा जाता है। यह पूजा बहुत खास होती है तो आइए हम आपको इस अनंत चतुर्दशी व्रत की पूजा विधि तथा महत्व के बारे में बताते हैं।

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हिन्दू धर्म में अनंत चतुर्दशी का है खास महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनंत चतुर्दशी व्रत की शुरुआत महाभारत काल से हुई थी। इस दिन व्रत रखने तथा श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से समस्त मनोकामना पूर्ण होती हैं। धन-धान्य, सुख-संपदा और संतान आदि की कामना से यह व्रत किया जाता है। 


अनंत चतुर्दशी के बारे में कुछ खास जानकारी 

अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना होती है। भादो महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चततुर्दशी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और अनंत सूत्र बांधने से सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इस दिन धार्मिक झांकियां निकालने का भी प्रचलन है। अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु के साथ ही यमुना नदी और शेषनाग जी की भी पूजा होती है। 


इन नियमों का पालन कर, व्रत को करें पूरा

 अगर साल भर नहीं बांध सकते तो 14 दिन जरूर बांधें। अनंत चतुर्दशी के दिन अनंत चतुर्दशी की कथा अवश्य सुनें और पढ़ें।


पौराणिक कथा भी है रोचक 

अनंत चतुर्दशी से जुड़ी कथा भी बहुत खास है। इस कथा के अनुसार प्राचीन काल में सुमंत नामक का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी दीक्षा तथा बेटी का नाम सुशीला था। दीक्षा बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। कुछ दिनों के बाद दीक्षा का अचानक से निधन हो गया। तब सुमंत ने दूसरा विवाह किया। दूसरी पत्नी का नाम कर्कशा था। कर्कशा का व्यवहार सुशीला के प्रति अच्छा नहीं था। सुमंत ने सुशीला का विवाह कौणिडन्य नाम के ऋषि के साथ किया। विवाह के पश्चात सुशीला अपने माता-पिता के साथ रहने लगी। लेकिन मां कर्कशा के व्यवहार से दुखी होकर नव दम्पत्ति वहां से चले गए। घर छोड़कर जाने से उन्हें बहुत परेशानी हुई। दोनों एक नदी किनारे रूके थे वहां सुशीला ने देखा कि कुछ स्त्रियों एक-दूसरे धागा बांध रही हैं, पूछने पर पता चला कि उन स्त्रियों अनंत चतुर्दशी का व्रत किया है। सुशीला ने भी व्रत का संकल्प लिया। तब इस व्रत के प्रभाव से सुशीला के पति धन-धान्य से पूर्ण हो गए। एक साल बीतने के बाद सुशीला ने अनंत चतुर्दशी के दिन अपने पति के हाथ में अनंत बांधा और कहानी के बारे में बताया। लेकिन पति बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने अनंत तोड़ कर फेंक दिया। ऐसे ईश्वर का अपमान करने से सुशीला तथा उसके पति का ऐश्वर्य खत्म हो गया। वे दोनों फिर से जंगलों में भटकने लगे। तब एक ऋषि मिले और उन्होंने अनंत चतुर्दशी व्रत का महत्व बताया। दम्पति ने चौदह सालों तक अनंत चतुर्दशी का व्रत किया तब उन्हें वापस से सुख-समृद्धि प्राप्त हुई। ऐसी मान्यता है कि पांडवों ने भी वनवास के दौरान अनंत चतुर्दशी का व्रत किया था। इसके अलावा राजा हरिश्चन्द्र ने भी अपना राज-पाट पाने के लिए इस व्रत का श्रद्धा पूर्वक किया था। 

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अनंत चतुर्दशी पूजा की विधि

अंत चतुर्दशी का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन प्रातः स्नान कर साफ कपड़े पहने तथा विष्णु भगवान की पूजा का संकल्प लें। उसके बाद पूजा हेतु कलश स्थापित करें तथा कलश पर कुश से बने अनंत की स्थापना करें। अब एक डोरी या धागे में कुमकुम, केसर तथा हल्दी से रंगकर अनंत सूत्र बना लें। उसमें 14 गांठें लगाएं तथा इस सूत्र को भगवान विष्णु को अर्पित करें। अनंत चतुर्दशी के दिन अनंत रूप में हरि की पूजा होती है। लेकिन अनंत बांधने के लिए नियम बहुत खास होते हैं। स्त्रियां अनंत को बाएं हाथ में तथा पुरुष अनंत को दाएं हाथ में बांधते हैं। अनंत राखी की तरह रूई या रेशम के कुंकू रंग में रंगे धागे होते हैं तथा इनमें चौदह गांठें होती हैं। यह एक प्रकार की व्यक्तिगत पूजा होती है। 

 

- प्रज्ञा पाण्डेय

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