नैसर्गिक समाजनायक थे अनिल माधव दवे, विवेकानंद जी की तरह जल्दी चले गये

By प्रवीण गुगनानी | May 18, 2021

अनिल माधव दवे, एक ऐसा नाम जो गड्ढा खोदकर पौधा लगाने से लेकर वायुयान उड़ाने तक के कार्य को पूर्ण विशेषज्ञता के साथ ही नहीं अपितु नवाचार के साथ करने में सक्षम हो! एक ऐसा नाम जो सादगी को भी फैशन बना देने में सक्षम हो!! और सबसे बड़ी बात जो वैदिक काल के नायकों की भांति सचमुच नदी पुत्र, नर्मदा पुत्र बन गया हो!!! और भी बहुत कुछ है इस चुम्बकीय, चमत्कारी व चंद्रत्व धारी व्यक्ति के विषय में जो कहा जा सकता है किंतु अभी व्यक्तित्व की चर्चा इतनी ही। जितना मैंने अनिल जी दवे को जाना है उसके अनुसार उनके व्यक्तित्व के विषय में इतना कहना, लिखना भी उनकी दिवंगत आत्मा को कष्टप्रद लग रहा होगा। संयोग कहें या दुर्योग कि वे जीवन के अंतिम वर्षों में राजनीति में भी रहे, किंतु राजनीति तो जैसे उन्हें छू भी नहीं पाई थी। अपने विषय में लिखने, पढ़ने, प्रशंसा, चर्चा से उन्हें बड़ा ही कष्ट होता था। उनके व्यक्तित्व की जितनी चर्चा, प्रसंशा की जाए कम है किंतु उससे भी अधिक बड़ी बात यह है कि उनके व्यक्तित्व से कई गुना बड़ा था उनका कृतित्व। और हां, उनके कृतित्व से भी कहीं बहुत अधिक अधिक बड़ा था उनका रचना संसार। अनिल जी दवे का लेखन या रचना संसार बहुत अधिक विस्तृत या विशाल नहीं है किंतु बहुत अधिक गहरा, प्रभावशाली व परिवर्तनकारी अवश्य है। उनके लेखन में प्रामाणिकता, खोज, शोध, संवेदनशीलता, सुन्दरता, भाव, बिम्ब, प्रतीक का अद्भुत समन्वय होता था। शब्दों के वे खिलाड़ी नहीं थे बल्कि वे शब्दों की अंतरात्मा से तादात्म्य बैठाकर लेखन करने वाले व्यक्ति थे।

आज संभवतः उनकी आत्मा को नदी पुत्र कहना बड़ा सुखकर लगता होगा किंतु मुझे उनको केवल नदी पुत्र के स्थान पर समूची प्रकृति का पुत्र कहना अधिक समयोचित, सटीक व सही लगता है। एक व्यक्ति के रूप में संपूर्ण थे वे, सो सामाजिक कार्यकर्ता बनने में उन्हें बहुत अधिक प्रयास नहीं करने पड़े होंगे ऐसा मुझे लगता है। वे नैसर्गिक समाजनायक थे। अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझना और उस अनुरूप ही अपने निर्णयों में परिवर्तन, लोच व आयाम उत्पन्न करना उन्हें आत्मसंतुष्टि देता था। अपने कार्यकर्ताओं के लिए सदा जागृत व चैतन्य रहना, उनसे संपर्क में बने रहना उनका चिर स्वभाव था। सहयोगियों के परिवार, परिस्थिति व प्रोफेशन आदि को वे व्यवस्थित समझते थे व उस अनुरूप ही उन्हें कार्य सौंपने में उन्हें विशेषज्ञता उपलब्ध थी। मुझे स्मरण है जब मैंने मेरी पहली पुस्तक की प्रस्तावना लिखने हेतु उनसे सीधा आग्रह किया था तब उन्होंने उनके बड़े ही कठिनतम व व्यस्ततम समय में भी मुझे बड़ी ही नम्रता से सहमति दे दी थी। मुझे बड़ा ही आश्चर्य हुआ था क्योंकि इस आग्रह के पूर्व उनकी मेरी केवल एक ही भेंट हुई थी और वह भी लगभग तीन वर्ष पूर्व। इन तीन वर्षों में भी मेरे व अनिल जी के मध्य एकाध बार ही फोन पर चर्चा हुई होगी। मेरी पहली पुस्तक जो कि 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान लिखी गई थी, की न केवल उन्होंने प्रस्तावना लिखी थी बल्कि स्वयं पहल करते हुए उस पुस्तक के विमोचन की भी चिंता उन्होंने की थी। अनिल जी के प्रयासों का ही प्रतिफल था की मेरी उस पुस्तक का विमोचन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान के दौरान बनारस में भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रामलाल जी, अमित शाह जी व श्री अरुण जेटली के शुभहस्ते संपन्न हो पाया था।

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मानव जाति द्वारा प्रकृति के साथ किये जा रहे खिलवाड़ व उसके परिणाम स्वरूप होने वाली केदारनाथ जैसी दुर्घटनाओं व कोरोना जैसी महामारी की संभावनाओं को वे बहुत पहले स्वीकार कर चुके थे व निरंतर समाज को इस हेतु चेता भी रहे थे। नदियों के सरंक्षण, संवर्धन व श्रीवर्धन करने हेतु उनके प्रयास अभिनव, अद्भुत व अद्वितीय थे। नदियों के सरंक्षण हेतु अनिलजी ने नर्मदा में जो प्रयोग किये थे वे प्रतिनिधि, प्रयोग के तौर पर ही किये गये थे। अनिल जी के मानस में यह योजना थी की नर्मदा पर किये जा रहे समूचे प्रयोगों व अभियानों को बाद में व संपूर्ण राष्ट्र की नदियों पर भी लागू करते किंतु इस अथक योद्धा को असमय ही काल ने लील लिया व 18 मई, 2017 को उनका असमय निधन हो गया।

उनके द्वारा किये जा रहे प्रयासों व अभियानों की सार्थकता का ही परिणाम था कि वे पर्यावरण, नदी, जल, जंगल, जमीन आदि विषयों पर होने वाली राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय बैठकों के अनिवार्य अंग हो गए थे। उनके रूचि के सैंकड़ों व्याख्यान वे सतत करते ही चले जा रहे थे। विद्वता, विशेषज्ञता व प्रामाणिकता के साथ जब वे प्रकृति संबंधित विषयों पर बोलते थे तो कतई ऐसा नहीं लगता था कि केवल कोई विशेषज्ञ बोल रहा है; लगता था जैसे कोई नदीपुत्र, वनपुत्र या भूमिपुत्र बोल रहा है। यही कारण था कि राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय बैठकों में उनके सत्र को सभी अनुभागी अनिवार्यतः सुनते व मथते थे।

भारतीयता की अद्भुत पहचान कुंभ मेले को नए सरोकार देने का भी विशाल बीड़ा उन्होंने उठाया था जिसमें वे सफल रहे थे। कुंभ मेले की कम होती प्रासंगिकता, कुंभ के प्रति नई पीढ़ी की उदासीनता व प्रशासनिक असंवेदनशीलता को अनिल जी ने एक झटके में समाप्त करा दिया था। उनकी अभिनव पहल का ही परिणाम था कि मध्य प्रदेश में उज्जैन कुंभ समूचे देश में एक रुचिकर व फैशन का विषय बन गया था।

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आठ वर्ष की आयु से एक स्वयंसेवक के रूप में प्रारंभ हुआ उनका जीवन विभाग प्रचारक से लेकर, एक पायलट, एक नदीपुत्र व एक केंद्रीय मंत्री तक का विस्तार प्राप्त कर चुका था। उनके व्यक्तित्व का समूचा विस्तार भारतीय परम्पराओं से उनके प्रेम का ही परिणाम था। परम्पराओं की रक्षा व धर्मो रक्षितः रक्षति उनका प्रिय ध्येय विषय था। धर्म के प्रति उनके आग्रह ने उन्हें बहुत अधिक तो नहीं किंतु शतांश रूप में विवेकानंद बना दिया था। यह दुखद ही है कि स्वामी विवेकानंद की ही भांति वे भी असमय काल के गाल में समा गए। यदि वे कुछ वर्ष और जीवित रहते तो भारतीय शासन, प्रशासन, शिक्षा, राजनीति अदि आदि में परम्पराओं व धर्म का वैज्ञानिक अद्भुत घोल तैयार कर लेते। ऐसा इसलिए होता कि परम्पराओं में आधुनिकता को खोजना व उनमें नवाचार की प्राणप्रतिष्ठा करने की अद्भुत क्षमता उनके पास थी। दुर्भाग्य कि उनके असमय निधन से ऐसा हो न पाया।

उनके विषय में आज जब उनकी पुण्यतिथि पर लिखना हो रहा है तब जावली, मिस्टर बंटाधार आदि आदि जैसे बहुत से उल्लेखनीय विषयों को स्थानाभाववश छोड़ना पद रहा है। किंतु, उनके अंतिम इच्छा पत्र या वसीयत की चर्चा किये बिना यह लेखन अधूरा ही होगा। उनके इच्छापत्र में लिखी चार पंक्तियां उनकी जीवन यात्रा का निचोड़ हैं, पढ़िए उनका इच्छापत्र-  

1.  संभव हो तो मेरा अंतिम संस्कार बाद्राभान में नर्मदा नदी महोत्सव वाले स्थान पर किया जाये।

2. उत्तर क्रिया के रूप में केवल वैदिक कर्म ही हो, किसी भी प्रकार का दिखावा आडंबर न हो।

3. मेरी स्मृति में कोई भी स्मारक, प्रतियोगिता, पुरस्कार, प्रतिमा आदि न बनाई जाए।

4. जो मेरी स्मृति में कुछ करना चाते हों वे वृक्षों को बोने व उन्हें सरंक्षित कर बड़ा करने का कार्य करें तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। और ऐसा करते हुए भी वे मेरे नाम का प्रयोग न करें।

- प्रवीण गुगनानी

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